शरतचंद्र ने हिंदी में कभी कुछ नहीं लिखा, और हिंदी के पाठकों ने उन्हें अपना बना लिया
पंद्रह सितंबर को उनकी डेढ़ सौवीं जयंती पर प्रधानमंत्री ने श्रद्धांजलि दी। देवदास और श्रीकांत के जिन हिंदी अनुवादों ने बंगाल के बाहर उनका पाठक बनाया, उनके प्रकाशक या अनुवादक का नाम किसी पुष्ट स्रोत में दर्ज नहीं मिला।

पंद्रह सितंबर की शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर एक पोस्ट डाला। मौक़ा था शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की डेढ़ सौवीं जयंती। पीआईबी की हिंदी विज्ञप्ति, रिलीज़ आईडी 2310545, शाम 4:38 बजे, ने वही पोस्ट बांग्ला अनुवाद के साथ छापा। उसमें एक पंक्ति है, उनकी रचनाओं को "19वीं सदी के भारत" में बंगाली समाज के चित्रण के लिए याद किया जाता है। यह पंक्ति ग़लत सदी बताती है। शरतचंद्र ने लिखना 1907 में शुरू किया। मरे वे 1938 में। उनका पूरा लेखन बीसवीं सदी का है, उन्नीसवीं का नहीं। विज्ञप्ति की एक और पंक्ति और बड़ा दावा करती है, उनकी रचनाएँ "हर भारतीय भाषा" में अनूदित हैं। यह दावा प्रधानमंत्री का है, इस लेख का नहीं।
जन्म 15 सितंबर 1876 को हुआ, हुगली ज़िले के देबानंदपुर गाँव में। मृत्यु 16 जनवरी 1938 को, कलकत्ता के पार्क नर्सिंग होम में। बांग्ला पंचांग की कोई तारीख़ इस डेस्क को किसी स्रोत में नहीं मिली जिसे वह खोल सकी, इसलिए यहाँ सिर्फ़ अंग्रेज़ी तारीख़ें दी जा रही हैं।
एक दावा फिर भी जाँच में टिकता है, और वह सरकारी काग़ज़ से नहीं आता। शरतचंद्र ने हिंदी में एक शब्द नहीं लिखा। फिर भी बीसवीं सदी के बड़े हिस्से में हिंदी के पाठकों के बीच वे सबसे ज़्यादा बिकने वाले उपन्यासकारों में गिने गए। देवदास, श्रीकांत, परिणीता, ये नाम हिंदी में उतने ही घर के लगते हैं जितने प्रेमचंद के उपन्यासों के नाम। यह कैसे हुआ? किसने कराया? उस कराने का काग़ज़ी सुराग़ आज कितना बचा है? यही इस लेख की खोज है, और जवाब का पहला हिस्सा उतना पक्का नहीं निकला जितनी उम्मीद थी।
1919 की एक पंक्ति की जाँच
शरतचंद्र की पहली छपी रचना 1903 में लिखी गई, अपने नाम पर नहीं। कहानी का नाम था मंदिर। उन्होंने इसे अपने चाचा सुरेंद्रनाथ गांगुली के नाम से कुंतलीन पुरस्कार की प्रतियोगिता में भेजा। कहानी को पुरस्कार मिला। पुरस्कार सुरेंद्रनाथ के नाम गया। शरतचंद्र का नाम कहीं दर्ज नहीं हुआ।
तीन साल बाद बड़दीदी आई, भारती पत्रिका में क़िस्तों में, बिना किसी लेखक के नाम के। उस वक़्त भारती का संपादन सरला देवी चौधुरानी कर रही थीं, रवींद्रनाथ टैगोर की भांजी। बड़दीदी किताब की शक्ल में 1913 में छपी। बिराजबौ किताब के तौर पर 1914 में आई। इसके बाद रचनाएँ तेज़ी से आईं, चरित्रहीन और देवदास 1917 में, श्रीकांत के चार भाग 1917 से 1933 के बीच फैले, और शेष प्रश्न 1931 में। इन तारीख़ों पर स्रोत एकमत हैं।

