एक ही गाना दो देशों का हो गया, और दोनों फ़िल्मों में मुख्य बच्चा एक ही अभिनेता था
जागृति 1954 में आई और भारत में स्कूल-मास्टर की सबसे बड़ी फ़िल्म बन गई। दो साल बाद लाहौर में बेदारी आई, जो उसकी लगभग दृश्य-दर-दृश्य नक़ल थी। दर्शकों ने पकड़ लिया और सेंसर बोर्ड ने उसे रोक दिया।

एक गाना है जो इस देश में हर स्कूल के हर 26 जनवरी पर बजता है।
आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की।
उसी धुन पर, उन्हीं शब्दों की बनावट में, एक और गाना है।
आओ बच्चों सैर कराएँ तुमको पाकिस्तान की।
रास्ते के सारे नाम बदल दिए गए। जिन जगहों की झाँकी दिखाई जा रही थी, वे सिंध, पंजाब, कश्मीर और सरहद हो गईं।
पहले फ़िल्म
जागृति 1954 में आई। इसे सत्येन बोस ने बनाया और निर्देशित किया, और यह फ़िल्मिस्तान की फ़िल्म थी।
संगीत हेमंत मुखर्जी का था और गीत कवि प्रदीप के।
कहानी सीधी है। अजय नाम का एक अमीर और बिगड़ा हुआ लड़का है जिसे अनुशासन सिखाने के लिए बोर्डिंग स्कूल भेजा जाता है। वहाँ शेखर नाम के अधीक्षक हैं, जिनका तरीक़ा सख़्ती का नहीं है। अजय फिर भी नहीं बदलता। वह तब बदलता है जब उसकी दोस्ती एक विकलांग लड़के से होती है और उस दोस्ती का अंत त्रासदी में होता है।
अजय की भूमिका राज कुमार गुप्ता ने की। शेखर अभि भट्टाचार्य बने। और शक्ति नाम के उस लँगड़े लड़के की भूमिका रतन कुमार ने की, जिनका नाम आगे इस कहानी का सबसे अजीब हिस्सा है।
फ़िल्म को फ़िल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार मिला और अभि भट्टाचार्य को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का।
इसे बिना सितारों वाली फ़िल्म की सफलता के उदाहरण की तरह याद किया जाता है।
और अब बेदारी
6 दिसंबर 1956 को पाकिस्तान में बेदारी रिलीज़ हुई।
निर्देशक रफ़ीक़ रिज़वी थे, निर्माता वज़ीर अली रिज़वी, और संगीत फ़तेह अली ख़ान का।
फ़िल्म जागृति की नक़ल थी। कुछ शब्द बदले गए, और संगीत सीधे उठा लिया गया।
अब वह बात जो इस पूरी कहानी को दूसरी नक़लों से अलग करती है।
बेदारी में मुख्य बच्चे का किरदार रतन कुमार ने किया।
वही रतन कुमार, जिन्होंने जागृति में शक्ति का किरदार किया था। वे पचास के दशक में पाकिस्तान चले गए थे।
यानी वह लड़का, जिसकी मौत भारत की सबसे लोकप्रिय देशभक्त फ़िल्म का भावनात्मक केंद्र थी, दो साल बाद उसी किरदार में उस देश की देशभक्त फ़िल्म में दिखा जो उसका पड़ोसी है।
एक ही शरीर, एक ही चोट, दो अलग राष्ट्रगाथाएँ।
बाक़ी कलाकारों में रागिनी, संतोष कुमार, मीना शोरी, क़ाज़ी वजीद, बिब्बो और लहरी थे। इनमें कई नाम पाकिस्तानी फ़िल्म और टेलीविज़न के बड़े नाम बने।
रतन कुमार कौन थे
इस कहानी का केंद्र एक बाल कलाकार है, और उसका अपना सफ़र दोनों फ़िल्मों से बड़ा है।
रतन कुमार पर्दे का नाम था। असल नाम नज़ीर रिज़वी था।
पचास के दशक की शुरुआत में वे भारतीय सिनेमा के सबसे पहचाने जाने वाले बाल कलाकारों में थे। जागृति में शक्ति का किरदार उनका सबसे याद रखा जाने वाला काम है, और उसी दौर की दूसरी फ़िल्मों में भी वे दिखे।
फिर वे पाकिस्तान चले गए।
