सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्क शून्य हुआ, सोयाबीन-पाम पर पांच फ़ीसदी
24 सितंबर से कच्चे सूरजमुखी तेल पर मूल सीमा शुल्क शून्य और सोयाबीन-पाम पर पांच फ़ीसदी है, पर पीआईबी की घोषणा और सीबीआईसी की असली अधिसूचना एक चीज़ नहीं। कृषि उपकर और सामाजिक कल्याण अधिभार जोड़ने पर कुल शुल्क साढ़े सोलह फ़ीसदी से घटकर साढ़े पांच या ग्यारह फ़ीसदी बैठता है, और एक लीटर पर इसका मतलब है आयातक के लिए साढ़े छह से साढ़े तेरह रुपये तक की गिरावट। पर गोदाम में पड़ा तेल पुराने शुल्क पर ही आयात हुआ है, और यह छूट टिन तक कब पहुंचेगी, इसकी कोई तारीख़ किसी ने नहीं बताई।

किचन की अलमारी में रखा तेल का टिन अभी वही दाम दिखाता है जो कल दिखाता था। बदला कुछ और है। पीआईबी दिल्ली ने 24 सितंबर की दोपहर 12:43 बजे एक घोषणा जारी की। इसके मुताबिक़ सरकार ने कच्चे सूरजमुखी तेल पर मूल सीमा शुल्क घटाकर शून्य कर दिया है, जो पहले दस फ़ीसदी था। कच्चे सोयाबीन और कच्चे पाम तेल पर यह शुल्क दस से घटकर पांच फ़ीसदी रह गया है। बदलाव आज, 24 सितंबर से ही लागू है।
सवाल सीधा लगता है: टिन कब सस्ता होगा? जवाब उतना सीधा नहीं है। मूल सीमा शुल्क अकेला आंकड़ा नहीं है। उसमें कृषि अवसंरचना उपकर और सामाजिक कल्याण अधिभार भी जुड़ता है। गोदाम में रखा आज का तेल पुराने, ऊंचे शुल्क पर ही आयात हुआ था। दुकान की क़ीमत बदलने में कितने दिन लगेंगे, इसका कोई तय जवाब किसी ने नहीं दिया। न सरकार ने, न किसी उद्योग संगठन ने।
यह लेख वही हिसाब खोलता है। शुल्क असल में कितना घटा। एक लीटर तेल पर इसका मतलब कितने रुपये है। दुकान की आज की क़ीमत क्या है। और यह बदलाव टिन तक पहुंचने में कहां अटक सकता है।
पीआईबी की घोषणा, और सीबीआईसी की अधिसूचना का पता
पीआईबी दिल्ली की यह घोषणा उपभोक्ता कार्य, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय की तरफ़ से आई। शीर्षक था, "सरकार ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए प्रमुख खाद्य तेलों पर आयात शुल्क घटाया।" यह एक घोषणा है, आदेश नहीं। शुल्क बदलने का असली दस्तावेज़ अलग होता है। वह केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड, यानी सीबीआईसी, की अधिसूचना है। यह वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग से जारी होती है।
