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काम की बात

सीएनजी भरवाने से पहले हाइड्रो टेस्ट का काग़ज़: नियम कहाँ लिखा है, जाँच में होता क्या है

इंद्रप्रस्थ गैस ने कहा है कि वैध हाइड्रो टेस्ट प्रमाणपत्र के बिना उसके स्टेशनों पर सीएनजी नहीं भरी जाएगी। जिस नियमावली का हवाला दिया जा रहा है, उस नाम की कोई नियमावली मौजूद नहीं है। असल नियम, असल पैमाना और असल केंद्रों की सूची तीन अलग दस्तावेज़ों में है, और तीनों एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।

दिल्ली में इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड का एक सीएनजी स्टेशन, यह तस्वीर सितंबर 2014 की है; प्रमाणपत्र की जाँच अब इसी काउंटर पर, गैस भरने से पहले होती है
तस्वीर: Nikhilb239, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

जाँच केंद्र पर पहला काम सिलेंडर को गाड़ी से उतारना है। वाल्व खोला जाता है, बची हुई गैस ठंडी लपट के रास्ते कम से कम छह मीटर ऊँची चिमनी से हवा में छोड़ी जाती है, फिर टंकी भाप या मंज़ूरशुदा घोल से भीतर तक धोई जाती है। उसके बाद वह पानी से पूरी तरह भर दी जाती है और उस पर वह दबाव डाला जाता है जो उसकी अपनी गर्दन पर ठुका हुआ है।

यह पूरा काम एक ही सवाल का जवाब देने के लिए होता है: दबाव हटने के बाद टंकी अपने पुराने आकार में लौटती है या नहीं।

सितंबर 2026 में इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड ने कहा कि वैध हाइड्रो टेस्ट प्रमाणपत्र गाड़ी में न हो तो उसके स्टेशनों पर सीएनजी नहीं भरी जाएगी। यह पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन, यानी पेसो के उन निर्देशों के बाद हो रहा है जो दिल्ली के एक रिटेल आउटलेट पर हुए सिलेंडर विस्फोट के बाद आए।

सिलेंडर में पानी भरकर दबाव डालना: जाँच होती क्या है

एक गाड़ी के ढाँचे के नीचे कसे हुए सीएनजी सिलेंडर और उन्हें बाँधने वाली पट्टियाँ; यह बिना बॉडी वाली प्रदर्शन गाड़ी है और तस्वीर 2013 की है, भारत की नहीं
तस्वीर: 1tcng, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

हाइड्रो टेस्ट का पूरा नाम जलस्थैतिक प्रतिबल जाँच है, और नाम में ही उसका तरीक़ा छिपा है। सिलेंडर को पानी से भरकर पानी के ही दबाव से फुलाया जाता है, हवा से नहीं। कारण सीधा है: पानी दबाने पर सिकुड़ता नहीं, इसलिए अगर टंकी फटे तो उसमें जमा ऊर्जा बाहर नहीं फेंकी जाती। आईओएजीपीएल अपनी वेबसाइट पर इस काम को दस चरणों में गिनाता है, जिनमें दीवार की मोटाई की अल्ट्रासोनिक जाँच, जलस्थैतिक प्रतिबल जाँच, ख़ाली वज़न की पड़ताल और अंत में सिलेंडर को गाड़ी पर वापस कसना शामिल है।

तीस सेकंड और दस फ़ीसदी: पास-फ़ेल का पैमाना

गैस सिलेंडर नियम, 2016 की अनुसूची 4 में पैमाना अंकों में दिया है। दबाव डालने के बाद उसे कम से कम तीस सेकंड तक बनाए रखना होता है। इन तीस सेकंड में दबाव ज़रा भी गिरा, कहीं रिसाव दिखा, या टंकी में उभार या टेढ़ापन आया, तो यह विफलता मानी जाती है। पास होने की शर्त यह है कि दबाव हटने के बाद जो स्थायी फैलाव बचे, वह जाँच के दौरान आए कुल फैलाव के दस फ़ीसदी से ज़्यादा न हो। भारतीय मानक आईएस 8451 इसमें एक बात और जोड़ता है: डिज़ाइन विनिर्देश में इससे कम प्रतिशत लिखा हो, तो वही मान्य होगा।

