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अमेरिका ने फिर वीज़ा नहीं दिया, महासभा ने अब्बास के वीडियो-भाषण को मंज़ूरी दी

गुरुवार, 24 सितंबर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के इक्यासीवें सत्र की आम बहस में फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास का पहले से रिकॉर्ड किया भाषण चला, क्योंकि अमेरिका ने लगातार दूसरे साल उन्हें वीज़ा नहीं दिया। महासभा ने 17 सितंबर को 152-3-4 के वोट से जो प्रस्ताव पास किया, वह ख़ुद 1947 के उस मुख्यालय समझौते का हवाला देता है जिस पर अमेरिका के दस्तख़त हैं। यह रिपोर्ट उसी समझौते की धारा 11, 12, 13 और 21 पढ़ती है, और यह भी कि 1988 में इसी सवाल पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने क्या कहा था।

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा हॉल के भीतर संगठन का प्रतीक-चिह्न, अप्रैल 2011 की तस्वीर; गुरुवार को अब्बास का वीडियो इसी हॉल में चला, वे ख़ुद वहाँ मौजूद नहीं थे।
तस्वीर: Basil D Soufi, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

गुरुवार को अब्बास की जगह स्क्रीन पर एक बयान चला

न्यूयॉर्क में गुरुवार, 24 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा के इक्यासीवें सत्र की आम बहस के दौरान जनरल असेंबली हॉल में एक पहले से रिकॉर्ड किया गया वीडियो चला। उसमें फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास बोल रहे थे। वे हॉल में मौजूद नहीं थे। अमेरिका ने उन्हें अमेरिका आने का वीज़ा नहीं दिया, लगातार दूसरे साल।

एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ अब्बास ने यह संदेश बुधवार को रामल्ला में अपने दफ़्तर से रिकॉर्ड कराया। गुरुवार को यह हॉल में चला, फ़लस्तीन की स्थायी पर्यवेक्षक टीम के प्रतिनिधि रियाद मंसूर के परिचय के बाद, ठीक वैसे ही जैसे महासभा ने एक हफ़्ता पहले तय किया था। एजेंसी के मुताबिक़ अब्बास ने पश्चिमी तट में सैन्य क़ब्ज़े और ग़ज़ा की जंग का ज़िक्र किया, और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से इसराइल पर ज़्यादा सख़्ती बरतने की अपील की। एजेंसी की दो अलग-अलग रिपोर्टों में उनके उद्धरण के अंग्रेज़ी शब्द थोड़े अलग-अलग हैं। यह फ़र्क़ अरबी से हुए अलग-अलग तर्जुमों का नतीजा हो सकता है। इसलिए यह रिपोर्ट उन्हें उद्धरण चिह्न में नहीं, बल्कि बताए गए मज़मून के तौर पर दर्ज करती है।

उसी दिन दोपहर बाद इसराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को बोलना था, इसराइल में प्राइम-टाइम के हिसाब से समय तय करके। एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक़ जब अब्बास का वीडियो चला, तब हॉल में इसराइली प्रतिनिधिमंडल की सीटें ख़ाली थीं।

यह रिपोर्ट उस भाषण पर नहीं है। यह उस समझौते पर है जिस पर ख़ुद अमेरिका के दस्तख़त हैं, वह समझौता जो न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय बसाता है। उसी काग़ज़ में यह भी लिखा है कि किसी सदस्य देश के प्रतिनिधि को वहाँ आने से रोकने का हक़ अमेरिका के पास कब नहीं है। बाक़ी रिपोर्ट उसी काग़ज़ को धारा दर धारा पढ़ती है।

