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रूसी तेल ख़रीदने वालों पर 100 फ़ीसदी शुल्क का विधेयक अमेरिकी सीनेट से 86-11 से पास है और सदन में अटका है; शुक्रवार को मोदी और पुतिन दिल्ली में मिलते हैं

क्रेमलिन ने मंगलवार को इस शुल्क को 'ग़ैर-क़ानूनी और अस्वीकार्य' कहा। भारत अगस्त में रूस से रोज़ 21 लाख बैरल तेल ले रहा था, कुल आयात का 44 फ़ीसदी। फ़रवरी में अमेरिका ने भारत पर शुल्क 50 से घटाकर 18 फ़ीसदी किया था, यह कहकर कि भारत रूसी तेल बंद करेगा; भारत ने ऐसा कभी नहीं कहा। बीच में होर्मुज़ बंद हुआ और सब बदल गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन हैदराबाद हाउस, नई दिल्ली में, 5 दिसंबर 2025। नौ महीने बाद दोनों फिर उसी शहर में मिल रहे हैं।
तस्वीर: प्रधानमंत्री कार्यालय GODL-India

मंगलवार 8 सितंबर को मॉस्को में क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव से रूसी तेल ख़रीदने वाले देशों पर अमेरिका के 100 फ़ीसदी शुल्क के प्रस्ताव पर सवाल हुआ। पीटीआई के अनुसार उनका जवाब दो शब्दों का था: "ग़ैर-क़ानूनी और अस्वीकार्य।"

उसी ब्रीफ़िंग में उन्होंने पुष्टि की कि राष्ट्रपति पुतिन शुक्रवार 11 सितंबर को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी से मिलेंगे, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से एक दिन पहले।

यह लेख उस बैठक का पूर्वावलोकन नहीं है। यह उन चार काग़ज़ों का क्रम है जो बैठक की मेज़ पर रखे होंगे, चाहे कोई उनका नाम ले या न ले।

पहला काग़ज़: 2 फ़रवरी का समझौता

2 फ़रवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते की घोषणा की। भारतीय सामान पर शुल्क 50 फ़ीसदी से घटकर 18 फ़ीसदी हुआ; उसमें से 25 फ़ीसदी वह अतिरिक्त शुल्क था जो अगस्त 2025 में रूसी तेल ख़रीदने की सज़ा के तौर पर लगा था।

अमेरिकी दूतावास के फ़ैक्टशीट के अनुसार यह 25 फ़ीसदी "भारत की रूसी तेल ख़रीद बंद करने की प्रतिबद्धता के सम्मान में" हटाया गया। केपीएमजी और मॉर्गन लुईस के सारों में समझौते की भारतीय प्रतिबद्धताएँ अमेरिकी सामान पर शून्य शुल्क, रूसी तेल बंद करना और 500 अरब डॉलर से ज़्यादा की भविष्य की ख़रीद के रूप में हैं।

केपीएमजी के सार में तारीख़ें भी हैं: आदेश पर हस्ताक्षर 6 फ़रवरी 2026 को, लागू 7 फ़रवरी से। जेनेरिक दवाओं, रत्नों, हीरों और विमान-कलपुर्ज़ों पर शुल्क पूरी तरह हटा; बचा हुआ 18 फ़ीसदी कपड़े और मशीनरी जैसी चीज़ों पर रहा।

भारत ने रूसी तेल बंद करने की ऐसी कोई प्रतिबद्धता सार्वजनिक रूप से कभी नहीं मानी। सीएनबीसी ने 4 फ़रवरी को लिखा कि क्रेमलिन को नई दिल्ली से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है। यह विरोध आज भी वैसा ही है।

दूसरा काग़ज़: होर्मुज़ और 30 दिन की छूट

चार हफ़्ते बाद दुनिया बदल गई। 28 फ़रवरी को अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर हमलों के बाद ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने 2 से 4 मार्च के बीच होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद घोषित किया और उससे गुज़रने वाले जहाज़ों पर हमले किए। इस रास्ते से रोज़ लगभग 1.3 करोड़ बैरल कच्चा तेल गुज़रता है, दुनिया की खपत का पाँचवाँ हिस्सा। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने इसे तेल बाज़ार के इतिहास का "सबसे बड़ा आपूर्ति-व्यवधान" कहा।