इसके बाद अंग्रेज़ी विकिपीडिया का एक वाक्य आता है, जिस पर एकमत नहीं है। 1919 में चंद्रशेखर पाठक नाम के किसी अनुवादक ने बिराजबौ का हिंदी अनुवाद किया, वाक्य कहता है। यह शरतचंद्र की किसी रचना का किसी और भारतीय भाषा में पहला अनुवाद था, वाक्य आगे जोड़ता है। यह पूरे लेख की सबसे बड़ी बात हो सकती थी। सच निकले तो शरतचंद्र मराठी, गुजराती और अंग्रेज़ी से पहले हिंदी में पहुँचे।
पर वाक्य के आगे कोई हवाला नहीं है। इस डेस्क ने तीन जगह देखा, बांग्लापीडिया का पन्ना, ब्रिटानिका का पन्ना, और आर्काइव डॉट ओआरजी की खोज। बांग्लापीडिया का पन्ना खाली मिला। ब्रिटानिका ने पहुँच से रोक दिया। आर्काइव डॉट ओआरजी पर बिराजबौ की दो प्रतियाँ मिलीं, एक 1920 की अंग्रेज़ी, दूसरी 1947 की बांग्ला, गुरदास चट्टोपाध्याय एंड संस से छपी। दोनों में कोई 1919 की हिंदी प्रति नहीं है। नेशनल लाइब्रेरी की सूची और हिंदी साहित्य सम्मेलन के रिकॉर्ड तक इस डेस्क की पहुँच नहीं बनी।
इसका मतलब यह नहीं कि दावा झूठा है। इसका मतलब बस इतना है कि इसे किसी दूसरे स्रोत से पुष्ट नहीं किया जा सका। इसी वजह से यह लेख अपनी शुरुआत इस तारीख़ पर नहीं टिकाता।
1919 का सुराग़ खुला रहता है।
अनुवादक का नाम किसी ने नहीं रखा
जो अनुवाद पक्के तौर पर मिलते हैं, वे अंग्रेज़ी के हैं, और वे भी दशकों बाद के। श्रीजाता गुहा का देवदास अनुवाद पेंगुइन बुक्स इंडिया ने 2002 में छापा। अरुणा चक्रवर्ती का श्रीकांत अनुवाद पेंगुइन की सूची में 1993 का दर्ज है। ये दोनों तारीख़ें उस दौर से बहुत बाद की हैं जब शरतचंद्र हिंदी पट्टी में पहले ही घर-घर पढ़े जा रहे थे।
असली सवाल हिंदी अनुवादों का है। वहीं जवाब ख़त्म हो जाता है। इंटरनेट पर कुछ नाम घूमते हैं, हिंदी पुस्तक भंडार, गंगा पुस्तक माला, सस्ता साहित्य मंडल। इनमें से किसी को किसी टाइटल पेज, किसी पुस्तकालय सूची या किसी विद्वत्तापूर्ण स्रोत से इस डेस्क ने पुष्ट नहीं पाया। एक बुकसेलर के पेज पर छपा नाम किसी संस्करण की तारीख़ का सबूत नहीं होता। इसलिए यहाँ कोई नाम छापा नहीं गया।

शरतचंद्र ने ख़ुद हिंदी अनुवादों की अनुमति दी हो, इस पर कोई राय रखी हो, या उनका मेहनताना पाया हो, इसका कोई सुराग़ नहीं मिला। कोई चिट्ठी नहीं मिली। कोई भूमिका नहीं मिली। कोई दर्ज बयान नहीं मिला।
एक पंक्ति फिर भी हाथ लगी। यह पंक्ति ख़ुद इसी कमी की मिसाल है। श्रीकांत के एक हिस्से में शरतचंद्र लिखते हैं, "It is easy enough to shed a few tears over another's sorrow, but to step forward and voluntarily take a heavy responsibility upon oneself is a very different matter." यह अरुणा चक्रवर्ती के अनुवाद की पंक्ति है। इस डेस्क ने इसे सीधे उस अनुवाद से नहीं पढ़ा, बल्कि द डेली स्टार में माधुरिमा सेन के लेख में उद्धृत पाया। यानी शरतचंद्र की जिस एक पंक्ति की पुष्टि हो सकी, वह भी हिंदी से होकर नहीं, अंग्रेज़ी से होकर आई।
देवदास, तीन बार बना
किताबों का हिसाब जहाँ अधूरा रह जाता है, वहाँ पर्दे का हिसाब भरा-पूरा मिलता है। देवदास तीन बार बना। तीनों बार दस साल के भीतर।
