फ़िल्म बनती थी एडिटर की मेज़ पर, नाम छपता था सबसे आख़िर में
मोवीओला, ब्लेड और टेप के दौर में एक कट मतलब एक भौतिक जोड़ था, और उसे खोलना महँगा पड़ता था। फ़िल्मफ़ेयर के अपने छब्बीस बरस के रिकॉर्ड, एक 1951 की सरकारी रिपोर्ट, और एक साफ़ करियर से यह लेख पूछता है कि एडिटर असल में तय क्या करता था।

रमेश सिप्पी ने शोले के लिए क़रीब तीन लाख फ़ुट नेगेटिव फ़िल्म ख़र्च की। यह आँकड़ा फ़िल्म कंपेनियन की रिपोर्ट में दर्ज है। इतनी फ़िल्म को बीस हज़ार फ़ुट से कम में समेटना था। यह काम एडिटर एम. एस. शिंदे का था। वे इसे फ़िल्म की शूटिंग के साथ-साथ कर रहे थे। बंगलौर से रीलें बंबई भेजी जातीं। वहाँ कटतीं। फिर सिप्पी की मंज़ूरी के लिए वापस जातीं।
फिर एक कटौती और आई। यह फ़िल्म बनने के बाद हुई।
साल 1975 था। देश में आपातकाल लगा हुआ था। सेंसर बोर्ड को क्लाइमैक्स पर एतराज़ था। मूल दृश्य में ठाकुर अपने कटे हाथों की जगह पैरों से गब्बर सिंह को मार डालता था। बोर्ड ने कहा कि एक रिटायर्ड पुलिस अफ़सर को क़ानून अपने हाथ में लेते हुए नहीं दिखाया जा सकता। रिलीज़ में गिने-चुने दिन बचे थे। सिप्पी ने बोर्ड से लड़ाई नहीं की। नया क्लाइमैक्स जल्दी में बंगलौर में शूट हुआ। संजीव कुमार को रूस से वापस बुलाया गया। छह मिनट का हिस्सा फ़िल्म से बाहर गया।
यह जो हुआ, वह काग़ज़ पर एक फ़ैसला था। मेज़ पर यह एक भौतिक काम था। नेगेटिव को फिर खोलना पड़ा। नया हिस्सा भीतर बिठाना पड़ा। बाक़ी रील का हिसाब दोबारा मिलाना पड़ा। यह किसी मशीन ने नहीं किया।
एक आदमी ने किया। ब्लेड और टेप के साथ, एक मेज़ पर बैठकर। उसका नाम पर्दे पर सबसे नीचे छपा। किताबों में अक्सर छपा ही नहीं।
यह लेख उसी आदमी के बारे में है। हिंदी सिनेमा के स्टूडियो-दौर में फ़िल्म एडिटर असल में करता क्या था। और उसका नाम इतिहास से बाहर क्यों रह गया।
स्प्लाइसर, वर्कप्रिंट, और एक महँगा जोड़
एडिटर की मेज़ पर दो तरह की फ़िल्म आती थी। एक वर्कप्रिंट, यानी कैमरा नेगेटिव से बना एक सस्ता पॉज़िटिव प्रिंट। असली काटने-जोड़ने का काम इसी पर होता था। दूसरी असली नेगेटिव। इसे तभी छुआ जाता था जब वर्कप्रिंट पर हर फ़ैसला पक्का हो चुका हो।
काटने का औज़ार एक ब्लेड था। देखने का औज़ार एक मशीन थी, जिसे ज़्यादातर मोवीओला कहा जाता था। बाद में फ़्लैटबेड मशीनें भी आईं। दोनों पर तस्वीर और साउंड अलग-अलग पट्टियों पर चलते थे। एडिटर को दोनों को हाथ से मिलाना पड़ता था। जहाँ कट तय होता, वहाँ फ़िल्म को ब्लेड से काटा जाता। दोनों सिरों को एक स्प्लाइसर पर जोड़ा जाता, सीमेंट या टेप से। यह जोड़ एक भौतिक चीज़ थी। इसे देखा जा सकता था। छुआ जा सकता था। और ग़लत होने पर बड़ी मुश्किल से बदला जा सकता था।