अमेरिका ने अपनी वजह ख़ुद बताई, 16 सितंबर को

बुधवार, 16 सितंबर को अमेरिकी विदेश विभाग ने वीज़ा से इनकार का एलान ख़ुद अपने शब्दों में किया। बयान का एक वाक्य था: "As a consequence of their failure to reform, contrary to their commitments to the United States, and their ongoing activities that undermine the prospects for peace, the United States will extend sanctions that deny visas to PLO members and PA officials." यानी सुधार में नाकामी, अमेरिका से किए वादों के ख़िलाफ़ आचरण, और शांति की संभावना कमज़ोर करने वाली गतिविधियों के चलते, अमेरिका फ़लस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) के सदस्यों और फ़लस्तीनी प्राधिकरण (पीए) के अधिकारियों को वीज़ा से वंचित करने वाली पाबंदी बढ़ा रहा है।

रिपोर्टों के मुताबिक़ यह पाबंदी दो अमेरिकी क़ानूनों से जुड़ी है: 1989 का पीएलओ कमिटमेंट्स कम्प्लायंस एक्ट, और 2002 का मिडिल ईस्ट पीस कमिटमेंट्स एक्ट। इन क़ानूनों के तहत विदेश विभाग को समय-समय पर कांग्रेस को प्रमाणित करना होता है कि पीएलओ और फ़लस्तीनी प्राधिकरण अपनी शर्तें पूरी कर रहे हैं या नहीं। विभाग ने कांग्रेस को बताया कि फ़लस्तीनी पक्ष ने "एक बार फिर" यह शर्तें पूरी नहीं कीं। वजह में अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में इसराइल के ख़िलाफ़ चल रही क़ानूनी कार्रवाइयाँ गिनाई गईं, और इसराइलियों पर हमलों के दोषी क़ैदियों के परिवारों को जारी भुगतान भी। आरोप एक और भी था। न्यूज़वीक की रिपोर्ट यह अलग वजह दर्ज करती है: सार्वजनिक बयानों और स्कूली किताबों में आतंकवाद का महिमामंडन।

अगले दिन, गुरुवार 17 सितंबर को, जब महासभा में वीडियो-भाषण वाला प्रस्ताव वोट के लिए आया, अमेरिकी प्रतिनिधि ने अपनी बात वहाँ भी दोहराई, इस बार संयुक्त राष्ट्र के अपने रिकॉर्ड में। दस्तावेज़ GA/12784 के मुताबिक़ उन्होंने कहा कि फ़लस्तीनी प्राधिकरण और पीएलओ 1993 के ओस्लो समझौतों के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं कर रहे। आतंकवाद और हिंसा को राजनीतिक हथियार के तौर पर छोड़ने का जो वादा प्राधिकरण ने किया था, वह "इसराइली नागरिकों पर हुए हमलों की सीधे निंदा करने से लगातार इनकार" करता है। नए तरीक़ों से "ज़िंदा और मृत आतंकवादियों" के परिवारों को भुगतान जारी रखकर आतंकवाद को प्रोत्साहन दिया जा रहा है, उन्होंने कहा, और जोड़ा: "The United States will not be fooled by creative accounting." प्राधिकरण के कूटनीतिक और क़ानूनी अभियानों को उन्होंने governance, diplomacy और leadership की कड़ी मेहनत से बचने के लिए इसराइल को अलग-थलग करने की एक रणनीति बताया।

यह कोई नई दलील नहीं थी। पिछले साल भी यही तर्क दिया गया था। यह दूसरा साल है।

महासभा ने वीडियो को रास्ता दिया: 152 के मुक़ाबले 3

उसी गुरुवार, इक्यासीवें सत्र की चौथी बैठक में, यह प्रस्ताव वोट के लिए रखा गया। संयुक्त राष्ट्र के अपने रिकॉर्ड, दस्तावेज़ GA/12784 के मुताबिक़, प्रस्ताव का नाम था "इक्यासीवें सत्र के दौरान फ़लस्तीन राज्य की भागीदारी" (दस्तावेज़ A/81/L.2)। 193 सदस्यों वाली महासभा में वोट 152 पक्ष में, 3 विपक्ष में गिना गया। विपक्ष में अमेरिका, इसराइल और पैराग्वे थे। कोलंबिया, होंडुरास, पनामा और पेरू ने वोट से परहेज़ किया। भारत का नाम इनमें से किसी सूची में नहीं है; भारत ने पक्ष में वोट डाला।

