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पैसा

भारत के निर्यातक अपने व्यापार समझौतों की तरजीह बीस से तीस फ़ीसदी मौक़ों पर इस्तेमाल करते हैं, बाहर के निर्यातक साठ से सत्तर फ़ीसदी पर, और यह आँकड़ा सरकार का नहीं एक थिंक टैंक का है

मंगलवार, 22 सितंबर को दिल्ली में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की अध्यक्षता में डीपीआईआईटी की कार्यशाला में उद्योग जगत से पूछा जाना है कि तरजीही शुल्क का पूरा फ़ायदा क्यों नहीं उठाया जाता। जवाब का बड़ा हिस्सा काग़ज़ी प्रक्रिया की लागत में है, अनिच्छा में नहीं।

चेन्नई पोर्ट का कंटेनर टर्मिनल, मरीना की तरफ़ से लिया गया दृश्य; हर व्यापार समझौते का असली हिसाब यहीं से गुज़रने वाले माल में बनता है
तस्वीर: VtTN, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 3.0

भारत ने जिन पंद्रह मुक्त व्यापार समझौतों पर दस्तख़त कर रखे हैं, उनमें अपने निर्यातक हर तीन मौक़ों में से एक पर भी शुल्क छूट का दावा नहीं करते। दूसरी तरफ़ के निर्यातक, जो भारत में सामान भेजते हैं, दस में से छह से सात बार यह दावा करते हैं। मंगलवार, 22 सितंबर को दिल्ली में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की अध्यक्षता में उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग, यानी डीपीआईआईटी, की एक दिन की कार्यशाला ठीक इसी सवाल पर है। उद्योग संगठनों और निर्यात संवर्धन परिषदों से पूछा जाना है कि ज़मीनी अमल में कौन-सी अड़चनें हैं।

यह आँकड़ा जितना सीधा दिखता है, उतना सीधा है नहीं। यह एक भिन्न है। हर भिन्न में अंश और हर, दोनों मायने रखते हैं। जब दो भिन्नों का हर ही अलग हो, तो उनकी तुलना ग़लत जगह पहुँचा सकती है। अगला हिस्सा उसी हर की बात करता है, क्योंकि उसके बिना यह पूरा लेख बेमतलब है।

इस्तेमाल दर का हिसाब: अंश ऊपर, हर नीचे

इस्तेमाल दर, या अंग्रेज़ी में यूटिलाइज़ेशन रेट, का मतलब है कि किसी व्यापार समझौते के तहत मिली शुल्क छूट का दावा कितनी बार किया गया। अंश में वह निर्यात या आयात है जिस पर तरजीही शुल्क का दावा हुआ। हर में क्या रखा जाए, यहीं असली सवाल शुरू होता है।

दो विकल्प हैं। पहला, उस साझेदार देश के साथ कुल व्यापार। दूसरा, उस व्यापार का सिर्फ़ वह हिस्सा जो तरजीह के लिए पात्र भी है, यानी जिस पर समझौते के मूल नियम लागू होते हैं और जो उस समझौते की शुल्क सूची में शामिल है। हर व्यापार पात्र नहीं होता। कुछ उत्पाद समझौते की शुल्क सूची से बाहर रह जाते हैं। कुछ पर पहले से ही सामान्य शुल्क शून्य है, तो तरजीह माँगने का कोई मतलब ही नहीं बनता। इन दोनों हर से एक ही व्यापार पर दो बिल्कुल अलग फ़ीसदी निकलते हैं। छोटा हर हमेशा बड़ा फ़ीसदी देगा।

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव, यानी जीटीआरआई, की रिपोर्ट "एफ़टीए रिपोर्ट कार्ड 2026: छह चुनौतियाँ जिन्हें भारत अब नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता" दूसरे हर का इस्तेमाल करती है। पीटीआई के ज़रिये आई इस रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत के पात्र निर्यात में से बीस से तीस फ़ीसदी पर ही तरजीही शुल्क का दावा होता है। भारत में सामान भेजने वाले साझेदार देशों के निर्यातक साठ से सत्तर फ़ीसदी दावा करते हैं। यह वाक्य ग़ौर से पढ़ने लायक़ है। जीटीआरआई ने पीटीआई को यही बताया: भारत के पात्र निर्यात का महज़ बीस से तीस फ़ीसदी हिस्सा एफ़टीए के फ़ायदे का इस्तेमाल करता है, जबकि भारत को निर्यात करने वालों में यह इस्तेमाल साठ से सत्तर फ़ीसदी है।