पहली बार 1928 में, मूक फ़िल्म के तौर पर। नरेश मित्रा ने निर्देशन किया। फणी बर्मा देवदास बने, तारकबाला पार्वती और परुलबाला चंद्रमुखी। ईस्टर्न फ़िल्म्स सिंडिकेट ने बनाई, 11 फ़रवरी 1928 को रिलीज़ हुई। यह उपन्यास का पहला पर्दा-रूपांतरण था।
दूसरी बार 1935 में, बांग्ला में। प्रमथेश बरुआ ने निर्देशन किया, ख़ुद देवदास बने। जमुना बरुआ पार्वती बनीं, चंद्राबती देवी चंद्रमुखी। न्यू थिएटर्स ने बनाई, 30 मार्च 1935 को आई। यह "सर्वकालिक हिट" के तौर पर दर्ज है।
तीसरी बार 1936 में, हिंदी में। बरुआ ने फिर निर्देशन किया। इस बार के.एल. सहगल देवदास बने, जमुना बरुआ फिर पारो और राजकुमारी चंद्रमुखी। छायांकन बिमल रॉय का था। संगीत रायचंद बोराल, पंकज मलिक और तिमिर बरन का। यही हिंदी संस्करण था जिसने देवदास को उस हर दर्शक तक पहुँचाया जिसने कभी कोई अनुवाद नहीं पढ़ा था।
तीनों फ़िल्मों का कोई सेंसर प्रमाणपत्र इस डेस्क को नहीं मिला। तीनों 1952 के सिनेमैटोग्राफ़ एक्ट से पहले की हैं, उस केंद्रीय बोर्ड से भी पहले जो आज फ़िल्में प्रमाणित करता है। 1918 के पुराने अधिनियम के तहत प्रांतीय बोर्ड यह काम करते थे, पर उनका कोई रिकॉर्ड इस खोज में सामने नहीं आया। यह गैप यहीं दर्ज किया जा रहा है, भरा नहीं जा रहा।
सिलसिला वहाँ नहीं रुका। 2002 में संजय लीला भंसाली ने शाहरुख़ ख़ान के साथ देवदास बनाई। बांग्लादेश में चाशी नज़रुल इस्लाम ने अपने करियर में दो बार इसी कहानी पर लौटने का फ़ैसला किया, यह ब्योरा माधुरिमा सेन के लेख से है। देवदास, सेन के अपने शब्दों में, बार-बार मरता है और नए रूप में लौटता है।
पथेर दाबी पर पाबंदी
अगली कहानी एक किताब की है, जो प्रतिबंधित हुई।
पथेर दाबी की कहानी के केंद्र में एक गुप्त संगठन है, जिसका नाम भी पथेर दाबी है, और जिसका मक़सद अंग्रेज़ी राज से भारत को आज़ाद कराना है। संगठन का मुखिया सव्यसाची है, यूरोप और अमेरिका में चिकित्सा, इंजीनियरिंग और क़ानून पढ़ा हुआ आदमी, जो अपनी शारीरिक क्षमता और सूझबूझ से अंग्रेज़ ख़ुफ़िया तंत्र को बार-बार चकमा देता है। सुमित्रा और भारती नाम की दो स्त्री-किरदार भी संगठन के काम में पुरुषों के बराबर हिस्सा लेती हैं, अपने दौर की सामाजिक बंदिशों को दरकिनार करते हुए। एक लोकप्रिय उपन्यासकार का यह उपन्यास किसी भूमिगत पर्चे जैसा पढ़ा गया, यही सरकार को सबसे ज़्यादा खटका।
पथेर दाबी बांग्ला पत्रिका बंगबाणी में क़िस्तों में छपा, इससे पहले कि वह किताब बने। किताब के तौर पर वह 31 अगस्त 1926 को आया। उमाप्रसाद मुखर्जी ने छापा, सत्यकिंकर बनर्जी ने कॉटन प्रेस में छापा। साहित्यिक इतिहासकार शांतनु रे चौधरी अपने 27 अप्रैल 2026 के लेख में लिखते हैं कि पहला संस्करण 5,000 प्रतियों का था। वह एक हफ़्ते में बिक गया।
नवंबर 1926 में पुलिस कमिश्नर सर चार्ल्स टेगार्ट ने किताब के आपत्तिजनक हिस्से बंगाल सरकार को भेजे। लेखक और प्रकाशक, दोनों पर मुक़दमा चलाने की सिफ़ारिश की। सरकार ने 4 जनवरी 1927 को किताब पर पाबंदी लगाई, आधार बना धारा 124A, यानी राजद्रोह। प्रतिबंध का असली हथियार 1898 की आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 99A रही, वह प्रावधान जिससे सरकार किसी छपी चीज़ को ज़ब्त घोषित कर सकती थी।
