भारत पन्ना
पुरानी रील

देश ने पहली बार जिस फ़िल्म को सबसे अच्छा कहा, उस समारोह की पुस्तिका में तीन पदक छपे थे और दिए दो गए

10 अक्तूबर 1954 की शाम राष्ट्रपति ने श्यामची आई को पहला स्वर्ण पदक दिया। उसी शाम बँटी उन्नीस पन्ने की सरकारी पुस्तिका आज भी पढ़ी जा सकती है, और वह समारोह की जगह से लेकर छायाकार के नाम तक कई बातें तय करती है जो आज उलटी छपी मिलती हैं।

राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला, नई दिल्ली की आज की इमारत, नाम प्रवेश-द्वार पर हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में लिखा मिलता है, और 1954 का पदक-समारोह विज्ञान भवन में नहीं, इसी सभागार में हुआ था।
तस्वीर: Shishirdasika, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

10 अक्तूबर 1954, शाम पाँच बजे। दिल्ली में राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला के सभागार में राष्ट्रगान बजा। उसके बाद सूचना तथा प्रसारण मंत्री डॉ. बी. वी. केसकर बोले, फिर मंगलदास पकवासा ने अपनी समिति के काम की रिपोर्ट रखी, फिर राष्ट्रपति का भाषण हुआ, और उसके बाद राष्ट्रपति ने पदक और प्रमाणपत्र बाँटे।

यह क्रम किसी की याद से नहीं आ रहा। यह उस शाम बँटी पुस्तिका में छपा है।

पुस्तिका उन्नीस पन्ने की है। नाम है State Awards for Films 1954, छापने वाला भारत सरकार का सूचना तथा प्रसारण मंत्रालय, और मुखपृष्ठ पर राजचिह्न। उसी शाम भारत सरकार ने पहली बार किसी फ़िल्म को देश की सबसे अच्छी फ़िल्म कहा। फ़िल्म मराठी थी, नाम श्यामची आई, निर्माता और निर्देशक प्रल्हाद केशव अत्रे।

बहत्तर साल बाद, 20 सितंबर 2026 को दोपहर 12:54 बजे, पत्र सूचना कार्यालय ने इन्हीं पुरस्कारों पर एक पृष्ठभूमि-दस्तावेज़ जारी किया। उसमें लिखा है कि पहले संस्करण में "केवल सात सम्मान" दिए गए। यह संख्या पुस्तिका से मिलती है। पुस्तिका में उन सातों को गिना जा सकता है, और उनके साथ एक आठवाँ पदक भी छपा है, जो किसी को नहीं दिया गया।

उन्नीस पन्ने, और उन पर छपा एक कार्यक्रम

पुस्तिका का दूसरा पन्ना सबसे ज़्यादा काम का है। ऊपर तारीख़ छपी है, October 10, 1954। उसके नीचे देवनागरी में नाट्यशास्त्र का एक श्लोक है, और उसके साथ अंग्रेज़ी में उसका भावानुवाद, जिसके नीचे स्रोत के तौर पर लिखा है Bharata's Natyashastra। उस अनुवाद की एक पंक्ति है, "The function of drama is to instruct the masses, educate the intellect"। नाटक का काम जनता को सिखाना और बुद्धि को शिक्षित करना है। 1954 में भारत सरकार ने फ़िल्म पुरस्कार की पुस्तिका इसी वाक्य से शुरू की। पन्नों की जो गिनती इस रिपोर्ट में दी जा रही है, वह स्कैन की गई प्रति की है।

उसी पन्ने पर, सबसे नीचे, सात नाम हैं। शीर्षक है Central Commitee of Awards, और पुस्तिका में Committee की यही वर्तनी छपी है।

कार्यक्रम पुस्तिका के बीच में, दो पन्नों पर फैला हुआ है। 10 अक्तूबर को शाम पाँच बजे पदक-वितरण, आठ मदों में। उनमें पाँचवीं मद है राष्ट्रपति के हाथों पदक और प्रमाणपत्रों का वितरण, छठी मद फ़िल्म उद्योग की ओर से धन्यवाद, सातवीं मद पुरस्कृत वृत्तचित्र का प्रदर्शन। फिर मध्यांतर, और उसके बाद पुरस्कृत फ़ीचर फ़िल्म का प्रदर्शन।

