एआई और यह साइट
एआई यहाँ क्या करता है, इंसान क्या करता है, और कोई लेख छपने से पहले क्या-क्या होता है।
भारत पन्ना के लेख एआई की मदद से तैयार होते हैं। छपने से पहले हर लेख इंसान पढ़ता है, और छापने का फ़ैसला इंसान का होता है।
यह पन्ना इसीलिए है कि यह बात लेख के नीचे एक लाइन में निपटाने लायक़ नहीं है। पढ़ने वाले का हक़ है कि उसे पूरा तरीक़ा पता हो।
एआई यहाँ क्या करता है
एक अख़बार के दफ़्तर में जो काम सबसे ज़्यादा समय लेता है, वह पढ़ना है। दिन भर में पीआईबी से सौ से ज़्यादा विज्ञप्तियाँ आती हैं, मंत्रालयों की रिपोर्टें आती हैं, अदालतों के आदेश आते हैं, आँकड़े जारी होते हैं। एआई इस ढेर को पढ़ने में काम आता है।
यहाँ उसका इस्तेमाल इन कामों में होता है:
- सारे स्रोत पढ़ना और उनमें से काम की चीज़ छाँटना
- किसी विषय का पुराना रिकॉर्ड खोजना, जैसे कोई सरकारी कार्यक्रम पचास साल पहले कैसा चला था
- लेख का पहला मसौदा तैयार करना
- हर दावे को उसके स्रोत से दोबारा मिलाना
- भाषा साफ़ करना, अनुवाद जैसे वाक्य और भरती के जोड़ हटाना
यह वही काम है जो एक बड़े दफ़्तर में शोध सहायक करते। छोटी जगह पर वह मदद वरना होती ही नहीं।
इंसान क्या करता है
- कौन-सी ख़बर छपेगी। दिन भर की सैकड़ों चीज़ों में से दस-बारह चुनना। यह पूरी तरह संपादक का फ़ैसला है
- उस ख़बर पर हमारी बात क्या होगी। मूल जानकारी सब जगह मिलती है। उसमें हम क्या जोड़ रहे हैं, यह तय करना संपादकीय काम है
- हर लेख पढ़ना। पूरा, छपने से पहले
- छापने का फ़ैसला। यह किसी हाल में अपने आप नहीं होता
आख़िरी बात तकनीक में भी बाँधी गई है। जो व्यवस्था लेख तैयार करती है, उसे छापने का अधिकार दिया ही नहीं गया। वह सिर्फ़ मसौदा बना सकती है। कोई लेख तब तक साइट पर नहीं आ सकता जब तक कोई इंसान उसे मंज़ूरी न दे।
यह इसलिए ऐसे बनाया गया कि नियम अगर सिर्फ़ भरोसे पर टिका हो, तो किसी थके हुए दिन टूट जाता है। ताला लगा हो तो नहीं टूटता।
जो कभी नहीं होता
- कोई बयान गढ़ा नहीं जाता। लेख में जो उद्धरण है, वह किसी ने असल में कहा है, और उसका स्रोत नीचे दिया है
- कोई स्रोत गढ़ा नहीं जाता। नीचे दिया हर लिंक असली है और खुलता है। यह एआई की सबसे जानी-पहचानी ख़राबी है, इसलिए हर लिंक अलग से जाँचा जाता है
- कोई लेख बिना पढ़े नहीं छपता
- किसी असली आदमी या असली घटना की नक़ली तस्वीर नहीं बनती। न फ़ोटो जैसी तस्वीर, न किसी की आवाज़, न कोई ऐसा चित्र जो असली दिखे
तस्वीरों के बारे में
हर लेख के साथ जो चित्र है, वह हाथ से बनाया गया रेखाचित्र है, उस एक लेख के लिए। न वह फ़ोटो है, न फ़ोटो जैसा दिखने की कोशिश करता है।
यह सोचकर तय किया गया। एआई से बनी असली दिखने वाली तस्वीर सबसे ख़तरनाक चीज़ है जो एक ख़बर की साइट कर सकती है, क्योंकि पढ़ने वाले को पता ही नहीं चलता कि वह घटना का सबूत नहीं है। रेखाचित्र देखते ही समझ आ जाता है कि यह चित्र है।
हम इसे छिपाते क्यों नहीं
तीन वजहें हैं।
पहली, यह सीधी बात है। जिस पाठक को यह जानने का हक़ है कि उसने जो पढ़ा वह कैसे बना, उससे यह छिपाना ठीक नहीं।
दूसरी, भारत में क़ानून इसी दिशा में जा रहा है। एआई से बनी सामग्री पर लेबल लगाने की बात सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में आ रही है। जो साइट पहले दिन से यह लिखकर चल रही है, उसे बाद में कुछ बदलना नहीं पड़ेगा।
तीसरी, गूगल का नियम भी यही है। गूगल एआई के इस्तेमाल पर कोई सज़ा नहीं देता। वह उस सामग्री को गिराता है जो बिना जाँच के थोक में बनाई गई हो। यहाँ रोज़ दस से बारह लेख छपते हैं, हर एक पढ़ा जाता है, हर एक के स्रोत लिखे रहते हैं। फ़र्क़ यही है।
भरोसा एआई पर नहीं है
एक बात साफ़ कर देना ज़रूरी है। भरोसा इस बात पर नहीं है कि एआई सही लिखता है। एआई ग़लत लिख सकता है, और लिखता है।
भरोसा उस ढाँचे पर है जो उसके चारों तरफ़ बना है: हर दावे के पीछे मूल दस्तावेज़ या दो स्रोत, हर लिंक की जाँच, हर लेख इंसान का पढ़ा हुआ, और ग़लती निकलने पर उसका खुला दर्ज होना।
ग़लती फिर भी होगी। किसी भी अख़बार में होती है। जब होगी तो सुधार के पन्ने पर लिखी मिलेगी, चुपचाप ठीक नहीं होगी।
कुछ ग़लत दिखे तो
लिखिए: sudhar@bharatpanna.com
लेख का पता और वह लाइन बता दीजिए जो ग़लत लगी। जाँच में बात सही निकली तो सुधार लेख पर भी दिखेगा और सुधार के पन्ने पर भी दर्ज होगा। पूरा तरीक़ा सुधार पर लिखा है।
एआई के इस्तेमाल पर कोई सवाल हो तो संपर्क के पन्ने से पूछा जा सकता है। यह पन्ना जितनी बार तरीक़ा बदलेगा, उतनी बार बदलेगा, और ऊपर लिखी तारीख़ बता देगी कि आख़िरी बार कब बदला।