भारत-यूरोपीय संघ समझौते का इस्पात कोटा 16,41,470 टन का है, यूरोपीय आयोग 1 जुलाई से भारत को 19,43,527 टन दे रहा है, और कार्बन शुल्क दोनों पर बराबर चलेगा
शुक्रवार, 11 सितंबर को ब्रसेल्स में समझौते का इस्पात अनुलग्नक सार्वजनिक हुआ। उसमें भारत के लिए सोलह उत्पाद समूहों में देश-विशिष्ट कोटा है, जिसमें 6,94,853 टन समझौते वाला हिस्सा है। उसी यूरोपीय संघ का एक क्रियान्वयन विनियम 1 जुलाई से लागू है और उन्हीं सोलह समूहों में भारत को इससे 3,02,057 टन ज़्यादा दे रहा है। वह विनियम 31 दिसंबर को ख़त्म हो जाएगा, और दोनों दस्तावेज़ों में से कौन-सा आँकड़ा 1 जनवरी 2027 से चलेगा, यह किसी पाठ में लिखा नहीं है।

भारतीय इस्पात को यूरोप में मिली नई जगह का माप तीन दस्तावेज़ों में तीन तरह से लिखा है, और तीनों लागू हैं।
पहला भारत और यूरोपीय संघ के व्यापार समझौते का अनुलग्नक 2-B है, जो शुक्रवार, 11 सितंबर को ब्रसेल्स में सार्वजनिक हुआ। वह सोलह उत्पाद समूहों में भारत के लिए देश-विशिष्ट कोटा तय करता है और तालिका के नीचे कुल 16,41,470 टन लिखता है: 9,46,616 टन सामान्य हिस्से का और 6,94,853 टन समझौते वाले हिस्से का। दूसरा यूरोपीय आयोग का क्रियान्वयन विनियम 2026/1457 है, जो 1 जुलाई से चल रहा है और उन्हीं सोलह समूहों में भारत को 19,43,526.60 टन दे रहा है। तीसरा क्रियान्वयन विनियम 2025/2621 है, जिसकी भारत वाली तालिका में गर्म बेलित इस्पात के सामने एक संख्या छपी है: 4.280 टन कार्बन डाइऑक्साइड प्रति टन माल।
पहले दो का फ़र्क़ 3,02,057 टन है। तीसरा तय करता है कि जो भी टन यूरोप पहुँचे, उस पर चुकाना क्या होगा।
अनुलग्नक 2-B की तालिका: तीस समूहों में से सोलह
अनुलग्नक तेरह पन्ने और छह अनुच्छेद का है। अनुच्छेद 2-B.3 का नाम दायरा है, और वही बताता है कि यह व्यवस्था किस माल पर बैठती है: तीस उत्पाद समूह, हर एक के नीचे उसकी प्रशुल्क लाइनें आठ अंकों में। यूरोपीय इस्पात विनियम में ये तीस लेबल छब्बीस श्रेणियाँ बनते हैं, क्योंकि 1.A और 1.B, 3.A और 3.B, 4.A और 4.B तथा 25.A और 25.B एक-एक श्रेणी के दो हिस्से हैं।
अगला अनुच्छेद, 2-B.4, कोटे की तालिका रखता है, और उसी तालिका में संख्या तीस से घटकर सोलह हो जाती है। तालिका के दो स्तंभ हैं: पहला सर्वाधिक अनुकूल राष्ट्र वाला हिस्सा, दूसरा समझौते वाला। सबसे बड़ी पंक्ति गर्म बेलित चादरों और पट्टियों की है, समूह 1.A: 2,99,197 टन पहले स्तंभ में, 2,10,408 टन दूसरे में, कुल 5,09,605 टन। उसके बाद ठंडी बेलित चादरें 2,18,658 टन, धातु-लेपित चादरें 1,97,860 टन, कार्बनिक-लेपित चादरें 1,86,038 टन और क्वार्टो प्लेटें 1,81,835 टन।
बाक़ी चौदह समूहों में भारत का अपना कोटा नहीं है, और उनमें वही माल है जो भारत बड़ी मात्रा में भेजता है: सरिया, मर्चेंट बार, वायर रॉड, तार, निर्बाध ट्यूब, कोण और आकृतियाँ, रेल सामग्री, खोखले सेक्शन और ठंडे-परिष्कृत बार। इनके लिए अनुच्छेद 2-B.4(3) दो साझा तालाब खोलता है: एक वह जिसमें दुनिया के वे सब देश हैं जिनका अपना कोटा नहीं है, और दूसरा वह जिसमें सिर्फ़ यूरोपीय संघ के व्यापार-समझौता साझेदार हैं। दोनों में पहले आओ, पहले पाओ चलता है।