अगली सुबह साढ़े आठ बजे का कार्यक्रम अलग था। फ़िल्म्स डिवीज़न के सभागार में "CHILDREN'S FILMS" पर एक संगोष्ठी, अध्यक्षता आर. आर. दिवाकर की। प्रतिभागियों की सूची में पी. के. अत्रे का नाम है। जिस फ़िल्म को एक शाम पहले सबसे बड़ा पदक मिला था, उसके निर्माता-निर्देशक अगली सुबह बाल फ़िल्मों की बहस में शामिल थे। उसी दिन शाम साढ़े पाँच बजे राष्ट्रपति भवन में मंत्री की ओर से स्वागत-समारोह था।

1949 की कमेटी की सिफ़ारिश, और 1954 में उसका एक हिस्सा

पीआईबी का दस्तावेज़ कहता है कि 1949 में गठित फ़िल्म इन्क्वायरी कमिटी ने "फिल्मों के लिए राज्य पुरस्कारों" की शुरुआत करने की सिफ़ारिश की थी। 1954 की पुस्तिका भी यही कहती है। दोनों सही हैं, और दोनों अधूरे हैं।

कमेटी की रिपोर्ट पढ़ी जा सकती है। उसके पहले अध्याय में गठन का प्रस्ताव पूरा छपा है: सूचना तथा प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली, 29 अगस्त 1949। अध्यक्ष थे संविधान सभा के सदस्य एस. के. पाटिल। सदस्यों में एम. सत्यनारायण, राजकमल कलामंदिर के वी. शांताराम, न्यू थिएटर्स के बी. एन. सरकार, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रमुख डॉ. आर. पी. त्रिपाठी, और आई.सी.एस. अधिकारी वी. शंकर थे। यानी जिस समिति ने फ़िल्म पुरस्कार माँगे, उसमें दो स्टूडियो के लोग बैठे थे।

सिफ़ारिश रिपोर्ट के पैराग्राफ़ 534 में है। वहाँ कमेटी एक फ़िल्म काउंसिल बनाने का प्रस्ताव रखती है और उसके काम गिनाती है। पुरस्कार उस सूची में (h) है: "Award of annual prizes for the best picture, best acting, best technical effort, best review, best book on film art, best film story, etc."

इस वाक्य को धीरे पढ़िए। कमेटी ने छह चीज़ों के लिए पुरस्कार माँगे थे। 1954 में सिर्फ़ पहली चीज़ के लिए पुरस्कार दिया गया। अभिनय के लिए अलग पुरस्कार 1967 की फ़िल्मों से शुरू हुए, और पीआईबी के अपने दस्तावेज़ के मुताबिक़ पहले विजेता उत्तम कुमार और नरगिस थे, 1968 में। सिनेमा पर लेखन का वर्ग उसके भी बाद आया। और जिस फ़िल्म काउंसिल को यह सब करना था, वह बनी ही नहीं; पुरस्कार मंत्रालय ने सीधे दिए, और पीआईबी के अनुसार 1973 में फ़िल्म महोत्सव निदेशालय ने यह ज़िम्मा लिया।

एक और बात जो कमेटी की रिपोर्ट से निकलती है। जिस आर. आर. दिवाकर ने 1954 में बाल फ़िल्मों की संगोष्ठी की अध्यक्षता की, वही 26 मार्च 1949 को संविधान सभा (विधायी) में बजट बहस के दौरान इस जाँच का ऐलान कर चुके थे। उनके शब्द रिपोर्ट में दर्ज हैं: "a thorough enquiry in this country is overdue"।

सात सदस्यों की केंद्रीय पुरस्कार समिति

पुस्तिका के दूसरे पन्ने पर छपे सात नाम ये हैं: श्री मंगलदास पकवासा (अध्यक्ष), श्रीमती कमलादेवी चट्टोपाध्याय, डॉ. कालिदास नाग, प्रोफ़ेसर आर. डी. सिन्हा दिनकर, श्री बी. डी. मीरचंदानी आई.सी.एस., श्री सी. वी. देसाई और श्री एस. ए. अय्यर।

चौथा नाम रुककर पढ़ने लायक़ है। प्रोफ़ेसर आर. डी. सिन्हा दिनकर, यानी रामधारी सिंह दिनकर, जिनका पूरा नाम अंग्रेज़ी विकिपीडिया के जूरी-खंड में भी दर्ज है। हिंदी के कवि। 1954 में भारत सरकार ने जिस समिति से देश की सबसे अच्छी फ़िल्म चुनवाई, उसमें एक हिंदी कवि बैठा था, और जो फ़िल्म चुनी गई वह मराठी थी।

