भारत आइची-नागोया 503 खिलाड़ी भेज रहा है, और 1951 के पहले एशियाई खेलों में कुल ग्यारह देशों के 489 खिलाड़ी आए थे
उन खेलों की मेज़बानी भारत ने की थी। जिस आदमी का विचार वे खेल थे, उसने आयोजन समिति से छह महीने पहले इस्तीफ़ा दे दिया था, क्योंकि न पैसा था न ढाँचा।

19 सितंबर को जापान के आइची और नागोया में एशियाई खेल शुरू होंगे और 4 अक्टूबर तक चलेंगे।
भारत का दल 503 खिलाड़ियों का है, 36 खेलों में। इनमें 269 पुरुष हैं और 234 महिलाएँ।
अब वह संख्या जो इसके साथ रखने लायक़ है।
1951 में पहले एशियाई खेलों में कुल ग्यारह देशों के 489 खिलाड़ी आए थे।
भारत अकेला इस बार उससे ज़्यादा भेज रहा है।
पहले खेल, और वह आदमी जो उनसे पहले हट गया
वे खेल नई दिल्ली में हुए थे और भारत ने उनकी मेज़बानी की थी।
ग्यारह देश आए: अफ़ग़ानिस्तान, बर्मा, सीलोन, इंडोनेशिया, ईरान, जापान, नेपाल, फ़िलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और भारत।
छह खेलों में 57 पदक स्पर्धाएँ हुईं।
भारत दूसरे स्थान पर रहा, 51 पदकों के साथ, जिनमें 15 स्वर्ण, 16 रजत और 20 कांस्य थे।
अब वह हिस्सा जो इस कहानी में सबसे कम आता है।
यह विचार गुरु दत्त सोंधी का था। वे 1948 के लंदन ओलंपिक में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति में भारत के प्रतिनिधि थे, और उन्होंने वहाँ एक ऐसी प्रतियोगिता का प्रस्ताव रखा जो सिर्फ़ सुदूर पूर्व के देशों तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे एशिया को समेटे।
एशियाई खेल संघ बना और सोंधी उसके सचिव चुने गए।
और फिर, खेल शुरू होने से छह महीने पहले, उन्होंने आयोजन समिति से इस्तीफ़ा दे दिया।
कारण कोई विवाद नहीं था। कारण यह था कि न पैसा था और न बुनियादी ढाँचा, और उसी हालत में खेल कराने का बोझ उन पर था।
उनकी जगह एंथनी डी मेलो आए, जो भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड के संस्थापकों में थे।
यानी एशिया के सबसे बड़े खेल आयोजन का जन्म एक ऐसे आदमी के विचार से हुआ जो उसका उद्घाटन देखने के लिए उसकी समिति में नहीं था।
सोंधी के प्रस्ताव में जो बात नई थी, वह भूगोल की थी। उनसे पहले एशिया में जो खेल आयोजन होते थे, वे सुदूर पूर्व तक सीमित थे। सोंधी ने कहा कि पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया भी इसी महाद्वीप में हैं और उन्हें बाहर रखने का कोई कारण नहीं।
1951 की सूची इसी सोच का नतीजा है। उसमें अफ़ग़ानिस्तान और ईरान भी हैं और फ़िलीपींस तथा जापान भी। यह उस समय के लिए असामान्य था, क्योंकि इन देशों के बीच खेल के अलावा कोई साझा मंच नहीं था।
और यह 1951 था। भारत को आज़ाद हुए चार साल हुए थे, विभाजन के घाव ताज़े थे, और देश के पास पैसा नहीं था। उसी साल इस देश ने ग्यारह देशों को बुलाकर एक नया अंतरराष्ट्रीय आयोजन शुरू किया।
इसी संदर्भ में सोंधी का इस्तीफ़ा समझ में आता है। जो काम असंभव लग रहा था, वह हुआ ज़रूर, पर उसे शुरू करने वाले के लिए उसकी क़ीमत यह रही कि वह अंत तक उसमें नहीं रह सके।

दो संख्याएँ, एक दल
इस बार के दल को लेकर एक बात दर्ज करने लायक़ है।
कुछ जगहों पर भारतीय दल की संख्या 503 छपी है और कुछ जगहों पर 492।