तालिका का जोड़ ख़ुद एक टन पर अटकता है। दोनों स्तंभों का योग 16,41,469 टन बैठता है, सोलह पंक्तियों के अपने-अपने कुल जोड़ने पर 16,41,471 टन, और तालिका के नीचे छपा है 16,41,470 टन; छह पंक्तियों में यह फ़र्क़ एक टन का है, क्योंकि ये मात्राएँ एक बड़े यूरोपीय आँकड़े के प्रतिशत हिस्से हैं जिन्हें पूरे टन में गोल किया गया है। अनुच्छेद 2-B.1(3) यह भी दर्ज करता है कि कोटे से बाहर के माल पर परिशिष्ट 2-A-1 की आधार दरें लगेंगी। पचास फ़ीसदी की दर इस अनुलग्नक में कहीं नहीं लिखी।
एक ही देश के दो कोटे, और उनके बीच 3,02,057 टन
पचास फ़ीसदी वाली दर और भारत का आज का असली कोटा, दोनों दूसरे दस्तावेज़ में हैं। यूरोपीय संसद और काउंसिल का विनियम (ईयू) 2026/1384 आधिकारिक पत्रिका में 24 जून 2026 को छपा, 25 जून को प्रभावी हुआ और 1 जुलाई 2026 से लागू है। उसके अनुच्छेद 5(1) के तहत कोटे का देशवार बँटवारा आयोग को करना था, और उसने वह काम क्रियान्वयन विनियम (ईयू) 2026/1457 से 29 जून को किया।
उस विनियम के अनुलग्नक I में हर श्रेणी के नीचे देशों की पंक्तियाँ हैं, और हर पंक्ति में कुल सालाना मात्रा, सामान्य हिस्सा, समझौते वाला हिस्सा, चार तिमाहियों की बराबर किश्तें और एक क्रम संख्या। समूह 1.A में भारत की पंक्ति की क्रम संख्या 09.9803 है और उसमें लिखा है: कुल 5,97,274.45 टन, सामान्य हिस्सा 2,99,196.82 टन, समझौते वाला हिस्सा 2,98,077.63 टन, हर तिमाही 1,49,318.61 टन।
भारत की पंक्तियाँ ठीक उन्हीं सोलह समूहों में हैं जिनमें अनुलग्नक 2-B ने कोटा दिया है। पहला स्तंभ टन-दर-टन वही है; सोलहों पंक्तियों का सामान्य हिस्सा जोड़ने पर 9,46,616.66 टन आता है, यानी संधि की तालिका का 9,46,616। दूसरा स्तंभ वही नहीं है। क्रियान्वयन विनियम में भारत का समझौते वाला हिस्सा 9,96,909.95 टन है, संधि के अनुलग्नक में 6,94,853 टन। 1.A में यह अंतर 87,670 टन का है, ठंडी बेलित चादरों में 51,316 टन का, धातु-लेपित चादरों में 35,323 टन का। आज भारत के पास 19,43,526.60 टन है और संधि उसे 16,41,469 टन देती है।

भारत को आज समझौते वाला हिस्सा मिल क्यों रहा है, यह विनियम अपनी प्रस्तावना में ख़ुद बताता है। बिंदु 6 कहता है कि मुक्त व्यापार समझौते वाले देशों की सूची में वे समझौते भी शामिल होंगे जिन पर इस विनियम के प्रभावी होने की तारीख़ तक राजनीतिक सहमति बन चुकी है। भारत और यूरोपीय संघ की बातचीत 27 जनवरी 2026 को पूरी घोषित हुई थी, और अनुच्छेद 2 जिस सूची को अनुलग्नक II के खंड II.1 में रखता है उसमें भारत दर्ज है। बिंदु 9 आगे कहता है कि ऐसे देश के कारोबारी दोनों हिस्सों को एक साथ, एक ही क्रम संख्या के नीचे इस्तेमाल कर सकते हैं, और जो देश उस सूची में नहीं है उसे सिर्फ़ सामान्य हिस्सा मिलेगा।