यह उस दौर की एक आम कहानी है। विभाजन के बाद के डेढ़ दशक में फ़िल्म उद्योग के लोग दोनों तरफ़ आते-जाते रहे, और कई ऐसे थे जिनका काम एक तरफ़ शुरू हुआ और दूसरी तरफ़ ख़त्म।
मीना शोरी, जो बेदारी में थीं, इसी श्रेणी में हैं। वे बंबई की फ़िल्मों की जानी-पहचानी अभिनेत्री थीं और बाद में लाहौर चली गईं।
पर रतन कुमार का मामला अलग है, क्योंकि उन्होंने वही किरदार दोबारा किया।
अभिनेता आमतौर पर दोबारा वही भूमिका तब करता है जब कोई फ़िल्म का रीमेक बने और वह उसी में लिया जाए। यहाँ रीमेक अधिकृत नहीं था। और फिर भी उसी किरदार के लिए उसी लड़के को चुना गया।
इसका सबसे सीधा कारण शायद यही रहा होगा कि दर्शक उस चेहरे को उस किरदार से जोड़ चुके थे। जो नक़ल दृश्य-दर-दृश्य हो रही हो, उसमें चेहरा भी वही रखना तार्किक क़दम है।
जो हुआ उसके बाद
फ़िल्म पहले कुछ हफ़्तों में अच्छी चली।
फिर दर्शकों ने पकड़ लिया।
जब यह बात फैली कि यह फ़िल्म नक़ल है, तो उसके प्रदर्शन के ख़िलाफ़ जन-प्रदर्शन हुए और पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड ने उस पर रोक लगा दी।
इस वाक्य को दोबारा पढ़िए, क्योंकि इसमें जो असामान्य है वह यह है कि किसने आपत्ति की।
आपत्ति भारत सरकार ने नहीं की। आपत्ति फ़िल्मिस्तान ने अदालत में जाकर नहीं की, जो 1956 में लगभग असंभव भी था।
आपत्ति दर्शकों ने की, अपने ही देश में।

दूसरा गाना, और असली अदला-बदली
जागृति में एक और गाना है जो पहले वाले से भी ज़्यादा जाना जाता है।
दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।
यह गांधी के लिए लिखा गया था और कवि प्रदीप ने लिखा था।
बेदारी में इसी धुन पर जो गाना है, उसमें साबरमती के संत की जगह पाकिस्तान के संस्थापक हैं।
यह अदला-बदली पहले वाली से गहरी है।
पहले गाने में जगहों के नाम बदले गए थे, जो भूगोल का मामला है। दो देश हैं, दो अलग नक़्शे हैं, और बच्चों को अपना नक़्शा दिखाना दोनों जगह स्वाभाविक है।
दूसरे गाने में जो बदला गया, वह व्यक्ति है। और वह व्यक्ति वही है जिस पर 1947 का पूरा झगड़ा टिका था।
एक ही धुन पर, एक ही लय में, एक ही तरह की श्रद्धा के साथ, दो नाम रखे जा सकते थे। और रख दिए गए।
तीसरा गाना, जो कम याद रहता है
जागृति में एक और गाना है जो इन दोनों जितना नहीं बजता, पर फ़िल्म के भीतर सबसे ज़्यादा काम करता है।
हम लाए हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के।
पहले दो गाने बच्चों को कुछ दिखाते हैं: नक़्शा, और एक आदमी।
यह तीसरा गाना उन्हें कुछ सौंपता है।
यही वह जगह है जहाँ फ़िल्म का कथानक और उसका संगीत एक हो जाते हैं। पूरी कहानी एक अध्यापक की है जो एक बिगड़े हुए लड़के को सज़ा से नहीं, ज़िम्मेदारी से बदलता है। और गाना ठीक वही करता है, बच्चों को ज़िम्मेदारी सौंपकर।
1954 में यह पंक्ति एक ख़ास अर्थ रखती थी। आज़ादी सात साल पुरानी थी और उस पीढ़ी को यह सचमुच लग रहा था कि उन्होंने किश्ती तूफ़ान से निकाली है।
नक़ल का सवाल, और उसके नीचे का सवाल
यहाँ दो बातें अलग रखनी चाहिए।
पहली सीधी है। यह नक़ल थी, उस दौर में भी नक़ल मानी गई, और उसी देश के दर्शकों ने उसे नक़ल कहकर रोका। इस पर कोई बहस नहीं है।
दूसरी उससे दिलचस्प है। नक़ल इतनी आसानी से बैठ क्यों गई?