200 बार पर चलती है, 335 बार पर जाँची जाती है

कितना दबाव डाला जाए, यह सिलेंडर की गर्दन पर ठुके निशान से तय होता है। गैस सिलेंडर नियम, 2016 की अनुसूची में विदेशी निर्माताओं के जो सीएनजी ऑन-बोर्ड सिलेंडर मंज़ूर हैं, उनका ब्योरा यही बताता है। ऑस्ट्रिया की वर्थिंगटन सिलेंडर्स, अर्जेंटीना की आर्जेंटॉयल और इटली की फ़ाबर इंडस्ट्रीज़, तीनों के आईएसओ 11439 वाले सिलेंडरों पर काम का दबाव 200 बार और जाँच का दबाव 335 बार दर्ज है। ब्रिटेन की यूईएफ़ चेस्टरफ़ील्ड के सिलेंडरों पर 200 और 344 बार। यानी जाँच का दबाव रोज़मर्रा के दबाव से लगभग पौने दो गुना है, डेढ़ गुना नहीं।

हर तीन साल: यह नियम किस नियमावली में है

जो नियमावली इस पूरे मामले को चलाती है, वह गैस सिलेंडर नियम, 2016 है। पेसो के राजपत्र पाठ में उसका नंबर सा.का.नि. 1081(अ) है और उसकी भाषा साफ़ है कि यह गैस सिलेंडर नियम, 2004 के अधिक्रमण में बनी है, सिवाय उन कामों के जो पहले हो चुके। इसका मसौदा 13 अक्तूबर 2015 को सा.का.नि. 779(अ) के तहत आपत्तियों के लिए निकला था। पेसो की अपनी प्रस्तुति में यह वाक्य दर्ज है कि सिलेंडरों की पुनर्जाँच गैस सिलेंडर नियम, 2016 के नियम 35 के मुताबिक़ हर तीन साल पर होगी।

"गैस सिलेंडर नियमावली, 2025" नाम की कोई नियमावली नहीं है

अभियान की ख़बरों में कुछ जगह यह कहा गया कि यह शर्त "गैस सिलेंडर नियम, 2025 के नियम 35(1)" से आती है। पेसो की अपनी अधिनियम-नियमावली सूची में उस नाम की कोई प्रविष्टि नहीं है। उस सूची में जो है, वह इस तरह है: गैस सिलेंडर नियम 2016, फिर 2018 के तीन संशोधन, 2022 का एक, 2024 का हाइड्रोजन से जुड़ा एक, 2025 के चार, और 2026 के तीन, जिनमें तीसरा अभी मसौदा है। 2025 की कोई स्वतंत्र नियमावली नहीं बनी; उस साल जो आया, वह संशोधन था, और संशोधन मूल नियमावली की जगह नहीं लेता।

नियम 35 में तीन का अंक कहीं नहीं है

राजपत्र में नियम 35(1) पढ़िए तो उसमें तीन साल लिखा ही नहीं मिलेगा। उसकी इबारत यह है कि कोई व्यक्ति किसी सिलेंडर में संपीड़ित गैस तब तक नहीं भरेगा जब तक भारतीय मानक ब्यूरो के आईएस 15975 में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर, या मुख्य नियंत्रक द्वारा लिखित में अनुमोदित अवधि के भीतर, उसकी परीक्षा और जाँच न हो चुकी हो। तीन साल की संख्या मानक में है, नियम में नहीं। नियम ने अवधि तय करने का काम भारतीय मानक ब्यूरो को सौंप रखा है, और यही वजह है कि अवधि बदलने के लिए राजपत्र में संशोधन की ज़रूरत नहीं पड़ती।

स्टेशन गैस रोक क्यों सकता है

गैस भरने से इनकार करने का अधिकार स्टेशन को नियम 35 से नहीं मिलता, उसके अपने लाइसेंस से मिलता है। सीएनजी बेचने का लाइसेंस फ़ॉर्म जी में जारी होता है और उस फ़ॉर्म की शर्तों में दूसरी शर्त यह है कि सीएनजी या सीबीजी सिर्फ़ उन्हीं मोटर वाहनों के सिलेंडरों में भरी जाएगी जो मुख्य नियंत्रक से अनुमोदित हों और जिन्होंने मुख्य नियंत्रक की मान्यता प्राप्त जाँच केंद्र पर वैधानिक आवधिक जाँच पास कर रखी हो। यह शर्त पंप पर काम करने वाले पर लागू होती है, ग्राहक पर नहीं, और उसे तोड़ने पर ख़तरा लाइसेंस का होता है।