उसी अनुलग्नक के आगे के खंड भारत की जगह और साफ़ करते हैं। खंड II.2 में भारत के सामने सोलह निशान हैं: अपना कोटा ख़त्म होने पर वह उन्हीं समूहों में समझौता-साझेदारों वाले साझे तालाब में उतर सकता है, जो 1.A में 4,83,682.26 टन का है। खंड II.4 के चौदह निशान बाक़ी चौदह समूहों के हैं। सोलह और चौदह मिलकर वही तीस बनते हैं जो अनुलग्नक 2-B के दायरे में हैं।
इस पूरी व्यवस्था की एक तारीख़ है। विनियम 2026/1457 का अनुच्छेद 6 कहता है कि यह 1 जुलाई 2026 से 31 दिसंबर 2026 तक लागू रहेगा। प्रस्तावना का बिंदु 18 वजह बताता है: इसे आपात प्रक्रिया के तहत तुरंत लागू किया गया, और विनियम (ईयू) संख्या 182/2011 के अनुच्छेद 8 के तहत ऐसा कोई कार्य छह महीने से ज़्यादा नहीं चल सकता। 1 जनवरी 2027 से जो अगला बँटवारा आएगा, उसमें 9,96,909.95 टन रहेगा या 6,94,853 टन, यह दोनों में से किसी पाठ में नहीं लिखा है।
कोटा खुलने की तारीख़ 1 जुलाई 2026 थी
रॉयटर्स की जिस ख़बर से सोमवार को यह मामला अख़बारों में आया, उसका आख़िरी वाक्य कहता है कि अतिरिक्त कोटा तब मिलेगा जब भारत-यूरोपीय संघ समझौता लागू होगा, और वह साल के अंत तक अपेक्षित है। अनुलग्नक ख़ुद यह नहीं कहता।
अनुच्छेद 2-B.1(2) का पाठ यह है कि अनुच्छेद 2-B.4 के कोटे उस तारीख़ से प्रभावी होंगे जिस दिन से यूरोपीय इस्पात विनियम लागू होना शुरू होगा। विनियम 2026/1384 का अनुच्छेद 14 वह तारीख़ 1 जुलाई 2026 रखता है। वह बीत चुकी है।
अनुच्छेद 2-B.6(2) में दूसरी तारीख़ है। वह कहता है कि गैट 1994 के अनुच्छेद XXVIII के तहत भारत और यूरोपीय संघ को एक समझौता करना है, और उस पर काम यूरोपीय इस्पात विनियम के प्रभावी होने से पहले पूरा हो जाना चाहिए। वह विनियम 25 जून 2026 को प्रभावी हुआ। यूरोपीय संघ ने यह अनुच्छेद XXVIII की प्रक्रिया विश्व व्यापार संगठन में 19 दिसंबर 2025 को शुरू की थी, और अनुलग्नक उसे अब भी भविष्य के काम की तरह लिखता है।
12 सितंबर को इसी डेस्क ने इस समझौते पर लिखते हुए पूछा था कि जिस पाठ को जनवरी में पूरा बताया गया था, उसका इस्पात वाला अनुलग्नक जून की एक विनियमावली का हवाला क्यों देता है। जवाब अनुलग्नक की अपनी तारीख़ों में है। वह उस विनियमावली के इर्द-गिर्द दोबारा काटा गया, और उसकी दोनों शर्तें ऐसी घड़ी पर बँधी हैं जो पहले ही आगे निकल चुकी है।
1,83,45,922 टन और 2013 के बाज़ार हिस्से का पैमाना
भारत का कोटा जिस बड़े आँकड़े का हिस्सा है, वह विनियम 2026/1384 के अनुलग्नक II में एक पंक्ति में है: कोटे की कुल सालाना मात्रा 1,83,45,922 टन होगी। कोटा-वर्ष 1 जुलाई से अगले साल 30 जून तक चलता है। अनुच्छेद 2(3) कहता है कि कोटा ख़त्म होने पर या कोटे के बाहर के माल पर 50 फ़ीसदी का मूल्यानुसार अतिरिक्त शुल्क लगेगा, और प्रस्तावना का बिंदु 61 दो बातें जोड़ता है: 2019 के रक्षोपाय में यह दर 25 फ़ीसदी थी, और नई दर बाक़ी लागू शुल्कों के ऊपर लगेगी।
अनुच्छेद 2(4) इस व्यवस्था की पहुँच तय करता है: यह हर आयात पर लागू है, उन देशों के माल पर भी जिनके साथ संघ का तरजीही समझौता है और उन पर भी जिन्हें एकतरफ़ा रियायतें मिली हुई हैं। मुक्त व्यापार समझौता कोटे से छूट नहीं देता; वह कोटे के भीतर एक अलग हिस्सा खोलता है।