बाक़ी छह भी फ़िल्म वाले नहीं थे। मंगलदास पकवासा (1882 से 1968) स्वतंत्रता सेनानी थे और आज़ाद भारत के पहले पाँच राज्यपालों में एक; वे मध्य प्रदेश, बंबई और मैसूर के राज्यपाल रहे, और 1953 से भारत स्काउट्स ऐंड गाइड्स के पहले अध्यक्ष। कमलादेवी चट्टोपाध्याय समाज-सुधारक थीं, जिनका काम हस्तशिल्प, हथकरघा और रंगमंच का था। कालिदास नाग इतिहासकार और लेखक थे, 1952 में राज्यसभा के लिए नामित। एस. ए. अय्यर 1943 से 1945 तक सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद सरकार में प्रचार मंत्री रह चुके थे। बी. डी. मीरचंदानी के नाम के साथ पुस्तिका में आई.सी.एस. लिखा है।

एक साहित्यकार, एक इतिहासकार, एक समाज-सुधारक, एक पूर्व राज्यपाल, एक आई.सी.एस. अधिकारी और आज़ाद हिंद सरकार का एक पूर्व मंत्री। यही वह जूरी थी। भारतीय सिनेमा में काम करने वाला उसमें कोई नहीं था। यह चूक नहीं थी, यह उस समय की सोच थी: फ़िल्म को संस्कृति के खाते में रखा गया था, उद्योग के खाते में नहीं, और पुस्तिका का नाट्यशास्त्र वाला पहला पन्ना इसी सोच का ऐलान है।

पुस्तिका के श्रेय और आज के रिकॉर्ड का फ़र्क़

पुस्तिका के तेरहवें पन्ने पर Award Films शुरू होते हैं, और पहला श्रेय-खंड श्यामची आई का है। वह पूरा यह है: कहानी साने गुरुजी, पटकथा आचार्य अत्रे, संगीत वसंत देसाई, कैमरा आर. एम. रेले, ध्वनि नायर, गीत पी. के. अत्रे और प्रोफ़ेसर वी. बापट, संपादन नारायण राव, और कलाकार वनमाला, माधव वझे, बाबूराव पेंढारकर, सुमति गुप्ते तथा सरस्वती बोडस।

पुस्तिका निर्माण संस्था का नाम नहीं देती। वह इतना कहती है कि फ़िल्म का निर्माण और निर्देशन श्री पी. के. अत्रे ने किया। अत्रे पिक्चर्स का नाम इंडियनसिने.मा और मराठी विश्वकोश देते हैं, और भारत के अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह की गाइड भी अत्रे को इसी स्टूडियो का संस्थापक बताती है, जिसने परिंदे (1945), ही माझी लक्ष्मी (1951) और महात्मा फुले (1954) भी बनाईं।

पुस्तिका फ़िल्म को पढ़ती भी है, और उसके शब्द 1954 की सरकारी नज़र का सबसे सीधा नमूना हैं। वह लिखती है कि श्यामची आई "is a story of how a Hindu child was trained by his mother in the cultural atmosphere of his family", और कि "The message of the film is that it is the home that is really the place of education." आगे वह जोड़ती है कि फ़िल्म ज़ोर स्कूल से हटाकर घर पर ले जाती है। यह समीक्षा नहीं है। यह एक सरकारी पुस्तिका का उस फ़िल्म को पढ़ने का तरीक़ा है जिसे उसी सरकार ने अभी-अभी देश की सबसे अच्छी फ़िल्म कहा था, और वह पढ़ना शिक्षा और संस्कार के खाने में है, सिनेमा के खाने में नहीं।

अब श्रेय-खंड को आज के रिकॉर्ड से मिलाइए।

छायाकार का नाम अंग्रेज़ी विकिपीडिया पर सी. एम. रेले लिखा है, बिना किसी स्रोत के। 1954 की सरकारी पुस्तिका में आर. एम. रेले है। राष्ट्रीय फ़िल्म संग्रहालय की जो प्रविष्टि गूगल आर्ट्स ऐंड कल्चर पर है, उसमें आर. एम. रेले है। एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ इंडियन सिनेमा पर आधारित इंडियनसिने.मा में आर. एम. रेले है। भारत के अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह की अपनी फ़िल्म गाइड में भी आर. एम. रेले है। चार रिकॉर्ड एक तरफ़, एक बिना स्रोत की प्रविष्टि दूसरी तरफ़। दोनों नाम चल रहे हैं, और दस्तावेज़ एक ही तरफ़ है।