ग़ौर करने की बात यह है कि जीटीआरआई का यह वाक्य पहले हिस्से में "पात्र" शब्द साफ़ लिखता है, दूसरे हिस्से में नहीं दोहराता। तुलना तभी बनती है जब आधार एक हो, इसलिए मतलब वही रहता है। लेकिन जो पाठक सिर्फ़ यह वाक्य पढ़ता है, वह दूसरे फ़ीसदी को कुल व्यापार पर भी लगा सकता है। असल हर वही है, पात्र व्यापार, कुल व्यापार नहीं।

यह रिपोर्ट 9 जून 2026 को पीटीआई के ज़रिये छपी। बिज़नेस टुडे, पीएसयू वॉच, केएनएन इंडिया और ईटीवी भारत, चारों ने वही कॉपी लगभग शब्दश: छापी। पाँच जगह यह आँकड़ा पढ़ने का मतलब पाँच अलग हिसाब नहीं है। यह एक ही हिसाब है, एक ही थिंक टैंक का, कई बार छपा हुआ। जीटीआरआई कोई सरकारी दफ़्तर नहीं है। यह 2023 में बना एक निजी नीति शोध संस्थान है, दिल्ली में, जिसके संस्थापक अजय श्रीवास्तव भारतीय व्यापार सेवा के पूर्व अधिकारी रहे हैं। बीस-तीस और साठ-सत्तर, दोनों संख्याएँ जीटीआरआई की अपनी गणना हैं, किसी सरकारी दस्तावेज़ की नहीं।

सर्टिफिकेट ऑफ़ ओरिजिन: तरजीह की चाबी वाला काग़ज़

तरजीही शुल्क का दावा करने के लिए काग़ज़ पर एक चीज़ ज़रूरी है, सर्टिफिकेट ऑफ़ ओरिजिन, यानी मूल प्रमाणपत्र। यह काग़ज़ बताता है कि माल किस देश में बना, और क्या वह उस समझौते के मूल नियमों पर खरा उतरता है। बिना इस प्रमाणपत्र के आयातक देश का सीमा शुल्क विभाग तरजीही दर लागू नहीं करेगा। पूरा माल सामान्य शुल्क पर ही निकलेगा, भले ही समझौता उस उत्पाद पर शून्य शुल्क का वादा करता हो। यह अंतर बहुत बड़ा है।

भारत में यह प्रमाणपत्र कोई एक दफ़्तर नहीं देता। विदेश व्यापार महानिदेशालय, यानी डीजीएफ़टी, ने एक साझा डिजिटल मंच बनाया है, coo.dgft.gov.in, जहाँ से एशिया-प्रशांत व्यापार समझौता, दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र, आसियान-भारत समझौता, जापान और कोरिया के समझौतों समेत लगभग हर समझौते का प्रमाणपत्र माँगा जा सकता है। इसी मंच पर अलग-अलग अधिकृत एजेंसियाँ आवेदन जाँचकर प्रमाणपत्र जारी करती हैं।

मुंबई का इंडियन मर्चेंट्स चैंबर, स्थापना 1907, देश के सबसे पुराने वाणिज्य मंडलों में एक; ऐसी ही अधिकृत एजेंसियाँ डीजीएफ़टी के मंच पर मूल प्रमाणपत्र जारी करती हैं
तस्वीर: Srinivasan V, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

17 जनवरी 2025 से तरजीही प्रमाणपत्र के लिए इसी नए मंच, नाम है ईकोओ 2.0, से आवेदन अनिवार्य है। पुराना तरीक़ा एक दिन पहले ही बंद हो चुका था।

निर्यातक को यह साबित करना पड़ता है कि उसका माल मूल रूप से प्राप्त है, यानी पूरी तरह उसी देश में उपजा या बना है, या फिर उसने पर्याप्त रूपांतरण पाया है। दूसरी शर्त पूरी करने के तरीक़े कई हैं, घरेलू मूल्यवर्धन का न्यूनतम हिस्सा, शुल्क वर्गीकरण में बदलाव, या कोई तय प्रक्रिया नियम। सीमा शुल्क बोर्ड के अपने एक प्रशिक्षण दस्तावेज़ में एक उदाहरण दिया गया है: कम से कम पैंतीस फ़ीसदी घरेलू मूल्यवर्धन, साथ में शुल्क उप-शीर्षक में बदलाव, तभी माल किसी साझेदार देश में बना हुआ माना जाएगा। यह सिर्फ़ एक उदाहरण है। हर समझौते और हर उत्पाद की अपनी शर्त अलग हो सकती है।

