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बाल आयोग ने मेटा इंडिया के प्रमुख को बुलाया है; सवाल यह है कि 99 रुपये का विज्ञापन इंस्टाग्राम की जाँच से निकला कैसे

बीबीसी की जाँच में इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण की सामग्री बेचने वाले 30 पेड विज्ञापन मिले, जो टेलीग्राम चैनलों तक ले जाते थे। जुलाई में सरकार ने नोटिस दिया, आयोग ने भी। 9 सितंबर को मेटा इंडिया के प्रबंध निदेशक को आयोग के सामने पेश होना है। आयोग के पास दीवानी अदालत की शक्तियाँ हैं, और यह लेख बताता है कि उनका मतलब क्या है।

एक स्मार्टफ़ोन पर इंस्टाग्राम का आइकन। बीबीसी की जाँच ने भारत में एक नया खाता बनाकर देखा कि ऐप उसे क्या दिखाता है।
तस्वीर: Yuri Samoilov, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

मेटा इंडिया के प्रबंध निदेशक और प्रमुख को बुधवार 9 सितंबर को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सामने पेश होना है।

यह समन 8 सितंबर को एएनआई ने रिपोर्ट किया। आयोग की अध्यक्ष तृप्ति गुरहा हैं, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की अपर सचिव, जिन्होंने जनवरी 2025 में पदभार लिया। मेटा इंडिया के प्रबंध निदेशक अरुण श्रीनिवास हैं; 28 अगस्त को टेकक्रंच ने लिखा कि भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया की उपाध्यक्ष संध्या देवनाथन ओपनएआई जा रही हैं और श्रीनिवास अब सीधे एशिया-प्रशांत के उपाध्यक्ष बेंजामिन जो को रिपोर्ट करेंगे।

समन किसे है, इस पर रिपोर्टें एक नहीं हैं। एएनआई, फ़्री प्रेस जर्नल और ट्रिब्यून ने "मेटा इंडिया के प्रबंध निदेशक और प्रमुख" लिखा है, जो एक ही पद पढ़ा जाता है। आउटलुक ने लिखा कि आयोग ने "प्रबंध निदेशक और सार्वजनिक नीति प्रमुख" को बुलाया है, जो दो लोग हैं। समन का पाठ सार्वजनिक नहीं है, इसलिए यह फ़र्क़ यहाँ दर्ज भर किया जा रहा है। फ़्री प्रेस जर्नल के अनुसार समन में अधिकारियों से पेश होकर "अतिरिक्त जानकारी" देने को कहा गया है।

समन का विषय दो महीने पुराना है, और उसकी शुरुआत एक पत्रकार के फ़ोन पर एक नए खाते से हुई।

बीबीसी ने क्या किया

लंदन में बीबीसी का ब्रॉडकास्टिंग हाउस। बीबीसी आई की जाँच जुलाई 2026 में छपी और उसी से दोनों नोटिस निकले।
तस्वीर: Richard Cooke, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 2.0

बीबीसी आई की टीम ने देखा कि इंस्टाग्राम भारत में उपयोगकर्ताओं को यौन संकेत वाली सामग्री तब भी दिखा रहा था जब उन्होंने उसे खोजा नहीं था। टीम ने भारत में एक नया, गुमनाम खाता बनाया और ऐसी 10 प्रोफ़ाइलें फ़ॉलो कीं।

एक हफ़्ते से कम में ऐप उस खाते को वयस्क अश्लील सामग्री के पेड विज्ञापन दिखाने लगा। कुछ दिन बाद उसे बच्चों के यौन शोषण की सामग्री के विज्ञापन दिखे, जिनमें से कुछ टेलीग्राम चैनलों के लिंक थे जहाँ वह सामग्री बिकती थी।

टीम ने 30 अलग-अलग पेड विज्ञापन गिने, जो स्पष्ट खोज-शब्दों का इस्तेमाल करते थे और टेलीग्राम तक ले जाते थे। वहाँ सामग्री की क़ीमत 99 रुपये तक बताई गई, यानी लगभग एक डॉलर।