ब्रेंट मार्च में 118 से 120 डॉलर प्रति बैरल तक गया। 8 अप्रैल को पाकिस्तान की मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ और रास्ता थोड़ा खुला; 18 अप्रैल को ईरान ने अमेरिकी बंदरगाह-नाकेबंदी को युद्धविराम का उल्लंघन बताकर उसे फिर बंद किया।

6 मार्च को, यानी बंदी के दो दिन बाद, अमेरिका ने भारत को 30 दिन की छूट दी कि वह रूस से तेल ख़रीद सकता है, सीएनबीसी के अनुसार। जिस प्रतिबद्धता के "सम्मान" में फ़रवरी में शुल्क हटा था, मार्च में उसी से छूट देनी पड़ी। खाड़ी बंद थी; रूस खुला था।

तीसरा काग़ज़: सीनेट का 86-11

मॉस्को क्रेमलिन का सेनेट पैलेस। इसी विधेयक के प्रस्ताव को 8 सितंबर को क्रेमलिन ने ग़ैर-क़ानूनी और अस्वीकार्य कहा।
तस्वीर: एंजेल मिकलाशेव्स्की, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

अब वह विधेयक जिस पर पेस्कोव ने मंगलवार को जवाब दिया।

सीनेटर लिंडसे ग्राहम और रिचर्ड ब्लूमेंथल ने 2025 में "सैंक्शनिंग रशिया ऐक्ट" पेश किया था, जिसमें रूसी तेल ख़रीदने वाले देशों के सामान पर 500 फ़ीसदी तक शुल्क का प्रावधान था। ग्राहम की 12 जुलाई 2026 को मृत्यु हुई। 7 अगस्त 2026 को सीनेट ने उनके नाम वाला संशोधित विधेयक, "लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया ऐक्ट ऑफ़ 2026", 86 के मुक़ाबले 11 मतों से पास किया।

संशोधित विधेयक सीनेट में एस. 5025 है, सदन में एच.आर. 10076। मतदान की तारीख़ पर स्रोत बँटे हैं: विकिपीडिया 7 अगस्त, आरएफ़ई/आरएल 10 अगस्त; गिनती दोनों जगह 86-11।

संशोधित विधेयक राष्ट्रपति को रूसी तेल और गैस के पाँच सबसे बड़े आयातक देशों पर 100 फ़ीसदी तक द्वितीयक शुल्क लगाने की शक्ति देता है, और उन पाँच देशों पर भी जो रूस को प्रतिबंध-चोरी में सबसे ज़्यादा मदद करते हैं। यह शक्ति है, आदेश नहीं: राष्ट्रपति लगा सकता है, लगाने को बाध्य नहीं।

विधेयक प्रतिनिधि सभा में है, जो 1 सितंबर को अवकाश से लौटी; मतदान इस पतझड़ में कभी होना है। यानी आज की तारीख़ में यह क़ानून नहीं है। पर यह उस सीनेट से पास है जहाँ 86 मत किसी एक पार्टी के नहीं होते।

द्वितीयक शुल्क, प्रतिबंध से कैसे अलग है

प्रतिबंध किसी लेन-देन को रोकता है: अमेरिकी बैंक रूसी कंपनी से कारोबार नहीं कर सकता। द्वितीयक शुल्क तीसरे देश को सज़ा देता है: जो देश रूस से तेल ख़रीदे, उसके सामान पर अमेरिका में आयात-कर बढ़ा दिया जाए। पहला रूस पर सीधे चलता है; दूसरा भारत, चीन या तुर्की पर, ताकि वे रूस से ख़रीदना बंद करें।

अगस्त 2025 का 25 फ़ीसदी इसी दूसरे तरह का था, कार्यकारी आदेश से। सीनेट का विधेयक उसी शक्ति को क़ानून में लिखता है और सीमा 100 फ़ीसदी तक ले जाता है। फ़र्क़ यह है कि आदेश एक राष्ट्रपति वापस ले सकता है, जैसा फ़रवरी में हुआ; क़ानून के लिए कांग्रेस चाहिए।

