ईशान किशन ढाई सौ पर चोट लगने से बाहर गए, और लौटकर दो सौ सत्तर बनाए
दलीप ट्रॉफ़ी के फ़ाइनल में पूर्व क्षेत्र ने दूसरे दिन का खेल 708 पर ख़त्म किया। किशन ने 334 गेंदों पर तीस चौके और सात छक्के लगाए।

चेन्नई के एम ए चिदंबरम स्टेडियम में सोमवार को एक बल्लेबाज़ ढाई सौ रन बनाकर मैदान से बाहर चला गया।
वह आउट नहीं हुआ था। उसे चोट लगी थी।
ऐसी हालत में ज़्यादातर पारियाँ उसी बिंदु पर ख़त्म हो जाती हैं। ढाई सौ रन बन चुके हों तो लौटने की कोई मजबूरी नहीं रहती।
ईशान किशन लौटे, और दो सौ सत्तर पर पहुँचे।
यह लेख उन बीस रनों के बारे में है, और उस चीज़ के बारे में जो वे बीस रन बताते हैं।
पारी का हिसाब
यह पारी 334 गेंदों की थी।
उसमें तीस चौके थे और सात छक्के।
यानी अकेले सीमा रेखा पार करने वाले शॉट से 162 रन आए, और बाक़ी 108 रन दौड़कर बने।
इस अनुपात पर ध्यान दीजिए, क्योंकि यह पारी के मिज़ाज को बताता है। दो सौ सत्तर में से साठ फ़ीसदी रन बाउंड्री से आए, यानी बल्लेबाज़ ने मारने के मौक़े छोड़े नहीं।
पर 334 गेंदों का मतलब यह है कि हर गेंद पर मारा भी नहीं। लंबी पारियों में यही संतुलन सबसे मुश्किल होता है।
पूर्व क्षेत्र ने दूसरे दिन का खेल 708 रन पर ख़त्म किया।
दूसरे छोर पर कुमार कुशाग्र ने 101 रन बनाए और दोनों के बीच 230 रन की साझेदारी हुई।
यह आँकड़ा कहाँ बैठता है
दलीप ट्रॉफ़ी के फ़ाइनल में यह पूर्व क्षेत्र के किसी बल्लेबाज़ का पहला दोहरा शतक है।
पूरी प्रतियोगिता के इतिहास में फ़ाइनल में दोहरा शतक बनाने वाले वे सातवें बल्लेबाज़ हैं।
और यह दलीप ट्रॉफ़ी के इतिहास में किसी विकेटकीपर बल्लेबाज़ का सबसे बड़ा व्यक्तिगत स्कोर है।
तीनों में से आख़िरी वाला सबसे ज़्यादा मायने रखता है, और उसकी वजह आगे है।
दलीप ट्रॉफ़ी है क्या

इस प्रतियोगिता के बारे में बताना ज़रूरी है, क्योंकि यह बाक़ी घरेलू क्रिकेट से अलग बनी है।
रणजी ट्रॉफ़ी राज्यों की टीमों के बीच होती है। दलीप ट्रॉफ़ी क्षेत्रों के बीच होती है, यानी उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम और मध्य।
इसका मतलब यह है कि हर टीम में कई राज्यों के सबसे अच्छे खिलाड़ी एक साथ आते हैं। मुक़ाबला इसलिए कड़ा होता है और स्तर रणजी से ऊपर रहता है।
यह प्रतियोगिता 1961-62 में शुरू हुई थी और इसका नाम दलीपसिंहजी के नाम पर है, जो 1930 के दशक में इंग्लैंड के लिए खेले थे और जिनका नाम भारतीय क्रिकेट की शुरुआती पीढ़ी में गिना जाता है।
पिछले कुछ बरसों में इस प्रतियोगिता के ढाँचे में बदलाव होते रहे हैं। कभी क्षेत्रीय टीमों की जगह चुनी हुई टीमें उतारी गईं, कभी पुराना ढाँचा लौटा। इन बदलावों के पीछे यही सवाल रहा है कि इसे किस काम के लिए चलाया जाए।
क्षेत्रीय ढाँचे का एक फ़ायदा यह है कि इसमें छोटे राज्यों के अच्छे खिलाड़ियों को बड़े मंच पर खेलने का मौक़ा मिलता है, जो उन्हें अपने राज्य की टीम में नहीं मिलता।
यह कहाँ खेली जाती है, यह क्यों मायने रखता है