रील से विज्ञापन तक

जाँच करने वाली बीबीसी की वरिष्ठ संवाददाता दिव्या आर्य हैं। 10 जुलाई को अमेरिकी कार्यक्रम डेमोक्रेसी नाउ से बातचीत में उन्होंने बताया कि खाता एक नए फ़ोन पर बनाया गया था ताकि उनकी अपनी फ़ीड जाँच में न मिल जाए। शुरुआत रील से हुई: ऐप उन्हें ऐसे लाइफ़स्टाइल ब्लॉगरों की रील दिखाने लगा जो यौन संकेत वाली भाषा इस्तेमाल करते थे। उनके शब्दों में, एल्गोरिद्म यह देखता है कि आप किसी रील पर रुकते हैं या नहीं, और फिर उसी तरह की और सामग्री भेजता है; "सामग्री कुछ ही दिनों में ज़्यादा स्पष्ट हो गई।"

विज्ञापन उसके बाद आए। पहले पोर्नोग्राफ़ी के, जिसे बेचना और साझा करना भारत में ग़ैरक़ानूनी है, आर्य ने यह भी कहा। फिर ऐसे विज्ञापन जिनमें बच्चे वयस्कों के साथ यौन संकेत वाली स्थितियों में थे और जिनसे टेलीग्राम का लिंक जुड़ा था। विज्ञापनों में "रेप वीडियो" और "चाइल्ड वीडियो" जैसे शब्द थे। स्टोरीबोर्ड18 के अनुसार, बीबीसी ने जब इन विज्ञापनों की रिपोर्ट ऐप के भीतर की, तो इंस्टाग्राम का पहला जवाब यह था कि सामग्री सामुदायिक दिशानिर्देशों का उल्लंघन नहीं करती।

विज्ञापन की समीक्षा कैसे होती है

इंस्टाग्राम पर विज्ञापन देने वाला पहले खाता बनाता है, भुगतान का तरीक़ा जोड़ता है, विज्ञापन की तस्वीर और शब्द अपलोड करता है, और लक्ष्य तय करता है: किस देश में, किस उम्र के, किन रुचियों वाले लोगों को दिखे। उसके बाद विज्ञापन मंच की समीक्षा में जाता है, जो ज़्यादातर स्वचालित है और मंच की विज्ञापन-नीतियों से मिलान करती है।

मेटा के अपने विज्ञापन-मानक इस प्रक्रिया को इन शब्दों में लिखते हैं: समीक्षा-व्यवस्था "मुख्यतः स्वचालित औज़ारों पर निर्भर" है, "आम तौर पर 24 घंटे में" पूरी होती है, और विज्ञापन की तस्वीर, वीडियो, पाठ और लक्ष्य-सूचना को देखती है। उसी दस्तावेज़ का एक वाक्य है: "विज्ञापनों में ऐसी सामग्री नहीं हो सकती जो बच्चों का यौन शोषण करे या उन्हें ख़तरे में डाले।" बीबीसी ने पाया कि यह समीक्षा 90 फ़ीसदी से ज़्यादा एआई से होती है और सामग्री के प्रकाशित होने से पहले उसे देखने वाले मानव समीक्षक गिने-चुने हैं; यह आर्य का डेमोक्रेसी नाउ को दिया ब्यौरा है।

मंज़ूरी के बाद विज्ञापन उन लोगों को दिखता है जिनकी गतिविधि लक्ष्य से मेल खाती है। बीबीसी के नए खाते ने दस प्रोफ़ाइल फ़ॉलो कीं; उसकी गतिविधि ने उसे उस लक्ष्य-समूह में डाल दिया जिसके लिए ये विज्ञापन ख़रीदे गए थे। यही कारण है कि जाँच का तरीक़ा ख़ुद एक निष्कर्ष है: लक्ष्य-समूह मौजूद था और मंच उसे बेच रहा था।

पेड का मतलब

यह शब्द इस पूरे मामले की धुरी है।

इंस्टाग्राम पर कोई पोस्ट अपने आप फैल सकती है, और मंच कह सकता है कि उसने उसे नहीं देखा। विज्ञापन ऐसा नहीं होता। विज्ञापन के लिए कोई पैसा देता है, मंच पैसा लेता है, और मंच की समीक्षा-प्रक्रिया उसे मंज़ूर करती है, तब वह दिखता है।

बीबीसी की जाँच का निष्कर्ष यह था कि इंस्टाग्राम की एआई-आधारित समीक्षा ऐसी सामग्री को अक्सर नहीं पकड़ती, और मंच का एल्गोरिद्म उन खातों को आगे बढ़ाता है जो विज्ञापन के लिए भुगतान करते हैं। यानी सवाल यह नहीं कि सामग्री मंच पर कैसे आई; सवाल यह है कि मंच ने उसे बेचने के पैसे कैसे लिए।