टैक्सस्कैन नाम के विशेषज्ञ कर-पोर्टल ने यह बदलाव 24 सितंबर की दोपहर रिपोर्ट किया। पोर्टल ने दस्तावेज़ को एक फ़ाइल संख्या से पहचाना, "सीबीआईसी-190354/134/2026-टीआरयू, 23 सितंबर 2026।" पीटीआई की मूल रिपोर्ट कई अख़बारों में जस की तस छपी। वह भी इतना ही कहती है कि "अधिसूचना के मुताबिक़" शुल्क घटा है। कोई क्रमांक उसमें भी नहीं है। सीबीआईसी की अपनी वेबसाइट एक जावास्क्रिप्ट एप्लिकेशन है। वह सादे अनुरोध पर पन्ना नहीं भेजती। उसका दस्तावेज़-भंडार लॉगिन भी मांगता है। दोनों रास्ते बंद मिले। इस बदलाव की कोई सार्वजनिक "अधिसूचना संख्या, वर्ष/2026-कस्टम्स" किसी भी पढ़े गए दस्तावेज़ में दर्ज नहीं मिली। सिर्फ़ विभागीय फ़ाइल संख्या मिली, और एक तारीख़।
जो पक्का है, वह यह है। बदलाव 24 सितंबर 2026 से लागू है। यह आठ अंकों वाली शुल्क-मदों पर सीधे लागू होता है। यह शुल्क सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 25(1) के तहत जारी होता है। यह धारा केंद्र सरकार को सार्वजनिक हित में किसी भी वस्तु पर शुल्क घटाने या माफ़ करने का अधिकार देती है। इसी क़ानून के सहारे हर बार दरें बदलती हैं। कोई नया क़ानून हर बार नहीं बनता।
| शुल्क मद | तेल | पुराना बीसीडी | नया बीसीडी |
|---|---|---|---|
| 1512 11 10 | कच्चा सूरजमुखी बीज तेल | 10% | शून्य |
| 1507 10 00 | कच्चा सोयाबीन तेल | 10% | 5% |
| 1511 10 00 | कच्चा पाम तेल | 10% | 5% |
| 1512 19 10 | परिष्कृत सूरजमुखी तेल | 32.5% | 22.5% |
| 1507 90 10 | परिष्कृत सोयाबीन तेल | 32.5% | 27.5% |
| 1511 90 | परिष्कृत पाम तेल (व अंश) | 32.5% | 27.5% |
छह पंक्तियों वाली यह तालिका ही पूरी अधिसूचना का सार है। बाक़ी तेल इसमें नहीं आते, न मूंगफली, न सरसों, न राइस ब्रान। जीएसटी इस बदलाव से अलग है। वह वैसा ही बना रहता है। सीमा शुल्क अधिसूचना घरेलू बिक्री पर लगने वाले उस कर को नहीं छूती। सीमा शुल्क सिर्फ़ आयात के दरवाज़े पर लगता है। तेल देश में आने के बाद हर बिक्री पर जीएसटी अलग से जुड़ता है, और यह इस अधिसूचना का विषय नहीं है।
बीसीडी अकेला शुल्क नहीं, उपकर-अधिभार जोड़ने पर असली आंकड़ा
पीआईबी की घोषणा में एक पंक्ति आसानी से छूट सकती है। इसमें लिखा है कि "कच्चे और परिष्कृत खाद्य तेलों के बीच आयात शुल्क का अंतर 19.25 प्रतिशत बरकरार" रखा गया है। यह अंतर सिर्फ़ बीसीडी का नहीं, कुल शुल्क का है। कुल शुल्क में मूल सीमा शुल्क के अलावा दो और टुकड़े जुड़ते हैं। पहला है कृषि अवसंरचना एवं विकास उपकर। दूसरा है सामाजिक कल्याण अधिभार।

बिज़नेस टुडे की 24 सितंबर की रिपोर्ट ने कुल शुल्क के आंकड़े सीधे दिए। कच्चे पाम और सोयाबीन तेल पर कुल शुल्क साढ़े सोलह फ़ीसदी से घटकर ग्यारह फ़ीसदी हुआ। कच्चे सूरजमुखी तेल पर यह साढ़े सोलह से घटकर साढ़े पांच फ़ीसदी हुआ। यह गणित एक पुराने दस्तावेज़ से जांचा जा सकता है। पीआईबी ने सितंबर 2024 में एक बयान जारी किया था, जब शुल्क घटाया नहीं, बढ़ाया गया था। उस बयान में सरकार ने ख़ुद लिखा था कि साढ़े बत्तीस फ़ीसदी बीसीडी पर परिष्कृत तेल का कुल शुल्क पैंतीस दशमलव सात पांच फ़ीसदी बैठता है। फ़र्क़ सिर्फ़ पौने तीन फ़ीसदी अंक का है। यह उतना ही है जितना दस फ़ीसदी सामाजिक कल्याण अधिभार बीसीडी पर जोड़ता है। मतलब साफ़ है, परिष्कृत तेल पर कृषि उपकर शून्य है। सिर्फ़ अधिभार लगता है।