मूल के नियम, और पालन की लागत

यहीं से पता चलता है कि इस्तेमाल दर कम होने का मतलब समझौता नापसंद होना नहीं है। कई बार गणित इतना ही कहता है कि काग़ज़ बनवाने की लागत, बचत से ज़्यादा बैठती है।

जीटीआरआई के आँकड़े इसे संख्या में रखते हैं। सिंगापुर का औसत सामान्य शुल्क लगभग शून्य है। जापान, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया और यूएई में यह चार फ़ीसदी से कम है। भारत का व्यापार-भारित औसत सामान्य शुल्क क़रीब 12.6 फ़ीसदी है, और अलग-अलग उत्पादों पर यह शून्य से लेकर 150 फ़ीसदी तक जाता है। भारतीय निर्यातक जब सिंगापुर या जापान भेजता है, तो बिना तरजीह के भी शुल्क वैसे ही बहुत कम है। प्रमाणपत्र बनवाने, मूल साबित करने और काग़ज़ी शर्तें पूरी करने में जो ख़र्च और समय लगता है, वह अक्सर उस मामूली बचत से ज़्यादा बैठता है। छोटे निर्यातक के लिए यह गणित और सख़्त हो जाता है। इसीलिए बहुत से निर्यातक तरजीह माँगते ही नहीं, सीधे सामान्य दर पर माल भेज देते हैं।

भारत में आने वाले माल पर औसत सामान्य शुल्क इसके उलट ऊँचा है। साझेदार देश के निर्यातक के लिए तरजीह माँगना बड़ी बचत का मामला बनता है। पचास फ़ीसदी की शुल्क कटौती किसी प्रतिस्पर्धी आपूर्तिकर्ता पर बड़ी बढ़त दे सकती है। अजय श्रीवास्तव अपनी बात में ठीक यही गिनाते हैं। इसी असंतुलन का एक नतीजा उलटी शुल्क संरचना है। इस्पात और एल्युमिनियम पर सामान्य शुल्क साढ़े सात से दस फ़ीसदी है, जबकि इन्हीं धातुओं से बनी मशीनरी और इंजीनियरिंग सामान कई समझौतों के तहत भारत में शुल्क-मुक्त घुस आते हैं। भारतीय विनिर्माता महँगा कच्चा माल ख़रीदता है, फिर उसी माल से बनी शुल्क-मुक्त मशीनरी से मुक़ाबला करता है। मुक़ाबला बराबरी का नहीं रहता।

इसका असर व्यापार घाटे में दिखता है। 2007-09 और 2023-25 के बीच आसियान के साथ भारत का व्यापार घाटा 381 फ़ीसदी बढ़ा। जापान के साथ यह बढ़त 318 फ़ीसदी रही, दक्षिण कोरिया के साथ 268 फ़ीसदी। इन तीन साझेदारों के साथ पिछले तीन बरस का औसत सालाना व्यापार घाटा क़रीब 62 अरब डॉलर बैठता है, जीटीआरआई के इसी आकलन में।

आयात की तरफ़ भी काग़ज़ी बोझ कम नहीं है। सीमा शुल्क, व्यापार समझौतों के तहत मूल नियमों के प्रशासन का नियम, 2020, यानी कारोटार, केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड ने 21 अगस्त 2020 की अधिसूचना संख्या 81/2020-सीमा शुल्क, एनटी, से लागू किया, और यह 21 सितंबर 2020 से प्रभाव में आया। सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 28डीए, जो वित्त अधिनियम 2020 से जुड़ी, इसकी क़ानूनी बुनियाद है। इस नियम के तहत आयातक को बिल ऑफ़ एंट्री में यह घोषणा करनी होती है कि माल तरजीही दर के योग्य है। हर वस्तु पर लागू शुल्क अधिसूचना बतानी होती है। हर वस्तु के साथ मूल प्रमाणपत्र देना होता है, जिसमें प्रमाणपत्र संख्या, जारी होने की तारीख़ और मूल की शर्त जैसे ब्योरे शामिल हों। आयातक को यह जानकारी कम से कम पाँच बरस तक सुरक्षित रखनी होती है।

पंजाब के अटारी में एकीकृत चेक पोस्ट, 13 अप्रैल 2012 के उद्घाटन की तस्वीर, तत्कालीन वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा भी मौजूद थे; सीमा पार आने वाले माल की मूल जाँच ऐसी ही चौकियों से गुज़रती है
तस्वीर: Ministry of Home Affairs, विकिमीडिया कॉमन्स GODL-India

