ट्रंप ने ईरान का सात दिन का प्रस्ताव ठुकराया, जवाब का इंतज़ार अब भी
शनिवार, 26 सितंबर की शाम सफ़ेद घर से निकलते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, 'मैं उनका प्रस्ताव ठुकराता हूँ।' रविवार को ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने लिखा कि मध्यस्थों से अमेरिका की तयशुदा राय अभी नहीं मिली। जिस योजना पर बात हो रही है, वह हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को सात दिन में फिर खोलने और जून के टूटे समझौते जैसी शर्तों पर बातचीत बहाल करने की है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान का प्रस्ताव ठुकरा दिया है। यह वही प्रस्ताव है जो हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को सात दिन में फिर खोलने की बात करता है। यह उन्होंने ख़ुद कहा, शनिवार 26 सितंबर की शाम, सफ़ेद घर से निकलते हुए, पत्रकारों के सामने। "मैं उनका प्रस्ताव ठुकराता हूँ," ट्रंप ने कहा।
पर अगले ही दिन, रविवार को, ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराग़ची ने जो लिखा, वह इस इनकार को उतना पक्का नहीं बताता। मध्यस्थों की तरफ़ से अमेरिका की "तयशुदा राय" अभी नहीं पहुँची, अराग़ची ने कहा। फ़ैसला उसी राय पर टिका है।
यह प्रस्ताव क्या है? किसके शब्दों में है? भारत के लिए इसके पीछे के दस्तावेज़ क्या कहते हैं? यह रिपोर्ट यहीं से शुरू होती है।
अराग़ची के अपने शब्दों में: सात दिन की योजना
गुरुवार, 24 सितंबर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के हाशिये पर अराग़ची ने पहली बार यह योजना सार्वजनिक की। अगले दिन, शुक्रवार को, उन्होंने सुरक्षा परिषद की इमारत के बाहर पत्रकारों को इसका ब्योरा दिया। उनके अपने शब्दों में यह एक "ठोस सात दिन की योजना" है। यह क़तर के ज़रिए वॉशिंगटन तक पहुँचाई जा चुकी है।
अराग़ची ने जो कहा, वह इस तरह दर्ज है। पहला उद्धरण: "अगर ज़रूरी शर्तें पूरी होती हैं, तो जलडमरूमध्य फिर खुल सकता है और सामान्य समुद्री आवाजाही सात दिन के भीतर बहाल हो सकती है।" दूसरा उद्धरण, एक अलग मौक़े पर: "जिस दिन वे इस योजना को मान लेंगे, अगले ही दिन से यह समयसीमा शुरू हो सकती है, और सात दिन बाद जलडमरूमध्य खुला होगा।" तीसरा उद्धरण सबसे साफ़ है: "अगर शर्तें पूरी होती हैं, तो जलडमरूमध्य सातवें दिन के अंत में खुलेगा, और बातचीत फिर शुरू होगी।"
यहाँ एक फ़र्क़ दर्ज करने लायक़ है। कई अख़बारों ने इसे दिन-दर-दिन बाँटकर लिखा: चार-पाँच दिन में पहले क़दम, छठे दिन जलडमरूमध्य खुलना, सातवें दिन बातचीत शुरू होना। यह बँटवारा पत्रकारों का अपना जोड़ है। अराग़ची के तीनों उद्धरणों में जलडमरूमध्य का खुलना और बातचीत का फिर शुरू होना, दोनों सातवें दिन पर ही टिके हैं। छठे और सातवें दिन का यह बँटवारा उनके अपने शब्दों में कहीं नहीं मिलता। बाक़ी बारीक़ ब्योरा अभी अराग़ची के अपने शब्दों में सार्वजनिक नहीं हुआ।