टिकरी कलां का धमाका, और उसके बाद का निर्देश

20 अगस्त 2026 को द पायनियर ने बाहरी दिल्ली के टिकरी कलां मेट्रो स्टेशन के पास एक ईंधन स्टेशन पर हुए धमाके की रिपोर्ट छापी। एक ट्रक पर लगा सीएनजी सिलेंडर गैस भरे जाते वक़्त फटा। मरने वालों में 25 साल के मनीष, 32 के सनी और 34 के परमजीत थे; घायलों में 32 साल के सुरजीत और 37 के संजय। दिल्ली अग्निशमन सेवा को फ़ोन दोपहर 3 बजकर 37 मिनट पर मिला और छह गाड़ियाँ भेजी गईं। घायलों की संख्या पर स्रोत अलग-अलग हैं: द हिंदू की ख़बर के आधार पर दो घायल दर्ज हैं, पायनियर ने तीन गिनाए, जिनमें एक को मामूली चोट थी। पुलिस ने उस समय कहा था कि धमाके का कारण तुरंत पता नहीं है और जाँच इस बात की होगी कि उपकरण की ख़राबी थी या प्रक्रिया में चूक।

फ़ेल हुआ सिलेंडर वापस नहीं आता

नियम 36 में जो लिखा है, वह मरम्मत की गुंजाइश नहीं छोड़ता। जो सिलेंडर आवधिक जाँच में ठीक न पाया जाए, या जिसका ख़ाली वज़न पाँच फ़ीसदी से ज़्यादा घट चुका हो, या जो किसी और दोष से असुरक्षित पाया जाए, उसमें कोई संपीड़ित गैस नहीं भरी जाएगी और उसे चपटा करके, या इस तरह टुकड़ों में काटकर नष्ट किया जाएगा कि टुकड़ों को वेल्ड करके दोबारा सिलेंडर न बनाया जा सके। नष्ट करने से पहले उस पर के सारे निशान मिटाने होते हैं, मालिक को सूचना देनी होती है, और बंद किया गया इतिहास पत्रक दो साल तक रखना होता है।

बीस साल के बाद बदलना ही है

नियम 36 के स्पष्टीकरण में सेवा आयु की संख्या दी है। ऑन-बोर्ड सीएनजी सिलेंडर और दूसरे सीएनजी सिलेंडरों की सेवा आयु बीस वर्ष है, और पतले कार्बन स्टील से बने ऑटो एलपीजी आधानों की पंद्रह वर्ष, जब तक संबंधित कोड में कुछ और न लिखा हो। यानी हर तीन साल की जाँच पास करते रहने पर भी बीसवें साल के बाद टंकी को नियम अपने आप बाहर कर देता है। इसीलिए अनुसूची 1 के अंकन-नियमों में एक अलग प्रविष्टि है: सीएनजी ऑन-बोर्ड सिलेंडरों, दूसरे सीएनजी सिलेंडरों और ऑटो एलपीजी आधानों पर समाप्ति तिथि अंकित करना ज़रूरी है।

प्रमाणपत्र कहाँ बनता है, कितना ख़र्च, कितना समय

प्रमाणपत्र सिर्फ़ पेसो से मान्यता प्राप्त जाँच केंद्र दे सकता है, कोई भी गैराज या रिट्रोफ़िटमेंट की दुकान नहीं। आईजीएल ने ऐसे केंद्रों की सूची अपनी वेबसाइट पर रखी है। ख़र्च का कोई सरकारी रेट नहीं है। आईओएजीपीएल अपने पन्ने पर अनुमानित ख़र्च 1,200 से 3,000 रुपये के बीच बताता है और साथ यह भी कि यह जगह-जगह बदलता है। समय का हिसाब इस बात पर टिका है कि सिलेंडर उतारना-चढ़ाना पड़ता है, इसलिए गाड़ी एक-दो कार्यदिवस के लिए केंद्र पर रहती है, चाहे जाँच का असल हिस्सा घंटे-डेढ़ घंटे में निपट जाए।