कुल मात्रा कैसे तय हुई, यह अनुच्छेद 5(1) में है। उपबिंदु (a) कहता है कि कोटे का स्तर 2013 में यूरोपीय इस्पात बाज़ार में आयात के हिस्से के बराबर रखा जाएगा, और उपबिंदु (b) कि हर श्रेणी का हिस्सा 2022 से 2024 के आयात के अनुपात में निकलेगा। द हिंदू की 14 सितंबर की रिपोर्ट में दर्ज है कि 2025 में यूरोपीय संघ ने क़रीब 2.97 करोड़ टन इस्पात मँगाया, जिसमें 24 लाख टन भारत से आया। नया कोटा उस आयात से लगभग 38 फ़ीसदी छोटा है। इसी हिसाब में भारत का आज का कोटा पूरे कोटे का 10.59 फ़ीसदी बैठता है और संधि वाला कोटा 8.95 फ़ीसदी, जबकि 2025 के यूरोपीय आयात में उसका हिस्सा क़रीब 8 फ़ीसदी था।
एक और तारीख़ दो हफ़्ते दूर है। अनुच्छेद 4(1) आयातक पर यह दायित्व डालता है कि आयात के वक़्त वह जाँचने लायक़ प्रमाण दे, जैसे मिल टेस्ट सर्टिफ़िकेट, कि कच्चा इस्पात या लोहा पहली बार किस देश की भट्ठी में तरल रूप में बना और उसी देश में पहली ठोस शक्ल में ढाला गया। यह दायित्व 1 अक्टूबर 2026 से चालू होता है, और प्रमाण की शक्ल तय करने वाला क्रियान्वयन कार्य 31 अगस्त 2026 तक अपनाया जाना था। अनुच्छेद 12(5) कहता है कि 30 जून 2028 तक आयोग यह आकलन करेगा कि कोटे की पात्रता इसी देश से तय की जाए या नहीं। अनुलग्नक 2-B का अनुच्छेद 2-B.1(4) मूल देश की परिभाषा इसी विनियम से बाँध देता है।
सीबीएएम की फ़ाइल यूरोपीय आयातक भरता है
कार्बन सीमा समायोजन तंत्र इस पूरी कोटा-व्यवस्था के समानांतर चलता है और उससे कहीं नहीं जुड़ता। विनियम (ईयू) 2023/956 के अनुलग्नक I में लोहा और इस्पात का मतलब सीमा-शुल्क अध्याय 72 है, जिसमें से फ़ेरो-मिश्रधातुएँ और शीर्षक 7204 का लौह कचरा तथा स्क्रैप बाहर हैं, और उसके साथ अध्याय 73 के गिने हुए शीर्षक। अनुलग्नक II इस्पात के लिए एक बड़ी बात तय करता है: इस माल पर सिर्फ़ प्रत्यक्ष उत्सर्जन गिना जाएगा, बिजली के ज़रिए आने वाला अप्रत्यक्ष उत्सर्जन नहीं।
दायित्व किस पर है, यह अनुच्छेद 4 और 5 में है। माल यूरोपीय संघ में सिर्फ़ एक अधिकृत सीबीएएम घोषणाकर्ता ला सकता है, और वह या तो किसी सदस्य देश में स्थापित आयातक होता है या उसका अप्रत्यक्ष सीमा-शुल्क प्रतिनिधि। भारतीय मिल इस ढाँचे में कोई घोषणा नहीं भरती। अनुच्छेद 10 उसे एक रास्ता ज़रूर देता है: तीसरे देश का संचालक अपनी इकाई को सीबीएएम रजिस्टर में दर्ज करा सकता है, उत्सर्जन की पुष्टि करा सकता है और वह पुष्टि आयातक को दे सकता है। पंजीकरण पाँच साल चलता है।
तारीख़ें 2025 के संशोधन के बाद बदल चुकी हैं। विनियम (ईयू) 2025/2083, जो 20 अक्टूबर 2025 को प्रभावी हुआ, ने घोषणा और प्रमाणपत्र समर्पण, दोनों की तारीख़ 31 मई से हटाकर 30 सितंबर कर दी; पहली घोषणा 2027 में 2026 के लिए होगी, और प्रमाणपत्रों की बिक्री 1 फ़रवरी 2027 से शुरू होगी। 2026 के उत्सर्जन पर प्रमाणपत्र की क़ीमत उस तिमाही के यूरोपीय उत्सर्जन भत्तों की नीलामी में बंद भाव का औसत होगी जिसमें माल आया; 2027 से यह साप्ताहिक औसत पर चलेगा। जुर्माना अनुच्छेद 26 में है, और वह उतना ही है जितना यूरोपीय उत्सर्जन व्यापार व्यवस्था में अतिरिक्त उत्सर्जन पर लगता है।