मांग की सूची छोटी है। अमेरिका जमी हुई ईरानी रक़म छोड़े। तेल पर लगी पाबंदियाँ हटाए। ईरानी बंदरगाहों पर अपनी नौसैनिक घेरेबंदी ख़त्म करे। बदले में जलडमरूमध्य खुलेगा, और परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत फिर शुरू होगी। अराग़ची ने एक बात और जोड़ी: "अमेरिका को जो क़दम उठाने हैं, वे नए नहीं हैं। वे सब समझौता-ज्ञापन में पहले से हैं। वे अमेरिका की पहले से तय प्रतिबद्धताओं का हिस्सा हैं। इसलिए हमें इन्हें लागू करने में कोई दिक़्क़त नहीं दिखती।"
यह समझौता-ज्ञापन 17 जून 2026 को हुआ था, क़तर और पाकिस्तान की मध्यस्थता से। उसने लड़ाई अस्थायी रूप से रोकी थी और बातचीत का रास्ता खोला था। पर वह ज़्यादा नहीं टिका। जलडमरूमध्य पर नियंत्रण किसका रहेगा, इसे लेकर शब्दों की अस्पष्टता पर विवाद हुआ, और 8 जुलाई को समझौता टूट गया। दोनों तरफ़ से हमले फिर शुरू हो गए। अराग़ची जिस योजना की बात कर रहे हैं, वह उसी टूटे समझौते को दोबारा खड़ा करने की कोशिश है।
ईरान की एक और आवाज़ भी उसी हफ़्ते सुनी गई। राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने सीबीएस को दिए एक साक्षात्कार में, जो रविवार प्रसारित होना तय था, कहा कि ईरान अपनी प्रतिबद्धताओं पर टिकेगा। उनकी शर्त थी कि अमेरिका दिखाए "कि उसका इरादा हमारी सरकार या प्रशासन को गिराने का नहीं है।" उन्होंने आगे कहा: "अगर अमेरिका इस तरह आगे बढ़ने को राज़ी है, तो सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा। क्योंकि अभी अमेरिका ने ही हमारा रास्ता रोका है, और ज़ाहिर है ईरान ने भी अपनी तरफ़ से रास्ता रोका है।" पेज़ेश्कियान ने यह भी कहा कि अगर अमेरिका प्रस्ताव मान लेता है, तो संयुक्त राष्ट्र के परमाणु निरीक्षकों को देश में आने दिया जाएगा।
ट्रंप: "यह मंज़ूर नहीं होगा"
शनिवार शाम सफ़ेद घर से निकलते हुए ट्रंप ने पत्रकारों से कुछ पंक्तियाँ कहीं। पूरा बयान इतना ही था। "मुझे सौदे करना भी पसंद है," उन्होंने कहा। फिर जोड़ा: "पर... वह सौदा मंज़ूर नहीं होगा।" एक वाक्य और: "वे चाहते हैं कि जलडमरूमध्य फ़ौरन खुल जाए, क्योंकि वे बुरी तरह हार रहे हैं।"
इससे पहले शुक्रवार को वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अनाम अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से लिखा था कि ट्रंप प्रस्ताव ठुकरा चुके हैं। अख़बार के मुताबिक़ ट्रंप निजी तौर पर मानते हैं कि ईरान उनकी शर्तें पूरी नहीं करेगा। उन्होंने अपने स्टाफ़ से यह भी कहा है कि नवंबर के मध्यावधि चुनाव के बाद बमबारी फिर शुरू होने की संभावना ज़्यादा है। शनिवार का बयान इसी रिपोर्ट की पहली सार्वजनिक पुष्टि था, ख़ुद ट्रंप की आवाज़ में।