गीतकारों पर रिकॉर्ड सचमुच आपस में लड़ते हैं। पुस्तिका दो नाम देती है, अत्रे और वी. बापट। संग्रहालय की प्रविष्टि तीन देती है, अत्रे, वसंत बापट और राजकवि यशवंत। महाराष्ट्र राज्य के मराठी विश्वकोश की प्रविष्टि भी तीन देती है, वही तीन। मराठी विकिपीडिया के सूचना-बॉक्स में सिर्फ़ वसंत बापट हैं। यह फ़र्क़ सुलझा हुआ नहीं है और यहाँ सुलझाया नहीं जा रहा।

कलाकारों की सूची में भी यही हाल है। पुस्तिका पाँच नाम देती है और उनमें दामूअण्णा जोशी नहीं हैं, जबकि संग्रहालय की प्रविष्टि, विश्वकोश और अंग्रेज़ी विकिपीडिया उन्हें साने गुरुजी की भूमिका में गिनते हैं; मराठी विकिपीडिया उन्हें प्रमुख कलाकारों में रखता है, भूमिका बताए बिना। विश्वकोश शंकर कुलकर्णी को श्याम के पिता की भूमिका में जोड़ता है, और वह नाम पुस्तिका में नहीं है।

अवधि पर भी दो आँकड़े हैं। विकिपीडिया और इंडियनसिने.मा दोनों 152 मिनट देते हैं। भारत के अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह की फ़िल्म गाइड, जो 2023 में दिखाई गई बहाल प्रति का ब्योरा है, 138 मिनट देती है। चौदह मिनट का अंतर है।

पुरस्कार का नाम भी दो हो गया है। 1954 की पुस्तिका में वह President's Gold Medal for the All-India Best Feature Film है। पीआईबी का 2026 का दस्तावेज़ भी यही नाम हिंदी में देता है। अंग्रेज़ी विकिपीडिया के फ़िल्म-पन्ने की पहली पंक्ति में लिखा है कि फ़िल्म ने "won the Golden Lotus Award for Best Film at the National Film Awards in 1954", और उस वाक्य के लिए स्रोत यही 1954 की पुस्तिका दी गई है। पुस्तिका में Golden Lotus कहीं नहीं छपा। उसी विकिपीडिया पन्ने का पुरस्कार-खंड, कुछ इंच नीचे, सही नाम देता है। स्वर्ण कमल बाद का नाम है, उस शाम का नहीं।

बाल फ़िल्मों का पदक, बनकर तैयार और बिना विजेता

पुस्तिका में तीन पदकों की तस्वीरें हैं, हर एक पूरे पन्ने पर। पाँचवें पन्ने पर PRESIDENT'S GOLD MEDAL FOR THE BEST ALL-INDIA FEATURE FILM। नौवें पन्ने पर PRESIDENT'S GOLD MEDAL FOR THE BEST DOCUMENTARY FILM। और बारहवें पन्ने पर PRIME MINISTER'S GOLD MEDAL FOR THE BEST CHILDRENS' FILM, जिसके गोल हिस्से पर देवनागरी में लिखावट है।

तीसरा पदक बनकर तैयार था। उसकी तस्वीर खिंच चुकी थी। वह किसी को नहीं दिया गया।

यह पहले विश्व युद्ध का एक विजय-पदक है, फ़ीता सहित, किसी नीलामी घर के संग्रह की तस्वीर। यह 1954 वाला पदक नहीं है, पर बना और फ़ीते से लटका पदक ऐसा ही दिखता है।
तस्वीर: Spink & Son Ltd., विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 4.0

यह बात पुस्तिका ख़ुद बताती है, सत्रहवें पन्ने पर, एक कोष्ठक में: "(None of the entries in the Children's film section was felt by the Central Committee of Awards to be of a high enough standard for the award of the Prime Minister's Gold Medal)."