अगर सीमा शुल्क अधिकारी को शक हो कि मूल की शर्त पूरी नहीं हुई, तो वह निर्यातक देश की तय जाँच एजेंसी से पुष्टि माँग सकता है। जाँच पूरी होने तक तरजीही दर रुक जाती है। माल तभी छूटता है जब शुल्क के अंतर के बराबर ज़मानत जमा हो। प्रमाणपत्र अधूरा हो, बिना अधिकृत बदलाव के काटा-छाँटा गया हो, मियाद ख़त्म हो चुकी हो, या जिस माल पर बना है वह उस समझौते की शुल्क सूची में हो ही नहीं, तो दावा बिना जाँच के भी ख़ारिज हो सकता है। ऐसे प्रमाणपत्र पर सीधे "लागू नहीं" लिख दिया जाता है।

सरकार की अपनी गिनती: सर्टिफिकेट, फ़ीसदी नहीं

सरकार जीटीआरआई वाला हिसाब लगाती ही नहीं। 28 जुलाई 2026 को लोकसभा में एक लिखित सवाल के जवाब में वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने बताया कि 2021 के बाद हुए समझौतों में तरजीही शुल्क के इस्तेमाल की निगरानी सरकार मूल प्रमाणपत्रों की गिनती और साझेदार देश के व्यापार आँकड़ों से करती है। यह जीटीआरआई की भिन्न वाली गणना नहीं है। यह सीधी गिनती है, कितने प्रमाणपत्र जारी हुए।

आँकड़े इस तरह हैं। यूएई सीईपीए 1 मई 2022 से लागू है, और तब से साढ़े चार लाख से ऊपर प्रमाणपत्र जारी हो चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया के साथ आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौता दिसंबर 2022 में लागू हुआ, उसमें 2.73 लाख प्रमाणपत्र जारी हुए हैं, जबकि समझौते से पहले 2020-21 के पूरे साल में सिर्फ़ 1,482 प्रमाणपत्र बने थे। मॉरिशस के साथ समझौते में 1,956 प्रमाणपत्र जारी हुए। ओमान का समझौता 1 जून 2026 से लागू है, यानी एक महीने में ही 783 प्रमाणपत्र बन गए। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के साथ टेपा अक्तूबर 2025 से लागू है, और तब से 7,885 प्रमाणपत्र जारी हो चुके हैं।

समझौताकब से लागूजारी सर्टिफिकेट
यूएई सीईपीए1 मई 20224.45 लाख से ऊपर
ऑस्ट्रेलिया ईसीटीएदिसंबर 20222.73 लाख
मॉरिशस सीईसीपीए20211,956
ओमान सीईपीए1 जून 2026783, एक महीने में
ईएफ़टीए-टेपाअक्तूबर 20257,885

स्रोत: जितिन प्रसाद का लोकसभा में लिखित उत्तर, आईएएनएस की रिपोर्ट, 28 जुलाई 2026।

मंत्री ने बढ़ते आँकड़ों को भरोसेमंद इस्तेमाल का सुबूत बताया, हर बार बिना कोई फ़ीसदी दिए। आँकड़ा यहाँ भी फ़ीसदी में नहीं है। यह किसी पात्र व्यापार के हर से निकला अनुपात नहीं है। यह सिर्फ़ गिनती है, जो हर साल स्वाभाविक रूप से बढ़ती ही जाएगी क्योंकि व्यापार ख़ुद बढ़ रहा है। इस गिनती से यह पता नहीं चलता कि कितना पात्र व्यापार तरजीह के बाहर रह गया। जीटीआरआई के बीस-तीस फ़ीसदी वाले आँकड़े को जाँचने लायक़ कोई अलग सरकारी फ़ीसदी सार्वजनिक रूप से मौजूद नहीं है। सरकार गिनती गिनती है, जीटीआरआई अनुपात नापता है, और दोनों एक-दूसरे को न सही ठहराते हैं न ग़लत।

जीटीआरआई ने अपनी रिपोर्ट में एक सुझाव यह भी दिया है: एक अलग एफ़टीए असर निगरानी प्राधिकरण बने, जो हर समझौते की इस्तेमाल दर को नियमित तरीक़े से नापे और सार्वजनिक करे। फ़िलहाल वह काम निजी थिंक टैंकों के भरोसे है।