इस छोटे बयान में एक तर्क भी है: ईरान समझौता इसलिए चाहता है क्योंकि वह हार रहा है। यह दावा किसी दस्तावेज़ या आँकड़े पर टिका नहीं है। यह ट्रंप का अपना आकलन है।
एक दिन बाद: न इनकार पक्का, न कोई नई शर्त
रविवार, 27 सितंबर की सुबह अराग़ची का बयान आया। समाचार एजेंसी एएनआई ने इसे 11:07 बजे दर्ज किया। अराग़ची ने कहा: "हमने अमेरिकी राष्ट्रपति की पहली प्रतिक्रिया देख ली है, पर मध्यस्थों की तरफ़ से हमें अब तक कुछ नहीं बताया गया।" उन्होंने आगे कहा: "हम मध्यस्थों से निश्चित राय मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं, और उसी के आधार पर फ़ैसला लेंगे।" शर्तों पर उनकी बात सीधी थी: "हमारी शर्तें साफ़ हैं, और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य खोलने की दिशा में कोई भी क़दम इन्हीं शर्तों के पूरा होने पर टिका है, और हम इनसे पीछे नहीं हटेंगे।" आख़िर में उन्होंने कहा: "बातचीत से निकला हल ही इस गतिरोध से बाहर निकाल सकता है।"
तो ट्रंप का सार्वजनिक इनकार और तेहरान का यह इंतज़ार, दोनों एक साथ सच हैं। सीएनएन को दिए एक बयान में सफ़ेद घर के एक अधिकारी ने कहा कि मध्यस्थों के ज़रिए बातचीत "सकारात्मक और रचनात्मक" चल रही है। यह अधिकारी नामज़द नहीं है। पर बयान का मतलब साफ़ है: कैमरे के सामने जो ट्रंप ने कहा, और पर्दे के पीछे उनका प्रशासन जो कर रहा है, दोनों अलग हो सकते हैं।

शनिवार शाम से रविवार दोपहर तक यही स्थिति बनी हुई है। न प्रस्ताव औपचारिक रूप से ठुकराया गया है, न मंज़ूर।
परमाणु फ़ाइल: बीस साल में पहली बार सुरक्षा परिषद तक पहुँचा मामला
जिस समझौते की बात हो रही है, उसका आधा हिस्सा परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत है। यह बातचीत जिस हालत में रुकी थी, वहीं से समझनी होगी।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी, यानी आईएईए, के बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स ने 9 सितंबर 2026 को एक प्रस्ताव पारित किया, दस्तावेज़ संख्या GOV/2026/61। वोट था 23 पक्ष में, 3 विपक्ष में, रूस, चीन और नाइजर, और 8 अनुपस्थित। पिछले बीस साल में यह पहली बार है जब एजेंसी के 35 सदस्यीय बोर्ड ने ईरान को सुरक्षा परिषद तक पहुँचाने वाला प्रस्ताव पास किया।
आईएईए के महानिदेशक राफ़ाएल ग्रॉसी ने वजह इन शब्दों में बताई: "इन ठिकानों और उनसे जुड़ी परमाणु सामग्री के बारे में एजेंसी के पास जानकारी का न होना, और वहाँ सत्यापन गतिविधियाँ न कर पाना, प्रसार के लिहाज़ से गंभीर चिंता की बात है।" यूरोपीय संघ के बयान ने ईरान से "परमाणु सामग्री की मात्रा और ठिकाने पर अद्यतन, सत्यापन योग्य घोषणाएँ" देने और सभी ठिकानों पर निरीक्षण फिर शुरू करने देने की माँग की।