उस वर्ग में एक सम्मान फिर भी गया। बंगाली फ़िल्म खेलाघर को, जिसे अरोरा फ़िल्म्स ने बनाया था, बाल फ़िल्म वर्ग का प्रमाणपत्र मिला। अगली सुबह की संगोष्ठी का विषय यही था। सरकार ने एक श्रेणी घोषित की, उसका पदक ढलवाया, उसकी प्रविष्टियाँ मँगवाईं, और फिर अपनी ही समिति से सुन लिया कि कोई प्रविष्टि इस लायक़ नहीं है।

सात सम्मानों की पूरी सूची पुस्तिका में यह है: श्यामची आई को फ़ीचर फ़िल्म का स्वर्ण पदक; दो बीघा ज़मीन और भगवान श्री कृष्ण चैतन्य को फ़ीचर वर्ग के प्रमाणपत्र; महाबलीपुरम को वृत्तचित्र का स्वर्ण पदक; होली हिमालयाज़ और ट्री ऑफ़ वेल्थ को वृत्तचित्र वर्ग के प्रमाणपत्र; और खेलाघर को बाल फ़िल्म का प्रमाणपत्र। सात। पीआईबी का 2026 का दस्तावेज़ भी यही संख्या देता है, पर आठवें पदक का ज़िक्र उसमें नहीं है।

समारोह की जगह: राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला का सभागार

पुस्तिका का कार्यक्रम-पन्ना समारोह-स्थल का नाम छापता है: National Physical Laboratory Auditorium।

अंग्रेज़ी विकिपीडिया का "1st National Film Awards" पन्ना कहता है कि समारोह विज्ञान भवन, नई दिल्ली में हुआ था। उस दावे के लिए उसने जो स्रोत दिया है, वह यही 1954 की पुस्तिका है, फ़िल्म समारोह निदेशालय की वेबसाइट से।

विज्ञान भवन उस शाम था ही नहीं। उसी विकिपीडिया के अपने पन्ने के मुताबिक़ यह इमारत 1956 में बनी और उसका नक़्शा 1955 में केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के आर. पी. गहलोत ने बनाया था। दो साल का फ़र्क़ है।

यह छोटी ग़लती नहीं है, क्योंकि यह वही जगह है जहाँ से बाक़ी सब नक़ल होता है। हर सालगिरह पर जो वाक्य दोहराया जाता है कि पहला समारोह विज्ञान भवन में हुआ था, उसका स्रोत एक ऐसा दस्तावेज़ बताया जाता है जो ख़ुद उसे काट रहा है। पीआईबी का 20 सितंबर 2026 का दस्तावेज़ समारोह-स्थल का नाम कहीं नहीं देता, इसलिए यह ग़लती उधर से नहीं आई।

उस शाम का आख़िरी हिस्सा भी उसी सभागार में था। पदक बँटने के बाद पुरस्कृत वृत्तचित्र दिखाया गया, फिर मध्यांतर हुआ, और फिर पुरस्कृत फ़ीचर फ़िल्म चली। देश की सबसे अच्छी घोषित फ़िल्म का दिल्ली में पहला सरकारी प्रदर्शन एक प्रयोगशाला के सभागार में हुआ।

35 मिलीमीटर फ़िल्म के कई रील और उनके धातु के डिब्बे, किसी और फ़िल्म के संग्रह की तस्वीर। पुरस्कृत फ़ीचर फ़िल्म भी उसी शाम ऐसे ही रीलों पर वहाँ चली थी।
तस्वीर: christian razukas, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 2.0

उद्योग का आकार, सरकार के अपने अनुमान में

अठारहवाँ पन्ना पूरा एक खाने में बँधा है। शीर्षक State of the Industry, उपशीर्षक FACTS AND FIGURES AT A GLANCE। नौ पंक्तियाँ।

निर्माता 300। स्टूडियो 65। वितरक 600। सिनेमाघर 3,500। अनुमानित निवेश 42 करोड़ रुपये। सकल वार्षिक आय 25 करोड़ रुपये। उद्योग के अलग-अलग हिस्सों में काम करने वाले लोग एक लाख। पिछले तीन साल के आँकड़ों के आधार पर औसत वार्षिक निर्माण 238 फ़िल्में। सिनेमाघरों में सालाना दर्शक-संख्या 60 करोड़। और उसके नीचे कोष्ठक में एक पंक्ति: "(The above figures are approximate)"।