जाँच केंद्र में क्या-क्या होना ज़रूरी है

अनुसूची 4 उस अहाते का नक्शा तक तय करती है। गैस निकालने और वाल्व खोलने का चबूतरा कम से कम तीन गुणा तीन मीटर का हो, उसके चारों तरफ़ दो मीटर ऊँची औद्योगिक बाड़ हो, और सीएनजी के मामले में बाड़ चबूतरे से कम से कम पंद्रह मीटर दूर हो। घुसने का फाटक ज़्यादा से ज़्यादा 1.2 मीटर चौड़ा रखा जाता है, ताकि सिलेंडरों से लदा ट्रक भीतर न जा सके। एक बार में पाँच से ज़्यादा सिलेंडरों की गैस नहीं निकाली जा सकती। दबाव नापने के दो गेज चाहिए, दोनों कम से कम पंद्रह सेंटीमीटर व्यास के, एक जाँच गेज और दूसरा मास्टर गेज। काम का गेज हर महीने अंशांकित होगा, मास्टर गेज हर छह महीने, और तौल मशीन काम के हर दिन मानक बाटों से जाँची जाएगी।

दिल्ली-एनसीआर में सत्रह केंद्र

आईजीएल की सूची में पेसो अनुमोदित सत्रह केंद्र हैं। दिल्ली में दस: दक्षिण में एक, उत्तर में चार, पश्चिम में पाँच। उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर में दो और ग़ाज़ियाबाद में तीन। हरियाणा में दो, एक फ़रीदाबाद में और एक बहादुरगढ़ में। पतों पर नज़र डालिए तो दिल्ली के दसों केंद्र शहर की बाहरी पट्टी पर हैं: अलीपुर, बुराड़ी, वज़ीराबाद, खेड़ा कलाँ, कंझावला, मुंडका, लाडपुर, नजफ़गढ़, द्वारका के बामनोली और छतरपुर के पास मांच गाँव। मध्य, पूर्वी या दक्षिण-पूर्वी दिल्ली में इस सूची पर एक भी केंद्र नहीं है, और गुरुग्राम में भी नहीं।

कानपुर और करनाल के ग्राहक इस सूची में नहीं हैं

आईजीएल अपने पन्ने पर बताता है कि उसका कारोबार दिल्ली, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, ग़ाज़ियाबाद, हापुड़, मुज़फ़्फ़रनगर, शामली, मेरठ, कानपुर, फ़तेहपुर, हमीरपुर, रेवाड़ी, गुरुग्राम, करनाल और कैथल तक फैला है, उसके 725 से ज़्यादा सीएनजी स्टेशन हैं और वह पंद्रह लाख से ज़्यादा वाहनों को गैस देता है। जाँच केंद्रों की जो सूची वह देता है, उसके ऊपर कोष्ठक में लिखा है: दिल्ली और एनसीआर। कानपुर, फ़तेहपुर, हमीरपुर, मेरठ, मुज़फ़्फ़रनगर, शामली, करनाल, कैथल, रेवाड़ी और गुरुग्राम के ग्राहक के लिए उस सूची में एक भी पता नहीं है।

पेसो की अपनी राष्ट्रीय सूची नवंबर 2017 की है

पेसो की वेबसाइट पर "अनुमोदित सीएनजी सिलेंडर जाँच केंद्र" नाम का पन्ना एक ही पीडीएफ़ से जुड़ा है। उस पीडीएफ़ की आख़िरी पंक्ति में लिखा है: अपडेटेड ऑन 03-नवंबर-2017, शाम 6.40 बजे। उसमें प्रविष्टियाँ क्रमांक 116 तक जाती हैं और बहुत सी प्रविष्टियों के सामने "वैध" खाने में 30 सितंबर 2018 दर्ज है। निर्देश इसी संगठन का है, जिस पर पंपों का अभियान टिका है। ग्राहक के लिए इसका मतलब यह है कि केंद्र का पता उसी गैस कंपनी की सूची से लेना पड़ेगा जिससे वह गैस लेता है, नियामक की सूची से नहीं।