यह अंतर मामूली लग सकता है, पर ग्यारह खिलाड़ियों का है, और उसकी वजह समझने लायक़ है।
ऐसी संख्याएँ चयन के बाद भी बदलती रहती हैं। कोई खिलाड़ी चोटिल होकर हटता है, कोई दल चयन मानदंड पूरा न करने पर काटा जाता है, कोई देर से जोड़ा जाता है। जो सूची किसी एक दिन जारी हुई, वह अगले हफ़्ते वही नहीं रहती।
इसी दल में इसके तीन उदाहरण हैं।
नीरज चोपड़ा चोट के कारण बाहर हो गए और भाला फेंक में उनकी जगह यशवीर सिंह आए।
महिला क्रिकेट में जेमिमा रोड्रिग्स चोटिल होने से बाहर हुईं और उनकी जगह प्रतिका रावल को लिया गया।
और घुड़सवारी की शो जंपिंग टीम चयन मानदंड पूरा न कर पाने पर हटा दी गई, जिससे उस दल की संख्या बारह से घटकर आठ रह गई।
इसलिए जब तक दल विमान में न बैठ जाए, कोई संख्या अंतिम नहीं होती। इस लेख में 503 इसलिए लिखा जा रहा है क्योंकि वही सबसे विस्तृत सूची में दर्ज है, जिसमें पुरुषों और महिलाओं का विभाजन भी दिया गया है और वह जोड़कर यही बनता है।
दो सौ छियालीस
दल के साथ 246 सहयोगी स्टाफ़ और 19 अधिकारी जा रहे हैं।
503 खिलाड़ी, 265 साथ जाने वाले लोग।
यानी हर दो खिलाड़ियों पर लगभग एक व्यक्ति।
इस अनुपात को दो तरह से पढ़ा जा सकता है, और दोनों तरीक़े ईमानदारी से रखने चाहिए।
पहला यह कि यह संख्या ज़रूरी है। आधुनिक खेल में हर खिलाड़ी के साथ कोच होता है, और कई खेलों में फ़िज़ियोथेरेपिस्ट, ट्रेनर और मनोवैज्ञानिक भी। निशानेबाज़ी और तीरंदाज़ी जैसे खेलों में उपकरण संभालने वाले तकनीशियन चाहिए। कुश्ती और मुक्केबाज़ी में वज़न प्रबंधन के लिए अलग सहयोग चाहिए। टीम खेलों में एक कोच कई खिलाड़ियों को देखता है, पर व्यक्तिगत खेलों में यह अनुपात एक के क़रीब चला जाता है।
दूसरा यह कि भारतीय दलों में अधिकारियों की संख्या को लेकर पुरानी शिकायत रही है, और वह शिकायत खिलाड़ियों की तरफ़ से आती रही है, न कि दर्शकों की तरफ़ से।
यहाँ जो संख्या अलग से गिनाई गई है, वह इस बहस के लिए काम की है। 246 सहयोगी स्टाफ़ है और 19 अधिकारी। सहयोगी स्टाफ़ वे हैं जो खिलाड़ी के प्रदर्शन से सीधे जुड़े हैं। अधिकारी वे हैं जो प्रशासन से।
दोनों को अलग गिनना अपने-आप में एक सुधार है, क्योंकि पहले यह सब एक ही संख्या में जाता था।
1982, और वह साल जब टीवी रंगीन हुआ
भारत ने दूसरी बार 1982 में मेज़बानी की, 19 नवंबर से 4 दिसंबर तक, फिर नई दिल्ली में।
उन खेलों में भारत पाँचवें स्थान पर रहा, 13 स्वर्ण, 19 रजत और 25 कांस्य के साथ।
पर उन खेलों को इस देश में जिस चीज़ के लिए याद किया जाता है, वह पदक नहीं है।
दूरदर्शन ने रंगीन प्रसारण इन्हीं खेलों के लिए शुरू किया।
यह वाक्य आज पढ़ने में मामूली लगता है। उस समय इसका मतलब यह था कि एक पूरे देश ने पहली बार अपनी स्क्रीन पर रंग देखा, और वह रंग खेल का था।
दूरदर्शन ने इसके लिए चार आउटसाइड ब्रॉडकास्टिंग वैन ख़रीदीं, ताकि किसी भी समय कम से कम दो स्पर्धाओं का सीधा रंगीन प्रसारण हो सके।
इसके साथ दिल्ली में बड़े पैमाने पर निर्माण हुआ। कई फ़्लाईओवर बने और एशियाई खेल गाँव बना, जो खिलाड़ियों के ठहरने के लिए विकसित किया गया था और आज भी उसी नाम से एक बस्ती है।