यह मांग नई नहीं है। इससे तीन महीने पहले, 10 जून 2026 को, बोर्ड ने एक और प्रस्ताव पारित किया था। फ़्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका, चारों देशों की तरफ़ से साझा बयान में लिखा गया कि ईरान की "सुरक्षा उपायों से जुड़ी गंभीर चिंताओं को भरोसेमंद ढंग से हल करने में नाकामी, उसके एनपीटी के तहत ज़रूरी व्यापक सुरक्षा उपाय समझौते के उल्लंघन के बराबर है।" उसी बयान में यह भी दर्ज है कि ईरान क़रीब एक साल से अपने चार यूरेनियम संवर्धन ठिकानों और वहाँ रखी संवर्धित यूरेनियम की जानकारी या पहुँच देने से इनकार करता आया है। नतीजतन, बयान के अपने शब्दों में, "महानिदेशक यह पुष्टि नहीं कर पा रहे कि सुरक्षा उपायों के लिहाज़ से इन ठिकानों और वहाँ की परमाणु सामग्री की हालत क्या है।"
ईरान के संयुक्त राष्ट्र मिशन ने सितंबर के प्रस्ताव पर पलटवार करते हुए कहा: "यह हालात सिर्फ़ अमेरिका और इसराइली शासन की आपराधिक आक्रामकता की वजह से बने हैं।" यानी एजेंसी ईरान से जो पहुँच माँग रही है, ईरान उसे युद्ध की परिस्थिति में एक अनुचित माँग बताता है।
"रिपोर्ट" शब्द का यहाँ ख़ास मतलब है। आईएईए के अपने संविधान के अनुच्छेद बारह-सी के तहत, बोर्ड किसी देश को ग़ैर-अनुपालन में पाए जाने पर मामला सुरक्षा परिषद और महासभा, दोनों को भेजता है। यह रास्ता पहले भी खुल चुका है, 2006 में, जब ईरान की फ़ाइल पहली बार परिषद पहुँची थी और उसके बाद बरसों की पाबंदियों का दौर शुरू हुआ। सुरक्षा परिषद तक पहुँचना कोई स्वचालित सज़ा नहीं है। रूस और चीन, दोनों वीटो अधिकार वाले स्थायी सदस्य, ईरान के साथ खड़े रहे हैं। वहाँ किसी नई कार्रवाई की गुंजाइश कम है।
यहीं एक विरोधाभास भी खड़ा होता है। जिस हफ़्तों में बोर्ड ईरान को ग़ैर-अनुपालन में पाकर परिषद भेजने पर वोट कर रहा था, ठीक उन्हीं हफ़्तों में अराग़ची अपनी सात दिन की योजना में परमाणु बातचीत फिर शुरू करने की पेशकश कर रहे थे, और पेज़ेश्कियान निरीक्षकों को देश में आने देने की। एक तरफ़ एजेंसी की साख को चुनौती, दूसरी तरफ़ उसी एजेंसी के साथ भविष्य के सहयोग का वादा। दोनों ईरान के अपने ही हफ़्तों में।
स्नैपबैक: ठीक एक साल पहले लौटीं पाबंदियाँ, अब भी बहस में
आज की तारीख़ में एक इत्तेफ़ाक़ है। ठीक एक साल पहले, 27 सितंबर 2025 की रात 8 बजे, अमेरिकी पूर्वी समय के हिसाब से, संयुक्त राष्ट्र ने ईरान पर छह पुराने प्रस्तावों, 1696, 1737, 1747, 1803, 1835 और 1929 के तहत पाबंदियाँ फिर लागू कर दी थीं। यह अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के अपने प्रेस वक्तव्य में दर्ज है।
यह "स्नैपबैक" तंत्र 2015 के परमाणु समझौते के साथ आए प्रस्ताव 2231 में बना था। इसका मक़सद सीधा था। अगर ईरान समझौते की शर्तें तोड़े, तो किसी एक स्थायी सदस्य के वीटो की परवाह किए बिना पुरानी पाबंदियाँ अपने आप लौट आएँ। फ़्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन ने यह तंत्र 28 अगस्त 2025 को चालू किया, ईरान को अपनी प्रतिबद्धताएँ गंभीर रूप से न निभाने का दोषी बताते हुए। तीस दिन की तय प्रक्रिया के बाद पाबंदियाँ अपने आप लौट आईं।