कंपनी-फ़िटेड किट और बाहर लगी किट का अलग हिसाब

कारख़ाने में लगी सीएनजी किट और बाद में लगवाई गई किट का रास्ता केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 115बी में अलग-अलग है। बाद में किट लगवाने का काम सिर्फ़ वे कार्यशालाएँ कर सकती हैं जिन्हें किट निर्माता, किट आपूर्तिकर्ता या वाहन निर्माता ने अधिकृत किया हो। रिट्रोफ़िटमेंट के लिए किट का टाइप अप्रूवल जारी होने की तारीख़ से तीन साल तक वैध रहता है और हर बार तीन साल के लिए नवीनीकृत होता है। किट और उसके पुर्जों की जाँच प्रक्रिया एआईएस 024 से तय होती है। फ़ॉर्म जी लाइसेंस की नौवीं शर्त पंप पर यही दोहराती है कि गाड़ी में सड़क परिवहन मंत्रालय के दिशानिर्देशों के अनुसार अनुमोदित क़िस्म की किट लगी हो।

कंप्लायंस प्लेट और हाइड्रो टेस्ट एक चीज़ नहीं

सीएनजी पर चलने वाले एक बजाज ऑटो पर कसी कंप्लायंस प्लेट, जिस पर ठुके अंक और अक्षर पढ़े जा सकते हैं; यह तस्वीर दिसंबर 2014 की और जकार्ता की है, और यह ऑटो भारत में बना है
तस्वीर: Sabung.hamster, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

कंप्लायंस प्लेट धातु की एक छोटी पट्टी है जो इंजन वाले हिस्से में चेसिस के पास कसी जाती है और जिस पर गाड़ी का नंबर, चेसिस नंबर, सिलेंडर नंबर, किट लगाने वाले केंद्र का नाम और अनुपालन प्रमाणपत्र संख्या दर्ज रहती है। यह किट लगने के वक़्त की चीज़ है। हाइड्रो टेस्ट हर तीन साल की चीज़ है। दोनों जुड़ते वहाँ हैं जहाँ अदाणी टोटल गैस का सरकारी अधिसूचना पन्ना कहता है कि आख़िरी जाँच की तारीख़ हर सीएनजी सिलेंडर और कंप्लायंस प्लेट, दोनों पर ठुकी होनी चाहिए। प्लेट लगी होने का मतलब यह नहीं कि जाँच चालू है।

सिलेंडर की गर्दन पर क्या ठुका होता है

अनुसूची 1 में अंकन की सूची लंबी है और उसका एक हिस्सा सीधे इस विवाद से जुड़ा है। सिलेंडर की गर्दन पर निर्माता, मालिक और निरीक्षक के निशान, रोटेशन नंबर, विनिर्देश, ताप-उपचार का संकेत, काम का दबाव, जाँच का दबाव, ख़ाली वज़न और जल क्षमता ठुकी होती है। इनके बीच एक प्रविष्टि यह भी है: आख़िरी जलस्थैतिक जाँच की तारीख़, उस मान्यता प्राप्त जाँच केंद्र के कोड चिह्न के साथ जहाँ जाँच हुई, और वह कोड चिह्न मुख्य नियंत्रक के यहाँ दर्ज होना ज़रूरी है। जाँच पूरी होते ही केंद्र सिलेंडर को भीतर से सुखाकर यही निशान ठोकता है।

काग़ज़ गाड़ी में रखना है या ऐप में चलेगा

नियमावली में ऐप, क्यूआर कोड या डिजिटल प्रति का कोई प्रावधान नहीं है। जो व्यवस्था लिखी है, वह तीन जगहों पर टिकी है: सिलेंडर की गर्दन पर ठुकी तारीख़, गाड़ी पर लगी कंप्लायंस प्लेट, और काग़ज़ का प्रमाणपत्र। पेसो की अपनी प्रस्तुति में सीएनजी स्टेशन पर काम करने वालों के लिए यह वाक्य दर्ज है कि ऑपरेटर चालक के पास मौजूद सिलेंडर का इतिहास कार्ड देखेगा, और उसी में यह भी कि चालक सीएनजी सिलेंडरों और दूसरे अहम पुर्ज़ों का जाँच रिकॉर्ड साथ रखेंगे। यानी काग़ज़ गाड़ी में होना चाहिए, फ़ोन में नहीं।