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय की इमारत, अक्तूबर 2023 की तस्वीर; इसी परिसर में 17 सितंबर को महासभा ने 152-3-4 के वोट से फ़लस्तीन के वीडियो-भाषण को मंज़ूरी दी।
तस्वीर: Jakub Hałun, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 4.0

प्रस्ताव के प्रावधान सीधे हैं। फ़लस्तीन राज्य अपने राष्ट्रपति का पहले से रिकॉर्ड बयान जमा कर सकता है, जो आम बहस के दौरान जनरल असेंबली हॉल में तब चलेगा जब उसकी प्रतिनिधि, हॉल में मौजूद रहकर, उसका परिचय दे देगी। यह सुविधा सिर्फ़ इसी साल तक सीमित नहीं है। प्रस्ताव यह भी कहता है कि अगर फ़लस्तीन के प्रतिनिधि किसी भावी उच्चस्तरीय बैठक या संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में शामिल होने से रोके जाते हैं, तो वहाँ भी रिकॉर्डेड बयान जमा किया जा सकता है।

संयुक्त राष्ट्र के अपने दस्तावेज़ में एक पैराग्राफ़ सीधे उसी समझौते का हवाला देता है जो इस रिपोर्ट का असली विषय है। मेज़बान देश का दायित्व है कि वह संयुक्त राष्ट्र के राजनयिक प्रतिनिधिमंडलों की यात्रा में मदद करे, दस्तावेज़ कहता है, और यह दायित्व अमेरिका-संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय समझौते से तय होता है। इस समझौते की धारा 11, 12 और 13 के तहत अमेरिकी अधिकारी सदस्य देशों के प्रतिनिधियों के मुख्यालय आने-जाने में कोई अड़चन नहीं डाल सकते, दस्तावेज़ आगे कहता है, और जहाँ वीज़ा चाहिए वहाँ उसे बिना शुल्क और जितनी जल्दी हो सके जारी करना होता है। यह समझौता 26 जून 1947 को दस्तख़त हुआ और महासभा ने इसे 31 अक्तूबर 1947 को मंज़ूर किया था।

बहस में फ़लस्तीन की स्थायी पर्यवेक्षक टीम के प्रतिनिधि रियाद मंसूर ने जवाब देने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए ठीक इसी बिंदु पर बात रखी। उनका जवाब सीधा था। संयुक्त राष्ट्र के रिकॉर्ड में दर्ज उनके शब्द थे: "This agreement is part of the national law of the United States." उन्होंने जोड़ा कि इस पर सिर्फ़ तत्कालीन प्रशासन के दस्तख़त नहीं हैं, इसे अमेरिकी कांग्रेस ने भी पारित किया था। चीन के प्रतिनिधि ने कहा कि फ़लस्तीनियों को महासभा में अपनी बात रखने के हक़ से वंचित करना "अंतरात्मा के लिहाज़ से नामंज़ूर और तर्क के लिहाज़ से अक्षम्य" है। ईरान के प्रतिनिधि ने कहा कि यह प्रस्ताव मेज़बान देश को उसके दायित्वों से मुक्त नहीं करता। रूस के प्रतिनिधि ने वीज़ा न देने को "मेज़बान देश की प्रतिबद्धताओं का खुला उल्लंघन" बताया, मगर साथ ही यह भी जोड़ा कि उनका पक्ष में वोट दूरस्थ या हाइब्रिड कामकाज के तरीक़ों के समर्थन के तौर पर न देखा जाए।

1947 की संधि, अमेरिका के अपने दस्तख़त के साथ

वह समझौता जिस पर सारा मामला टिका है, उसका पूरा नाम है "अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के बीच संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय को लेकर हुआ समझौता"। यह 26 जून 1947 को दस्तख़त हुआ। इसकी धारा 11 का अंग्रेज़ी पाठ यह है: "The federal, state or local authorities of the United States shall not impose any impediments to transit to or from the headquarters district of (1) representatives of Members or officials of the United Nations... or (5) other persons invited to the headquarters district by the United Nations or by such specialized agency on official business." यानी अमेरिका के संघीय, राज्य या स्थानीय प्राधिकरण किसी सदस्य देश के प्रतिनिधि के, या संयुक्त राष्ट्र द्वारा आधिकारिक काम पर बुलाए किसी और व्यक्ति के, मुख्यालय आने-जाने में कोई अड़चन नहीं डालेंगे। एक राष्ट्रपति, जिसे महासभा ने ख़ुद बोलने के लिए बुलाया हो, ठीक इसी पाँचवीं श्रेणी में आता है।