एक पूर्व उपाध्यक्ष, एक पूर्व न्यायाधीश

बीबीसी के कार्यक्रम में दो लोग रिकॉर्ड पर बोले। ब्रायन बोलैंड, मेटा के पूर्व उपाध्यक्ष: "मेरी राय है कि वे कहीं भी उपयोगकर्ताओं की परवाह नहीं करते, इसीलिए मैंने कंपनी छोड़ी।" मदन लोकुर, सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश: "यह मुद्दा इतना गंभीर है कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय इसका स्वतः संज्ञान ले।" डेमोक्रेसी नाउ ने ये दोनों अंश 10 जुलाई को चलाए। आर्य ने बातचीत यह कहकर ख़त्म की कि यह ग़ैरक़ानूनी सामग्री इंटरनेट पर होनी ही नहीं चाहिए और "किसी को इसके लिए जवाबदेह ठहराना होगा।" जिन रिपोर्टों को इस लेख ने देखा, उनमें संज्ञान दो आयोगों का है, अदालत का नहीं।

यह पहली बार नहीं है

इंस्टाग्राम पर ऐसी सामग्री के नेटवर्क का सवाल अमेरिका में जून 2023 में उठा था, जब वहाँ के अख़बारों और स्टैनफ़ोर्ड के शोधकर्ताओं ने बताया कि मंच का सिफ़ारिश-तंत्र बाल यौन सामग्री बेचने वाले खातों को आपस में जोड़ रहा है। उसी महीने सीनेटर टेड क्रूज़ ने मेटा से जवाब माँगा, और सीनेटर मार्शा ब्लैकबर्न व रिचर्ड ब्लूमेंथल ने संयुक्त पत्र लिखा। दिसंबर 2023 में न्यू मेक्सिको के अटॉर्नी जनरल ने मेटा पर मुक़दमा किया।

फ़र्क़ यह है कि 2023 का मामला सिफ़ारिश का था: मंच ने खाते जोड़े। 2026 का भारतीय मामला विज्ञापन का है: मंच ने पैसे लिए। दूसरा पहले से ज़्यादा सीधा है।

4 जुलाई: सरकार का नोटिस

इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 4 जुलाई 2026 को मेटा को नोटिस दिया। सीएनबीसी के अनुसार मंत्रालय ने इसे इंस्टाग्राम पर "पेड विज्ञापनों में बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री की मौजूदगी" पर "कड़ा नोटिस" कहा।

आदेश दो हिस्सों में था: ऐसी सामग्री को बढ़ावा देने या उस तक पहुँच दिलाने वाले सभी विज्ञापन और सामग्री "तुरंत निष्क्रिय" करो; और सात दिन में विस्तार से बताओ कि ये विज्ञापन समीक्षा-व्यवस्था से निकले कैसे।

द वीक ने नोटिस की एक और पंक्ति छापी: मंत्रालय "यौन शोषण वाली सामग्री के कथित एल्गोरिद्मिक प्रवर्धन को सर्वोच्च गंभीरता से देखता है" और "तत्काल सुधारात्मक क़दम" चाहता है। स्टोरीबोर्ड18 के अनुसार मंत्रालय ने विज्ञापन मंज़ूर करने की प्रक्रिया, पहचान के तंत्र, रोकथाम के उपाय और "की गई कार्रवाई की जानकारी" माँगी। ट्रिब्यून के अनुसार नोटिस से पहले मंत्री अश्विनी वैष्णव ने अधिकारियों को स्पष्टीकरण लेने का निर्देश दिया था; डेमोक्रेसी नाउ के अनुसार जवाब की मियाद 11 जुलाई थी। उसी हफ़्ते मंत्रालय ने व्हाट्सऐप के "यूज़रनेम" फ़ीचर पर भी मेटा को नोटिस दिया, तीन दिन की मियाद के साथ।

3 जुलाई: आयोग का नोटिस

एक दिन पहले, 3 जुलाई को, आयोग ने बीबीसी की रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लेकर मेटा प्लेटफ़ॉर्म्स इंक. को नोटिस भेजा और स्पष्टीकरण माँगा। एएनआई के अनुसार मेटा ने एक हफ़्ते बाद जवाब दिया। आयोग ने जवाब देखा और तय किया कि "तथ्यों और परिस्थितियों" की पड़ताल के लिए जाँच शुरू की जाए।