छूट का दरवाज़ा जो क़ानून में ही रखा है

एफ़डीडी ऐक्शन के प्रावधान-सार में शुल्क न अपने-आप लगते हैं, न अपने-आप हटते हैं। राष्ट्रपति छूट दे सकता है, पर पहले कांग्रेस को लिखित प्रमाणपत्र भेजना होगा कि यह अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है। दूसरा पेच घड़ी का: शुल्क उन्हीं देशों पर लगेंगे जो क़ानून बनने के तीस दिन बाद रूसी ऊर्जा की नई ख़रीद करेंगे। प्रतिबंध तभी ख़त्म होंगे जब रूस यूक्रेन को स्वीकार्य शांति समझौता करे और उस पर टिका रहे। उसी क़ानून में ईरान पर 1996 के प्रतिबंध 2031 तक बढ़ते हैं।

सदन में क्यों अटका है

नोटस की रिपोर्ट में सदन की विदेश मामलों की समिति के डेमोक्रेट पक्ष के वरिष्ठतम सदस्य ग्रेगरी मीक्स कहते हैं: "चुनाव से पहले यह कर पाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि हमारे पास ज़्यादा समय नहीं है।" उनका आकलन है कि नवंबर के मध्यावधि चुनाव के बाद ही बात बढ़ेगी। अध्यक्ष ब्रायन मास्ट ने कहा कि विधेयक की "जाँच हो रही है", पर "इस हफ़्ते पूरी नहीं होगी।" फ़िट्ज़पैट्रिक कहते हैं कि वह इसे "शुल्क के साथ, शुल्क के बिना" दोनों तरह वोट करेंगे। आरएफ़ई/आरएल के अनुसार एक प्रस्तावित संशोधन शुल्क की शक्ति आठ देशों तक बाँध देगा।

भारत पाँच में है

केप्लर के आँकड़ों में भारत रूसी कच्चे तेल का चीन के बाद सबसे बड़ा ख़रीदार है। "शीर्ष पाँच" की सूची में भारत बिना किसी बहस के है। इसीलिए यह विधेयक भारत के लिए वैसा ही है जैसा चीन के लिए, और पेस्कोव का "ग़ैर-क़ानूनी" वाक्य नई दिल्ली की मेज़ पर उतना ही है जितना मॉस्को की।

रूस के भारत में राजदूत डेनिस अलीपोव ने इसी हफ़्ते कहा: "हम उतना तेल देने को तैयार हैं जितना भारत को चाहिए।" और इन प्रस्तावों को उन्होंने "दबाव की रणनीति" कहा, "ईमानदार सहयोग" नहीं।

चौथा काग़ज़: अगस्त के 21 लाख बैरल

समुद्र में तेल का एक जहाज़। अगस्त में भारत के कुल आयात का 44 फ़ीसदी रूस से आया।
तस्वीर: Jon Olav Eikenes, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

अब वह आँकड़ा जो सब बहसों के नीचे है।

केप्लर के अनुसार अगस्त 2026 में भारत ने रूस से रोज़ लगभग 21 लाख बैरल कच्चा तेल आयात किया। जून और जुलाई में यह रिकॉर्ड 26 लाख बैरल के आसपास था। अगस्त में रूस का हिस्सा भारत के कुल आयात का 44 फ़ीसदी रहा, जुलाई में रिकॉर्ड 56 फ़ीसदी।

बाक़ी सूची: संयुक्त अरब अमीरात रोज़ 6.11 लाख बैरल, सऊदी अरब 3.85 लाख, वेनेज़ुएला 3.83 लाख, नाइजीरिया 1.29 लाख, ब्राज़ील 1.20 लाख। यानी दूसरे नंबर का देश पहले के तीसरे हिस्से से भी कम है।

गिरावट की वजहें, केप्लर के विश्लेषण में: रिफ़ाइनरियों का रखरखाव, पिछले महीनों की भारी ख़रीद के बाद सामान्य होना, रूस के पास निर्यात के लिए कम तेल, और चीन से बढ़ती होड़।