धारा 12 इस दायित्व को और सख़्त बना देती है। इसका पूरा पाठ एक वाक्य का है: "The provisions of Section 11 shall be applicable irrespective of the relations existing between the Governments of the persons referred to in that section and the Government of the United States." यानी धारा 11 का दायित्व इस बात की परवाह नहीं करता कि उस व्यक्ति की सरकार के अमेरिका से कैसे रिश्ते हैं। अमेरिका का फ़लस्तीन राज्य को मान्यता देना या न देना, दोनों के बीच तनाव या उसका अभाव — धारा 12 के तहत इनमें से कुछ भी मायने नहीं रखता।

धारा 13 वीज़ा की बात सीधे करती है। इसका हिस्सा (a) कहता है: "When visas are required for persons referred to in that Section, they shall be granted without charge and as promptly as possible." यानी जहाँ वीज़ा ज़रूरी हो, वह बिना शुल्क और जितनी जल्दी मुमकिन हो जारी करना होगा। हिस्सा (b) निवास से जुड़ा है, और कहता है कि किसी व्यक्ति को उसकी आधिकारिक हैसियत में किए काम की वजह से अमेरिका छोड़ने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। यह हिस्सा एकतरफ़ा नहीं है। इसी में एक शर्त भी है: अगर कोई व्यक्ति अपनी आधिकारिक हैसियत से बाहर, यानी निजी हैसियत में, इन सुविधाओं का दुरुपयोग करता है, तो अमेरिकी विदेश मंत्री की पूर्व मंज़ूरी से उसके ख़िलाफ़ कार्यवाही हो सकती है। समझौता किसी को हर हाल में छूट नहीं देता। वह अमेरिका के हाथ में एक रास्ता भी छोड़ता है, बशर्ते वह उसी प्रक्रिया से गुज़रे जो धारा 13 ख़ुद तय करती है।

तीनों धाराएँ मिलकर एक ही बात कहती हैं। वीज़ा देना या न देना अमेरिका की सामान्य आव्रजन नीति का मामला नहीं रह जाता, जब बात संयुक्त राष्ट्र के किसी काम पर बुलाए गए व्यक्ति की हो। वहाँ एक अलग, ज़्यादा सख़्त नियम लागू होता है, और वह नियम अमेरिका ने ख़ुद 1947 में मंज़ूर किया था। यह तीन धाराओं की पूरी कहानी है।

धारा 21: मध्यस्थता जो कभी नहीं हुई

समझौते की धारा 21 यह तय करती है कि अगर अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के बीच इसकी व्याख्या को लेकर कोई विवाद हो और बातचीत से न सुलझे, तो फ़ैसला कैसे होगा। पाठ है: "Any dispute... which is not settled by negotiation or other agreed mode of settlement, shall be referred for final decision to a tribunal of three arbitrators, one to be named by the Secretary-General, one to be named by the Secretary of State of the United States, and the third to be chosen by the two." यानी विवाद तीन मध्यस्थों के एक पैनल के पास जाएगा: एक महासचिव का नामज़द, एक अमेरिकी विदेश मंत्री का, तीसरा दोनों की सहमति से। धारा 21(b) यह जोड़ती है कि इस प्रक्रिया के दौरान उठे किसी क़ानूनी सवाल पर महासचिव या अमेरिका, दोनों में से कोई भी, महासभा से गुज़ारिश कर सकता है कि वह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय से सलाहकार राय माँगे, यानी हेग की उस अदालत से जो संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी न्यायिक संस्था है।