इस पूरे ढाँचे का व्यावहारिक असर यह है कि भारतीय निर्यातक पर जो पड़ता है वह क़ानूनी नहीं, अनुबंध वाला दबाव है। देनदारी यूरोपीय आयातक की है, और वह उसे अपने ख़रीद भाव में उतारेगा।
यूरोप के रजिस्टर में भारतीय इस्पात 4.28 टन कार्बन का है
विनियम 2023/956 के अनुच्छेद 7(2) के मुताबिक़ उत्सर्जन असली आँकड़ों से तय होता है, और जब असली आँकड़े ठीक से तय न हो सकें तो मानक मान लगते हैं। वे मानक मान आयोग के क्रियान्वयन विनियम (ईयू) 2025/2621 में हैं, जो 16 दिसंबर 2025 को अपनाया गया और 1 जनवरी 2026 से लागू है। उसका अनुलग्नक I देश-दर-देश चलता है, और हर पंक्ति में सीएन कोड, प्रत्यक्ष उत्सर्जन, अप्रत्यक्ष उत्सर्जन, कुल, तीन बरसों के बढ़त-सहित मान, और वह उत्पादन-मार्ग है जिससे मानक तय हुआ।
भारत की तालिका में सीएन 7208 की पंक्ति, यानी 600 मिलीमीटर या उससे चौड़े गर्म बेलित चपटे उत्पाद, ऐसी है: प्रत्यक्ष उत्सर्जन 4.280 टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य प्रति टन, अप्रत्यक्ष के ख़ाने में लागू नहीं, कुल 4.280। इसके बाद बढ़त जुड़ती है। 2026 के लिए दस फ़ीसदी की बढ़त के साथ 4.708, 2027 के लिए बीस फ़ीसदी के साथ 5.136 और 2028 तथा उसके बाद के लिए तीस फ़ीसदी के साथ 5.564। मार्ग के ख़ाने में (C) लिखा है, यानी धमन भट्ठी और बेसिक ऑक्सीजन फ़र्नेस से बना कार्बन इस्पात। कच्चे लोहे की पंक्ति में भारत का मान 2.530 है।

यही पंक्ति दूसरे देशों की तालिकाओं में इस तरह है: ब्राज़ील 1.620, जापान 2.100, ब्रिटेन 2.420, तुर्किये 2.428, यूक्रेन 2.483, अर्जेंटीना 2.590, अल्जीरिया 3.000, चीन 3.187, रूस 3.430, भारत 4.280 और इंडोनेशिया 8.230। सूची में भारत से ऊपर सिर्फ़ इंडोनेशिया है। भारत का मान ब्राज़ील का 2.64 गुना और चीन का 1.34 गुना है।
यह संख्या बनती कैसे है, इसका जवाब दो जगह है। विनियम 2023/956 के अनुलग्नक IV का बिंदु 4.1 कहता है कि मानक मान निर्यातक देश की औसत उत्सर्जन तीव्रता पर रखे जाएँगे और उन पर एक अनुपात में बनी बढ़त जोड़ी जाएगी। विनियम 2025/2621 की प्रस्तावना उस बढ़त की बुनियाद बताती है: तीसरे देशों की इकाई-स्तर की जानकारी की गुणवत्ता जाँचना मुश्किल है, इसलिए यूरोपीय इकाइयाँ अपने औसत से कितना हटती हैं, उसी को नाप के तौर पर लिया गया, और दाम पर अचानक असर न पड़े इसलिए बढ़त दस, बीस और तीस फ़ीसदी में बाँटकर चढ़ाई गई। उसी प्रस्तावना का बिंदु 46 कहता है कि ये सारे मान दिसंबर 2027 तक संशोधित किए जाएँगे।