एक फ़िल्म को दूसरे देश में उठाकर रख देना तब ही संभव है जब उसका ढाँचा वहाँ भी काम करे।
जागृति का ढाँचा एक स्कूल है, एक बिगड़ा हुआ अमीर लड़का, एक ग़रीब और बीमार लड़का, और एक अध्यापक जो सज़ा के बजाय समझाने पर चलता है। इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो सिर्फ़ भारत में हो सकता हो।
और देशभक्ति का जो रूप उसमें है, वह भी दोनों जगह एक जैसा था: एक नया देश, एक नक़्शा जो बच्चों को याद कराना है, और एक संस्थापक जिसका नाम श्रद्धा से लिया जाना है।
1947 में जो बँटा, वह ज़मीन थी और आबादी थी। सिनेमा का व्याकरण नहीं बँटा।
उसी बँटवारे के दोनों तरफ़ के फ़िल्मकार एक ही उद्योग में सीखे थे, एक ही तरह की कहानियाँ बनाते थे, और उनमें से कई तो एक ही दफ़्तर में काम कर चुके थे।

दोनों फ़िल्मों का बुनियादी ढाँचा
एक बात जो इस तुलना में अक्सर छूट जाती है, वह यह कि जागृति ख़ुद किसी शून्य से नहीं आई थी।
पचास का दशक भारतीय सिनेमा में स्कूल, अध्यापक और सुधार की कहानियों का दशक था। नया देश था, और उसे अपने बारे में जो कहानियाँ चाहिए थीं, उनमें शिक्षा सबसे ऊपर थी।
इस ढाँचे के तीन हिस्से लगभग हर ऐसी फ़िल्म में मिलते हैं। एक बच्चा जो ग़लत रास्ते पर है। एक बड़ा जो सज़ा के बजाय समझ का रास्ता चुनता है। और एक तीसरा किरदार, आमतौर पर कमज़ोर या बीमार, जिसकी पीड़ा से पहला बच्चा बदलता है।
जागृति ने इस ढाँचे को सबसे साफ़ रूप में रखा, और उसमें देशभक्ति के गाने जोड़ दिए। यही मिश्रण उसे उस दशक की सबसे याद रखी जाने वाली फ़िल्मों में ले गया।
और यही मिश्रण वह चीज़ थी जिसे सरहद पार उठाकर रख देना आसान था। ढाँचा साझा था, गाने बदले जा सकते थे, और बीच में जो नाम थे वे अदल-बदल दिए गए।
कवि प्रदीप का नाम
जिस आदमी ने ये दोनों गाने लिखे, उसका अपना इतिहास इस कहानी को एक और परत देता है।
कवि प्रदीप ने 1943 में बॉम्बे टॉकीज़ की फ़िल्म किस्मत के लिए दूर हटो ऐ दुनिया वालों, हिंदुस्तान हमारा है लिखा था।
वह भारत छोड़ो आंदोलन का साल था और वह गाना अंग्रेज़ सरकार को इतना नागवार गुज़रा कि उसके लिए उन पर कार्रवाई की तैयारी हुई।
ग्यारह साल बाद उन्होंने जागृति के गाने लिखे, और वे गाने अब स्कूलों के गाने हैं।
तीन साल बाद उन्हीं में से दो गाने सरहद पार जाकर किसी और देश के गाने बन गए।
एक ही लेखक की पंक्तियाँ, जिनका एक रूप औपनिवेशिक सरकार के ख़िलाफ़ था, दूसरा नए भारत के लिए था, और तीसरा वह जिसे उन्होंने लिखा ही नहीं था।
उस दौर में नक़ल का क़ानून क्या था
1956 में इस मामले में क्या किया जा सकता था, यह सवाल आज के हिसाब से नहीं देखा जा सकता।
भारत का अपना कॉपीराइट क़ानून 1957 में आया, यानी बेदारी के रिलीज़ होने के बाद। उससे पहले 1914 का औपनिवेशिक क़ानून चलता था।