यह रास्ता एक ही बार आज़माया गया है, और वह भी वीज़ा पर नहीं। दिसंबर 1987 में अमेरिकी कांग्रेस ने एक क़ानून पास किया, जिसके एक हिस्से को "एंटी-टेररिज़्म एक्ट" कहा गया, और जिसने न्यूयॉर्क में पीएलओ के पर्यवेक्षक मिशन का दफ़्तर बंद करना अमेरिकी क़ानून के तहत अनिवार्य बना दिया। तत्कालीन महासचिव हावियर पेरेज़ द कुइयार का पक्ष था कि यह क़दम मुख्यालय समझौते से टकराता है। बातचीत नाकाम रही। महासभा ने 2 मार्च 1988 को प्रस्ताव 42/229 बी पास कर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय से सलाहकार राय माँगी: क्या अमेरिका धारा 21 के तहत मध्यस्थता के लिए बाध्य है?

न्यायालय ने 26 अप्रैल 1988 को अपनी राय दी, सर्वसम्मति से। फ़ैसला था: "the United States of America... is under an obligation, in accordance with section 21 of that Agreement, to enter into arbitration for the settlement of the dispute between itself and the United Nations." यानी अमेरिका मध्यस्थता में जाने के लिए बाध्य है। यही वह पंक्ति है जो आज के मामले में सबसे कम पढ़ी गई है, और सबसे ज़्यादा काम की: संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय समझौते पर विवाद खड़ा होने पर अमेरिका के पास मध्यस्थता से बचने का कोई रास्ता नहीं, यह बात हेग की अदालत ने ख़ुद, बिना किसी असहमति के, दर्ज की है।

हेग में शांति महल, जहाँ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय बैठता है, अगस्त 2009 की तस्वीर; यहीं से न्यायालय ने 26 अप्रैल 1988 को कहा था कि अमेरिका मध्यस्थता के लिए बाध्य है।
तस्वीर: Iamthestig, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

पर मध्यस्थता हुई नहीं। अमेरिका ने पैनल नहीं बनाया। इसके बजाय मामला एक घरेलू अदालत में गया। न्यूयॉर्क की संघीय ज़िला अदालत में जज एडवर्ड पाल्मियेरी ने 29 जून 1988 को अमेरिकी सरकार बनाम पीएलओ के मामले में फ़ैसला सुनाया। उन्होंने लिखा: "The Anti-Terrorism Act does not require the closure of the PLO Permanent Observer Mission to the United Nations nor do the act's provisions impair the continued exercise of its appropriate functions." उनकी दलील एक जानी-पहचानी क़ानूनी परंपरा पर टिकी थी: "Unless this power is clearly and unequivocally exercised, this court is under a duty to interpret statutes in a manner consonant with existing treaty obligations." यानी जब तक कांग्रेस साफ़ शब्दों में किसी संधि को रद्द करने का इरादा न जताए, अदालतें क़ानून को उस संधि के मुताबिक़ ही पढ़ेंगी।

मिशन खुला रहा।

मध्यस्थता का वह पैनल, जिसे न्यायालय ने अनिवार्य बताया था, कभी नहीं बना। इस बार, यानी 2025 और 2026 के वीज़ा से इनकार पर, सार्वजनिक रिकॉर्ड में किसी ने धारा 21 के तहत औपचारिक मध्यस्थता की माँग दर्ज नहीं की है, न महासचिव ने, न फ़लस्तीन ने।

यह पहली बार नहीं: 1988 का जिनीवा, 2025 का वीडियो

यह कहानी दो बार पहले भी लगभग यही मोड़ ले चुकी है, एक बार 1988 में और एक बार पिछले साल।