कच्चे तेल पर हिसाब अलग बैठता है। साढ़े सोलह फ़ीसदी कुल शुल्क में दस फ़ीसदी बीसीडी है। उस पर दस फ़ीसदी अधिभार जुड़ता है, यानी एक फ़ीसदी अंक। बाक़ी साढ़े पांच फ़ीसदी अंक कृषि अवसंरचना उपकर के हैं। यह उपकर बीसीडी घटने पर नहीं बदलता। इसीलिए बीसीडी शून्य होने पर भी सूरजमुखी तेल पर साढ़े पांच फ़ीसदी शुल्क बचा रहता है। यह उपकर वित्त अधिनियम 2021 की धारा 124 से आया है। इसकी रक़म कृषि ढांचे पर ख़र्च होने के लिए तय है। बीसीडी घटाना आसान है। यह उपकर छूना उतना आसान नहीं, क्योंकि इसका मक़सद ही अलग है। एक और फ़र्क़ भी है। संविधान के अनुच्छेद 270 के तहत उपकर केंद्र और राज्यों के बीच बंटने वाले करों की सूची से बाहर रहता है। मूल सीमा शुल्क का एक हिस्सा राज्यों को भी मिलता है, पर उपकर की पूरी रक़म सिर्फ़ केंद्र के पास रहती है। इसीलिए 2021 के बाद से मूल शुल्क घटाकर उपकर बढ़ाने की प्रवृत्ति कई वस्तुओं पर दिखी है।
यह दर पिछले दो साल में तीन बार बदली है, और हर बार दिशा अलग रही। सितंबर 2024 से पहले कच्चे खाद्य तेलों पर बीसीडी शून्य थी। 14 सितंबर 2024 को सरकार ने इसे बढ़ाकर बीस फ़ीसदी कर दिया। परिष्कृत तेल पर यह साढ़े बारह से बढ़ाकर साढ़े बत्तीस फ़ीसदी हुआ। मक़सद था नई खरीफ़ फ़सल आने से पहले घरेलू तिलहन किसानों को बेहतर भाव मिलना। फिर 30 मई 2025 को यह बीस फ़ीसदी घटाकर दस फ़ीसदी हुई, अधिसूचना संख्या 31/2025-कस्टम्स से। अब 24 सितंबर 2026 को यह सूरजमुखी पर शून्य और सोयाबीन-पाम पर पांच फ़ीसदी हुई है। दो बरस में शून्य से बीस, बीस से दस, फिर दस से शून्य या पांच। यह दर लगभग हर साल बदली है।
इस हिसाब से बना पूरा नक़्शा यह है:
| तेल की क़िस्म | बीसीडी पहले | बीसीडी अब | कुल शुल्क पहले | कुल शुल्क अब |
|---|---|---|---|---|
| कच्चा सूरजमुखी | 10% | शून्य | 16.5% | 5.5% |
| कच्चा सोयाबीन/पाम | 10% | 5% | 16.5% | 11% |
| परिष्कृत सूरजमुखी | 32.5% | 22.5% | 35.75% | 24.75% |
| परिष्कृत सोयाबीन/पाम | 32.5% | 27.5% | 35.75% | 30.25% |
हर पंक्ति में अंतर वही उन्नीस दशमलव पच्चीस फ़ीसदी अंक निकलता है जो पीआईबी ने दावा किया। यह दावा हिसाब में सही बैठता है।
एक लीटर कच्चे तेल पर हिसाब: कितने रुपये घटे