घरेलू क्रिकेट की भीड़ में दलीप ट्रॉफ़ी की एक ख़ास जगह है।
यह वह प्रतियोगिता है जिसे चयनकर्ता ध्यान से देखते हैं, क्योंकि यह अक्सर सत्र की शुरुआत में होती है और उसमें बड़े नाम आमने-सामने होते हैं।
इसलिए यहाँ बनाया गया रन उतना ही नहीं होता जितना किसी और मैदान पर।
यही वजह है कि यह पारी सिर्फ़ एक स्कोर नहीं है। वह एक जगह पर, एक ख़ास वक़्त पर, ख़ास लोगों के सामने बनाई गई है।
किशन का सवाल क्या रहा है
ईशान किशन झारखंड से आते हैं और वे विकेटकीपर बल्लेबाज़ हैं।
उन्होंने भारत के लिए खेला है और सीमित ओवरों के प्रारूप में उनकी बल्लेबाज़ी की क्षमता पर कभी सवाल नहीं रहा। वे तेज़ खेलते हैं और बाएँ हाथ के बल्लेबाज़ होने से टीम के संतुलन में फ़ायदा देते हैं।
पिछले कुछ बरसों में वे भारतीय टीम की चर्चा से दूर रहे, और उस दौर में उनके बारे में जो सवाल उठा, वह क्षमता का नहीं था।
वह इस बात का था कि लंबे प्रारूप में उनका मन कितना लगता है।
छोटे प्रारूप के अच्छे बल्लेबाज़ों पर यह सवाल अक्सर उठता है। तेज़ खेलने की आदत टेस्ट क्रिकेट में उलटी पड़ सकती है, जहाँ गेंद छोड़ना उतना ही ज़रूरी है जितना मारना।
तीन सौ चौंतीस गेंदें
इसीलिए इस पारी में सबसे अहम संख्या दो सौ सत्तर नहीं है।
वह 334 है।
तीन सौ से ज़्यादा गेंदें खेलने का मतलब है क़रीब आठ घंटे बल्लेबाज़ी करना। इसका मतलब है सैकड़ों बार तय करना कि इस गेंद पर क्या करना है। इसका मतलब है थकान में एकाग्रता बनाए रखना।
यह वही चीज़ है जिसकी टेस्ट क्रिकेट माँग करती है, और यही वह चीज़ है जिस पर उनसे सवाल पूछे जाते रहे।
तीस चौके और सात छक्के यह बताते हैं कि उन्होंने अपना स्वाभाविक खेल छोड़ा नहीं। पर 334 गेंदें यह बताती हैं कि उन्होंने वह खेल एक लंबी पारी के ढाँचे में ढाल लिया।
पूर्व क्षेत्र का अपना हिसाब
टीम के लिहाज़ से भी यह पारी मामूली नहीं है।
पूर्व क्षेत्र में बंगाल, झारखंड, ओडिशा, असम, त्रिपुरा और बाक़ी पूर्वोत्तर के राज्य आते हैं।
घरेलू क्रिकेट में यह क्षेत्र लंबे समय से पश्चिम और उत्तर के मुक़ाबले कमज़ोर माना जाता रहा है। बंगाल का अपना पुराना इतिहास है, पर बाक़ी राज्यों से राष्ट्रीय टीम तक पहुँचने वाले खिलाड़ी कम रहे हैं।
पिछले कुछ बरसों में यह बदला है, ख़ासकर झारखंड और असम से आने वाले खिलाड़ियों की वजह से।
इस फ़ाइनल में जो दो बड़ी पारियाँ आईं, वे दोनों झारखंड से हैं। यह उस बदलाव का हिस्सा है और उसे इसी रूप में पढ़ा जाना चाहिए।
एक क्षेत्र का फ़ाइनल में सात सौ से ऊपर बनाना अपने आप में उस क्षेत्र के बारे में कुछ कहता है, चाहे मैच का नतीजा कुछ भी हो।
लौटने वाला हिस्सा
अब उस बात पर लौटिए जिससे यह लेख शुरू हुआ।
ढाई सौ पर चोट लगने के बाद बाहर जाना और फिर लौटना, यह चुनाव का मामला है।
टीम 708 पर थी, यानी स्कोर की कोई ज़रूरत नहीं बची थी। चोट के बाद आराम करना सबसे समझदारी का काम होता।
लौटने से बीस रन और जुड़े।
