काम आने वाला
काम की बात
जो पढ़कर कुछ करना आ जाए। ये लेख सालों काम आते हैं।
- सुमित्रा को नौकरी नहीं मिली थी, सुप्रीम कोर्ट ने 38 साल बाद वजह बताई करनाल ज़िले के गुढ़ा गांव में इंडियन ऑयल के एलपीजी प्लांट ने 1988 में सिफ़ारिश किए गए 49 में से 43 उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र भेजे, सुमित्रा को नहीं भेजा। निगम के अपने गवाह ने अदालत में माना कि वह सिर्फ़ इसलिए छूटीं क्योंकि वह औरत थीं, जबकि भर्ती अधिसूचना में औरतें पात्र मानी गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितंबर 2026 को कहा कि उन्हें रोकने वाला कोई क़ानून रिकॉर्ड में कभी नहीं आया, और अनुच्छेद 142 के तहत बारह लाख रुपये मुआवज़ा तय किया। यह लेख उस साल के क़ानून, आज के क़ानून और आज किसी और के साथ ऐसा होने पर जाने के रास्ते बताता है।
- सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्क शून्य हुआ, सोयाबीन-पाम पर पांच फ़ीसदी 24 सितंबर से कच्चे सूरजमुखी तेल पर मूल सीमा शुल्क शून्य और सोयाबीन-पाम पर पांच फ़ीसदी है, पर पीआईबी की घोषणा और सीबीआईसी की असली अधिसूचना एक चीज़ नहीं। कृषि उपकर और सामाजिक कल्याण अधिभार जोड़ने पर कुल शुल्क साढ़े सोलह फ़ीसदी से घटकर साढ़े पांच या ग्यारह फ़ीसदी बैठता है, और एक लीटर पर इसका मतलब है आयातक के लिए साढ़े छह से साढ़े तेरह रुपये तक की गिरावट। पर गोदाम में पड़ा तेल पुराने शुल्क पर ही आयात हुआ है, और यह छूट टिन तक कब पहुंचेगी, इसकी कोई तारीख़ किसी ने नहीं बताई।
- किर्गिज़स्तान के तेरह मेडिकल कॉलेजों का लाइसेंस गया, फ़ैसला वहाँ की सरकार का है, भारत का नहीं: वहाँ पढ़ रहे छात्र अभी क्या करें किर्गिज़स्तान में तेरह निजी मेडिकल यूनिवर्सिटियों का लाइसेंस सितंबर 2026 से निलंबित है, मगर यह राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग की कोई सूची-कार्रवाई नहीं, राष्ट्रपति सद्यर जापारोव के अगस्त 2025 के फ़रमान पर किर्गिज़ स्वास्थ्य मंत्रालय की अपनी राष्ट्रीय मान्यता-जाँच का नतीजा है। भारतीय दूतावास, बिश्केक के दस्तावेज़ों, एनएमसी के अपने नियमों और संसद में सरकार के जवाब से यह लेख वह फ़र्क़ बताता है जिस पर तय होता है कि परिवार को अभी किससे बात करनी है।
- बुज़ुर्ग रिश्तेदार के लिए मुफ़्त वॉकर, व्हीलचेयर या सुनने की मशीन चाहिए, तो राष्ट्रीय वयोश्री योजना में आवेदन का पूरा तरीक़ा यह है राष्ट्रीय वयोश्री योजना बीपीएल या कम आय वाले बुज़ुर्गों को छड़ी से लेकर व्हीलचेयर तक आठ उपकरण मुफ़्त देती है, पर आवेदन की मशीनरी किसी एक जगह लिखी नहीं मिलती। सामाजिक न्याय मंत्रालय और एएलआईएमको के अपने दस्तावेज़ों से यह लेख वह मशीनरी जोड़ता है, और जहां दस्तावेज़ चुप हैं वहां चुप्पी को दर्ज करता है।
- पचास रुपये की अर्ज़ी पर सरकारी कर्मचारी का सेवा-विवाद कैट सुनता है, नियम में छह महीने की समय-सीमा दर्ज है केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी कैट में मूल आवेदन की फ़ीस 50 रुपये है, और यही रक़म 1987 के गजट, कैट के ई-फ़ाइलिंग मैनुअल और इस विज्ञप्ति, तीनों में दर्ज है। प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 की धारा 20 कहती है कि पहले विभाग में प्रतिवेदन दो, धारा 21 कहती है कि उसके बाद एक साल के भीतर अर्ज़ी लगे, और धारा 23 कहती है कि वकील रखना ज़रूरी नहीं। कैट (प्रक्रिया) नियम, 1987 का नियम 14(2) कहता है कि हर आवेदन रजिस्ट्रेशन से छह महीने के भीतर, जहाँ तक हो सके, सुना और तय किया जाए।