भारत के अपने रजिस्टर में दूसरी संख्या है। इस्पात मंत्रालय ने 30 जुलाई 2024 को लोकसभा में लिखित उत्तर में बताया था कि भारतीय इस्पात क्षेत्र की कार्बन तीव्रता 2005 के क़रीब 3.1 टन प्रति टन कच्चे इस्पात से घटकर 2022 में क़रीब 2.5 टन रह गई है। 12 दिसंबर 2024 को जारी हरित इस्पात की वर्गीकरण-सूची इससे आगे जाती है: हरित इस्पात वही है जिसकी तीव्रता 2.2 टन प्रति टन तैयार इस्पात से कम हो, पाँच तारे 1.6 से नीचे, और 2.2 से ऊपर कोई रेटिंग नहीं। उसमें स्कोप 1, स्कोप 2 और सीमित स्कोप 3 गिने जाते हैं, जिसमें सिंटरिंग, पेलेट और कोक बनाना, लाभकारीकरण तथा ख़रीदे गए कच्चे माल में समाया उत्सर्जन शामिल है, पर खदान, ढुलाई और आगे की कड़ियाँ नहीं। प्रमाणपत्र राष्ट्रीय द्वितीयक इस्पात प्रौद्योगिकी संस्थान हर वित्त वर्ष में देता है, और उसी कार्यक्रम में इस्पात सचिव संदीप पौंड्रिक ने 2.2 को 2030 का लक्ष्य बताया था।
दोनों संख्याएँ आमने-सामने रखी नहीं जा सकतीं। भारत का आँकड़ा प्रति टन कच्चे इस्पात का है और यूरोप का प्रति टन तैयार माल का, जिसमें उससे पहले की हर कड़ी का उत्सर्जन साथ चलता है। भारत की सूची ख़रीदी गई बिजली गिनती है, सीबीएएम इस्पात पर उसे नहीं गिनता। और यूरोपीय मान पर वह बढ़त लगी है जो भारतीय आँकड़े पर नहीं लगती। एक और फ़र्क़ काग़ज़ी है और उतना ही ठोस: एनआईएसएसटी का हरित-रेटिंग प्रमाणपत्र सीबीएएम की सत्यापन रिपोर्ट नहीं है, क्योंकि अनुच्छेद 8 के तहत सत्यापन उसी को करना है जो क्रियान्वयन विनियम (ईयू) 2018/2067 के तहत मान्यता प्राप्त हो।
मुफ़्त आवंटन की कटौती और हर बरस घटता गुणांक
सीबीएएम का बिल सिर्फ़ उत्सर्जन गुणा क़ीमत नहीं है। विनियम 2023/956 का अनुच्छेद 31 कहता है कि समर्पित किए जाने वाले प्रमाणपत्रों में उतनी कटौती होगी जितने उत्सर्जन भत्ते यूरोपीय संघ की अपनी इकाइयों को मुफ़्त मिलते हैं। उस कटौती का हिसाब आयोग के क्रियान्वयन विनियम (ईयू) 2025/2620 में है, जो 1 जनवरी 2026 से लागू है।
उसके अनुलग्नक का बिंदु 2 कटौती का सूत्र देता है, और मानक मानों वाले रास्ते पर वह तीन चीज़ों का गुणनफल है: सीबीएएम गुणांक, अंतर-क्षेत्रीय सुधार गुणांक, और उस माल का सीबीएएम बेंचमार्क। सीएन 7208 के लिए धमन भट्ठी वाले कार्बन इस्पात का मानक बेंचमार्क 1.370 है, प्राकृतिक गैस आधारित डीआरआई और विद्युत आर्क भट्ठी वाले का 0.481, और स्क्रैप तथा विद्युत आर्क भट्ठी वाले का 0.072।

इन तीन अलग बेंचमार्कों के पीछे की सोच प्रस्तावना के बिंदु 64 में दर्ज है। डीआरआई अब तक यूरोपीय व्यवस्था के गर्म धातु बेंचमार्क में आता था, और उसे वैसे ही रहने दिया जाता तो पहले बरसों में डीआरआई से बने माल की कटौती उसके अपने उत्सर्जन से बड़ी हो जाती, यानी उस पर एक भी प्रमाणपत्र न बनता, जबकि स्क्रैप से बने इस्पात पर बनता। इसलिए डीआरआई के लिए अलग बेंचमार्क गढ़ा गया।
गुणांक निर्देश 2003/87/EC के अनुच्छेद 10a(1a) से आता है, और उसकी अनुसूची पूरी लिखी हुई है: 2026 में 97.5 फ़ीसदी, 2027 में 95, 2028 में 90, 2029 में 77.5, 2030 में 51.5, 2031 में 39, 2032 में 26.5, 2033 में 14, और 2034 से कोई गुणांक नहीं। यह हिस्सा मुफ़्त आवंटन का है जो बचा रहता है, इसलिए कटौती हर बरस छोटी होती जाती है।