फ़िल्म इन्क्वायरी कमिटी की 1951 की रिपोर्ट में इसका सीधा सबूत मिलता है। रिपोर्ट के पैराग्राफ़ 466 में लिखा है, "the most important of these are film phonographs (play-back machine) and editing machines. A large number of these are in use in the studios." यानी 1951 तक ये मशीनें बंबई के हर बड़े स्टूडियो में आम थीं। इतनी आम कि कमिटी उनके देसी निर्माण की सिफ़ारिश कर रही थी। उसी रिपोर्ट का एक सवालनामा निर्माताओं से पूछता है कि वे अपने बजट में किस हिस्से को "editing charges, matching negative and cost of duplicate negative" के नाम रखते हैं। यह वाक्य अकेला बताता है कि एडिटिंग कोई मुफ़्त, बाद का काम नहीं था। नेगेटिव को वर्कप्रिंट के कट के हिसाब से काटना, मिलाना, और ज़रूरत पड़ने पर एक डुप्लीकेट नेगेटिव बनवाना, यह एक अलग, गिना हुआ ख़र्च था।
इसी वजह से एक फ़ैसला बदलना महँगा पड़ता था। आज एक कट पलटने में एक क्लिक लगता है। तब मतलब था नेगेटिव को दोबारा खोलना। पुराना जोड़ हटाना। नया टुकड़ा बिठाना। और फिर पूरी रील का हिसाब नए सिरे से मिलाना। शोले के क्लाइमैक्स ने यही दिखाया। बीस साल बाद भी वही तरीक़ा काम कर रहा था।
फ़िल्मफ़ेयर के छब्बीस बरस, और नमूने की परिभाषा
पुरानी रील का नियम साफ़ है। दस्तावेज़ के बिना दावा नहीं। तो इस लेख का नमूना क्या है, यह पहले बता देना ज़रूरी है।
स्टूडियो-दौर की हर फ़िल्म के शीर्षक-पट पर कौन एडिटर था, यह बड़े पैमाने पर देखना इस रिपोर्ट के लिए संभव नहीं था। जो संभव था, वह फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ संपादन पुरस्कार की अपनी सूची थी। यह सूची 1955 से 1980 तक हर साल एक नाम और एक फ़िल्म दर्ज करती है। छब्बीस बरस, छब्बीस प्रविष्टियाँ। यह एक पत्रिका का पुरस्कार है, किसी गिल्ड का मतदान नहीं। यह फ़र्क़ याद रखने लायक़ है। पर यह एक तारीख़ लगी, प्रकाशित, जाँची जा सकने वाली सूची है। इस लेख में इसे नमूने की तरह लिया गया है, किसी अंतिम सच की तरह नहीं।
सूची से कुछ नाम बार-बार आते हैं। हृषिकेश मुखर्जी तीन बार जीते। जी. जी. मायेकर दो बार जीते। बी. एस. ग्लाड और कमलाकर करखानिस भी दो-दो बार जीते। इसका मतलब यह हुआ कि उस दौर की सबसे चर्चित फ़िल्मों का एक बड़ा हिस्सा गिने-चुने हाथों से गुज़रा।
पर सूची में कुछ नाम अजीब भी हैं। 1965 में सर्वश्रेष्ठ संपादन का पुरस्कार संगम के लिए राज कपूर के नाम दर्ज है। वे उस फ़िल्म के निर्देशक और नायक भी थे। 1971 में यह पुरस्कार जॉनी मेरा नाम के लिए विजय आनंद के नाम है, जो उसके निर्देशक थे। 1973 में शोर के लिए यह मनोज कुमार के नाम है, जो उसके निर्देशक-नायक थे। तीनों बार असली कैंची किसके हाथ में थी, क्रेडिट यह नहीं बताता। क्रेडिट सिर्फ़ यह बताता है कि श्रेय किसे मिला।