रुबियो के वक्तव्य के मुताबिक़ लौटी पाबंदियों का दायरा बड़ा है: यूरेनियम संवर्धन, भारी पानी और पुनर्संसाधन से जुड़ी गतिविधियाँ रोकना, बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक पर रोक, पारंपरिक हथियारों के निर्यात पर बंदी, सूचीबद्ध व्यक्तियों और संस्थाओं पर यात्रा-प्रतिबंध और संपत्ति ज़ब्ती, और ईरान से भेजे जा रहे हथियारों या प्रतिबंधित माल को ज़ब्त करने का अधिकार। वक्तव्य की एक पंक्ति सीधी है: "दुनिया धमकियों और आधे-अधूरे क़दमों के आगे नहीं झुकेगी।"
पर मामला इतना सीधा नहीं रहा। रूस और चीन का कहना है कि प्रस्ताव 2231 की मियाद ख़ुद 18 अक्तूबर 2025 को ख़त्म होनी थी। इसलिए उससे ठीक पहले चालू किया गया स्नैपबैक ग़ैर-क़ानूनी है, और पुरानी पाबंदियाँ उसी तारीख़ को वैसे भी अपने आप ख़त्म हो गईं, उनके तर्क में। पश्चिमी देशों का जवाब उलटा है: तंत्र मियाद ख़त्म होने से पहले सही ढंग से चालू हुआ, इसलिए पाबंदियाँ क़ायम हैं। यह बहस अब भी सुलझी नहीं है।
इसका सीधा असर 17 सितंबर 2026 को दिखा। सुरक्षा परिषद में अमेरिका के उस मसौदे पर वोट हुआ जो ईरान पर पाबंदियाँ देख रहे विशेषज्ञ पैनल को एक और साल का विस्तार देता। रूस और चीन ने वीटो कर दिया। बाक़ी ग्यारह सदस्यों ने पक्ष में वोट डाला, पाकिस्तान और सोमालिया अनुपस्थित रहे। 1737 प्रतिबंध समिति अब बिना किसी काम करने वाले निगरानी तंत्र के रह गई है। पाबंदियाँ काग़ज़ पर हैं। उन्हें कौन जाँचेगा, यह सवाल खुला है।
भारत का हॉर्मुज़ हिसाब: संसद में दर्ज आँकड़ा
भारत के लिए यह सिर्फ़ कूटनीति की ख़बर नहीं है। जिस जलडमरूमध्य को सात दिन में खोलने की बात हो रही है, उसी रास्ते से भारत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आता है।
12 मार्च 2026 को पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने लोकसभा में जो बयान दिया, वह पत्र सूचना कार्यालय के रिकॉर्ड में है। उन्होंने कहा: "इस संकट से पहले, भारत के क़रीब 45 फ़ीसदी कच्चे तेल का आयात हॉर्मुज़ रास्ते से होता था।" भारत ने उतना ही तेल जुटा लिया। यह उतनी ही मात्रा है जो बाधित जलडमरूमध्य रास्ते से इसी अवधि में मिलती, प्रधानमंत्री के कूटनीतिक प्रयासों की बदौलत, पुरी के अपने दावे में। उनके मुताबिक़ ग़ैर-हॉर्मुज़ सोर्सिंग बढ़कर तेल आयात का क़रीब 70 फ़ीसदी हो गई, जो संघर्ष शुरू होने से पहले 55 फ़ीसदी थी। भारत अब 40 देशों से कच्चा तेल ख़रीदता है, 2006-07 के 27 देशों के मुक़ाबले।