आज दिल्ली में डीपीआईआईटी की कार्यशाला

आज की कार्यशाला ठीक इसी ख़ाली जगह को भरने की कोशिश है। पीटीआई की 21 सितंबर की ख़बर के मुताबिक़, जो डेली एक्सेलसियर और मिलेनियम पोस्ट दोनों में छपी, डीपीआईआईटी का एक दिन का सत्र वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की अध्यक्षता में हो रहा है।

नई दिल्ली में उद्योग भवन, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की इमारत, जिसके अंतर्गत डीपीआईआईटी आता है; आज की कार्यशाला इसी मंत्रालय के दायरे में हो रही है
तस्वीर: Pinakpani, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

सत्र का केंद्र है एफ़टीए का जायज़ा, कारोबार सुगमता, और नियामक अनुपालन की पहल। उद्योग संगठनों और निर्यात संवर्धन परिषदों से ज़मीनी अमल की अड़चनें और प्रक्रियागत रुकावटें माँगी जानी हैं।

इसी ख़बर में यह भी दर्ज है कि भारत ने ब्रिटेन, ओमान, यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ, ऑस्ट्रेलिया और यूएई के साथ समझौते लागू कर रखे हैं। बाक़ी दो अभी अधूरे हैं। न्यूज़ीलैंड के साथ समझौता अगले महीने से लागू होगा, और यूरोपीय संघ के साथ समझौते पर दिसंबर तक दस्तख़त होने की उम्मीद जताई गई है।

इस लेख के लिखे जाने तक कार्यशाला पर पत्र सूचना कार्यालय की कोई विज्ञप्ति नहीं मिली। सत्र ख़त्म होने के बाद क्या तय हुआ, इसकी भी कोई रिपोर्ट उपलब्ध नहीं थी। अगर कार्यशाला से कोई नई घोषणा, नया आँकड़ा या काग़ज़ी प्रक्रिया आसान बनाने का कोई क़दम निकलता है, तो वह अलग ख़बर होगी। आज का सत्र ख़ुद कोई फ़ैसला नहीं है। यह उद्योग से सुनने की कवायद है।

पचहत्तर फ़ीसदी की सोच, तीस फ़ीसदी का हाल

गोयल का बड़ा लक्ष्य आज की कार्यशाला में नहीं बना। यह एक अलग और पहले के मंच से आया है। गुरुवार, 3 सितंबर को दिल्ली में "लीवरेजिंग एफ़टीए: एक आउटरीच कार्यक्रम" नाम की राष्ट्रीय कार्यशाला में गोयल ने भारत के सभी 780 ज़िलों तक तरजीही पहुँच बढ़ाने का आह्वान किया था। डीडी इंडिया और एसएमई स्ट्रीट, दोनों की उस दिन की रिपोर्ट के मुताबिक़, गोयल ने कहा कि भारत के नौ व्यापार समझौते, जो साठ ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्थाओं तक फैले हैं, दुनिया के लगभग दो-तिहाई व्यापार तक तरजीही पहुँच देते हैं। कनाडा, मेक्सिको, चिली, मर्कोसुर, दक्षिणी अफ़्रीकी सीमा शुल्क संघ, खाड़ी सहयोग परिषद और इसराइल के साथ आने वाले समझौते, और आसियान, कोरिया व जापान के समझौतों की समीक्षा, मिलाकर यह हिस्सा पचहत्तर फ़ीसदी तक पहुँचा सकते हैं।

ग़ौर करने की बात यह भी है कि गोयल ने उस दिन नौ समझौतों की बात कही, जबकि जीटीआरआई की गिनती, तीन महीने पहले, पंद्रह की थी, जो सत्ताईस देशों तक फैली है। यह ग़लती नहीं है। यह गिनने के तरीक़े का फ़र्क़ है। जीटीआरआई के पंद्रह में श्रीलंका समझौता, दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र, नेपाल और भूटान के पुराने व्यापार समझौते, और थाईलैंड के साथ शुरुआती रियायत योजना जैसे पुराने और छोटे समझौते भी गिने गए हैं। गोयल की नौ की गिनती बड़े, हाल के व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौतों तक सीमित लगती है।

पचहत्तर फ़ीसदी का यह लक्ष्य कितने भी नए समझौतों से बने, वह तभी मायने रखेगा जब पुराने समझौतों का पात्र व्यापार भी तरजीह की तरफ़ मुड़े। नए समझौते जोड़ने से कवरेज बढ़ता है। कवरेज बढ़ने से इस्तेमाल अपने आप नहीं बढ़ता। बीस से तीस फ़ीसदी वाला आँकड़ा यही दिखाता है।