क्रिकेट में ऐसे फ़ैसले सीधे तौर पर आँकड़ों में नहीं दिखते, पर वे उस माहौल में दिखते हैं जिसमें टीम खेलती है। ड्रेसिंग रूम में बैठे बाक़ी खिलाड़ियों ने वह देखा, और कोच तथा चयनकर्ताओं ने भी।
708 का मतलब

टीम का स्कोर भी अपनी जगह बड़ा है।
सात सौ से ऊपर का स्कोर घरेलू क्रिकेट में भी आम नहीं है, और फ़ाइनल में तो और कम।
इतना बड़ा स्कोर खड़ा करने का सीधा नतीजा यह होता है कि सामने वाली टीम के पास जीतने का रास्ता लगभग नहीं बचता। उसके सामने सिर्फ़ बचने का सवाल रहता है।
चेन्नई की पिच परंपरागत रूप से स्पिन के लिए मददगार मानी जाती रही है, और उस पर चौथी पारी में बल्लेबाज़ी सबसे मुश्किल होती है।
इसलिए यह स्कोर सिर्फ़ रन नहीं है। वह मैच का ढाँचा है।
कुशाग्र वाला हिस्सा
इस पारी में एक और नाम है जो दब गया, और उसे दर्ज करना चाहिए।
कुमार कुशाग्र ने सौ रन बनाए और किशन के साथ 230 रन की साझेदारी की।
वे भी झारखंड से हैं और वे भी विकेटकीपर बल्लेबाज़ हैं।
यानी एक ही टीम में, एक ही राज्य से, एक ही भूमिका के दो खिलाड़ी, और दोनों ने एक साथ बड़ी पारी खेली।
घरेलू क्रिकेट में ऐसी साझेदारियाँ अक्सर बताती हैं कि किसी राज्य में उस भूमिका के लिए कितनी गहराई है। झारखंड में विकेटकीपिंग की यह परंपरा नई नहीं है, और उसका सबसे बड़ा नाम भारतीय क्रिकेट के इतिहास में दर्ज है।
विकेटकीपर का सबसे बड़ा स्कोर होने का मतलब
इस पारी के तीन रिकॉर्डों में से जो सबसे कम चर्चा में आया, वही सबसे ज़्यादा बताता है।
विकेटकीपर की भूमिका क्रिकेट में सबसे थकाऊ मानी जाती है। वह हर गेंद पर झुकता है और खड़ा होता है, पूरे दिन। एक दिन में यह तीन सौ से ज़्यादा बार होता है।
इसीलिए विकेटकीपरों की बल्लेबाज़ी का औसत आम तौर पर बाक़ी बल्लेबाज़ों से कम रहता है, और उनकी बड़ी पारियाँ कम होती हैं।
जब कोई विकेटकीपर आठ घंटे बल्लेबाज़ी करता है, तो वह उस थकान के ऊपर से करता है जो उसे मैदान में पहले ही हो चुकी होती है।
यही वजह है कि यह रिकॉर्ड, जो प्रतियोगिता के पैंसठ साल के इतिहास में बना है, बाक़ी दोनों से भारी है।
टेस्ट टीम में विकेटकीपर का सवाल
यह पारी जिस वक़्त आई है, वह भी मायने रखता है।
भारतीय टेस्ट टीम में विकेटकीपर की जगह पिछले कुछ बरसों से बहस का विषय रही है, और उसमें दो अलग तरह के दावेदार रहे हैं।
एक तरफ़ वे जो विकेटकीपिंग में बेहतर हैं और बल्लेबाज़ी में ठीक। दूसरी तरफ़ वे जो बल्लेबाज़ी में बेहतर हैं और कीपिंग में ठीक।
चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि टीम को उस समय क्या चाहिए। अगर बल्लेबाज़ी लंबी करनी हो तो दूसरी तरह का खिलाड़ी चुना जाता है।
किशन दूसरी श्रेणी में आते हैं, और इस तरह की पारी उसी दावे को मज़बूत करती है।
चोट लगकर लौटने का नियम
चूँकि इस पारी की सबसे ख़ास बात यही है, इसलिए इसका नियम भी बता देना चाहिए।
क्रिकेट में जब कोई बल्लेबाज़ चोट या किसी और कारण से बीच में मैदान छोड़ता है, तो उसे रिटायर्ड हर्ट दर्ज किया जाता है। वह आउट नहीं माना जाता।