यहीं पुरानी रील की सावधानी सच साबित होती है। स्टूडियो-दौर में एडिटिंग का श्रेय भरोसेमंद नहीं है। कभी-कभी यह किसी सुपरवाइज़र के नाम चला जाता था। यहाँ सुपरवाइज़र निर्देशक ख़ुद था। इस लेख में इतना ही कहा जा रहा है, क्रेडिट क्या कहता है, इससे ज़्यादा नहीं।
फ़िल्मफ़ेयर की अपनी सूची में एक और गड़बड़ी है, जो इसी बात को और पुख़्ता करती है। सूची के परिचय में दर्ज है कि पहला पुरस्कार दूसरे फ़िल्मफ़ेयर समारोह में, 1955 में, हृषिकेश मुखर्जी को नौकरी के लिए मिला। पर सूची की अपनी तालिका में यही पुरस्कार तीसरे समारोह, यानी 1956 के आगे दर्ज है, उसी फ़िल्म के लिए। एक ही पन्ने पर दो अलग साल। जो सूची श्रेय का रिकॉर्ड रखने के लिए बनी थी, वह ख़ुद अपने पहले नाम की तारीख़ पर एकमत नहीं है।
बॉम्बे टॉकीज़ से फ़िल्मिस्तान तक, सीखने का एक रास्ता
एडिटर बनने का कोई स्कूल नहीं था। हृषिकेश मुखर्जी ने ख़ुद 2015 में छपे एक साक्षात्कार में यह बात साफ़ कही, "there was no FTII then and we learnt mostly through observing others at work." यह साक्षात्कार शोमा ए. चटर्जी ने लिया था। यह सिलुएट पत्रिका में छपा था।
जो असल स्कूल था, वह किसी स्टूडियो की कटिंग रूम थी। वहाँ सीखने का तरीक़ा एक उस्ताद-शागिर्द का रिश्ता था। बॉम्बे टॉकीज़ में डी. एन. पाई इस रिश्ते के केंद्र में थे। उन्होंने अछूत कन्या (1936) से लेकर कमाल अमरोही की पाकीज़ा (1971) तक फ़िल्में काटीं। बाद में वे शशधर मुखर्जी के साथ फ़िल्मिस्तान चले गए। वहाँ उन्होंने वो कौन थी (1964), गुमनाम (1965) और पड़ोसन (1968) को आकार दिया।
वामन भोंसले 1952 में उन्हीं डी. एन. पाई की निगरानी में बॉम्बे टॉकीज़ पहुँचे। छह महीने उनके साथ रहे। फिर उन्हें फ़िल्मिस्तान भेज दिया गया, सहायक एडिटर की तरह। वहाँ उन्होंने बारह बरस बिताए। तब जाकर उन्हें अपने नाम की पहली फ़िल्म मिली, राज खोसला की दो रास्ते (1969)। यह लंबा रास्ता था। इसमें कोई डिग्री नहीं थी, सिर्फ़ बारह बरस का अभ्यास।

यह छह महीने की शुरुआती अवधि किसी संयोग से नहीं आई। 1951 की फ़िल्म इन्क्वायरी कमिटी की रिपोर्ट ने ख़ुद यह सुझाया था। रिपोर्ट के पैराग्राफ़ 604 में दर्ज है कि साहित्यिक कामगारों की तरह फ़िल्म एडिटरों के लिए भी छह महीने की बुनियादी ट्रेनिंग पर्याप्त होगी। निर्देशकों के लिए दो साल का कोर्स चाहिए था। यानी जिस पेशे को उद्योग का सबसे कम समय में सीखा जाने वाला हुनर माना गया, वही पेशा आगे चलकर फ़िल्म को उसका आख़िरी आकार देता था।
