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संचार साथी से एक महीने में 75 हज़ार फ़ोन लौटे, ऐप अनिवार्य करने पर सवाल बरक़रार

बरामदगी का रिकॉर्ड ऐसे वक़्त आया है जब हर नए फ़ोन में यह ऐप पहले से डालने के फ़ैसले पर विपक्ष निजता का सवाल उठा रहा है।

संचार साथी से एक महीने में 75 हज़ार फ़ोन लौटे, ऐप अनिवार्य करने पर सवाल बरक़रार

दूरसंचार विभाग के संचार साथी मंच से एक महीने में 75 हज़ार से ज़्यादा गुम और चोरी हुए मोबाइल फ़ोन उनके मालिकों तक पहुँचे। शुरुआत के बाद यह किसी एक महीने का सबसे बड़ा आँकड़ा है।

संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने शुक्रवार को इसके लिए विभाग और राज्यों की पुलिस की सराहना की।

आँकड़े से ज़्यादा उसकी ढलान अहम है। अप्रैल 2025 से जुलाई 2026 के बीच हर महीने बरामद होने वाले फ़ोन तीन गुना हुए, यानी 201 फ़ीसदी की बढ़ोतरी।

यह रिकॉर्ड ऐसे समय आया है जब यही ऐप एक अलग वजह से चर्चा में है। सरकार ने तय किया है कि हर नए मोबाइल फ़ोन में संचार साथी पहले से डला हो। विपक्ष ने इस पर निजता और निगरानी का सवाल उठाया है। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी सहित कई नेताओं ने पूछा है कि नागरिक के फ़ोन में सरकारी ऐप अनिवार्य रूप से क्यों डाला जाए।

सरकार का कहना है कि ऐप हटाया जा सकता है और उसका मक़सद फ़ोन की सुरक्षा है।

बरामदगी बढ़ी क्यों

पुलिस बल नहीं बढ़ा। जो बदला, वह सूचना का रास्ता था।

पहले शिकायत दर्ज करने के बाद नागरिक को यह पता नहीं चलता था कि उसका फ़ोन कहाँ ट्रेस हुआ। अब उसे एसएमएस, ईमेल और ऐप पर उस थाने का नाम भेजा जाता है जहाँ मामला पहुँचा है।

दूसरा बदलाव जाँच अधिकारी के काम आया। चोरी हुए हैंडसेट में जो नया सिम डाला जाता है, उसका ब्योरा और कोई वैकल्पिक नंबर अब सीधे पुलिस को दिया जाता है।

तीसरा बदलाव फ़ोन लौटने के बाद का है। बरामद हैंडसेट सौंपते समय नागरिक को एसएमएस से सलाह दी जाती है कि उसे फ़ैक्टरी रीसेट कर लें, ताकि बीच के दिनों में डाला गया कोई मैलवेयर बचा न रहे।

तीनों बदलाव एक ही क़िस्म के हैं: जो जानकारी पहले सिस्टम के भीतर पड़ी रहती थी, वह अब उस तक पहुँचा दी जाती है जिसे उसकी ज़रूरत है।

ब्लॉक होने का मतलब

पोर्टल या ऐप पर फ़ोन दर्ज होते ही वह भारतीय दूरसंचार नेटवर्क पर ब्लॉक हो जाता है। उसमें किसी भी कंपनी का सिम डालकर उसे चलाया नहीं जा सकता।

इसके बाद अगर कोई हैंडसेट चालू करने की कोशिश करता है, नेटवर्क उस कोशिश को दर्ज कर लेता है। यही सूचना दूरसंचार विभाग की डिजिटल इंटेलिजेंस यूनिट और राज्य पुलिस तक जाती है।

चोरी हुआ फ़ोन बेकार हो जाना ही उसे बाज़ार में बिकने से रोकता है।

ब्लॉक की सीमा

यह व्यवस्था जिस डेटाबेस पर चलती है, उसका नाम केंद्रीय उपकरण पहचान रजिस्टर है।

यह हैंडसेट के आईएमईआई नंबरों की एक केंद्रीय सूची है, जिसमें उपकरणों को श्वेत, धूसर और काली सूचियों में रखा जाता है। यह सूची देश के दूरसंचार ऑपरेटरों के अपने रजिस्टरों तक समय-समय पर भेजी जाती है, और नेटवर्क हर बार आईएमईआई जाँचकर तय करता है कि उस उपकरण को सेवा दी जाए या नहीं।

इसकी दो सीमाएँ हैं जिन्हें साथ में पढ़ना चाहिए।

पहली, यह ब्लॉक भारतीय नेटवर्क पर काम करता है। जो हैंडसेट सीमा पार चला जाए, उस पर इसका असर नहीं रहता।

दूसरी, ब्लॉक कराने के लिए काग़ज़ चाहिए। आमतौर पर पुलिस शिकायत या एफ़आईआर की प्रति, कोई सरकारी पहचान पत्र, और अगर हो तो ख़रीद का बिल। जिसके पास आईएमईआई नंबर ही नहीं है, वह पहला क़दम भी नहीं उठा सकता।

ऐप क्या देख सकता है और क्या नहीं

अनिवार्य प्री-इंस्टॉलेशन पर जो बहस है, उसमें दोनों पक्ष एक ही बात पर टिके हैं: यह ऐप देखता क्या है।

जो काम यह करता है, वह आईएमईआई के स्तर पर होता है। हैंडसेट की पहचान, उसमें डला सिम, और नेटवर्क पर उसकी मौजूदगी। यही जानकारी दूरसंचार नेटवर्क के पास पहले से रहती है, ऐप के बिना भी।

सरकार का कहना है कि ऐप हटाया जा सकता है और उसका मक़सद फ़ोन की सुरक्षा है।

विपक्ष का सवाल इस पर नहीं है कि यह ऐप आज क्या करता है। सवाल यह है कि हर नागरिक के हर नए फ़ोन में एक सरकारी ऐप का पहले से होना अपने आप में क्या बनाता है, और उसकी क्षमताएँ आगे बदलें तो उसे रोकने वाला क्या है।

यह लेख इन दोनों में से किसी का पक्ष नहीं ले रहा। जो दर्ज करने लायक़ है, वह यह है कि 75 हज़ार फ़ोन लौटने का आँकड़ा इस सवाल का जवाब नहीं है। एक व्यवस्था उपयोगी होने और उसे अनिवार्य किए जाने में फ़र्क़ है, और बहस दूसरे हिस्से पर है।

स्रोतसंचार मंत्रालय, केंद्रीय उपकरण पहचान रजिस्टर, दूरसंचार विभाग

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