तारीख़ें इस तरह हैं। मेटा का जवाब 10 जुलाई को आया, ट्रिब्यून और आउटलुक के अनुसार। आयोग ने जाँच शुरू करने का फ़ैसला मंगलवार 4 अगस्त को सार्वजनिक किया; एशियानेट न्यूज़ेबल ने उसी दिन लिखा कि आयोग "मामले के तथ्य तय करने के लिए जाँच" करेगा। अगले दिन ऐडगली ने लिखा कि जाँच यह देखेगी कि इंस्टाग्राम की विज्ञापन-आपूर्ति व्यवस्था में "प्रणालीगत चूक" हुई या नहीं और भारतीय बाल संरक्षण क़ानूनों के तहत दंडात्मक क़दम ज़रूरी हैं या नहीं। उसी हफ़्ते, 5 और 6 अगस्त को, मेटा के वैश्विक मामलों के प्रमुख जोएल कैप्लन को भारत सरकार के अधिकारियों से मिलना था; स्टोरीबोर्ड18 के अनुसार एजेंडे में सिफ़ारिश-तंत्र और खातों की सुरक्षा थी।

यह जाँच दो महीने चली है, और समन उसी का अगला क़दम है। जवाब में मेटा ने क्या कहा, यह किसी सार्वजनिक दस्तावेज़ में नहीं है।

आयोग कर क्या सकता है

यहाँ क़ानून पढ़ना ज़रूरी है, क्योंकि "बाल आयोग ने बुलाया" सुनने में पुलिस जैसा लगता है और है नहीं।

बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम 2005 की धारा 13(1)(ञ) आयोग को बाल अधिकारों के उल्लंघन की शिकायतों की जाँच का काम देती है। धारा 14 कहती है कि ऐसी जाँच करते हुए आयोग के पास दीवानी प्रक्रिया संहिता के तहत मुक़दमा चलाने वाली दीवानी अदालत की सभी शक्तियाँ होंगी: किसी व्यक्ति को बुलाना और उपस्थिति सुनिश्चित करना, उससे शपथ पर पूछताछ करना, दस्तावेज़ मँगवाना, हलफ़नामे पर साक्ष्य लेना।

एक और शक्ति है: आयोग किसी मामले को अधिकार-क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट को भेज सकता है, और मजिस्ट्रेट उसे ऐसे सुनेगा जैसे वह दंड प्रक्रिया संहिता के तहत उसके पास आया हो।

धारा 14 में दो और शक्तियाँ हैं: किसी अदालत या दफ़्तर से सार्वजनिक रिकॉर्ड मँगवाना, और गवाहों या दस्तावेज़ों की जाँच के लिए कमीशन जारी करना। उपधारा 14(2) कहती है कि मजिस्ट्रेट शिकायत को ऐसे सुनेगा जैसे वह दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 346 के तहत भेजी गई हो। धारा 15 जाँच के बाद के क़दम गिनाती है: अभियोजन की सिफ़ारिश, निर्देश के लिए सर्वोच्च या उच्च न्यायालय जाना, और पीड़ित के लिए अंतरिम राहत। धारा 13(1)(घ) जिन विषयों को गिनाती है उनमें "पोर्नोग्राफ़ी" शब्द है।

आयोग ने पहले यह शक्ति कब इस्तेमाल की

समन की यह शक्ति काग़ज़ी नहीं रही है। आयोग कर्नाटक के मुख्य सचिव को एक अनाथालय के मामले में एफ़आईआर दर्ज न होने पर तलब कर चुका है, और झारखंड के दुमका हत्याकांड में जाँच अधिकारियों से मिल चुका है, डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्टों के अनुसार। सरकारी अधिकारियों पर यह शक्ति बार-बार चली है; किसी वैश्विक कंपनी के भारतीय प्रमुख पर इस तरह चलना कम देखा गया है।

"उपस्थिति सुनिश्चित" का मतलब

धारा 14 की भाषा में आयोग "किसी व्यक्ति को बुला सकता है और उसकी उपस्थिति सुनिश्चित कर सकता है।" दीवानी अदालत के लिए इसका अर्थ है कि समन की अनदेखी पर अदालत आगे की प्रक्रिया अपना सकती है, जिसमें दोबारा समन और ज़रूरत पर बाध्यकारी आदेश शामिल हैं। आयोग के लिए व्यवहार में यह इतना है कि न आने को रिकॉर्ड में दर्ज किया जाता है और मामला आगे भेजा जा सकता है।