नवंबर 1988 के आख़िर में अमेरिकी विदेश मंत्री जॉर्ज शुल्ट्ज़ ने पीएलओ नेता यासिर अराफ़ात को वीज़ा देने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि पीएलओ के तत्वों के आतंकवाद में शामिल होने के "पुख़्ता सबूत" हैं। अराफ़ात उस साल की आम बहस में न्यूयॉर्क आकर बोलने वाले थे। महासभा ने 2 दिसंबर 1988 को प्रस्ताव 43/49 पास किया, 154 पक्ष में और 2 विपक्ष में, यानी अमेरिका और इसराइल; ब्रिटेन ने वोट से परहेज़ किया। इस प्रस्ताव ने तय किया कि फ़लस्तीन के सवाल पर बैठक जिनीवा में होगी, 13 से 15 दिसंबर तक। महासभा न्यूयॉर्क में बसने के बाद यह पहला मौक़ा था जब वह उसके बाहर मिली। अराफ़ात ने 13 दिसंबर को पैले दे नेसिओं में महासभा को संबोधित किया। वह भाषण हॉल में हुआ, स्क्रीन पर नहीं। यूपीआई की उसी दिन की रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्होंने कहा कि वे "हर रूप में" आतंकवाद के ख़िलाफ़ हैं, और इसराइल के नेताओं को संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में सीधी बातचीत का न्यौता दिया। कुछ ही दिनों में अमेरिका ने कहा कि पीएलओ ने बातचीत खोलने की उसकी शर्तें पूरी कर दी हैं, और राजदूत रॉबर्ट पेलेट्रो के ज़रिए सीधी बातचीत शुरू हुई।

जिनीवा में पैले दे नेसिओं, संयुक्त राष्ट्र के यूरोपीय मुख्यालय की इमारत, मार्च 2011 की तस्वीर; यहीं महासभा दिसंबर 1988 में अराफ़ात को सुनने के लिए मिली थी, न्यूयॉर्क के बाहर पहली बार।
तस्वीर: Gryffindor, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

तब समाधान एक ही तरह का हो सकता था: पूरी महासभा को जिनीवा ले जाना। आज समाधान की जगह एक वीडियो फ़ाइल है। यह फ़र्क़ इरादे का नहीं, तीन दशक की तकनीक का है।

पिछले साल भी यही हुआ था, लगभग हूबहू। इक्यासीवें सत्र से पहले, 2025 में, अमेरिका ने अब्बास और फ़लस्तीनी प्राधिकरण के कई अधिकारियों के वीज़ा देने से इनकार किया और कुछ के जारी वीज़ा रद्द किए। महासभा ने 19 सितंबर 2025 को प्रस्ताव पास किया, 145 पक्ष में, 5 विपक्ष में (अमेरिका, इसराइल, नाउरू, पलाउ और पैराग्वे), और 6 देशों ने वोट से परहेज़ किया। उस प्रस्ताव में एक पंक्ति ख़ास तौर पर जोड़ी गई थी: यह क़दम आगे की किसी भी आम बहस के लिए कोई मिसाल नहीं बनाएगा। एक बरस बाद वही तरीक़ा फिर अपनाया गया, इस बार 152 पक्ष में और सिर्फ़ 3 विपक्ष में; नाउरू और पलाउ इस बार विपक्ष की सूची में नहीं थे। संख्या बदली, तरीक़ा नहीं बदला।

गुतारेस का 'गहरा अफ़सोस', और यूरोपीय संघ की अपील

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम में सबसे संक्षिप्त रही। उनके प्रवक्ता स्तेफ़ान दुज़ारिक ने 18 और 19 सितंबर के बीच बताया कि महासचिव को अमेरिका के फ़ैसले पर गहरा अफ़सोस है। साइप्रस मेल और गल्फ़ टुडे की रिपोर्टों के मुताबिक़ दुज़ारिक ने यह भी कहा कि महासचिव मेज़बान देश से चाहते हैं कि वह 1947 के मुख्यालय समझौते के तहत अपने दायित्वों के मुताबिक़ ही वीज़ा जारी करे। यूरोपीय संघ ने भी 19 सितंबर को अलग से अपील की कि अमेरिका फ़लस्तीनी प्रतिनिधिमंडल पर लगी यात्रा-रोक हटाए।