निवेश 42 करोड़ और सालाना आय 25 करोड़। यानी उद्योग में लगी पूँजी उसकी सालाना कमाई से क़रीब 68 प्रतिशत ज़्यादा थी। सरकार अपने ही पन्ने पर यह चित्र छाप रही थी, और उसी पन्ने पर लिख रही थी कि आँकड़े अनुमान हैं।

पुस्तिका के इतिहास-निबंध में उत्पादन के आँकड़े भी हैं। फ़ीचर फ़िल्मों की संख्या 1949 में 289 के शिखर पर पहुँची, 1951 में गिरकर 221 रह गई, और 1953 में 260 हो गई। क्षेत्रीय भाषाओं की फ़िल्में 1946 में 45 थीं और 1953 में 163। निबंध यह भी दर्ज करता है कि 1918 के अधिनियम के बाद से सेंसरशिप प्रांतीय थी, और एकरूपता लाने के लिए 1951 में केंद्रीय फ़िल्म सेंसर बोर्ड बनाया गया, जिसके क्षेत्रीय दफ़्तर कलकत्ता और मद्रास में थे। फ़िल्मों को U और A में बाँटने की व्यवस्था भी तभी शुरू हुई।

पुरस्कार के साथ पैसा नहीं था। पुस्तिका का कार्यक्रम सिर्फ़ पदक और प्रमाणपत्र गिनाता है, और उन्नीस पन्नों में कहीं कोई राशि नहीं छपी। आज पीआईबी के दस्तावेज़ की तालिका में फ़ीचर वर्ग के लिए तीन लाख और दो लाख रुपये दर्ज हैं, और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार के साथ दस लाख।

फ़िल्म का प्रिंट और 2023 की बहाली

अब वह सवाल जो सालगिरह की रिपोर्टों में कभी नहीं पूछा जाता। देश ने जिस फ़िल्म को सबसे अच्छा कहा था, वह आज है कहाँ?

पुणे के राष्ट्रीय फ़िल्म संग्रहालय की सार्वजनिक फ़िल्म-खोज पर श्यामची आई नहीं मिलती। भाषा MARATHI और वर्ष 1953 डालने पर सात नाम आते हैं: अबोली, गुलाचा गणपती, कुबेराचे धन, महात्मा, नवे बिऱ्हाड, ताई तेलीण और वहिनीच्या बांगड्या। श्यामची आई उनमें नहीं है।

संग्रहालय एक पीडीएफ़ भी छापता है जिसमें दो सूचियाँ हैं, "List of Digitized Films" और "List of Restored Films"। पहली सूची के मराठी खंड में 34 फ़िल्में हैं, दूसरी के मराठी खंड में 18। दोनों में 1953 की गुलाचा गणपती है, पहली में उसी साल की नवे बिऱ्हाड और वहिनीच्या बांगड्या भी हैं। श्यामची आई किसी में नहीं है। संग्रहालय की जो प्रविष्टि गूगल आर्ट्स ऐंड कल्चर पर है, उसमें सामग्री का प्रकार Publicity Material लिखा है, प्रिंट नहीं। और खोज का पन्ना ख़ुद एक चेतावनी छापता है, "Updating this database is in process."

इससे यह नतीजा नहीं निकलता कि संग्रहालय के पास प्रिंट नहीं है। इससे इतना निकलता है कि उसकी सार्वजनिक सूची में यह फ़िल्म दर्ज नहीं है।

और इसी के साथ दूसरी बात, जो इसे उलट देती है। पत्र सूचना कार्यालय के 27 नवंबर 2023 के एक फ़ीचर के मुताबिक़ राष्ट्रीय फ़िल्म विरासत मिशन के तहत एनएफ़डीसी-एनएफ़एआई ने सात भारतीय क्लासिक फ़िल्मों को बहाल किया और उन्हें नवंबर 2023 में गोवा के अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह के रेस्टोर्ड क्लासिक्स खंड में पहली बार दिखाया। उस सूची में बिद्यापति (1937), पाताल भैरवी (1951), गाइड (1965), हक़ीक़त (1964), कोरस (1974), बीस साल बाद (1962) के साथ श्यामची आई (1953) है। सातों का विश्व प्रीमियर वहीं हुआ। समारोह की अपनी फ़िल्म गाइड में इस प्रविष्टि पर लिखा है, "World Premiere of 4K Restoration", और अवधि 138 मिनट। वही गाइड छायाकार का नाम आर. एम. रेले दर्ज करती है।