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन, यानी एसईए, हर हफ़्ते आयातित तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव प्रकाशित करती है। 18 सितंबर 2026 के आंकड़ों के मुताबिक़ कच्चा पाम तेल क़रीब 1,265 डॉलर प्रति टन था। कच्चा सोयाबीन तेल क़रीब 1,314 डॉलर था। सूरजमुखी तेल क़रीब 1,380 डॉलर प्रति टन था। रुपये में बदलने के लिए रिज़र्व बैंक की संदर्भ दर संग्रह से 24 सितंबर की दर लेते हैं, यानी 95.91 रुपये प्रति डॉलर।

यहां से हिसाब शुरू होता है, और हर मान्यता खुल कर लिखी है। सीमा शुल्क मूल्यांकन में सीआईएफ़ भाव पर आमतौर पर एक फ़ीसदी उतराई ख़र्च जोड़ा जाता है। तभी शुल्क योग्य मूल्य बनता है। एक टन तेल को लीटर में बदलने के लिए घनत्व क़रीब 0.91 किलो प्रति लीटर मान लें। यह वनस्पति तेलों के लिए सामान्य अनुमान है। इस आधार पर एक टन में क़रीब 1,099 लीटर बैठते हैं।
सूरजमुखी तेल पर पूरा हिसाब यूं बैठता है। 1,380 डॉलर प्रति टन को 95.91 रुपये से गुणा करने पर लागत 1,32,356 रुपये प्रति टन बनती है। एक फ़ीसदी उतराई ख़र्च जोड़ने पर शुल्क योग्य मूल्य 1,33,679 रुपये हुआ। पुराने साढ़े सोलह फ़ीसदी शुल्क पर यह रक़म 22,057 रुपये प्रति टन बनती थी। नए साढ़े पांच फ़ीसदी शुल्क पर यह घटकर 7,352 रुपये रह गई। फ़र्क़ हुआ 14,705 रुपये प्रति टन। यह 1,099 लीटर से भाग देने पर क़रीब साढ़े तेरह रुपये प्रति लीटर बैठता है। सोयाबीन और पाम तेल पर यही तरीक़ा दोहराने पर फ़र्क़ क़रीब साढ़े छह रुपये प्रति लीटर निकलता है, क्योंकि वहां बीसीडी शून्य नहीं, आधा ही घटा है।
| तेल | भाव (डॉलर/टन) | ₹/टन (लागत) | पुराना शुल्क ₹/टन | नया शुल्क ₹/टन | फ़र्क़ ₹/लीटर |
|---|---|---|---|---|---|
| सूरजमुखी | 1,380 | 1,32,356 | 22,057 | 7,352 | 13.38 |
| सोयाबीन | 1,314 | 1,26,026 | 21,002 | 14,002 | 6.37 |
| पाम | 1,265 | 1,21,326 | 20,219 | 13,479 | 6.13 |
सूरजमुखी तेल पर आयातक की लागत क़रीब साढ़े तेरह रुपये प्रति लीटर घटती है। सोयाबीन और पाम पर यह क़रीब साढ़े छह रुपये घटती है। पर यह आयातक की लागत है, दुकान की क़ीमत नहीं। रिफ़ाइनिंग, पैकेजिंग, ढुलाई, जीएसटी और दुकानदार का मुनाफ़ा इसके ऊपर जुड़ते हैं। अंतरराष्ट्रीय भाव भी रोज़ बदलता है। एक हफ़्ते पहले का भाव अलग था। एक हफ़्ते बाद अलग होगा।
दुकान की क़ीमत आज क्या है, साल भर में कितनी बढ़ी
उपभोक्ता मामलों के विभाग का मूल्य निगरानी प्रभाग रोज़ देश भर के बाज़ारों से खाद्य तेल की खुदरा क़ीमतें जमा करता है। पीआईबी की 1 अगस्त 2024 की एक घोषणा के मुताबिक़ यह प्रभाग 550 केंद्रों से रोज़ाना दाम इकट्ठा करता है। ये केंद्र 34 राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में फैले हैं। दाम राज्यों के अपने नागरिक आपूर्ति विभागों के ज़रिए, एक मोबाइल ऐप पर दर्ज होते हैं। पहले 22 ज़रूरी चीज़ों के दाम इसमें आते थे। अगस्त 2024 से सोलह और चीज़ें जुड़ीं, तो यह गिनती अड़तीस हो गई। खाद्य तेल शुरू से ही उन 22 में गिना जाता रहा है, मूंगफली, सरसों, वनस्पति, सूरजमुखी, सोया और पाम तेल, अलग-अलग।