तारीख़ पर एक भ्रम भी मिला, और उसे यहाँ दर्ज करना ज़रूरी है। अंग्रेज़ी विकिपीडिया के एक अंश में पाबंदी की तारीख़ 4 जनवरी 1921 छपी मिली। यह तारीख़ ग़लत है। किताब ख़ुद 1926 में छपी थी। 1921 में उस पर पाबंदी लग ही नहीं सकती थी। इस लेख में इसलिए 1927 वाली तारीख़ रखी गई है, जो शांतनु रे चौधरी के विस्तृत लेख और विकिपीडिया के अपने एक दूसरे पन्ने, दोनों से मेल खाती है।
एक और बात साफ़ नहीं होती। एक स्रोत कहता है लेखक पर मुक़दमा चला। दूसरा सिर्फ़ इतना कहता है कि मुक़दमे की सिफ़ारिश हुई थी। शरतचंद्र ख़ुद अदालत में पेश हुए या नहीं, इसका कोई दर्ज ब्योरा इस डेस्क को नहीं मिला। दोनों बातें इसलिए यहाँ साथ रखी जा रही हैं।
प्रतिबंध बारह साल चला। 16 जनवरी 1939 को शरतचंद्र की पहली पुण्यतिथि पर कोलकाता के अल्बर्ट हॉल में एक सभा हुई, जिसने प्रतिबंध हटाने की माँग रखी। कुछ ही हफ़्तों में बंगाल की फ़ज़लुल हक़ सरकार ने माँग मान ली। प्रतिबंध 1 मार्च 1939 को हटा। किताब का दूसरा संस्करण उसी साल अप्रैल-मई में छपा।
रवींद्रनाथ टैगोर का नाम इस पूरे प्रसंग में बार-बार आता है, अक्सर एक नाटकीय चिट्ठी-लेन-देन की शक्ल में, जहाँ टैगोर किताब को देशद्रोही बताते मिलते हैं। यह क़िस्सा बहुत सुनाया जाता है। इस डेस्क को किसी नामी संकलन में वे चिट्ठियाँ नहीं मिलीं। इसलिए वे यहाँ उद्धृत नहीं की जा रहीं। माधुरिमा सेन अपने लेख में एक नपा-तुला दावा करती हैं, टैगोर ने प्रतिबंध के बाद किताब का समर्थन करने से मना कर दिया था। यह दावा एक नामी, तारीख़दार लेख से आता है। यहाँ उतना ही दर्ज है, जितना सेन ने लिखा।
लोकप्रियता एक चीज़ है, प्रतिष्ठा दूसरी
हिंदी की दर्जनों वेबसाइटों पर एक क़िस्सा मिलता है। शरतचंद्र ने प्रेमचंद को "उपन्यास सम्राट" की उपाधि दी थी, क़िस्सा कहता है। यह हिंदीकुंज से लेकर ज़ी न्यूज़ तक हर जगह दोहराया मिलता है। किसी भी जगह कोई चिट्ठी, कोई तारीख़, कोई लेख नहीं मिलता जहाँ यह बात दर्ज हो। यह ठीक वही जगह है जहाँ हिंदी और बांग्ला के दो सबसे बड़े उपन्यासकारों का रिश्ता दर्ज होना चाहिए था। वहाँ सिर्फ़ एक बिना जड़ की कहावत खड़ी मिलती है।
क्या प्रेमचंद ने शरतचंद्र पर कुछ लिखा? यह सवाल कमीशन का सबसे उम्मीद भरा सुराग़ था। प्रेमचंद ने माधुरी, हंस, जागरण और मर्यादा, चारों पत्रिकाएँ संपादित कीं। इनमें से किसी में शरतचंद्र पर उनका कोई लेख या समीक्षा इस खोज में नहीं मिली।
हिंदी की अपनी आलोचना-परंपरा में भी शरतचंद्र का कोई बड़ा मूल्यांकन दर्ज नहीं मिला। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का इतिहास हिंदी भाषा के साहित्य तक सीमित है, इसलिए वहाँ किसी बांग्ला लेखक का न होना अपने आप में असामान्य नहीं। फिर भी इतना साफ़ दिखता है, जितना बड़ा पाठक-वर्ग शरतचंद्र को हिंदी में मिला, उतना बड़ा कोई हिंदी आलोचनात्मक मूल्यांकन उन्हें दर्ज इतिहास में नहीं मिला।