यानी जिस संस्था की सार्वजनिक सूची में फ़िल्म नहीं मिलती, उसी संस्था ने उसे 4K में बहाल करके गोवा में दिखाया है। दोनों बातें सरकार के अपने दस्तावेज़ों से निकलती हैं। दोनों एक साथ सही हैं।

पुणे के लॉ कॉलेज रोड पर राष्ट्रीय फ़िल्म संग्रहालय का मुख्य प्रवेश-द्वार, नाम-पट्ट हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में। यही संस्था है, जिसने फ़िल्म को 2023 में बहाल किया था।
तस्वीर: Suresh Khole, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

तीन चीज़ें इस रिपोर्ट में बंद नहीं हुईं, और उन्हें खुला लिखा जा रहा है। पहली, प्रदर्शन की तारीख़। 1954 की पुस्तिका कोई तारीख़ नहीं देती, इंडियनसिने.मा का releasedate खाली है, और महाराष्ट्र राज्य का मराठी विश्वकोश सिर्फ़ इतना कहता है कि फ़िल्म 1953 में अत्रे पिक्चर्स ने प्रदर्शित की। 6 मार्च 1953 की जो तारीख़ जगह-जगह मिलती है, वह मराठी विकिपीडिया के सूचना-बॉक्स से आती है और वहाँ उसके साथ कोई स्रोत नहीं है। दूसरी, सेंसर प्रमाणपत्र। 1953 में प्रमाणन सिनेमैटोग्राफ़ अधिनियम, 1952 के तहत होता था, और 1954 की पुस्तिका ख़ुद दर्ज करती है कि बंबई मुख्यालय वाला केंद्रीय फ़िल्म सेंसर बोर्ड 1951 में बन चुका था। यानी एक मराठी फ़िल्म का 1953 का प्रमाणपत्र उसी बोर्ड ने दिया होगा, नंबर, तारीख़ और फ़ुट में लंबाई के साथ। संग्रहालय जो सेंसर बोर्ड रिकॉर्ड ऑनलाइन रखता है, वे 1920 से दिसंबर 1950 तक की शृंखलाएँ हैं। प्रकाशित रिकॉर्ड तीन साल पहले ख़त्म हो जाता है। प्रमाणपत्र इस रिपोर्ट में देखा नहीं गया। तीसरी, कमाई। 1953 के मराठी सिनेमा का कोई लेखा-परीक्षित संग्रह-आँकड़ा नहीं है, और जो आँकड़े ब्लॉगों पर घूमते हैं उनका कोई स्रोत नहीं मिलता, इसलिए यहाँ कोई आँकड़ा नहीं छापा जा रहा।

बहत्तरवाँ संस्करण और एकता नगर

पीआईबी के 20 सितंबर के दस्तावेज़ के मुताबिक़ बहत्तरवें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों के विजेताओं का ऐलान 18 जुलाई 2026 को हुआ। समारोह 22 सितंबर को है। राष्ट्रपति गुजरात के एकता नगर में, जिसका पुराना नाम केवड़िया है, ये पुरस्कार देंगी। दस्तावेज़ इसे एक नीतिगत पहल बताता है। मंत्रालय ने तय किया है कि ये पुरस्कार देश के अलग-अलग हिस्सों में दिए जाएँ, और आगे के संस्करण राष्ट्रीय राजधानी से आगे बढ़कर अलग-अलग राज्यों और शहरों तक पहुँचें। यह वाक्य दस्तावेज़ का है, और उसमें कहीं यह नहीं लिखा कि ऐसा पहली बार हो रहा है।

उसी दस्तावेज़ में बहत्तरवें संस्करण की कुछ पहली बातें गिनाई गई हैं, और ये पीआईबी के कथन हैं, इस रिपोर्ट में इनकी अलग जाँच नहीं हुई। पहली, गैर-फ़ीचर वर्ग में पहली बार किसी संथाली फ़िल्म को सम्मान मिला: रवि राज मुर्मू की आंगेन को निर्देशक की सर्वश्रेष्ठ पहली गैर-फ़ीचर फ़िल्म का पुरस्कार। दूसरी, संविधान की आठवीं अनुसूची से बाहर की भाषाओं वाले प्रावधान के तहत गढ़वाली फ़िल्म ढोली और तुलु फ़िल्म इम्बू को सम्मान मिला।