इसका मतलब है कि उस बयान के वक़्त भी क़रीब 30 फ़ीसदी आयात हॉर्मुज़ के रास्ते ही आ रहा था। यह आँकड़ा अब छह महीने पुराना है। इसके बाद जलडमरूमध्य पर ख़तरा घटा नहीं। सितंबर में बाब-अल-मंडब पर भी नया संकट खड़ा हुआ। इसी डेस्क की 24 सितंबर की रिपोर्ट ने दर्ज किया था कि इसी जलडमरूमध्य में मालवाहक जहाज़ एमवी कैप डाओ पर हमला हुआ, जिसमें उस पर सवार भारतीय नाविक सूरज यादव की जान गई, और यूकेएमटीओ की अपनी फ़ाइल में जुलाई से तब तक ऐसी बासठ घटनाएँ दर्ज थीं। भारत के जहाज़ों और नाविकों, दोनों का हिसाब इसी जोखिम से जुड़ा है।
24 सितंबर को, यानी ट्रंप के इनकार से ठीक दो दिन पहले, पुरी ने दिल्ली में पीएएफ़आई के सालाना मंच पर संकट को लेकर अलग लहज़ा अपनाया। उन्होंने कहा: "संकट पक्का ख़त्म नहीं हुआ है। यह न सिर्फ़ जारी है, बल्कि इसके और बिगड़ने की गुंजाइश भी है। हम अब तक अपने आपको संकट के सबसे बुरे हिस्से से बचाने में कामयाब रहे हैं। पर अगर संकट और बिगड़ता है, तो मैं यह नहीं कह सकता कि हम आगे भी ऐसे ही टिके रह पाएँगे।" उन्होंने साफ़ नाम लिया: हॉर्मुज़ और बाब-अल-मंडब, दोनों पर बंदी की सूरत में सप्लाई पर असर पड़ेगा। दो नाम, एक चेतावनी।
पुरी ने यह भी कहा कि वैश्विक बाज़ार में तेल की कमी नहीं है। दुनिया में रोज़ लगभग 10.2 करोड़ बैरल तेल बनता है, जबकि खपत 9.4 से 9.5 करोड़ बैरल है। यह फ़र्क़ बड़ा है। भारत की रिफ़ाइनिंग क्षमता 26.7 करोड़ टन सालाना है, जिसे 2030 तक बढ़ाकर 32 करोड़ टन करने की योजना है।

यही क्षमता है जिसने युद्ध के सबसे बुरे दौर में भी देश में ईंधन की उपलब्धता बनाए रखी, पुरी के अपने कहे मुताबिक़।
पैसे का हिसाब: आयात बिल में अड़तालीस फ़ीसदी बढ़ोतरी
आँकड़े यह भी बताते हैं कि यह सुरक्षा किस क़ीमत पर मिली। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल, यानी पीपीएसी, के आँकड़ों पर आधारित ट्रिब्यून की 22 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक़, अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच भारत का कच्चे तेल का आयात बिल 74.8 अरब डॉलर तक पहुँच गया, यानी क़रीब 7 लाख करोड़ रुपये। यह पिछले साल की इसी अवधि के 50.4 अरब डॉलर से 48.4 फ़ीसदी ज़्यादा है। रुपये में यह उछाल 62 फ़ीसदी बैठता है।
यह उछाल मात्रा का नहीं, क़ीमत का है। इसी अवधि में भारत ने 10.07 करोड़ टन कच्चा तेल आयात किया, जो पिछले साल के मुक़ाबले 0.4 फ़ीसदी कम है। तेल उतना ही आया। पर उसकी क़ीमत बहुत ज़्यादा चुकानी पड़ी। भारत की अपनी क्रूड बास्केट अगस्त में औसतन 90.19 डॉलर प्रति बैरल पर रही, एक साल पहले के 69.11 डॉलर से 30.5 फ़ीसदी ज़्यादा। पाँच महीनों में भारत ने अतिरिक्त 24.4 अरब डॉलर ख़र्च किए, उसी तेल के लिए जो पिछले साल कम में मिल जाता।