यह आंकड़ा fcainfoweb.nic.in पर प्रकाशित होता है। इस लेख को लिखते वक़्त वह पन्ना इस मशीन से नहीं खुला। कनेक्शन टीएलएस चरण पर ही अटक गया। इसलिए यहां आंकड़े दो स्वतंत्र रिपोर्टों से लिए गए हैं। दोनों ने विभाग के मूल्य निगरानी प्रभाग का हवाला दिया है।
24 सितंबर 2026 के मुताबिक़ सरसों तेल का औसत खुदरा भाव 202.87 रुपये प्रति किलो था। सोयाबीन तेल का भाव 166.87 रुपये था। पाम तेल का भाव 153.89 रुपये था। पिछले साल के मुक़ाबले यह क्रमशः आठ, चौदह और सोलह फ़ीसदी ज़्यादा है। सूरजमुखी तेल की अलग क़ीमत इन दोनों रिपोर्टों में नहीं मिली।
क़ीमत क्यों बढ़ी, इसकी वजह भारत की सीमा के बाहर है। इंडोनेशिया ने मार्च 2026 में पाम तेल पर निर्यात उपकर दस से साढ़े बारह फ़ीसदी कर दिया। मक़सद था अपने बायोडीज़ल कार्यक्रम को पैसा देना। इससे मलेशिया को बढ़त मिली, पर वैश्विक भाव ऊपर ही रहा। रुपये में गिरावट ने आयात लागत को और बढ़ाया। भारत अपनी खाद्य तेल ज़रूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। इसलिए बाहर का हर उतार-चढ़ाव सीधे घर की रसोई तक पहुंचता है।
पुराना आयात पुराने शुल्क पर, टिन तक पहुंचने में समय क्यों लगेगा
सरकार ने घोषणा के साथ ही उद्योग को एक सलाह भी जारी की। पीआईबी के अपने शब्दों में:
उद्योग के हितधारकों से अनुरोध किया गया है कि वे लागत में कमी के अनुरूप वितरकों के लिए मूल्य और अधिकतम खुदरा मूल्य में तत्काल संशोधन करें
पीआईबी दिल्ली, उपभोक्ता कार्य मंत्रालय, 24 सितंबर 2026
"तत्काल" शब्द सरकार का है। पर यह आदेश नहीं, सलाह है। इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन, यानी आईवीपीए, के अध्यक्ष सुधाकर देसाई ने पीटीआई से कहा कि आयात शुल्क घटने से आयातित तेल की लागत घटनी चाहिए। इससे उपभोक्ता क़ीमतों में कुछ राहत मिल सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि सूरजमुखी तेल पर कटौती ज़्यादा गहरी है। इसलिए दक्षिण भारत जैसे बड़े खपत वाले इलाक़ों में यह तेल तुलनात्मक रूप से सस्ता पड़ेगा। कोई दिन या हफ़्ता उन्होंने नहीं गिनाया।
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन की प्रतिक्रिया अलग तरह की थी। संगठन ने कटौती का स्वागत किया। कहा कि इससे त्योहारी सीज़न से पहले बढ़ी उपभोक्ता क़ीमतों में राहत मिलनी चाहिए। यह भी कहा कि कच्चे-परिष्कृत के बीच फ़र्क़ बरक़रार रहने से घरेलू शोधन उद्योग को बचाव मिला है। दो अलग संगठन, दो अलग ज़ोर। पर समय पर दोनों चुप रहे।
