भारत पन्ना

हमारे बारे में

भारत पन्ना क्या है, कैसे बनता है, और किन नियमों से चलता है।

अंतिम बदलाव: शनिवार, 29 अगस्त

भारत पन्ना हिंदी की ख़बरों की साइट है। हर सुबह 7 बजे एक अंक खुलता है, जिसमें दस से बारह लेख होते हैं। वे बीते दिन की ख़बरें होती हैं, पिछली शाम लिखी हुई। इसके बाद अगली सुबह तक कुछ नया नहीं आता।

दिन में एक बार ही क्यों

हिंदी की ज़्यादातर साइटें दिन भर छापती रहती हैं। एक ही ख़बर आठ बार अपडेट होती है, हर बार नए शीर्षक के साथ, और पढ़ने वाले को आख़िर तक साफ़ नहीं होता कि असल में हुआ क्या।

हमने उल्टा तय किया। दिन भर पढ़ते हैं, शाम को लिखते हैं, एक बार छापते हैं, और वह अंक अगली सुबह 7 बजे खुलता है। शाम तक सरकारी आँकड़ा आ चुका होता है, दूसरा पक्ष बोल चुका होता है, और दिन भर की आधी अफ़वाहें अपने आप छँट चुकी होती हैं।

इसका एक नुक़सान है। जो लोग हर घंटे ताज़ा अपडेट चाहते हैं, उनके लिए यह साइट नहीं है। जो सुबह चाय के साथ यह जानना चाहते हैं कि बीते दिन क्या हुआ, उनके लिए है।

एक ख़बर पर हमारा सवाल

किसी घटना की मूल जानकारी बीस जगह छपती है। उसे दोहराने का कोई मतलब नहीं।

तो हर ख़बर पर लिखने से पहले हम एक सवाल तय करते हैं: बाक़ी सबने जो नहीं बताया, वह क्या है? कभी वह पिछली बार होता है, जब यही चीज़ हो चुकी थी। कभी वह आँकड़े का पैमाना होता है, कि 6.7 फ़ीसदी अच्छा है या बुरा, किसके मुक़ाबले। कभी वह तरीक़ा होता है, कि यह चीज़ चलती कैसे है। और कभी वह होता है जो सरकारी विज्ञप्ति में लिखा ही नहीं गया।

मलेरिया पर आई एक समीक्षा को सबने "दस साल में 80 फ़ीसदी कमी" कहकर छापा। किसी ने यह नहीं जोड़ा कि भारत 1961 में यही लड़ाई जीत चुका था, देश में सिर्फ़ 49,151 मामले बचे थे, और 1976 तक आँकड़ा 64 लाख पर लौट आया था। वही वापसी जिन वजहों से हुई थी, ताज़ा समीक्षा उन्हीं की चेतावनी दे रही है। वह जोड़ ही असल लेख था, और उसे खोजने में दो खोजें लगीं।

यहाँ क्या-क्या है

सात रोज़ाना सेक्शन हैं। हर एक का काम अलग है, और इसीलिए हर एक पढ़ने में अलग लगता है।

इनके अलावा पाँच सीरीज़ हैं, हफ़्ते के तय दिनों पर। क़लम सोमवार को, हिसाब-किताब मंगलवार को, सियासतनामा बुधवार को, लफ़्ज़ों का सफ़र शुक्रवार को और पुरानी रील रविवार को। इन्हें सीरीज़ के पन्ने पर देखा जा सकता है।

जो हम नहीं करते

कुछ चीज़ें हिंदी की साइटों पर सबसे ज़्यादा पढ़ी जाती हैं। हमने तय किया कि वे यहाँ नहीं होंगी।

हर लेख के नीचे उसका स्रोत

लेख के आख़िर में उसके स्रोत लिखे रहते हैं, लिंक के साथ। ज़्यादातर सरकारी दस्तावेज़ होते हैं: पीआईबी की विज्ञप्ति, मंत्रालय की रिपोर्ट, रिज़र्व बैंक का आँकड़ा, अदालत का आदेश।

नियम यह है कि हर तथ्य के पीछे या तो मूल दस्तावेज़ हो, या दो अलग-अलग भरोसेमंद स्रोत। जो इस कसौटी पर नहीं उतरता, वह छपता नहीं। पूरी शर्तें संपादकीय नीति में लिखी हैं।

एआई की भूमिका

लेख एआई की मदद से तैयार होते हैं। कौन-सी ख़बर छपेगी, उस पर हमारा सवाल क्या होगा, और छपने लायक़ है या नहीं, यह इंसान तय करता है। हर लेख छपने से पहले पूरा पढ़ा जाता है।

यह छिपाने की बात नहीं है। पूरा तरीक़ा एआई और यह साइट पर लिखा है, और उस पन्ने का लिंक साइट के हर पन्ने के नीचे रहता है।

तस्वीरें असली नहीं हैं

लेख के साथ जो चित्र दिखता है, वह फ़ोटो नहीं है। वह हर लेख के लिए अलग से बनाया गया रेखाचित्र है।

यह जान-बूझकर है। एआई से बनी नक़ली फ़ोटो असली घटना की जगह ले लेती है, और पाठक को यह पता भी नहीं चलता। रेखाचित्र देखते ही साफ़ है कि वह चित्र है, तस्वीर नहीं।

नाम के बारे में

पन्ना दो चीज़ें हैं। किताब या अख़बार का एक पन्ना, और एक हरा रत्न। साइट का रंग उसी दूसरे मतलब से आया है।

नाम में जो वादा है वह पहला वाला है: दिन का एक पन्ना, जो पूरा पढ़ा जा सके।

ज़िम्मेदारी किसकी है

अख़बार यह अपने पन्ने पर छापते आए हैं, और इसकी वजह साफ़ है: जिस ख़बर के पीछे कोई नाम न हो, उस पर भरोसा किस बात का।

आदित्य तिवारी

संपादक, भारत पन्ना

sampadak@bharatpanna.com

साइट पर जो कुछ छपता है, उसकी संपादकीय जवाबदेही इन्हीं की है। ख़बरों का चुनाव, हर लेख का कोण, तथ्यों की आख़िरी जाँच और छापने का फ़ैसला इन्हीं का होता है।

सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के तहत शिकायत अधिकारी भी यही हैं। शिकायत के लिए grievance@bharatpanna.com, और पूरा तरीक़ा तथा समय-सीमा संपर्क के पन्ने पर लिखी है।

कोई तथ्य ग़लत लगे तो सुधार के पन्ने पर बताने का तरीक़ा दिया है। जो सुधार हुए हैं, वे भी वहीं दर्ज रहते हैं। हम चुपचाप बदलाव नहीं करते।