2026 के महीनों की चाल

पूरे साल का ग्राफ़ इस बहस को दूसरा रंग देता है। द प्रिंट की 9 मार्च की रिपोर्ट में केप्लर के आँकड़े हैं: युद्ध से पहले, फ़रवरी 2022 तक, रूसी कच्चा तेल भारत की टोकरी का सिर्फ़ 2 फ़ीसदी था; 2025 में औसत रोज़ 17 लाख बैरल; और दिसंबर 2025 से फ़रवरी 2026 के बीच हिस्सा दो साल में पहली बार 25 फ़ीसदी से नीचे उतरा, मात्रा रोज़ 10 से 12 लाख बैरल पर। केप्लर के सुमित रितोलिया के अनुसार तब भी रूस भारत का सबसे बड़ा स्रोत बना रहा; गिरावट की वजह उस विश्लेषण में नीति नहीं, प्रतिबंधों का दबाव, भुगतान की अड़चनें और जहाज़रानी की तंगी है।

जुलाई की चोटी पर स्रोत एक नहीं हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड में छपे केप्लर के आँकड़े जून-जुलाई को रोज़ लगभग 26 लाख बैरल बताते हैं, जुलाई का हिस्सा 56 फ़ीसदी। द प्रिंट की 31 जुलाई की रिपोर्ट, केप्लर के ही हवाले से, जुलाई को रोज़ 28 लाख बैरल और हिस्सा "लगभग 55 फ़ीसदी" कहती है। यह लेख दोनों रख रहा है।

56 फ़ीसदी का मतलब

जुलाई का 56 फ़ीसदी उस महीने का आँकड़ा है जब होर्मुज़ दूसरी बार बंद था और खाड़ी का तेल भारत तक कम पहुँच रहा था। फ़रवरी में अमेरिका को जो "प्रतिबद्धता" दिखी थी, उसके पाँच महीने बाद भारत की रूस पर निर्भरता रिकॉर्ड पर थी।

यह विरोधाभास नीति का नहीं, भूगोल का है। भारत का लगभग हर दूसरा बैरल खाड़ी से आता था। खाड़ी बंद हुई, तो बाक़ी जगह से आना था, और बाक़ी जगह में रूस सबसे बड़ा और सबसे सस्ता था। 30 दिन की अमेरिकी छूट इसी को मान लेने का दस्तावेज़ थी।

इस हफ़्ते की खाड़ी

बैठक जिस हफ़्ते हो रही है, उसकी सुर्ख़ियाँ अकेले पढ़ लीजिए। हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों पर मिसाइल हमलों का दावा किया, जिनमें 73 लोग घायल हुए। ईरान ने कहा कि खाड़ी में अमेरिकी ऊर्जा प्रतिष्ठान "असुरक्षित" हैं। संयुक्त अरब अमीरात ने होर्मुज़ की नाकेबंदी से बचने के लिए अपने पूर्वी तट के बंदरगाह बढ़ाने की घोषणा की, यह कहते हुए कि उसका निर्यात "बंधक नहीं रहेगा।"

और मुंबई में: सेंसेक्स मंगलवार को 555 अंक गिरा, लगातार दूसरे दिन, कच्चे तेल के दाम और पश्चिम एशिया की वजह से; रुपया 28 पैसे टूटकर 94.84 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। ये सब द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस की 8 सितंबर की सुर्ख़ियाँ हैं।

यानी शुक्रवार की बैठक उस हफ़्ते में है जब खाड़ी का तेल फिर अनिश्चित है। ऐसे हफ़्ते में रूसी तेल छोड़ने का वादा कोई सरकार नहीं करती, और अमेरिकी विधेयक ऐसे ही हफ़्ते में सदन के सामने है।

फ़रवरी में ट्रंप ने क्या कहा था

सीएनबीसी की 4 फ़रवरी की रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप ने कहा था कि भारत रूसी तेल बंद करके अमेरिका और शायद वेनेज़ुएला से ख़रीदेगा। अगस्त के आँकड़े में वेनेज़ुएला भारत का चौथा स्रोत है, रोज़ 3.83 लाख बैरल; अमेरिका शीर्ष छह में नहीं है। रूस पहले पर है।

फ़रवरी की घोषणा का एक हिस्सा, वेनेज़ुएला, आँकड़ों में दिखता है; उसका मुख्य हिस्सा, रूस का बंद होना, नहीं दिखता।