यानी मेटा के लिए बुधवार को न आना क़ानूनी रूप से संभव है, पर उसका रिकॉर्ड बनेगा, और मंत्रालय के जुलाई के नोटिस के साथ वह रिकॉर्ड कंपनी के ख़िलाफ़ किसी अगली कार्रवाई की फ़ाइल में जाएगा।

और क्या नहीं कर सकता

आयोग जुर्माना नहीं लगा सकता। किसी ऐप को बंद नहीं कर सकता। किसी को गिरफ़्तार नहीं कर सकता। वह पूछ सकता है, रिकॉर्ड पर ले सकता है, सिफ़ारिश कर सकता है, और मामला मजिस्ट्रेट या सरकार को भेज सकता है।

यानी बुधवार को जो होगा, वह शपथ पर दर्ज बयान है। उसकी क़ीमत इस बात में है कि वह बयान सार्वजनिक रिकॉर्ड बनता है और आगे किसी अभियोजन या नियामक कार्रवाई का आधार बन सकता है।

दूसरा आयोग भी इसी फ़ाइल पर है

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, यानी एनएचआरसी, इस मामले में अलग से बैठा है। फ़्री प्रेस जर्नल के अनुसार उसे 6 जुलाई को शिकायत मिली, 8 जुलाई को उसने दिल्ली पुलिस आयुक्त से विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट माँगी, और 29 जुलाई को याद दिलाने वाला पत्र भेजा। सितंबर की शुरुआत में उसने दायरा बढ़ाया: लेटेस्टली ने आदेश की तारीख़ 2 सितंबर लिखी है, एएनआई ने 3 सितंबर को इसकी ख़बर दी। पीठ की अध्यक्षता सदस्य प्रियंक कानूनगो ने की। नोटिस इलेक्ट्रॉनिकी मंत्रालय, सूचना-प्रसारण मंत्रालय और दिल्ली पुलिस आयुक्त को गए, और तीनों से दो हफ़्ते में बिंदुवार कार्रवाई रिपोर्ट माँगी गई।

मानवाधिकार आयोग के सवाल

एनएचआरसी के सवाल दूसरी दिशा में जाते हैं। एएनआई के अनुसार पीठ ने पूछा कि अगर मेटा की प्रणालियाँ सामग्री को "सक्रिय रूप से बनाती, बदलती, चुनती, सिफ़ारिश करती, प्रकाशित करती, बढ़ाती या मुद्रीकृत करती हैं," तो वह मध्यवर्ती है या प्रकाशक। सूचना-प्रसारण मंत्रालय से पूछा गया कि क्या मेटा सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021 के नियम 2(1)(q), 2(1)(s) और 2(1)(u) के अर्थ में "ऑनलाइन क्यूरेटेड सामग्री का प्रकाशक" है; इलेक्ट्रॉनिकी मंत्रालय से, कि पॉक्सो की धारा 19 के तहत अनिवार्य रिपोर्टिंग हुई या नहीं, विशेष किशोर पुलिस इकाई या स्थानीय पुलिस को बताया गया या नहीं, और न बताया गया हो तो कौन अधिकारी ज़िम्मेदार है; दिल्ली पुलिस से, कि टेलीग्राम से क्या माँगा और क्या मिला। पीठ ने यह भी दर्ज किया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 "अपने आप में" किसी इकाई को पॉक्सो के दायित्वों से मुक्त नहीं करती। लेटेस्टली के अनुसार सबूतों में मेटा के "बैकएंड" फ़ीचरों के स्क्रीनशॉट थे, जो सुझाव, सहभागिता और मुद्रीकरण के औज़ार दिखाते हैं।

बाल आयोग के अधिनियम की धारा 13(2) कहती है कि आयोग ऐसा कोई मामला नहीं जाँचेगा जो किसी राज्य आयोग या "किसी क़ानून के तहत विधिवत गठित किसी अन्य आयोग" के सामने लंबित हो। दो आयोग एक ही विज्ञापनों पर बैठे हैं, और जिन रिपोर्टों को हमने देखा उनमें इस धारा का ज़िक्र किसी ने नहीं किया।

क़ानून की तीन धाराएँ जो पीछे खड़ी हैं

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, यानी पॉक्सो, की धारा 15 बाल अश्लील सामग्री को रखने या संग्रहीत करने को अपराध बनाती है, और धारा 14 उसके इस्तेमाल को। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67ख बच्चों को यौन कृत्यों में दिखाने वाली सामग्री को इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रकाशित या प्रसारित करने पर पहली बार पाँच साल तक की सज़ा देती है।

और सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021 का नियम 3(1)(ख) मध्यवर्ती मंच से कहता है कि वह अपने उपयोगकर्ताओं को सूचित करे कि वे "अश्लील, पोर्नोग्राफ़िक, पीडोफ़िलिक" या बच्चों के लिए हानिकारक सामग्री न रखें, और ऐसा होने से रोकने के "उचित प्रयास" करे; "पीडोफ़िलिक" शब्द नियम में ही है। यही "उचित प्रयास" वह वाक्यांश है जिस पर मंच का "सुरक्षित बंदरगाह" टिकता है: अगर मंच ने उचित प्रयास किया, तो वह उपयोगकर्ता की सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं।

पेड विज्ञापन इस बचाव को कमज़ोर करता है, क्योंकि विज्ञापन मंच का अपना कारोबार है, उपयोगकर्ता की पोस्ट नहीं।

टेलीग्राम की ओर

एक स्मार्टफ़ोन पर टेलीग्राम का आइकन। विज्ञापनों के लिंक इसी ऐप के चैनलों तक जाते थे।
तस्वीर: Yuri Samoilov, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

बीबीसी की जाँच का दूसरा सिरा टेलीग्राम था, जहाँ विज्ञापन ले जाते थे। टेलीग्राम ने कहा कि उसने 2026 में बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़े 2,74,000 से ज़्यादा समूह और चैनल हटाए हैं।

डेमोक्रेसी नाउ पर आर्य ने बताया कि टेलीग्राम ने अपने जवाब में ब्रिटेन की संस्था इंटरनेट वॉच फ़ाउंडेशन के साथ काम का हवाला दिया और कहा कि उसने ऐसी सामग्री को अपने मंच से "लगभग मिटा" दिया है; "लगभग मिटा" शब्द टेलीग्राम के हैं, आर्य ने यह जोड़ा।

यह संख्या दो बातें एक साथ कहती है: कि मंच कार्रवाई करता है, और कि हटाने के लिए इतना कुछ है। एनएचआरसी ने दिल्ली पुलिस से पूछा है कि टेलीग्राम से क्या माँगा गया। भारत में टेलीग्राम पर कोई नोटिस इस मामले में सार्वजनिक नहीं हुआ है।

मेटा का जवाब

सीएनबीसी की जुलाई की रिपोर्ट में मेटा का सार्वजनिक रुख़ यह था कि वह ऐसी सामग्री के ख़िलाफ़ है और उसे हटाता है। आयोग को दिए जवाब का पाठ सार्वजनिक नहीं है। एएनआई की 8 सितंबर की रिपोर्ट में मेटा की कोई नई टिप्पणी नहीं है।

मंत्रालय के नोटिस पर मेटा का बयान स्टोरीबोर्ड18 ने 5 जुलाई को पूरा छापा। उसका पहला वाक्य: "मेटा की विज्ञापनों समेत बाल यौन शोषण सामग्री माँगने या साझा करने पर शून्य-सहिष्णुता की नीति है।" आगे कंपनी ने लिखा कि वह "3.5 अरब उपयोगकर्ताओं के बीच छिपे अपराधियों से लगातार लड़ाई" में है, और उसकी टीमें बचाव सुधारने, "शिकारियों को जड़ से निकालने" की तकनीक बनाने, उल्लंघन करने वाली वेबसाइटों के लिंक रोकने और दूसरी कंपनियों से ख़ुफ़िया जानकारी साझा करने पर काम करती हैं। इंडिया ग्लोबल न्यूज़ के अनुसार मेटा ने बीबीसी को बताया कि उसने "कई विज्ञापन निष्क्रिय किए और उन्हें डालने वाले खाते निलंबित किए," और बाद में "और विज्ञापन हटाए, और खाते निष्क्रिय किए, और यूआरएल रोके।"

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एम्बुलेंस वाली रिपोर्ट में लिखा कि एक और कंपनी, ब्लिंकिट की मूल कंपनी, ने टिप्पणी के अनुरोध का जवाब नहीं दिया; मेटा के मामले में भी यही पैटर्न है। सवाल पूछे जा चुके हैं, जवाब बुधवार को शपथ पर आएँगे।