भोंसले का बारह बरस का अभ्यास आगे चलकर एक सरकारी मान्यता में बदला। उन्होंने इनकार (1977) के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार का सर्वश्रेष्ठ संपादन सम्मान जीता। यह फ़िल्मफ़ेयर से अलग रिकॉर्ड है। यह किसी पत्रिका का नहीं, भारत सरकार का अपना पुरस्कार है, और यह श्रेणी ख़ुद 1976 में शुरू हुई थी।
उसी रिपोर्ट के पैराग्राफ़ 216 में एक और वाक्य है, जो इस पूरे लेख की बुनियाद है। लैबोरेटरी वर्कर और एडिटर के बारे में कमिटी लिखती है, "the interest of the average laboratory worker and editor has not extended much beyond the credit title." यानी औसत एडिटर की दिलचस्पी श्रेय-पट्टी पर अपने नाम से आगे कभी नहीं बढ़ पाई। यह किसी नाराज़ एडिटर की शिकायत नहीं है। यह भारत सरकार की अपनी कमिटी का 1951 का अवलोकन है। फ़िल्म बनने के महज़ चालीस बरस बाद।
पेस, गाने की आमद, और काटा गया दृश्य
एडिटर की मेज़ पर जो तय होता, वह सिर्फ़ यह नहीं था कि कौन-सा शॉट कहाँ लगे। पेस तय होती थी, यानी कोई सीन कितनी देर टिके। किसी की प्रतिक्रिया कितने फ़्रेम तक स्क्रीन पर रहे, यह भी तय होता था। कोई गाना सीन में कब घुसे और कब निकले, यह तय होता था। और यह भी तय होता था कि कोई सीन असल में फ़िल्म में रहे भी या नहीं।
हृषिकेश मुखर्जी के काम को क़रीब से देखने वालों ने संगीत के साथ उनके कटों को ख़ास तौर पर नोट किया है। समीक्षक अंतरा नंदा मोंडल ने 2013 में सिलुएट में लिखा कि उनके शॉट अक्सर धुन की "सम" पर कटते थे, बीच के किसी बीट पर नहीं। यह एक समीक्षक का अवलोकन है। मुखर्जी का अपना बयान नहीं। यह फ़र्क़ यहाँ साफ़ रखा जा रहा है। पर अवलोकन ख़ुद बताता है कि गाने की एडिटिंग महज़ तकनीकी काम नहीं थी। इसमें संगीत की समझ चाहिए थी। ठीक वैसे ही जैसे कैमरे की समझ चाहिए थी।
स्टूडियो का शेड्यूल इन फ़ैसलों को घेरे रखता था। एक फ़िल्म की रिलीज़ तारीख़ पहले से तय होती। बुकिंग हो चुकी होती। एडिटर के पास वर्कप्रिंट पर बैठने के लिए हफ़्तों का हिसाब होता, महीनों का नहीं। इसी दबाव में यह तय करना पड़ता था कि कौन-सा टेक रखा जाए, कौन-सा सीन छोटा हो, और कौन-सा हिस्सा पूरी तरह हटा दिया जाए।
गाता रहे मेरा दिल, फ़िल्म बनने के बाद जुड़ा गीत
पुरानी रील का यह सिलसिला एक सीक्वेंस को कट दर कट देखने के लिए कहता है। सबसे साफ़ मामला किसी गाने का सीन में घुसना है। गाइड (1965) का गाता रहे मेरा दिल इसके लिए सबसे भरोसेमंद उदाहरण है। इसका सबूत ख़ुद फ़िल्मकार की ज़बान से मिलता है, अनुमान से नहीं।
गाइड के शीर्षक-पट पर एडिटर के तौर पर दो नाम दर्ज हैं, विजय आनंद और बाबू शेख़। विजय आनंद उसके निर्देशक भी थे। 2016 में सिलुएट में एक साक्षात्कार छपा। पत्रकार पीयूष शर्मा ने सवाल पूछा था। विजय आनंद ने ख़ुद माना कि यह गाना फ़िल्म की बाक़ी शूटिंग पूरी होने के बाद फ़िल्माया गया। उनके अपने अंग्रेज़ी शब्द थे, "well, you seem to have caught me." उन्होंने आगे बताया कि यह गाना फ़िल्म पूरी होने के बाद जोड़ा गया, जैसे पैबंद लगाया गया हो।