भारत ने चार दिन पहले क्या कहा

उस "प्रतिबद्धता" पर भारत का ताज़ा जवाब बैठक से चार दिन पहले आया। द ट्रिब्यून के अनुसार 5 सितंबर 2026 को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा: "हमारी ऊर्जा ख़रीद हमारा राष्ट्रीय हित तय करता है, और 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा ज़रूरत पूरी करने की मजबूरी ही हमें चलाती है, और यही हमारी नीति रहेगी।"

एक दिन पहले कीव में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा था: "यह संघर्ष इसलिए नहीं सुलझेगा कि कोई तेल या खनिज या उर्वरक ख़रीद रहा है या नहीं। यह बातचीत, कूटनीति और वार्ता से सुलझेगा।" रूसी तेल बंद करने का ज़िक्र किसी बयान में नहीं है।

ऑयलप्राइस डॉट कॉम के अनुसार पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा कि भारत ने रूस से तेल छूट से पहले भी लिया, छूट के दौरान भी और उसके बाद भी। उसी रिपोर्ट में मंत्री हरदीप सिंह पुरी के हवाले से भंडार हैं: 60 दिन का कच्चा तेल, 60 दिन की एलएनजी, 45 दिन की एलपीजी।

बैठक के एजेंडे में क्या है

शाम को भारत मंडपम, नई दिल्ली। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को यहीं है; मोदी-पुतिन बैठक उससे एक दिन पहले।
तस्वीर: संस्कृति मंत्रालय GODL-India

द फ़ेडरल और पीटीआई के अनुसार शुक्रवार की बैठक में द्विपक्षीय संबंध, व्यापार, रक्षा और यूक्रेन हैं। रूस की ओर से दो ठोस बातें बताई गई हैं: सु-57 लड़ाकू विमान की बिक्री, और नए परमाणु बिजलीघर।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि रूस-यूक्रेन संघर्ष "उन कई मुद्दों में से एक है जो द्विपक्षीय बातचीत में आएँगे।" पेस्कोव ने एक आँकड़ा जोड़ा: रूस के ब्रिक्स देशों के साथ 90 फ़ीसदी भुगतान अब राष्ट्रीय मुद्राओं में होते हैं, डॉलर में नहीं।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को भारत मंडपम में है; भारत की अध्यक्षता का विषय "लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण" है। सदस्य अब ग्यारह हैं, जिनमें ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी हैं; यानी होर्मुज़ के दोनों किनारे एक ही मेज़ पर। द ट्रिब्यून के अनुसार दस साझेदार देश भी हैं, और एजेंडे में ऊर्जा सुरक्षा दर्ज है।

सु-57: वह जो पिछली बार तय नहीं हुआ

दिसंबर 2025 में पुतिन दिल्ली आए थे, हैदराबाद हाउस में बैठक हुई थी। सु-57 तब भी एजेंडे में था और तब कोई घोषणा नहीं हुई। भारत का अपना पाँचवीं पीढ़ी का विमान कार्यक्रम अलग चल रहा है, और अमेरिकी विधेयक में रूसी हथियार ख़रीदने वाले देशों पर पहले से एक अलग क़ानून, काट्सा, लटका हुआ है।

उस दौरे से जो निकला, वह अल जज़ीरा की रिपोर्ट में है: ऊर्जा, कृषि और दवा के समझौता-ज्ञापन, और 2030 तक व्यापार 100 अरब डॉलर पर ले जाने का लक्ष्य। 2025 में व्यापार लगभग 69 अरब डॉलर था, भारत का घाटा 64 अरब डॉलर। पुतिन ने उसी मंच से पूछा था: "अगर अमेरिका को हमारा ईंधन ख़रीदने का हक़ है, तो भारत को वही हक़ क्यों न हो?"

यानी विमान का सौदा तेल से भी ज़्यादा उलझा है, और दोनों उलझनें एक ही वॉशिंगटन से आती हैं।

भारत के लिए इसका मतलब

तीन तारीख़ें। शुक्रवार 11 सितंबर: बैठक, जिसमें तेल की मात्रा पर कोई सार्वजनिक वादा होने की संभावना कम है, क्योंकि भारत ने फ़रवरी में भी नहीं किया था। पतझड़: प्रतिनिधि सभा का मतदान, जो शुल्क की शक्ति को क़ानून बनाएगा या नहीं। और उसके बाद: राष्ट्रपति का फ़ैसला कि शक्ति इस्तेमाल हो या नहीं, और किस पर।