वह उसी पारी में दोबारा बल्लेबाज़ी करने आ सकता है, बशर्ते उसकी टीम के दस विकेट न गिर चुके हों। आम तौर पर वह किसी विकेट गिरने के बाद उतरता है।
अगर टीम की पारी उससे पहले ख़त्म हो जाए, तो उसका स्कोर उसी संख्या पर रुक जाता है और उसे नाबाद माना जाता है।
इसका मतलब यह है कि लौटने का फ़ैसला हमेशा खिलाड़ी के हाथ में नहीं होता। उसे मौक़ा तभी मिलता है जब विकेट गिरे और वक़्त बचा हो।
सोमवार को दोनों बातें उनके पक्ष में रहीं, और उन्होंने उस मौक़े का इस्तेमाल किया।
एक बात जो अभी नहीं कही जा सकती
एक पारी से चयन नहीं होता, और यह बात दोहराई जानी चाहिए।
घरेलू क्रिकेट में बड़े स्कोर हर सत्र में बनते हैं और उनमें से सब खिलाड़ी टीम में नहीं आते। चयन में निरंतरता देखी जाती है, यानी कई पारियों का रिकॉर्ड।
इसलिए इस पारी को उस चीज़ की तरह पढ़ना ठीक होगा जो वह है: एक दरवाज़ा खुलने की आवाज़, दरवाज़ा खुल जाना नहीं।
अगले कुछ महीनों में रणजी ट्रॉफ़ी का सत्र आएगा। अगर वहाँ भी ऐसी पारियाँ आती हैं, तो यह बहस अलग शक्ल ले लेगी।
और वह चीज़ जो आँकड़े में नहीं है

घरेलू क्रिकेट की सबसे मुश्किल बात यह होती है कि उसे देखने वाले कम होते हैं।
रणजी और दलीप के मैच अक्सर ख़ाली स्टेडियमों में खेले जाते हैं। टेलीविज़न पर उनका प्रसारण सीमित रहता है और अख़बारों में जगह कम मिलती है।
ऐसे में आठ घंटे बल्लेबाज़ी करना अपने आप में एक तरह की ज़िद है, क्योंकि उसका तुरंत कोई इनाम नहीं दिखता।
जो खिलाड़ी बड़े मंच से उतरकर इस मंच पर आता है, उसके लिए यह और कठिन होता है। भीड़ नहीं होती, शोर नहीं होता, और हर पारी पर यह सवाल टँगा रहता है कि यह आदमी यहाँ क्यों खेल रहा है।
सोमवार को चेन्नई में उस सवाल का एक जवाब दिया गया, और वह 334 गेंदों में दिया गया।
घरेलू क्रिकेट का अपना सवाल
इस पारी के बहाने एक बड़ी बात भी दर्ज होनी चाहिए, जो अकेले किसी खिलाड़ी की नहीं है।
भारतीय क्रिकेट में पिछले एक दशक में सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि छोटे प्रारूप की लीग साल का एक बड़ा हिस्सा ले लेती है, और उसमें कमाई तथा पहचान दोनों घरेलू लंबे प्रारूप से कहीं ज़्यादा हैं।
इसका असर खिलाड़ियों के चुनाव पर पड़ता है। एक नौजवान बल्लेबाज़ के सामने यह सवाल असली होता है कि वह अपना समय कहाँ लगाए।
बोर्ड ने इस पर रुख़ लिया है और यह कहा जाता रहा है कि राष्ट्रीय टीम में जगह चाहने वालों को घरेलू लंबे प्रारूप में खेलना होगा।
यह नियम अपनी जगह सही है, पर अकेले वह पूरा नहीं पड़ता। जो चीज़ उससे ज़्यादा असर करती है, वह यह है कि जब कोई बड़ा नाम इस प्रारूप में उतरकर आठ घंटे बल्लेबाज़ी करता है, तो बाक़ी खिलाड़ियों के लिए वह एक उदाहरण बन जाता है।
सोमवार की पारी उस लिहाज़ से एक खिलाड़ी की वापसी से बड़ी चीज़ है।
स्रोतभारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड, घरेलू क्रिकेट, न्यूज़ड्रम, फ़ाइनल के दूसरे दिन की रिपोर्ट, आउटलुक, दूसरे दिन का विवरण