इसका मतलब यह हुआ कि जिस वक़्त यह गाना शूट होकर आया, फ़िल्म का बाक़ी हिस्सा वर्कप्रिंट पर पहले से एक शक्ल ले चुका था। नया हिस्सा भीतर बिठाने के लिए मौजूदा जोड़ों को दोबारा खोलना पड़ा होगा। आस-पास के सीन की लंबाई नए सिरे से नापनी पड़ी होगी। कहानी में यह गाना उस हिस्से में आता है जहाँ रोज़ी अपना गायन-नृत्य का करियर शुरू करती है, यह विकिपीडिया के प्लॉट-विवरण में दर्ज है। इससे आगे किस ठीक शॉट के बाद यह गाना कटा, और किस शॉट पर वापस कहानी में लौटा, इसका कोई प्रकाशित, शॉट-दर-शॉट विवरण इस रिपोर्ट के लिए नहीं मिल सका। फ़िल्म को दोबारा देखे बिना यह दावा नहीं किया जा रहा।
जो दावा किया जा रहा है, वह इतना है। यह गाना एक बाद में हुआ संपादन-निर्णय था, न कि शुरू से लिखी योजना का हिस्सा। यह ख़ुद फ़िल्मकार के अपने शब्दों से स्थापित तथ्य है। बाक़ी विश्लेषण अनुमान होता। इस सिलसिले में अनुमान की जगह नहीं है।
स्टूडियो का समय, और सेंसर की देर से चलने वाली क़ैंची
शोले पर लौटना यहाँ ज़रूरी है। यह उन दुर्लभ मामलों में से एक है जहाँ "क्या काटा गया" कोई अफ़वाह नहीं, बल्कि एक जाँचा जा सकने वाला तथ्य है।
फ़िल्म कंपेनियन की रिपोर्ट के मुताबिक़ मूल क्लाइमैक्स में ठाकुर बलदेव सिंह अपने पैरों की कीलों से गब्बर सिंह को मार डालता था। उसके अपने हाथ गब्बर ने काट दिए थे। आपातकाल के दौर के सेंसर बोर्ड ने इसे बहुत हिंसक बताकर रोक दिया। एक और आपत्ति यह थी कि एक रिटायर्ड पुलिस अफ़सर को क़ानून अपने हाथ में लेते दिखाना ठीक नहीं। रिलीज़ में कुछ ही दिन बचे थे। रमेश सिप्पी ने बोर्ड से लड़ने के बजाय समझौता चुना। नया क्लाइमैक्स बंगलौर में जल्दी में शूट हुआ। संजीव कुमार को इसके लिए रूस से वापस बुलाया गया।

यह पूरी कहानी दशकों तक सिर्फ़ बताई जाती रही। किसी ने नहीं दिखाया कि हटाया गया हिस्सा असल में मौजूद भी है या नहीं। यह बदल गया। फ़िल्म हेरिटेज फ़ाउंडेशन ने सिप्पी फ़िल्म्स के साथ मिलकर शोले की एक 4K बहाली तैयार की, शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर की अगुआई में, बोलोन्या की लाबोरेटरी एल'इम्माजिने रित्रोवाता के साथ। द फ़ेडरल की रिपोर्ट के मुताबिक़ इस बहाली में लगभग छह मिनट का वह हिस्सा वापस जोड़ा गया जो सेंसर बोर्ड के आदेश पर हटाया गया था। इसमें मूल क्लाइमैक्स भी शामिल है। पूरी बहाल फ़िल्म तीन घंटे चौबीस मिनट की बैठती है। यह प्रिंट 6 सितंबर 2025 को टोरंटो के अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में, रॉय थॉमसन हॉल में, पहली बार दिखाया गया।