मेटा के अपने अंक

मेटा ने 7 जुलाई को अपने ब्लॉग पर "हमारे ऐप्स पर बाल शोषण से लड़ने का हमारा काम" शीर्षक से पोस्ट डाली। उसमें कंपनी ने "भारत में इंस्टाग्राम विज्ञापनों के बारे में हाल की ख़बरों" को स्वीकार किया, जो "बाल शोषण के ख़िलाफ़ हमारी नीतियों का उल्लंघन" थे, और लिखा कि बाहर से सूचना मिलने से पहले ही उसकी प्रणालियों ने "उल्लंघन करने वाले कई विज्ञापनों और उनके पीछे के खातों" को निष्क्रिय कर दिया था। उसी पोस्ट का वाक्य है: "यह कहना स्पष्ट रूप से ग़लत है कि हम जानबूझकर बच्चों वाले विज्ञापन उन लोगों को दिखाएँगे जिनकी बच्चों में अनुचित रुचि है।"

अंक भी पोस्ट में हैं। पिछले एक साल में फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम से 40 लाख से ज़्यादा संदिग्ध खाते अपने आप हटाए गए; बाल शोषण के लिए 3.6 करोड़ सामग्री हटाई गई; अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच 1.3 करोड़, जिसमें 96 फ़ीसदी किसी उपयोगकर्ता की रिपोर्ट से पहले पकड़ी गई; और भारत में छह महीने में 1,60,000 खाते। पोस्ट विज्ञापनों की समीक्षा को "स्वचालित और मानवीय" बताती है और कहती है कि बाल शोषण के मामले नेशनल सेंटर फ़ॉर मिसिंग ऐंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रन को रिपोर्ट किए जाते हैं। बीबीसी को दिए जवाब में कंपनी ने यह भी कहा था कि "कोई प्रक्रिया पूर्ण नहीं होती।"

मेटा इंडिया का नेतृत्व, तीन साल में

टेकक्रंच की समय-रेखा इस तरह है। जनवरी 2023 में संध्या देवनाथन अजित मोहन की जगह मेटा इंडिया की उपाध्यक्ष बनीं। जून 2025 में कंपनी ने उनका दायरा दक्षिण-पूर्व एशिया तक बढ़ाया और उसी के आसपास अरुण श्रीनिवास को भारत का प्रबंध निदेशक और प्रमुख नियुक्त किया, जो देवनाथन को रिपोर्ट करते थे। 28 अगस्त 2026 को देवनाथन ने ओपनएआई जाने की घोषणा की; वे सिंगापुर में बैठेंगी।

टेकक्रंच के अनुसार देवनाथन 2016 में मेटा से जुड़ी थीं और एशिया-प्रशांत का गेमिंग कारोबार सँभाल चुकी थीं; ओपनएआई में वे एशिया-प्रशांत के प्रबंध निदेशक किरण मणि को रिपोर्ट करेंगी। उसी रिपोर्ट में भारत में मेटा पर "बढ़ते दबाव" की एक और मिसाल है: जुलाई में इंस्टाग्राम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक पोस्ट को ग़लती से प्रतिबंधित किया, कंपनी ने माफ़ी माँगी, और सरकार ने वैश्विक मामलों के प्रमुख जोएल कैप्लन समेत अधिकारियों को तलब किया।

आयोग का समन "प्रबंध निदेशक और प्रमुख" को है। नामों की यह व्यवस्था बताती है कि बुधवार को कुर्सी पर श्रीनिवास होंगे, और उनके ऊपर अब भारत में कोई नहीं।

भारत मेटा के लिए क्या है

टेकक्रंच ने देवनाथन के जाने की ख़बर में यही लिखा कि यह उस समय हुआ जब कंपनी भारत में "बढ़ती जाँच" का सामना कर रही है। भारत उपयोगकर्ताओं की गिनती में मेटा का सबसे बड़ा बाज़ार है; इंस्टाग्राम, फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप तीनों के लिए।

समन उसी दफ़्तर के नए प्रमुख को गया है जो अभी दो हफ़्ते पहले सीधे एशिया-प्रशांत को रिपोर्ट करने लगा। बुधवार का बयान इसीलिए कंपनी के लिए भी नया है।

घर में किशोर हों तो

फ़ोन पर काम करता एक व्यक्ति। जाँच का सबसे व्यावहारिक निष्कर्ष यही है कि विज्ञापन खाते की पिछली गतिविधि से तय होते हैं।
तस्वीर: Biswarup Ganguly, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