इन आँकड़ों से एक टन का हिसाब लगाया जा सकता है, और यह उदाहरण है, किसी कंपनी का बिल नहीं। भारत से गए गर्म बेलित इस्पात पर, मानक मानों के रास्ते पर और सुधार गुणांक को एक मानकर: 2026 में 4.708 में से 1.336 घटाकर 3.372 टन, 2028 में 5.564 में से 1.233 घटाकर 4.331 टन, 2030 में 4.858 टन और 2034 में पूरे 5.564 टन के प्रमाणपत्र। यूरोपीय केंद्रीय बैंक के सितंबर 2026 के स्टाफ़ अनुमानों में उत्सर्जन भत्ते की क़ीमत 2026 के लिए 78.4 और 2028 के लिए 86.4 यूरो प्रति टन रखी गई है। इन्हीं दरों पर 2026 का बिल क़रीब 264 यूरो प्रति टन बैठता है, 2028 का क़रीब 374 यूरो, और पूरी तरह लागू होने पर 2028 वाली दर पर क़रीब 481 यूरो। जो मिल अपने सत्यापित असली उत्सर्जन दाख़िल करती है, उसका बिल उसके अपने आँकड़े पर बनता है।
जीटीआरआई का 35 फ़ीसदी किस हिसाब से बैठता है
सोमवार की ख़बर में जो आँकड़ा सबसे ज़्यादा दोहराया गया वह एक निजी शोध संस्था का अनुमान है, किसी क़ानून में लिखी दर नहीं: सीबीएएम पूरी तरह लागू होने पर औसतन मूल्य का क़रीब 35 फ़ीसदी हो सकता है। द हिंदू ने 14 सितंबर को दोपहर 2 बजकर 49 मिनट पर रॉयटर्स की जो ख़बर छापी, उसमें यह आकलन ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के नाम से है। ऊपर गिनाए गए किसी भी यूरोपीय दस्तावेज़ में यह संख्या नहीं मिलती।
उसे उलटकर देखने पर पता चलता है कि यह अनुमान किस मान्यता पर खड़ा है। 35 फ़ीसदी तब बैठता है जब प्रति टन क़रीब 2.5 टन कार्बन को 78 यूरो के आसपास की भत्ता-क़ीमत से गुणा किया जाए और उसे 560 यूरो प्रति टन के आसपास के कॉइल-भाव के सामने रखा जाए। 2.5 वही आँकड़ा है जो इस्पात मंत्रालय ने संसद में दिया था; यूरोप के अपने रजिस्टर में भारत के नाम 4.280 दर्ज है, और 2028 से बढ़त के साथ 5.564।
एक रास्ता और है जो फ़िलहाल बंद दिखता है। अनुच्छेद 9 के तहत आयातक उतने प्रमाणपत्र कम कर सकता है जितनी कार्बन क़ीमत मूल देश में वाक़ई चुकाई गई हो, और वहाँ मिली किसी भी छूट या मुआवज़े को घटाकर; इसका दस्तावेज़ ऐसे व्यक्ति से प्रमाणित कराना होता है जो घोषणाकर्ता और उस देश के अधिकारियों, दोनों से स्वतंत्र हो। भारत में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना का अनुपालन हिस्सा चल रहा है, पर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 22 जनवरी 2026 की विज्ञप्ति के मुताबिक़ पहली अधिसूचना अक्टूबर 2025 में एल्युमिनियम, सीमेंट, क्लोर-अल्कली और लुगदी-काग़ज़ के लिए आई और उसमें 282 इकाइयाँ थीं, दूसरी 13 जनवरी 2026 को रिफ़ाइनरियों, पेट्रोरसायन, वस्त्र और द्वितीयक एल्युमिनियम के लिए, जिसमें 208 और जुड़ीं। कुल 490। लोहा और इस्पात इनमें से किसी सूची में नहीं है, और इस डेस्क को इस्पात को इस दायरे में लाने वाली कोई मूल अधिसूचना नहीं मिली। योजना का ढाँचा भी यही है कि जो इकाई अपना लक्ष्य पूरा कर ले वह कुछ नहीं ख़रीदती, यानी चुकाई गई क़ीमत दिखाने को कुछ होता ही नहीं।
समझौते के भीतर कार्बन पर भारत को जो मिला है वह अनुलग्नक 14-A है, और वह छूट नहीं देता; उसका ठोस हिस्सा इतना भर है कि किसी तीसरे देश को दी गई रियायत भारत से रोकी नहीं जाएगी।