यही वह शर्त है जो पुरानी रील की सावधानी पूरी करती है। किसी फ़िल्म से क्या काटा गया, यह तभी लिखा जा सकता है जब कोई सेंसर रिकॉर्ड, कोई स्क्रिप्ट या कोई बचा हुआ लंबा हिस्सा इसे स्थापित करे। यहाँ वह बचा हुआ हिस्सा ख़ुद मौजूद निकला। तीस साल बाद नहीं, पचास साल बाद। और एक सिनेमा हॉल में दिखाया गया। इसलिए यहाँ यह लिखना अनुमान नहीं, दस्तावेज़ है।
इस पूरे प्रकरण में एडिटर की भूमिका को भी ग़लत मत समझिए। एम. एस. शिंदे ने फ़िल्म को शूटिंग के साथ-साथ तीन लाख फ़ुट से बीस हज़ार फ़ुट से कम में समेटा। यह पहला काम था। सेंसर बोर्ड के आदेश के बाद छह मिनट का दूसरा हटाव आया, फ़िल्म पूरी बनने के बाद। दोनों अलग घटनाएँ थीं। दोनों में मेज़ पर बैठकर नेगेटिव को फिर से खोलने का वही भौतिक काम दोहराया गया।
एडिटर जब निर्देशक बना
इस लेख की शुरुआत में एक दावा किया गया था। हिंदी सिनेमा के कई निर्देशक कटिंग रूम से आए, और यही इस बात का सबसे मज़बूत सबूत है कि फ़िल्म कटिंग रूम में समझी जाती है। इस दावे को सावधानी से जाँचने पर एक साफ़ मामला मिलता है। उसके साथ एक अलग, पर जुड़ा हुआ पैटर्न भी मिलता है।
साफ़ मामला हृषिकेश मुखर्जी का है। उन्होंने कलकत्ता के न्यू थिएटर्स में संपादन सीखा, सुबोध मित्तर के साथ, जिन्हें "केंचीदा" कहा जाता था। 1951 में वे बंबई आए। बिमल रॉय के साथ काम करने लगे, एडिटर और सहायक निर्देशक दोनों की भूमिका में। दो बीघा ज़मीन (1953), परिणीता (1953) और मधुमती (1958) उनकी कैंची से गुज़रीं। देवदास (1955) में उनका नाम सह-संपादक के तौर पर दर्ज है। 1957 में उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म ख़ुद निर्देशित की, मुसाफ़िर, तीन कहानियों वाली एक फ़िल्म, जिसकी पटकथा पर ऋत्विक घटक ने भी काम किया।
निर्देशक बनने के बाद भी वे एडिटर का काम पूरी तरह नहीं छोड़ पाए। शायद छोड़ना नहीं चाहते थे। 1961 में आई गंगा जमुना के शीर्षक-पट पर एडिटर के तौर पर दो नाम हैं, दास ढैमाडे और हृषिकेश मुखर्जी। फ़िल्म का निर्देशन नितिन बोस के नाम दर्ज है। दिलीप कुमार ने बाद में यह दावा किया कि इस फ़िल्म का निर्देशन और संपादन दोनों असल में उन्होंने ख़ुद किया था। यह दिलीप कुमार का अपना बयान है। कोई दस्तावेज़ी सबूत नहीं। इसे उसी तरह दर्ज किया जाना चाहिए।
मुखर्जी ने फ़िल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ संपादन पुरस्कार तीन बार जीता, 1956 में नौकरी के लिए, 1959 में मधुमती के लिए, और 1972 में आनंद के लिए। यह सोलह बरस का फ़ासला है। इसी सोलह बरस में वे हिंदी सिनेमा के सबसे सम्मानित निर्देशकों में गिने जाने लगे थे। 1999 में उन्हें दादासाहेब फालके पुरस्कार मिला, भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा सम्मान। जिस कटिंग रूम से उन्होंने शुरुआत की थी, उसका ज़िक्र उस पुरस्कार की किसी भी सूची में अलग से नहीं आता।