यह चीज़ बड़े खेल आयोजनों के साथ बार-बार होती है। जो ढाँचा खेलों के नाम पर बनता है, वह खेलों के बाद शहर के पास रह जाता है, और अक्सर वही उन खेलों की सबसे टिकाऊ विरासत होती है।
बीसवीं बार
यह भारत की बीसवीं भागीदारी है, 1951 से।
इस लंबे रिकॉर्ड में एक बात लगातार दिखती है। भारत ने कभी कोई एशियाई खेल नहीं छोड़ा, और भारत ने दो बार मेज़बानी की, 1951 में और 1982 में, दोनों बार नई दिल्ली में।
पदकों का हिसाब बहुत बाद में बदला।
2018 के जकार्ता खेलों में भारत ने 570 खिलाड़ियों का दल भेजा और 70 पदक जीते, जिनमें 16 स्वर्ण, 23 रजत और 31 कांस्य थे।
2023 के हांगझोऊ खेलों में यह संख्या 107 हो गई, 28 स्वर्ण, 38 रजत और 41 कांस्य के साथ। एशियाई खेलों के इतिहास में पहली बार भारत का आँकड़ा तीन अंकों में पहुँचा।
इसके साथ भारत चीन, जापान और दक्षिण कोरिया के बाद चौथा ऐसा देश बना जिसने एक ही संस्करण में सौ या उससे ज़्यादा पदक जीते।
उस बार सबसे आगे निशानेबाज़ी रही, 22 पदकों के साथ, जिनमें सात स्वर्ण थे। एथलेटिक्स दूसरे नंबर पर रहा, छह स्वर्ण, चौदह रजत और नौ कांस्य के साथ।

दो आँकड़ों का जोड़
अब 2018 और 2023 को साथ रखिए।
2018 में 570 खिलाड़ी, 70 पदक। हर आठ खिलाड़ियों पर एक पदक।
2023 में पदक 107 हुए। दल का आकार उस स्तर तक नहीं बढ़ा।
इस बार दल 503 का है, यानी 2018 से छोटा।
इसका मतलब यह नहीं कि पदक घटेंगे। इसका मतलब यह है कि दल के आकार और पदकों की संख्या के बीच सीधा रिश्ता नहीं है, और यह बात इस देश में खेल नीति की सबसे उपयोगी सीख है।
एक छोटा दल जिसमें हर खिलाड़ी योग्यता के मानक पर आया हो, एक बड़े दल से बेहतर कर सकता है जिसमें भागीदारी के लिए भेजे गए लोग हों।
घुड़सवारी के दल का इस बार कट जाना इसी सोच का उदाहरण है। चयन मानदंड पूरा न होने पर बारह में से चार को हटाया गया। यह ख़बर किसी के लिए अच्छी नहीं है, पर वह मानदंड के लागू होने का सबूत है।
इस बार का आयोजन कितना बड़ा है
आइची-नागोया के ये बीसवें एशियाई खेल हैं, और जापान तीसरी बार इनकी मेज़बानी कर रहा है। पहले 1958 में टोक्यो में और फिर 1994 में हिरोशिमा में।
इस बार 45 देशों से ग्यारह हज़ार से ज़्यादा खिलाड़ी और लगभग छह हज़ार अधिकारी आ रहे हैं। सोलह दिन में 43 खेलों की 71 विधाओं में 469 स्पर्धाएँ होंगी और 1,407 पदक बाँटे जाएँगे।
अब इसे 1951 के साथ रखिए। ग्यारह देश, छह खेल, 57 पदक स्पर्धाएँ।
पैंतालीस देश, तैंतालीस खेल, 469 स्पर्धाएँ।
स्पर्धाओं की संख्या पचहत्तर साल में आठ गुना से ज़्यादा हो गई है।
इसका एक व्यावहारिक अर्थ है जो पदक तालिका पढ़ते समय याद रखने लायक़ है। जब स्पर्धाएँ बढ़ती हैं, तो पदक भी बढ़ते हैं, और किसी देश की पदक संख्या का बढ़ना अकेले उसके सुधार का प्रमाण नहीं होता।
2023 में भारत का सौ पार करना असली उपलब्धि थी, क्योंकि वह चौथा देश बना जिसने ऐसा किया। पर उसी तालिका को 1951 से जोड़कर सीधे पढ़ना ग़लत होगा, क्योंकि तब कुल 57 पदक स्पर्धाएँ थीं और भारत 51 पदक जीत गया था।
उस साल भारत ने जितने पदक जीते, उतनी स्पर्धाएँ भी मुश्किल से ज़्यादा थीं।
नीरज का न होना