शुद्ध हिसाब इतना है। कोटे की तरफ़ भारत को समझौते से जो मिल रहा है, वह उससे 3,02,057 टन कम है जो उसे 1 जुलाई से यूरोपीय आयोग के एक अस्थायी विनियम से पहले ही मिला हुआ है, और वह विनियम 31 दिसंबर को ख़त्म होता है। कार्बन की तरफ़ छूट का कोई प्रावधान किसी पाठ में नहीं है, और यूरोप के रजिस्टर में भारतीय गर्म बेलित इस्पात का मान सूची के ग्यारह देशों में दूसरा सबसे ऊँचा है। जो अभी तय नहीं हुआ वह यह है कि भारतीय मिलें 2027 की पहली घोषणा तक अपने असली उत्सर्जन का सत्यापन करा पाती हैं या मानक मान पर चली जाती हैं। बिल का आकार इसी एक बात से तय होगा।
स्रोतयूरोपीय आयोग: भारत-यूरोपीय संघ समझौते का अनुलग्नक 2-B, इस्पात के प्रशुल्क-दर कोटे, तेरह पन्ने, छह अनुच्छेद, 11 सितंबर 2026 को प्रकाशित, यूरोपीय आयोग, व्यापार एवं आर्थिक सुरक्षा महानिदेशालय: भारत-यूरोपीय संघ समझौते के अध्यायों और अनुलग्नकों का पूरा पाठ, यूर-लेक्स: विनियम (ईयू) 2026/1384, 17 जून 2026, वैश्विक अतिरिक्त क्षमता के असर से यूरोपीय इस्पात बाज़ार की सुरक्षा; आधिकारिक पत्रिका में 24 जून 2026 को प्रकाशित, 1 जुलाई 2026 से लागू, यूर-लेक्स: आयोग का क्रियान्वयन विनियम (ईयू) 2026/1457, 29 जून 2026, विनियम 2026/1384 के तहत खुले कोटों का देशवार बँटवारा; अनुलग्नक I और II, यूर-लेक्स: विनियम (ईयू) 2023/956, 10 मई 2023, कार्बन सीमा समायोजन तंत्र; अनुलग्नक I, II, IV और अनुच्छेद 4 से 31, यूर-लेक्स: विनियम (ईयू) 2025/2083, 8 अक्टूबर 2025, विनियम 2023/956 में संशोधन; 20 अक्टूबर 2025 से प्रभावी, यूर-लेक्स: आयोग का क्रियान्वयन विनियम (ईयू) 2025/2621, 16 दिसंबर 2025, सीबीएएम के मानक मान; अनुलग्नक I में देशवार तालिकाएँ, 1 जनवरी 2026 से लागू, यूर-लेक्स: आयोग का क्रियान्वयन विनियम (ईयू) 2025/2620, 16 दिसंबर 2025, मुफ़्त आवंटन की कटौती की गणना; अनुलग्नक के बिंदु 2 और 5, यूर-लेक्स: निर्देश 2003/87/EC का समेकित पाठ, अनुच्छेद 10a(1a) में सीबीएएम गुणांक की बरसवार अनुसूची, पत्र सूचना कार्यालय, इस्पात मंत्रालय, 30 जुलाई 2024: लोकसभा में लिखित उत्तर, भारतीय इस्पात क्षेत्र की कार्बन तीव्रता 2005 के 3.1 से घटकर 2022 में क़रीब 2.5 टन प्रति टन कच्चा इस्पात, पत्र सूचना कार्यालय, इस्पात मंत्रालय, 12 दिसंबर 2024: हरित इस्पात की भारतीय वर्गीकरण-सूची, 2.2 टन की सीमा, तारा-श्रेणियाँ और एनआईएसएसटी की भूमिका, पत्र सूचना कार्यालय, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, 22 जनवरी 2026: कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना के तहत 208 और इकाइयों के लिए उत्सर्जन-तीव्रता लक्ष्य, कुल 490, यूरोपीय केंद्रीय बैंक, आँकड़ा पोर्टल: सितंबर 2026 के स्टाफ़ वृहद-आर्थिक अनुमानों में यूरोपीय उत्सर्जन भत्ते की क़ीमत का अनुमान, प्रति टन यूरो में, द हिंदू, रॉयटर्स की ख़बर, 14 सितंबर 2026, दोपहर 2:49 बजे: कोटे के आँकड़े, 2025 में 24 लाख टन निर्यात, और जीटीआरआई के हवाले से 50 फ़ीसदी शुल्क तथा 35 फ़ीसदी का अनुमान