इतिहास पत्रक में चौदह ख़ाने हैं

जाँच केंद्र जो रिकॉर्ड रखता है, उसे नियमावली इतिहास कार्ड कहती है, और उसके ख़ाने अनुसूची 4 में गिनाए गए हैं: निर्माता और मालिक का नाम, रोटेशन या क्रम संख्या, विनिर्देश, पहली जलस्थैतिक जाँच की तारीख़, निर्माता के जाँच प्रतिवेदन, जाँच का दबाव, अधिकतम कार्य दबाव, जल क्षमता, ख़ाली वज़न, सिलेंडर पर लिखे और असल ख़ाली वज़न का अंतर, ख़ोल की हालत, गैस का नाम, वाल्व की क़िस्म और टिप्पणी। शर्त यह भी है कि समय-समय पर हुए हर बदलाव को इसी पत्रक में दर्ज किया जाए। ख़रीदी हुई पुरानी सीएनजी गाड़ी में यही पत्रक बताता है कि टंकी की उम्र कहाँ पहुँची है।

टैक्सी और ऑटो वालों के लिए अलग बात

नई दिल्ली के आर.के. पुरम में एक सीएनजी स्टेशन के बाहर गैस भरवाने के इंतज़ार में खड़ी सीएनजी टैक्सी; यह तस्वीर फ़रवरी 2008 की है
तस्वीर: Arpanjolly at English Wikipedia, विकिमीडिया कॉमन्स सार्वजनिक डोमेन

आईजीएल का अपना पन्ना कहता है कि उसके इलाक़े में लगभग सारे ऑटो-रिक्शा और टैक्सियाँ सीएनजी पर चलती हैं। इनके लिए दो बातें अलग हैं। पहली, इनका सिलेंडर दिन भर भरता है, इसलिए तीन साल की अवधि जिस दिन ख़त्म होगी, कमाई उसी दिन रुकेगी, जबकि निजी कार वाला कुछ दिन गाड़ी खड़ी करके काम चला सकता है। दूसरी, फ़ॉर्म जी लाइसेंस की दसवीं शर्त सीधे इन्हीं पर लागू होती है: छह से ज़्यादा सवारियाँ किराए पर ढोने के लिए लाइसेंसशुदा गाड़ी में जब तक कोई सवारी बैठी है, गैस नहीं भरी जाएगी, और किसी भी गाड़ी में इंजन चालू रहते नहीं भरी जाएगी।

बीमा और फ़िटनेस पर इसका क्या असर है

फ़िटनेस की तरफ़ का रास्ता दस्तावेज़ों में साफ़ है। अदाणी टोटल गैस का अधिसूचना पन्ना मोटर वाहन अधिनियम की धारा 52 का हवाला देकर कहता है कि हर सीएनजी वाहन के पंजीकरण प्रमाणपत्र पर सीएनजी ईंधन का अंकन होना चाहिए, और उसी पन्ने पर यह चेतावनी है कि पालन न करने पर पंप गैस देने से मना कर सकता है और अभियोजन की ज़िम्मेदारी भी बन सकती है। बीमा की तरफ़ इस पड़ताल में कोई प्राथमिक दस्तावेज़ नहीं मिला जो हाइड्रो टेस्ट की अवधि बीतने को दावे से जोड़ता हो; गैस कंपनियों के पन्ने, नियमावली और पेसो की प्रस्तुति, तीनों बीमा पर चुप हैं।

टंकी को कभी ख़ाली नहीं माना जाता

अनुसूची 4 का एक हिस्सा उन लोगों के लिए है जो टंकी को छूते हैं। जाँच के लिए भेजे गए सिलेंडर पहले ख़ाली किए जाएँ और उन पर "ख़ाली" का लेबल लगे, पर लेबल के बावजूद निर्माता के कारख़ाने के बाहर के हर सिलेंडर को दबाव वाली गैस से भरा हुआ मानकर ही बरता जाएगा। भीतर जंग जमी हो तो उसे हटाने के दो ही रास्ते नियमावली मानती है: शॉट ब्लास्टिंग या घूमते तार के ब्रश से सफ़ाई, या भट्ठी में बर्न-आउट उपचार, जिसमें तापमान 300 डिग्री सेल्सियस से ऊपर नहीं जाएगा और समय एक घंटे से ज़्यादा नहीं।