बंगाल में मान्यता की कमी नहीं थी। राजनीति में भी उनकी जगह थी, वे हावड़ा ज़िला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे, 1921 से 1936 तक। 1936 में ढाका विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में उन्हें मानद डी.लिट. मिली, उसी मंच पर इतिहासकार जदुनाथ सरकार को भी। बंगाल के गवर्नर और विश्वविद्यालय के चांसलर सर जॉन एंडरसन, और वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय, दोनों उस दिन मंच पर मौजूद थे। यह ब्योरा माधुरिमा सेन के लेख की एक तस्वीर के कैप्शन से है।

लोकप्रियता पाठकों ने दी। प्रतिष्ठा संस्थाओं ने दी। हिंदी की आलोचना-परंपरा में इन दोनों में से किसी का दर्ज हिसाब नहीं मिलता।
कॉपीराइट का हिसाब, अनुमान से दस साल पहले ख़त्म
कॉपीराइट अधिनियम 1957 की धारा 22 जब बनी, तब उसने लेखक की मृत्यु के बाद पचास साल तक कॉपीराइट का प्रावधान रखा। गिनती उस साल की 1 जनवरी से शुरू होती थी जो मृत्यु के साल के ठीक बाद आता है। यह प्रावधान सिर्फ़ उन रचनाओं पर लागू होता है जो लेखक के जीते-जी छप गई थीं, और शरतचंद्र की लगभग सारी रचनाएँ 1907 से 1938 के बीच, यानी उनके जीते-जी ही छप चुकी थीं।
शरतचंद्र की मृत्यु 16 जनवरी 1938 को हुई। गिनती 1 जनवरी 1939 से शुरू होती है। पचास साल बाद, यानी 1 जनवरी 1989 को, यह गिनती पूरी होती है।
1992 का संशोधन अधिनियम, अधिनियम संख्या 13, इस पचास साल को साठ साल में बदल देता है। विकिस्रोत पर उपलब्ध उस अधिनियम के अपने पाठ के मुताबिक़, यह संशोधन 28 दिसंबर 1991 से लागू माना गया। यहीं हिसाब पलटता है। शरतचंद्र की पचास साल की अवधि 1 जनवरी 1989 को ही ख़त्म हो चुकी थी। यह संशोधन आने से लगभग तीन साल पहले की बात है।
विकिमीडिया कॉमन्स का भारत-कॉपीराइट पन्ना एक सामान्य नियम देता है। 1941 से पहले मरने वाले लेखकों की रचनाएँ पचास साल में ही सार्वजनिक डोमेन में आ गईं। संशोधन ने उन्हें वापस कॉपीराइट के दायरे में नहीं लौटाया। शरतचंद्र 1938 में मरे, इस सीमा-रेखा से तीन साल पहले।
टैगोर का मामला ठीक उलट है, और इसी वजह से तुलना के लायक़ है। टैगोर की मृत्यु 1941 में हुई। उनकी पचास साल की अवधि 1 जनवरी 1992 को पूरी होनी थी, यानी संशोधन लागू होने के बाद। इसलिए टैगोर की रचनाओं को साठ साल का नया हिसाब मिला। वे सार्वजनिक डोमेन में 2001-02 में गईं, दस साल देर से। शरतचंद्र के मामले में यह देरी नहीं लगी, क्योंकि उनका हिसाब संशोधन से पहले ही बंद हो चुका था।
इस लेख की कमीशन-सामग्री ने अनुमान लगाया था कि शरतचंद्र की रचनाएँ 1 जनवरी 1999 को सार्वजनिक डोमेन में आईं, साठ साल के मौजूदा नियम को सीधे लगाकर। धारा 22 का पुराना पाठ और संशोधन की तारीख़ साथ रखने पर यह अनुमान ग़लत निकलता है। सही तारीख़ 1 जनवरी 1989 बैठती है, दस साल पहले। मतलब यह भी है कि जिस दशक में शरतचंद्र की सस्ती हिंदी किताबें रेलवे स्टेशनों और कॉलेज स्ट्रीट जैसी गलियों में सबसे ज़्यादा बिकी होंगी, उसी दशक के आख़िरी बरसों से कोई भी प्रकाशक बिना अनुमति और बिना रॉयल्टी के वे किताबें छाप सकता था।