इनमें से किसी बयान ने धारा 21 का नाम नहीं लिया। किसी ने मध्यस्थता की माँग नहीं की। प्रस्ताव पास होने और भाषण चलने के बीच सात दिन बीते, और इन सात दिनों में प्रक्रिया ठीक वैसी ही रही जैसी 17 सितंबर के प्रस्ताव में तय हुई थी। रियाद मंसूर ने हॉल में मौजूद रहकर परिचय दिया, वीडियो चला, और सत्र अपने तय क्रम में आगे बढ़ा। अफ़सोस दर्ज हुआ, अपील दर्ज हुई, और आम बहस अपने तय कार्यक्रम पर आगे बढ़ती रही, गुरुवार को एक वीडियो के साथ।

स्रोतसंयुक्त राष्ट्र महासभा की मीटिंग्स कवरेज, दस्तावेज़ GA/12784, 17 सितंबर 2026: प्रस्ताव A/81/L.2 का पूरा ब्योरा, वोट, और अमेरिका, फ़लस्तीन, चीन, ईरान व रूस के प्रतिनिधियों के बयान, येल लॉ स्कूल का एवलॉन प्रोजेक्ट: अमेरिका-संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय समझौता, 1947, पूरा पाठ, धारा 11, 12, 13 और 21 सहित, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय: मामला संख्या 77, 'Applicability of the Obligation to Arbitrate under Section 21', केस पेज, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की प्रेस विज्ञप्ति, 26 अप्रैल 1988: सलाहकार राय का पूरा फ़ैसला-वाक्य और पृष्ठभूमि, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय: 26 अप्रैल 1988 की सलाहकार राय का आधिकारिक सारांश, यूनाइटेड स्टेट्स बनाम फ़लस्तीन मुक्ति संगठन, 695 F. Supp. 1456 (S.D.N.Y. 1988), जज एडवर्ड पाल्मियेरी का 29 जून 1988 का फ़ैसला, पूरा पाठ, ज्यूइश वर्चुअल लाइब्रेरी: महासभा प्रस्ताव 42/229 बी, 2 मार्च 1988 का ब्योरा, विकिपीडिया: 1988 में यासिर अराफ़ात का महासभा को संबोधन, वीज़ा से इनकार और जिनीवा की बैठक का सोर्स किया गया ब्योरा, डेज़रेट न्यूज़, 1 दिसंबर 1988: महासभा का प्रस्ताव 43/49 और जिनीवा में दोबारा बैठक की योजना, तत्कालीन रिपोर्ट, यूपीआई आर्काइव्स, 13 दिसंबर 1988: जिनीवा में अराफ़ात के भाषण की उसी दिन की रिपोर्ट, न्यूज़वीक, 16 सितंबर 2026: अमेरिकी विदेश विभाग का बयान, पूरा उद्धरण और तारीख़, अल जज़ीरा, 17 सितंबर 2026: वीज़ा पाबंदी बढ़ाए जाने की रिपोर्ट, अमेरिकी क़ानूनों के हवाले सहित, एसोसिएटेड प्रेस (सैम मेट्ज़ व मेगन मिनेइरो की बाइलाइन), 24 सितंबर 2026: अब्बास की रिकॉर्डिंग, नेतन्याहू का कार्यक्रम और इसराइली सीटों का ब्योरा, साइप्रस मेल, 18 सितंबर 2026: महासचिव गुतारेस के प्रवक्ता का बयान, गल्फ़ टुडे, 19 सितंबर 2026: गुतारेस की प्रतिक्रिया, मुख्यालय समझौते के हवाले सहित, अल जज़ीरा, 19 सितंबर 2026: यूरोपीय संघ की अपील, अल जज़ीरा, 19 सितंबर 2025: पिछले साल के वीडियो-प्रस्ताव की रिपोर्ट और वोट का ब्योरा, इंटरनेशनल न्यूज़ ऐंड व्यूज़, 17-18 सितंबर 2026: भारत के वोट का ब्योरा, भारत पन्ना, 22 सितंबर 2026 — इसी डेस्क की अपनी रिपोर्ट, इक्यासीवें सत्र की आम बहस के कार्यक्रम पर

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