अगर आपके घर में किशोर हैं जो इंस्टाग्राम पर हैं, तो बीबीसी की जाँच का सबसे व्यावहारिक निष्कर्ष यह है कि विज्ञापन उस खाते की पिछली गतिविधि से तय होते हैं, और दस ग़लत प्रोफ़ाइल फ़ॉलो करना एक हफ़्ते में विज्ञापनों का रुख़ बदल देता है।

अगर आपको ऐसा कोई विज्ञापन दिखे, तो उसकी रिपोर्ट ऐप में की जा सकती है और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल, cybercrime.gov.in, पर भी; बाल यौन शोषण सामग्री और बलात्कार से जुड़ी सामग्री के लिए वहाँ "गुमनाम रिपोर्ट" का अलग विकल्प है, जिसमें नाम और नंबर नहीं देना होता। फ़ोन पर 1930 साइबर हेल्पलाइन है। स्क्रीनशॉट और विज्ञापन का लिंक साथ रखिए; विज्ञापन कुछ घंटों में हट जाते हैं और फिर सबूत नहीं रहता। आयोग के पास भी शिकायत जा सकती है, और यही शिकायत का रास्ता है जिससे यह मामला शुरू हुआ, बस यहाँ शिकायत एक ख़बर थी।

बुधवार के बाद

आयोग बयान दर्ज करेगा। वह मंत्रालय को सिफ़ारिश भेज सकता है, मामला मजिस्ट्रेट को भेज सकता है, या रिपोर्ट सार्वजनिक कर सकता है। मंत्रालय के जुलाई के नोटिस का जवाब सात दिन में आना था; वह आया या नहीं, और उसमें क्या था, यह अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ है। एनएचआरसी की दो हफ़्ते की मियाद भी सितंबर के मध्य में पूरी होती है, और तीन दफ़्तरों की बिंदुवार रिपोर्टें उसी के आसपास आनी हैं।

30 विज्ञापन, 99 रुपये, एक हफ़्ता। जाँच के ये तीन अंक इतने छोटे हैं कि उन्हें भूलना आसान है। समन इसीलिए है कि वे भूले न जाएँ।

स्रोतएएनआई, आयोग का समन, 8 सितंबर 2026, सीएनबीसी, इलेक्ट्रॉनिकी मंत्रालय का नोटिस, 6 जुलाई 2026, डेमोक्रेसी नाउ, बीबीसी की दिव्या आर्य से बातचीत का लिखित पाठ, 10 जुलाई 2026, बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम 2005, धारा 14, बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम 2005, धारा 13, बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम 2005, पूरा पाठ (धारा 15), टेकक्रंच, मेटा इंडिया का नेतृत्व, 28 अगस्त 2026, मेटा का ब्लॉग, बाल शोषण पर कंपनी का बयान और आँकड़े, 7 जुलाई 2026, मेटा के विज्ञापन-मानक, समीक्षा-प्रक्रिया का आधिकारिक पाठ, एएनआई की रिपोर्ट की प्रति, लेटेस्टली, 8 सितंबर 2026, आउटलुक, समन की ख़बर, 8 सितंबर 2026, फ़्री प्रेस जर्नल, समन और एनएचआरसी की तारीख़ें, 8 सितंबर 2026, द ट्रिब्यून, समन की ख़बर, सितंबर 2026, एएनआई की रिपोर्ट की प्रति, पब्लिक टीवी, एनएचआरसी के सवाल, 3 सितंबर 2026, लेटेस्टली, एनएचआरसी का 2 सितंबर का आदेश, सितंबर 2026, द वीक, मंत्रालय के नोटिस की भाषा, 5 जुलाई 2026, स्टोरीबोर्ड18, नोटिस पर मेटा का पूरा बयान, 5 जुलाई 2026, स्टोरीबोर्ड18, बीबीसी की जाँच का सार, जुलाई 2026, मीडियान्यूज़4यू, नोटिस की तारीख़ और मियाद, 7 जुलाई 2026, लॉबीट, मेटा के आँकड़े, 8 जुलाई 2026, इंडिया ग्लोबल न्यूज़, मंत्री का निर्देश और व्हाट्सऐप नोटिस, 8 जुलाई 2026, एशियानेट न्यूज़ेबल, आयोग की जाँच का फ़ैसला, 4 अगस्त 2026, ऐडगली, जाँच का दायरा, 5 अगस्त 2026, स्टोरीबोर्ड18, जोएल कैप्लन की बैठकें, 5 अगस्त 2026

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।