एक खिलाड़ी के बाहर होने की ख़बर आमतौर पर एक पंक्ति होती है। यहाँ वह उससे बड़ी है।
नीरज चोपड़ा ने 2023 में हांगझोऊ में भाला फेंक का ख़िताब बचाया था, और वे एथलेटिक्स के उन छह स्वर्ण पदकों में से एक थे।
उनकी अनुपस्थिति का असर सिर्फ़ एक पदक पर नहीं पड़ता। बड़े खिलाड़ी दल के भीतर एक और भूमिका निभाते हैं, जो आँकड़ों में नहीं आती।
उनकी जगह यशवीर सिंह जा रहे हैं।
एक खिलाड़ी के हटने और दूसरे के आने में जो चीज़ ध्यान देने लायक़ है, वह यह है कि जगह ख़ाली नहीं छोड़ी गई। जिस खेल में एक दशक पहले तक एक भी विश्व स्तरीय भाला फेंकने वाला नहीं था, वहाँ अब चोट लगने पर कोई दूसरा नाम मौजूद है।
क्रिकेट, और एक सोलह साल का नाम
इस बार भी क्रिकेट एशियाई खेलों का हिस्सा है।
पुरुष टीम में जसप्रीत बुमराह जैसे नाम हैं और वैभव सूर्यवंशी भी, जो इस दल के सबसे कम उम्र के खिलाड़ियों में हैं। महिला टीम में हरमनप्रीत कौर और स्मृति मांधना हैं।
क्रिकेट का एशियाई खेलों में होना अपने-आप में एक अजीब बात है, क्योंकि यह खेल एशिया के अधिकांश देशों में नहीं खेला जाता। कुछ ही देशों की टीमें उतरती हैं, और इसीलिए पदक तक का रास्ता बाक़ी खेलों के मुक़ाबले छोटा होता है।
यह टिप्पणी खिलाड़ियों पर नहीं है। यह उस पदक तालिका पर है जिससे किसी देश के खेल की सेहत आँकी जाती है, और जिसमें हर पदक का वज़न बराबर गिना जाता है, चाहे उसके लिए कितने भी देश उतरे हों।
जो इस दल में देखने लायक़ है
पदक की भविष्यवाणी करना इस अख़बार का काम नहीं है। पर कुछ चीज़ें ऐसी हैं जिन पर सोलह दिन नज़र रखी जा सकती है, और वे आँकड़ों से निकलती हैं।
पहली, निशानेबाज़ी। 2023 में यह अकेला खेल 22 पदक लाया, जिनमें सात स्वर्ण थे। किसी एक खेल का इतना बड़ा हिस्सा होना ताक़त भी है और जोखिम भी। जिस साल यह खेल ख़राब जाए, उस साल कुल तालिका पर सीधा असर पड़ता है।
दूसरी, एथलेटिक्स। पिछली बार छह स्वर्ण, चौदह रजत और नौ कांस्य। इस बार उसका सबसे बड़ा नाम बाहर है।
तीसरी, महिलाओं का हिस्सा। दल में 234 महिलाएँ हैं और 269 पुरुष, यानी लगभग छियालीस फ़ीसदी। 1951 के भारतीय दल में यह अनुपात इसके आसपास भी नहीं था, और यह उन बदलावों में है जो पदक तालिका से ज़्यादा बताते हैं।
चौथी, वे खेल जिनमें भारत पहली बार या लंबे अंतराल के बाद उतर रहा है। दल 36 खेलों में है, जबकि आयोजन 43 का है। यानी सात खेल ऐसे हैं जिनमें भारत नहीं उतर रहा, और वह सूची भी अपने-आप में एक जानकारी है।
आख़िर में
पचहत्तर साल में यह सफ़र यह रहा।
1951 में ग्यारह देशों के कुल 489 खिलाड़ी, छह खेल, 57 स्पर्धाएँ। मेज़बान भारत, और उसकी आयोजन समिति में वह आदमी नहीं जिसका यह विचार था।
2026 में अकेले भारत के 503 खिलाड़ी, 36 खेलों में, 265 लोगों के साथ।
जो चीज़ इन दोनों के बीच नहीं बदली, वह यह है कि दोनों बार सबसे दिलचस्प संख्या पदकों की नहीं, भेजे गए लोगों की है।

स्रोतआइची-नागोया 2026 में भारतीय दल का विवरण, ओलंपिक्स डॉट कॉम, 1951 के पहले एशियाई खेल, हांगझोऊ 2023 की पदक तालिका, 1951 के एशियाई खेलों का विवरण, 1982 के खेल और भारत में रंगीन प्रसारण की शुरुआत, आइची-नागोया 2026, आयोजन का विवरण