ईरान के साथ भारत का सीधा व्यापार इस पूरे हिसाब में एक छोटा, उलझा हुआ हिस्सा है। सात बरस के अंतराल के बाद भारत ने 2025 में फिर ईरानी तेल ख़रीदना शुरू किया था। 6 फ़रवरी 2026 को ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर दस्तख़त किए। इससे ईरान से व्यापार करने वाले किसी भी देश पर 25 फ़ीसदी तक शुल्क लगाने का अधिकार अमेरिकी विदेश और वाणिज्य विभाग को मिलता है। तीन हफ़्ते बाद, 28 फ़रवरी को, अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमले शुरू कर दिए, और यह युद्ध अब अपने सातवें महीने में है। इन दोनों के बाद भारत और ईरान के बीच सीधा व्यापार किस हाल में है, इसका कोई ताज़ा, पुख़्ता सरकारी आँकड़ा फ़िलहाल सार्वजनिक नहीं मिला। यह अंतर यहाँ खुला छोड़ा जा रहा है।
बातचीत की मेज़ पर भारत की मौजूदगी दर्ज है, भले सीधी न हो। शुक्रवार, 26 सितंबर को न्यूयॉर्क में महासभा के मौक़े पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अराग़ची से मुलाक़ात की। जयशंकर ने ख़ुद एक्स पर लिखा: "ईरान के विदेश मंत्री अराग़ची के साथ बातचीत की सराहना करता हूँ। हमने खाड़ी में संघर्ष को लेकर ताज़ा हालात पर चर्चा की।" उन्होंने आख़िर में जोड़ा: "संपर्क में बने रहेंगे।"
इतनी छोटी पंक्ति में न कोई शर्त है, न कोई वादा। सिर्फ़ बातचीत जारी रहने का भरोसा है, ठीक वैसे ही जैसे अराग़ची और ट्रंप के बीच बाक़ी सब कुछ अभी भरोसे और इंतज़ार पर टिका है।
स्रोतएनपीआर, एवा पुकाच, 26 सितंबर 2026, शाम 4:08 बजे (अमेरिकी पूर्वी समय): ट्रंप और अराग़ची, दोनों के प्रत्यक्ष उद्धरण, अल जज़ीरा, काओलान मगी, 25 सितंबर 2026: अराग़ची के सात दिन के प्रस्ताव पर उनके अपने उद्धरण, अल जज़ीरा, 26 सितंबर 2026: ट्रंप की अस्वीकृति और वॉल स्ट्रीट जर्नल की पिछली रिपोर्ट का ब्योरा, द ट्रिब्यून, एएनआई, 27 सितंबर 2026, सुबह 11:07 बजे: अराग़ची के रविवार के बयान के प्रत्यक्ष उद्धरण, सीएनएन, 26 सितंबर 2026: सफ़ेद घर के एक अधिकारी का बयान कि मध्यस्थों के ज़रिए बातचीत जारी है, अल जज़ीरा, 9 सितंबर 2026: आईएईए बोर्ड का प्रस्ताव, वोट का ब्योरा, ग्रॉसी और ईरानी मिशन के बयान, ब्रिटेन सरकार, विदेश, राष्ट्रमंडल एवं विकास कार्यालय, 10 जून 2026: फ़्रांस-जर्मनी-ब्रिटेन-अमेरिका का साझा बयान, आईएईए बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स, अमेरिकी विदेश मंत्रालय, मार्को रुबियो का प्रेस वक्तव्य, 27 सितंबर 2025: स्नैपबैक पाबंदियों के पूरा होने पर, अल जज़ीरा, 17 सितंबर 2026: सुरक्षा परिषद में रूस-चीन के वीटो का ब्योरा और मत-गिनती, पत्र सूचना कार्यालय, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, 12 मार्च 2026, दोपहर 5:09 बजे: लोकसभा में हरदीप सिंह पुरी का पूरा वक्तव्य, बिज़नेस स्टैंडर्ड, शुभांगी माथुर, 24 सितंबर 2026, रात 10:55 बजे: पीएएफ़आई मंच पर पुरी का बयान, द ट्रिब्यून, आदित्य रांगरू, 22 सितंबर 2026: पीपीएसी के आँकड़ों पर आधारित आयात बिल की रिपोर्ट, द ट्रिब्यून, 26 सितंबर 2026: जयशंकर-अराग़ची मुलाक़ात पर जयशंकर का अपना एक्स बयान, पृष्ठभूमि के लिए देखी गई सामान्य समयरेखा, किसी तथ्य के लिए सीधे उद्धृत नहीं