आपके लिए इसका सीधा रिश्ता पेट्रोल पंप से है। रूसी तेल भारत की रिफ़ाइनरियों के लिए सबसे सस्ता कच्चा माल रहा है; उस पर सज़ा का मतलब या तो महँगा तेल, या अमेरिका को महँगा निर्यात। दोनों में से कोई भी विकल्प भारत के हाथ में नहीं है; हाथ में सिर्फ़ यह है कि शुक्रवार को क्या कहा जाए।

उल्टी दिशा का ईंधन

अगस्त में एक रास्ता उल्टी दिशा में चला। टेलंगाना टुडे के अनुसार रूस भेजा गया पेट्रोल गुजरात के वाडीनार में नयारा एनर्जी की रिफ़ाइनरी से गया, जिसमें रूस की रोसनेफ़्ट की हिस्सेदारी है; अगस्त में रूस का समुद्री पेट्रोल आयात 4.70 लाख टन रहा। द मॉस्को टाइम्स के अनुसार पहली खेप 5 अगस्त को पहुँची; रूस ने अपने ईंधन निर्यात पर 2026 के अंत तक रोक लगा रखी है।

जो हमें नहीं मिला

समझौते के बाद भारत की रूसी तेल ख़रीद पर अमेरिका का कोई ताज़ा सार्वजनिक बयान इस हफ़्ते का हमें नहीं मिला। छूट कब ख़त्म हुई, यह कहीं दर्ज नहीं मिला; ऑयलप्राइस डॉट कॉम कहता है कि अमेरिका ने उसे समाप्त होने दिया। अगस्त के 21 लाख बैरल बताते हैं कि ख़रीद चलती रही, छूट थी या नहीं।

और पेट्रोल: टेलंगाना टुडे और आईएएनएस के अनुसार अगस्त में भारत ने रूस को लगभग दस लाख बैरल पेट्रोल निर्यात किया, क्योंकि रूस की रिफ़ाइनरियाँ संकट में हैं। कच्चा तेल एक तरफ़, पेट्रोल दूसरी तरफ़। यह उस रिश्ते की तस्वीर है जिस पर वॉशिंगटन 100 फ़ीसदी शुल्क सोच रहा है।

स्रोतपीटीआई, पेस्कोव का बयान और बैठक की तारीख़, 8 सितंबर 2026, सैंक्शनिंग रशिया ऐक्ट, विधेयक का इतिहास, केप्लर के अगस्त 2026 के आयात-आँकड़े, सीएनबीसी, अमेरिका की 30 दिन की छूट, 6 मार्च 2026, केपीएमजी, फ़रवरी 2026 के भारत-अमेरिका समझौते का सार, एफ़डीडी ऐक्शन, एस. 5025 के प्रावधानों का सार, 30 जुलाई 2026, नोटस, प्रतिनिधि सभा में विधेयक की देरी और सांसदों के बयान, सितंबर 2026, आरएफ़ई/आरएल, सदन का साथी विधेयक और शुल्क-प्रावधान, अगस्त 2026, द ट्रिब्यून, विदेश मंत्रालय और जयशंकर के बयान, 5 सितंबर 2026, द प्रिंट, केप्लर के हवाले से 2024-2026 का आयात-हिस्सा, 9 मार्च 2026, द प्रिंट, जुलाई 2026 का रिकॉर्ड आयात, 31 जुलाई 2026, ऑयलप्राइस डॉट कॉम, छूट की समाप्ति, पुरी और पेट्रोलियम मंत्रालय के बयान, अल जज़ीरा, दिसंबर 2025 के पुतिन-मोदी शिखर के नतीजे, 5 दिसंबर 2025, द फ़ेडरल, 11 सितंबर की बैठक का एजेंडा और पेस्कोव के उद्धरण, द ट्रिब्यून, ब्रिक्स 2026 शिखर की तारीख़, विषय और सदस्य-सूची, टेलंगाना टुडे/आईएएनएस, रूस को भारत का पेट्रोल निर्यात, 30 अगस्त 2026, द मॉस्को टाइम्स, रूस का भारतीय पेट्रोल आयात और निर्यात-रोक, 12 अगस्त 2026

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