तारीख़ें जो आपस में नहीं मिलतीं

इस पूरे मामले में सबसे उलझा हुआ हिस्सा हवाले हैं। आईओएजीपीएल का हाइड्रो टेस्ट पन्ना अब भी आईएस 8451:2009 और "गैस सिलेंडर नियम, 2004" का हवाला देता है, जबकि 2004 की नियमावली 2016 में अधिक्रमित हो चुकी है। अदाणी टोटल गैस का पन्ना भी 2004 का ही नाम लेता है। आईएस 8451 की अपनी अनुसूची अ में मीथेन के सिलेंडरों के लिए आवधिक जाँच अंतराल पाँच साल दर्ज है, तीन नहीं, क्योंकि वह तालिका औद्योगिक सिलेंडरों की है और गाड़ी में लगी टंकी की अवधि नियम 35 के रास्ते आईएस 15975 से आती है। पंप पर खड़े ग्राहक के लिए इन सबका जोड़ एक ही वाक्य है: प्रमाणपत्र पर लिखी अगली जाँच की तारीख़ उस दिन से आगे होनी चाहिए जिस दिन गाड़ी नोज़ल के नीचे खड़ी है।

जो काग़ज़ में नहीं है

नियमावली यह नहीं बताती कि जिस दिन प्रमाणपत्र की मियाद ख़त्म होगी, उस दिन घर से कुछ किलोमीटर दूर खड़ी गाड़ी को जाँच केंद्र तक कैसे पहुँचाया जाए। सिलेंडर में बची गैस के साथ गाड़ी चल सकती है, पर नई गैस नहीं मिलेगी, और जाँच केंद्र पर पहुँचने से पहले टंकी की गैस निकाली जानी है। दिल्ली की सूची के दस में से नौ केंद्र उत्तर और पश्चिम की श्रेणियों में दर्ज हैं। पेसो की राष्ट्रीय सूची में क्रमांक 116 तक की प्रविष्टियाँ नवंबर 2017 के बाद से नहीं बदली हैं।

स्रोतपेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन: गैस सिलेंडर नियम, 2016 का द्विभाषी राजपत्र पाठ, सा.का.नि. 1081(अ), 22 नवंबर 2016, पेसो: अनुमोदित सीएनजी सिलेंडर जाँच केंद्रों की राष्ट्रीय सूची, दस्तावेज़ पर अंकित तिथि 3 नवंबर 2017, पेसो: अधिनियम और नियमावलियों की सूची, जिसमें गैस सिलेंडर संशोधन नियमावलियाँ 2018 से 2026 तक दर्ज हैं, इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड: पेसो अनुमोदित हाइड्रो टेस्ट केंद्रों की सूची (दिल्ली और एनसीआर), इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड: सीएनजी कारोबार का अपना ब्योरा, स्टेशन और वाहन संख्या, द हिंदू (कारोबार): आईजीएल के अभियान की ख़बर, 9 सितंबर 2026, पीएनजीआरबी पर प्रकाशित पेसो की प्रस्तुति, 'सीएनजी स्टेशनों के लिए वैधानिक नियम', डॉ. करुणामय पांडेय, उप मुख्य विस्फोटक नियंत्रक, भारतीय मानक आईएस 8451:2009, निर्बाध इस्पात गैस सिलेंडरों की आवधिक जाँच और परीक्षण की आचार संहिता, इंडियन ऑयल-अदाणी गैस प्राइवेट लिमिटेड: हाइड्रो टेस्ट की प्रक्रिया और अनुमानित ख़र्च, अदाणी टोटल गैस: सीएनजी वाहनों से जुड़ी सरकारी अधिसूचनाओं का पन्ना, केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 का नियम 115बी, सीएनजी वाहनों के मानक और किट अनुमोदन, द पायनियर: टिकरी कलां के सीएनजी पंप पर हुए धमाके की रिपोर्ट, 20 अगस्त 2026

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