एसईए ख़ुद हर हफ़्ते आयात शुल्क की तालिका अपनी वेबसाइट पर छापता है। इस लेख को लिखते वक़्त वहां टंगी आख़िरी तालिका 31 मई 2025 की थी, यानी दस फ़ीसदी वाले पुराने ढांचे की। नई दरें उसमें दर्ज नहीं थीं। उद्योग के अपने रिकॉर्ड को भी अपडेट होने में समय लगता है।
एक पुराना संकेत ज़रूर मिलता है, पर वह इसी बदलाव का नहीं है। सितंबर 2024 में सरकार ने उलटी दिशा में क़दम उठाया था, यानी शुल्क घटाया नहीं बढ़ाया था। तब मंत्रालय ने ख़ुद लिखा था कि देश में क़रीब तीस लाख टन तेल पुराने, कम शुल्क पर आयात होकर पड़ा है। यह भंडार पैंतालीस से पचास दिन की घरेलू खपत के बराबर बताया गया था। यानी नया आयात बाज़ार में हावी होने में डेढ़ महीने के आसपास लगता है, कम से कम उस मौक़े पर लगा था। इस बार दिशा उलटी है, शुल्क घटा है, बढ़ा नहीं। पर गोदाम और जहाज़ का भौतिक समय वही रहता है।
इस बार की कटौती के लिए कोई दिन या हफ़्ता किसी ने नहीं गिनाया। न सरकार ने, न एसईए ने, न आईवीपीए ने। जो दावा नहीं मिला, वह यहां जोड़ा नहीं गया है।
कच्चे और परिष्कृत तेल के बीच फ़र्क़ बरकरार क्यों रखा गया
उन्नीस दशमलव पच्चीस फ़ीसदी अंक का यह फ़ासला अपने आप नहीं बना रहा। सरकार ने इसे जानबूझकर बरकरार रखा है। पीआईबी की घोषणा इसकी वजह भी बताती है, घरेलू शोधन क्षमता के इस्तेमाल को बढ़ावा देना, और परिष्कृत तेल के ज़रूरत से ज़्यादा आयात को हतोत्साहित करना।

मतलब यह कि भारत के तेल शोधक कारखाने कच्चा तेल भारत में मंगाकर यहीं परिष्कृत करें। बाहर से पहले से परिष्कृत तेल का टिन न आए। उन्नीस फ़ीसदी अंक का फ़ासला इसी काम को आसान बनाता है। परिष्कृत तेल पर शुल्क कच्चे से हमेशा इतना ऊंचा रखा जाता है।
घोषणा की आख़िरी पंक्ति एक और पक्ष जोड़ती है। सरकार उपभोक्ता के हित और किसानों व घरेलू उद्योग के हित में संतुलन बनाए रखने की बात करती है। कच्चे तेल पर शुल्क अब भी शून्य नहीं है, सूरजमुखी को छोड़कर बाक़ी पर पांच फ़ीसदी है। यह उसी संतुलन का नतीजा है। तर्क सीधा है, आयातित कच्चे तेल पर जितना शुल्क कम होगा, वह उतना ही सस्ता पड़ेगा। तब घरेलू मंडी में सोयाबीन व सरसों बेचने वाले किसान को भी उतनी ही कम क़ीमत मिलेगी, क्योंकि ख़रीदार सस्ते आयात की तरफ़ मुड़ सकता है। पांच फ़ीसदी शुल्क बचाकर रखना उस दबाव को पूरी तरह नहीं, पर आंशिक रूप से रोकता है।
अगर दुकानदार ने नई क़ीमत नहीं लगाई, तो शिकायत कहां करें