- मुक़दमा लंबित हो तो पासपोर्ट अदालत की लिखित अनुमति और एक वचन-पत्र पर मिलता है पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 6(2)(f) उसी पर लागू होती है जिसका मामला किसी आपराधिक अदालत के सामने लंबित है। 25 अगस्त 1993 की अधिसूचना उससे छूट देती है, बशर्ते आप उसी अदालत का आदेश और सादे काग़ज़ पर लिखा वचन-पत्र साथ लगाएँ। सिर्फ़ एफ़आईआर दर्ज हो और जाँच चल रही हो, तो विदेश मंत्रालय की अपनी हिदायत कहती है कि यह धारा लगती ही नहीं।
- लोक अदालत में अपना मामला कैसे भिजवाएँ, उसमें ख़र्च क्या आता है, और फ़ैसले के बाद कौन सा रास्ता बंद हो जाता है मुक़दमा अदालत में है तो आवेदन उसी अदालत में, और दायर ही नहीं हुआ तो तालुक, ज़िला या राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में। फ़ीस कोई नहीं, और पहले जमा की गई अदालती फ़ीस समझौता होने पर वापस मिलती है। बदले में अपील का हक़ ख़त्म हो जाता है।
- रात दस बजे के बाद शोर की शिकायत में डेसिबल नापने की ज़रूरत नहीं ध्वनि प्रदूषण (नियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 में चार क्षेत्र हैं और हर क्षेत्र की दिन-रात की अलग सीमा। रात दस से सुबह छह बजे तक लाउडस्पीकर पर सीधी रोक है, और साल में पंद्रह रातों की जो छूट राज्य सरकार दे सकती है, उसकी तारीख़ें उसे पहले से घोषित करनी होती हैं। शिकायत किसके पास जाती है, उसमें क्या लिखा होना चाहिए, नाप कौन करता है, और लिखित आदेश आने के बाद पुलिस का अधिकार कैसे बदल जाता है, नीचे उसी क्रम में है।
- बॉस के नाम से आया एक संदेश और कंपनी के खाते से डेढ़ करोड़: बॉस स्कैम में बैंक की ज़िम्मेदारी कहाँ तक जाती है इस ठगी में न पासवर्ड चोरी होता है, न ओटीपी बाहर जाता है। भुगतान कंपनी का अपना कर्मचारी करता है, अपने ही लॉगिन से। और ग्राहक की देनदारी सीमित करने वाला रिज़र्व बैंक का पूरा ढाँचा 'अनधिकृत' लेनदेन पर टिका है, जो यह नहीं है।
- ग़लत बेची गई बीमा पॉलिसी पर शिकायत का असल रास्ता: तीस दिन, चौदह दिन और पचास लाख की तीन सीमाएँ मिस-सेलिंग की परिभाषा नियामक के 2024 के विनियम में लिखी है और उसके चार हिस्से हैं। पॉलिसी लौटाने की अवधि अब तीस दिन की है, कंपनी को जवाब चौदह दिन में देना है, और बीमा लोकपाल पचास लाख रुपये तक का मुआवज़ा तय कर सकता है। नियामक की अपनी वेबसाइट पर यह आख़िरी आँकड़ा आज भी तीस लाख लिखा मिलता है।
- राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने आरक्षित डिब्बे में हुई डकैती को सेवा में कमी माना और रेलवे पर 20,000 रुपये मुआवज़ा तय किया 28 अगस्त 2004 की रात अवध-असम एक्सप्रेस के स्लीपर डिब्बे एस-8 में हथियारबंद लोग घुसे थे। बाईस साल बाद राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने तय किया कि रात में दरवाज़े बंद न रखना और डिब्बे में टीटीई या सुरक्षाकर्मी का न होना सेवा में कमी है। मुआवज़ा 20,000 रुपये, वह भी नुक़सान, मानसिक कष्ट और मुक़दमे के ख़र्च को मिलाकर। इसी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश उलटी दिशा में है, और वह इस फ़ैसले में कहीं नहीं है।
- सीएनजी भरवाने से पहले हाइड्रो टेस्ट का काग़ज़: नियम कहाँ लिखा है, जाँच में होता क्या है इंद्रप्रस्थ गैस ने कहा है कि वैध हाइड्रो टेस्ट प्रमाणपत्र के बिना उसके स्टेशनों पर सीएनजी नहीं भरी जाएगी। जिस नियमावली का हवाला दिया जा रहा है, उस नाम की कोई नियमावली मौजूद नहीं है। असल नियम, असल पैमाना और असल केंद्रों की सूची तीन अलग दस्तावेज़ों में है, और तीनों एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।