डेढ़ सौ साल का बक़ाया
डेढ़ सौ साल पूरे होने पर हिसाब जितना पक्का लगना चाहिए था, उतना नहीं निकला। प्रधानमंत्री की श्रद्धांजलि एक सदी की ग़लत गिनती के साथ छपी। हिंदी में उनके प्रवेश की तारीख़ एक अनुद्धृत वाक्य पर टिकी है। जिन अनुवादकों और प्रकाशकों ने उन्हें हिंदी पाठक तक पहुँचाया, उनका कोई नाम किसी टाइटल पेज पर इस खोज में नहीं मिला। देवदास की तीन शुरुआती फ़िल्मों का कोई सेंसर काग़ज़ नहीं बचा। पथेर दाबी पर मुक़दमा चला या सिर्फ़ सिफ़ारिश हुई, यह भी साफ़ नहीं। प्रेमचंद से उनका रिश्ता एक बिना स्रोत की कहावत में सिमटा मिला।
एक तारीख़ सबसे पक्की मानी जा रही थी, कॉपीराइट ख़त्म होने की तारीख़। हिसाब लगाने पर वह भी एक दशक खिसक गई।
कुछ दरवाज़े अभी बंद ही रहे। नेशनल लाइब्रेरी की सूची, हिंदी साहित्य सम्मेलन के रिकॉर्ड, और पथेर दाबी की असली ज़ब्ती-अधिसूचना, तीनों तक इस डेस्क की पहुँच नहीं बनी। इन्हें खोलना अगली किसी खोज का काम है।
जो नहीं खिसका, वह यह है। किताबें अब भी छपती हैं। अब भी पढ़ी जाती हैं। अब भी फ़िल्मों में लौटती हैं।
बाक़ी हिसाब खुला रहेगा, अगली किसी खोज के लिए।
स्रोतपीआईबी दिल्ली, प्रधानमंत्री कार्यालय, 15 सितंबर 2026, 4:38 PM, हिंदी विज्ञप्ति, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, जन्म-मृत्यु तिथियाँ, हावड़ा कांग्रेस कमेटी, 1919 वाला दावा, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, पथेर दाबी लेख, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, प्रतिबंध से जुड़ा मुक़दमा, शांतनु रे चौधरी, 'The Book That Shook an Empire: Pather Dabi at 100', 27 अप्रैल 2026, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, देवदास 1928, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, देवदास 1935, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, देवदास 1936, माधुरिमा सेन, 'Reading Sarat Chandra at 150, with empathy', द डेली स्टार, 21 सितंबर 2026, इंडियन कानून, कॉपीराइट अधिनियम 1957 की धारा 22 का वर्तमान पाठ, विकिस्रोत, कॉपीराइट संशोधन अधिनियम 1992 का पाठ, प्रवर्तन-तिथि खंड, विकिमीडिया कॉमन्स, भारत में कॉपीराइट अवधि पर मार्गदर्शन, 1941 से पहले मृत्यु वाले लेखकों का नियम, आर्काइव डॉट ओआरजी, बिराज बौ का 1920 का अंग्रेज़ी संस्करण, आर्काइव डॉट ओआरजी / डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ़ इंडिया, बिराज बौ, बांग्ला, 1947 संस्करण, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, सरला देवी चौधुरानी और 'भारती' पत्रिका का संपादन, पाराबास, श्रीजाता गुहा के देवदास अंग्रेज़ी अनुवाद (पेंगुइन, 2002) का ब्योरा, पेंगुइन इंडिया, अरुणा चक्रवर्ती द्वारा अनूदित कृतियों की सूची, श्रीकांत सहित, रिसर्च आउटरीच, शरतचंद्र पर लेख, 'मंदिर' और कुंतलीन पुरस्कार का ब्योरा, ज़ी न्यूज़ हिंदी, प्रेमचंद को शरतचंद्र द्वारा 'उपन्यास सम्राट' कहे जाने के दावे का एक नमूना, बिना स्रोत के