पंद्रह लागू, नौ बातचीत में

जीटीआरआई की रिपोर्ट भारत के व्यापार समझौतों की पूरी फ़ेहरिस्त भी देती है। पंद्रह समझौते लागू हैं, जो सत्ताईस देशों को छूते हैं। नौ और समझौतों पर बातचीत चल रही है या वे लागू होने की प्रक्रिया में हैं, जो बयालीस और देशों को जोड़ेंगे। दोनों मिलाकर उनहत्तर देश भारत के तीन-चौथाई से ज़्यादा निर्यात को समेटते हैं।

पुरानी पीढ़ी के समझौतों की सूची लंबी है। श्रीलंका के साथ मुक्त व्यापार समझौता, वर्ष 2000। दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र, 2006। नेपाल के साथ व्यापार संधि, 2009, और भूटान के साथ, 1972। थाईलैंड के साथ शुरुआती रियायत योजना, 2004, और सिंगापुर के साथ व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता, 2005। आसियान के साथ समझौता 2010-11 में हुआ, दक्षिण कोरिया और जापान के साथ व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते भी उसी दौर में। मलेशिया के साथ व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता 2011 का है।

नई पीढ़ी के समझौतों की शुरुआत मॉरिशस से 2021 में हुई। उसके बाद यूएई, 2022, ऑस्ट्रेलिया, 2022, यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ, 2025, और ओमान, 2026, आए। ब्रिटेन के साथ समझौता 15 जुलाई 2026 से लागू है, एसएमई स्ट्रीट की 3 सितंबर की रिपोर्ट में दर्ज गोयल के अपने बयान के मुताबिक़। न्यूज़ीलैंड अगले महीने जुड़ेगा। बातचीत की मेज़ पर अमेरिका, इसराइल, कनाडा, पेरू, चिली, खाड़ी सहयोग परिषद के चार देश, और यूरेशियाई आर्थिक संघ के पाँच देश हैं।

यूरोपीय संघ इस सूची में अलग से खड़ा है। पीटीआई की 21 सितंबर की ख़बर दस्तख़त दिसंबर तक होने की बात करती है। जब तक दस्तख़त और दोनों तरफ़ की मंज़ूरी नहीं मिलती, यह समझौता न लागू सूची में है, न बातचीत वाली सूची में ठीक बैठता है। यह ठीक बीच में अटका है। आज की कार्यशाला में उठा कोई भी सवाल इस अनिश्चितता को नहीं बदलेगा।

स्रोतबिज़नेस टुडे, 9 जून 2026, दोपहर 1:48: जीटीआरआई की 'एफ़टीए रिपोर्ट कार्ड 2026' रिपोर्ट पर पीटीआई की ख़बर, पीएसयू वॉच, 9 जून 2026: वही पीटीआई कॉपी, जीटीआरआई संस्थापक अजय श्रीवास्तव के हवाले से पूरा ब्योरा और समझौतों की फ़ेहरिस्त, आईएएनएस, 28 जुलाई 2026: वाणिज्य राज्य मंत्री जितिन प्रसाद का लोकसभा में लिखित उत्तर, सर्टिफिकेट ऑफ़ ओरिजिन के आँकड़ों समेत, डेली एक्सेलसियर, 21 सितंबर 2026, सुबह 4:00: 22 सितंबर की डीपीआईआईटी कार्यशाला पर पीटीआई की पूर्व-रिपोर्ट, मिलेनियम पोस्ट, 21 सितंबर 2026, रात 12:16: वही पीटीआई कॉपी, डीडी इंडिया, 3 सितंबर 2026: 'लीवरेजिंग एफ़टीए: एक आउटरीच कार्यक्रम' में पीयूष गोयल का भाषण, एसएमई स्ट्रीट, 3 सितंबर 2026, दोपहर 3:31: उसी भाषण की विस्तृत रिपोर्ट, पचहत्तर फ़ीसदी वाला लक्ष्य और ब्रिटेन समझौते की तारीख़, केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड, बंगलुरु सीमा शुल्क आयुक्तालय की प्रशिक्षण प्रस्तुति: कारोटार, 2020 की नियम-दर-नियम व्याख्या, विदेश व्यापार महानिदेशालय: सर्टिफिकेट ऑफ़ ओरिजिन के लिए साझा डिजिटल मंच

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