- माँ के दूसरे विवाह से बेटी का पिता की संपत्ति पर हक़ नहीं जाता, मद्रास हाई कोर्ट ने पुरानी धारा 24 का दायरा खोलकर रख दिया हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की जो धारा 2005 में हटाई जा चुकी है, वह अब भी उन बँटवारों में उठती है जहाँ मृत्यु उससे पहले हुई थी। मद्रास हाई कोर्ट ने कोयंबटूर के एक पुराने मुक़दमे में तय किया कि उस धारा की रोक विधवा तक सीमित थी। पिता का हिस्सा उसकी बेटी तक पहुँचने से नहीं रुकता।
- उपभोक्ता हेल्पलाइन पंद्रह महीनों में 105 करोड़ रुपये वापस दिला चुकी है, पर वह किसी कंपनी को रिफंड का आदेश नहीं दे सकती राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन ने 35 क्षेत्रों की 1,66,189 रिफंड शिकायतें मुक़दमा-पूर्व चरण में निपटाईं। औसत रिफंड लगभग 6,318 रुपये का बैठता है। यह पूरा रास्ता कंपनियों की स्वैच्छिक भागीदारी पर टिका है, और आदेश देने की शक्ति सिर्फ़ उपभोक्ता आयोग के पास है।
- पीजी का अपना कोई लाइसेंस नहीं होता, इसलिए कमरा लेने से पहले जो काग़ज़ माँगने हैं वे इमारत के हैं, और माँगने का एक क्रम है दिल्ली नगर निगम पीजी का लाइसेंस जारी नहीं करता, इसलिए पूछताछ इमारत से शुरू होती है: मंज़ूर नक़्शा, फ़ॉर्म H का अग्नि-सुरक्षा प्रमाणपत्र और उसके साथ हर साल का फ़ॉर्म K। बेंगलुरु और गुरुग्राम के नियम बताते हैं कि और क्या माँगा जा सकता है। हर क़दम के साथ वह क़ानून, जिससे वह क़दम निकलता है, और वह जगह भी जहाँ कोई क़ानून नहीं है।
- गाँव में रसोई गैस की दूसरी बुकिंग पैंतालीस दिन बाद होती थी, शहर में पच्चीस दिन बाद यह अंतर अब ख़त्म कर दिया गया है और दोनों जगह पच्चीस दिन का नियम लागू है। पेट्रोलियम राज्य मंत्री ने कहा कि आदेश तुरंत प्रभाव से लागू है।
- भारत से एमबीबीएस करने वाला सीधे काम शुरू करता है, विदेश से करने वाले को एक और परीक्षा देनी पड़ती है उस परीक्षा में तीन सौ में से डेढ़ सौ अंक चाहिए। पास होने वालों का अनुपात हर सत्र में आधे से नीचे रहा है और कई सत्रों में उससे भी बहुत नीचे।
- नशे की लत है और पुलिस का डर भी: क़ानून में एक धारा है जो इलाज कराने पर मुक़दमे से बचाती है एनडीपीएस अधिनियम की धारा 64ए कहती है कि जो व्यक्ति ख़ुद इलाज के लिए आगे आता है, उस पर कम मात्रा वाले मामले में मुक़दमा नहीं चलेगा। शर्त एक है, और उसे न जानने पर यह छूट वापस ली जा सकती है।
- सरकारी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु हो जाए तो परिवार को क्या-क्या मिलता है, और कहाँ से माँगना पड़ता है पारिवारिक पेंशन पहले दस साल आख़िरी वेतन की आधी मिलती है, चाहे नौकरी कितनी भी छोटी रही हो। मृत्यु उपदान के लिए पाँच साल की न्यूनतम सेवा की शर्त नहीं है। और अनुकंपा नियुक्ति सबसे धीमा रास्ता है।
- पेंशन नहीं आ रही या कम आ रही है, तो शिकायत कहाँ और कैसे दर्ज करें केंद्र सरकार के पेंशनभोगियों के लिए शिकायत का पोर्टल सीपीईएनजीआरएएमएस है। पीपीओ नंबर और पेंशन से जुड़ा मोबाइल नंबर पास रखिए, निपटारे की तय समय-सीमा 21 दिन है।
- मोबाइल चोरी हो जाए तो पहले क्या करें, और किस क्रम में ज़्यादातर गाइड बताती हैं कि क्या करना है। क्रम नहीं बतातीं। और क्रम ही तय करता है कि आपका पैसा बचेगा या नहीं।