पैकेट या टिन पर छपा अधिकतम खुदरा मूल्य क़ानूनी अधिकतम है। दुकानदार उससे ऊपर नहीं बेच सकता। यह शर्त विधिक माप विज्ञान (पैकेज्ड कमोडिटी) नियम, 2011 से आती है। यही नियम तय करता है कि हर पैकेट पर एमआरपी सभी करों सहित छपे। पैकिंग का महीना व साल भी दर्ज हो, शब्दों में या अंकों में। शुल्क घटने से किसी कंपनी ने नई, कम एमआरपी वाली खेप बाज़ार में भेजी है या नहीं, यह जांचने का तरीक़ा भी वही पुराना है जो हर पैकेट ख़रीद पर काम आता है, पैकिंग की तारीख़ पढ़ना।
- पैकेट पर छपी एमआरपी और पैकिंग का महीना-साल देखें। पुरानी खेप पर पुरानी, ऊंची एमआरपी सही है। यह ग़ैर-क़ानूनी नहीं है।
- एमआरपी से ज़्यादा वसूलना ग़ैर-क़ानूनी है। तेल पुरानी खेप का हो, तब भी यह नियम लागू होता है।
- शिकायत राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन पर दर्ज हो सकती है। टोल-फ़्री नंबर 1800-11-4000 या 1915, वॉट्सऐप नंबर 8800001915।
- बिल, पैकेट की फ़ोटो और दुकान का पता साथ रखें। शिकायत दर्ज करते वक़्त यही सबसे पहले मांगा जाता है।
- एनसीएच पोर्टल या ऐप पर स्थिति बाद में देखी जा सकती है।
नई, घटी हुई एमआरपी वाला टिन कब आएगा? इसकी कोई तय तारीख़ किसी दस्तावेज़ में दर्ज नहीं है। जब आएगा, पैकेट पर छपी तारीख़ और एमआरपी से ख़ुद पता चल जाएगा।
स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, उपभोक्ता कार्य, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय, 24 सितंबर 2026, दोपहर 12:43: प्रमुख खाद्य तेलों पर आयात शुल्क घटाने की घोषणा, पत्र सूचना कार्यालय, उपभोक्ता कार्य मंत्रालय, 17 सितंबर 2024: सितंबर 2024 की शुल्क-वृद्धि पर सलाह, कुल शुल्क (35.75%) और पुराने भंडार से जुड़े आंकड़े, पत्र सूचना कार्यालय, उपभोक्ता कार्य मंत्रालय, 1 अगस्त 2024: मूल्य निगरानी प्रणाली ऐप वर्ज़न 4.0, निगरानी केंद्रों और वस्तुओं की गिनती, टैक्सस्कैन, 24 सितंबर 2026: सीबीआईसी की फ़ाइल संख्या और शुल्क-मद तालिका, बिज़नेस टुडे, 24 सितंबर 2026: कृषि उपकर व अधिभार सहित कुल शुल्क के आंकड़े, ए2ज़ेड टैक्सकॉर्प: मई 2025 की अधिसूचना संख्या 31/2025-कस्टम्स का ब्यौरा, सियासत डेली, पीटीआई की रिपोर्ट, 24 सितंबर 2026: आईवीपीए अध्यक्ष सुधाकर देसाई की प्रतिक्रिया, गांव जंक्शन, 24 सितंबर 2026: उपभोक्ता मामलों के विभाग के मूल्य निगरानी प्रभाग के हवाले से खुदरा भाव, टाइम्स नाउ हिंदी, 24 सितंबर 2026: खुदरा भाव और एसईए के अंतरराष्ट्रीय भाव, भारतीय रिज़र्व बैंक, संदर्भ दर संग्रह: 24 सितंबर 2026 की डॉलर दर, सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया: आयात शुल्क तालिका (31 मई 2025 तक), और 18 सितंबर 2026 के साप्ताहिक भाव, 24 सितंबर 2026 को देखे गए, द एज मलेशिया: इंडोनेशिया के पाम तेल निर्यात उपकर में मार्च 2026 की बढ़ोतरी (10% से 12.5%)