और इससे बड़ी अड़चन यह थी कि यह दो देशों के बीच का मामला था। एक देश की अदालत का आदेश दूसरे देश में तभी काम करता है जब दोनों के बीच कोई संधि या व्यवस्था हो, और 1956 में भारत तथा पाकिस्तान के बीच ऐसी कोई कार्यशील व्यवस्था कल्पना से बाहर थी।
इसलिए इस मामले में जो हुआ, वह क़ानून से नहीं हुआ।
वह दर्शकों से हुआ।
और यह ध्यान देने लायक़ बात है, क्योंकि यह उस दौर के दर्शक के बारे में कुछ कहती है। लाहौर के सिनेमाघर में बैठा व्यक्ति जागृति देख चुका था, या कम से कम उसके गाने सुन चुका था, इतना कि वह पर्दे पर देखकर पहचान गया।
विभाजन को नौ साल हुए थे। सरहद खिंच चुकी थी, पर कान अभी नहीं बँटे थे।
जो इस कहानी में साफ़ नहीं है
एक बात दर्ज करनी चाहिए।
बेदारी के साल को लेकर स्रोतों में अंतर है। कुछ जगह 1956 मिलता है और कुछ जगह 1957।
जिस विवरण में निर्देशक, निर्माता, संगीतकार और पूरी कलाकार सूची दर्ज है, उसमें रिलीज़ की तारीख़ 6 दिसंबर 1956 है, और यह लेख उसी को मान रहा है।
यह अंतर क्यों बनता है, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है। जिस फ़िल्म पर रिलीज़ के कुछ हफ़्तों बाद रोक लगी हो, उसके "चलने" का साल और "आने" का साल अलग-अलग दर्ज हो सकते हैं।
दूसरी बात जो इस लेख में नहीं है, वह यह कि जागृति के निर्माताओं ने इस पर क्या कहा। उस समय की भारतीय अख़बारी प्रतिक्रिया का कोई भरोसेमंद ब्योरा इस लेख के लिए नहीं मिला, इसलिए वह हिस्सा ख़ाली छोड़ा जा रहा है।
एक फ़िल्म जो दो बार बनी और दोनों बार पढ़ाई गई
जागृति भारत में स्कूलों में दिखाई जाने वाली फ़िल्मों में रही है।
बेदारी के साथ ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि उस पर रोक लग गई।
पर उसका गाना बचा रह गया।
यही इस पूरी कहानी का सबसे टिकाऊ हिस्सा है। फ़िल्म रुक गई, और उसकी नक़ल की हुई धुन पर लिखा गाना उस देश में चलता रहा, क्योंकि गाना फ़िल्म से हल्का होता है और तेज़ चलता है।
एक फ़िल्म को सेंसर बोर्ड रोक सकता है। एक धुन को नहीं, जब वह एक बार बच्चों की ज़बान पर चढ़ जाए।
आख़िर में
इस कहानी का सबक़ चोरी वाला नहीं है, क्योंकि वह हिस्सा उसी वक़्त तय हो चुका था और उसे उसी देश के दर्शकों ने तय किया।
सबक़ यह है कि 1947 के नौ साल बाद दो देशों को अपने बच्चों से लगभग एक ही बात कहनी थी।
यह देखो हमारा नक़्शा। यह देखो हमारे पहाड़ और नदियाँ। और यह देखो वह आदमी जिसने हमें यह सब दिलाया।
पहला गाना नक़्शे का था और उसमें नाम बदलना आसान था।
दूसरा गाना उस आदमी का था, और उसमें भी नाम बदल दिया गया, उसी धुन पर, उसी लय में।
और बीच में वह बच्चा खड़ा था जिसने दोनों फ़िल्मों में एक ही किरदार निभाया, और जिसे दोनों कहानियों में मरना था।

स्रोतअपरस्टॉल, जागृति (1954) का विवरण, बेदारी (1956) का विवरण और नक़ल का विवाद, स्क्रॉल, गाने के बदले जाने पर रिपोर्ट, दोनों फ़िल्मों की तुलनात्मक समीक्षा