इससे अलग, पर जुड़ा हुआ पैटर्न राज कपूर और विजय आनंद का है। इन्होंने कटिंग रूम से करियर शुरू नहीं किया। ये पहले से निर्देशक-अभिनेता थे। पर दोनों ने अपनी ही फ़िल्मों पर एडिटर का श्रेय रखा, संगम (1964) और जॉनी मेरा नाम (1971) से लेकर आगे तक। आर.के. फ़िल्म्स में यह बदलाव साफ़ देखा जा सकता है। जी. जी. मायेकर ने आवारा (1951), श्री 420 (1955), बूट पॉलिश (1954) और जागते रहो (1956) को काटा। संगम से आगे यह श्रेय राज कपूर के अपने नाम चला गया। एक करियर एडिटर से एक निर्देशक-अपना-एडिटर तक, यही वह बदलाव है जिसे क्रेडिट अकेला ठीक से नहीं बताता।
इस रिपोर्ट की सीमाएँ
तीन बातें यहाँ खुली छोड़ी जा रही हैं।
एक, एनएफ़एआई में बची संपादन-स्क्रिप्ट और कट-लिस्ट का ज़िक्र स्लेट में है। यह रिपोर्ट सिर्फ़ इतना पुष्ट कर सकी कि एनएफ़एआई के पास सेंसर बोर्ड से मिली इकतीस हज़ार फ़िल्म-स्क्रिप्ट का एक संग्रह है। एडिटरों की अपनी कंटिन्यूइटी शीट का कोई अलग, नामित संग्रह स्वतंत्र रूप से नहीं मिल सका।
दो, शोले की नेगेटिव लंबाई पर स्रोत एक-मत नहीं हैं। फ़िल्म कंपेनियन बीस हज़ार फ़ुट से कम लिखता है। शिंदे की अपनी जीवनी अठारह हज़ार फ़ुट बताती है। दोनों आँकड़े यहाँ इसी फ़र्क़ के साथ दर्ज हैं।
तीन, जहाँ फ़िल्मफ़ेयर के क्रेडिट में एडिटर की जगह निर्देशक या निर्माता का नाम है, वहाँ असली कैंची किसके हाथ में थी, यह इस रिपोर्ट का दावा नहीं है। क्रेडिट जो कहता है, यह लेख उतना ही दोहराता है।
बाक़ी साफ़ है। हृषिकेश मुखर्जी की मेज़ से एम. एस. शिंदे की मेज़ तक, फ़िल्म का आख़िरी आकार उसी कमरे में तय होता था, जहाँ किसी का नाम श्रेय-पट्टी पर सबसे नीचे छपता था।
स्रोतभारत सरकार, फ़िल्म इन्क्वायरी कमिटी की रिपोर्ट, 1951, पैराग्राफ़ 215-217, 466, 604, फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संपादन पुरस्कार, वर्षवार सूची, हृषिकेश मुखर्जी, जीवनी और फ़िल्मोग्राफ़ी, शोमा ए. चटर्जी, Hrishikesh Mukherjee: From Editor to Director, सिलुएट, 30 सितंबर 2015, अंतरा नंदा मोंडल, Hrishikesh Mukherjee: In a Genre of His Own, सिलुएट, 12 सितंबर 2013, पीयूष शर्मा, विजय आनंद का साक्षात्कार, सिलुएट, 22 जनवरी 2016, गाइड (1965), श्रेय-सूची, एम. एस. शिंदे, जीवनी, वामन भोंसले, जीवनी, सिनेमाज़ी, डी. एन. पाई की प्रोफ़ाइल, फ़िल्म कंपेनियन, शोले पर तथ्य, द फ़ेडरल, शोले की 4K बहाली पर रिपोर्ट, इंडिया टीवी, टोरंटो फ़िल्म समारोह में शोले के 4K प्रीमियर पर रिपोर्ट, तारीख़ और रॉय थॉमसन हॉल का ज़िक्र