1954 और 2026 के बीच का फ़ासला गिना जा सकता है। तब तीन श्रेणियाँ थीं और सात सम्मान। अब पीआईबी की तालिका के मुताबिक़ फ़ीचर वर्ग में 26 श्रेणियाँ हैं, गैर-फ़ीचर में 16, और सिनेमा पर लेखन में दो। तब सिर्फ़ पदक थे। अब स्वर्ण कमल और रजत कमल हैं, और उनके साथ नक़द राशि भी। तब जूरी में कोई फ़िल्म वाला नहीं था; बहत्तरवें संस्करण की तीनों जूरियों के अध्यक्ष जयराज, असीम सिन्हा और ए. चंद्रशेखर सिनेमा से ही हैं।

मक़सद का वाक्य दोनों सिरों पर एक नहीं है। बीच वाला हिस्सा वही है। 1954 की पुस्तिका कहती है कि पुरस्कार इसलिए बनाए गए ताकि "films of a high aesthetic and technical standard and educational and cultural value" बनें। 2026 का पीआईबी दस्तावेज़ मक़सद को इस तरह लिखता है कि ये पुरस्कार कलात्मक और तकनीकी उत्कृष्टता तथा सामाजिक प्रासंगिकता वाली फ़िल्मों को बढ़ावा देते हैं, दर्शकों को अलग-अलग क्षेत्रों की संस्कृतियाँ समझने में मदद करते हैं, और इस तरह राष्ट्र की एकता और अखंडता को भी बढ़ाते हैं। कलात्मक और तकनीकी वाली जोड़ी दोनों में है।

पुस्तिका में एक वादा और था, जो उसी पन्ने पर छपा है: "In subsequent years there will also be Regional Awards for feature films." वह वादा निभा। आज हर अनुसूचित भाषा की सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म का पुरस्कार है। बाल फ़िल्मों का पदक भी लौटा, और बहत्तरवें संस्करण में तेलुगु फ़िल्म 35 - चिन्ना कथा कादू को सर्वश्रेष्ठ बाल फ़िल्म का पुरस्कार मिला है। 1954 में उस श्रेणी में कोई विजेता नहीं था।

स्रोतभारत सरकार, सूचना तथा प्रसारण मंत्रालय: State Awards for Films 1954, समारोह की आधिकारिक पुस्तिका, उन्नीस पन्ने; फ़िल्म समारोह निदेशालय की अपनी प्रति, इंटरनेट आर्काइव से, पत्र सूचना कार्यालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, 20 सितंबर 2026, दोपहर 12:54: राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, पृष्ठभूमि-दस्तावेज़ (PRID 2312735), Report of the Film Enquiry Committee, 1951, भारत सरकार; अध्यक्ष एस. के. पाटिल; गठन का प्रस्ताव 29 अगस्त 1949; पैराग्राफ़ 534 में फ़िल्म काउंसिल के प्रस्तावित काम, एनएफ़डीसी-राष्ट्रीय फ़िल्म संग्रहालय, पुणे: फ़िल्म खोज; मराठी और 1953 पर सात प्रविष्टियाँ, 21 सितंबर 2026 को पढ़ी गईं, एनएफ़डीसी-राष्ट्रीय फ़िल्म संग्रहालय: सेंसर बोर्ड रिकॉर्ड, प्रकाशित शृंखलाएँ 1920 से दिसंबर 1950 तक, एनएफ़डीसी-राष्ट्रीय फ़िल्म संग्रहालय: डिजिटाइज़्ड और रीस्टोर्ड फ़िल्मों की सूची, पत्र सूचना कार्यालय, 27 नवंबर 2023: Reviving Cinematic Legacy — IFFI 2023 के रेस्टोर्ड क्लासिक्स खंड में एनएफ़डीसी-एनएफ़एआई की सात बहाल फ़िल्में, भारत का अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह, आधिकारिक फ़िल्म गाइड: श्यामची आई, रेस्टोर्ड क्लासिक्स, 138 मिनट, छायाकार आर. एम. रेले, इंडियनसिने.मा (एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ इंडियन सिनेमा पर आधारित): श्यामची आई (1953), निर्माण संस्था अत्रे पिक्चर्स, छायाकार आर. एम. रेले, अवधि 9,120 सेकंड, गूगल आर्ट्स ऐंड कल्चर पर राष्ट्रीय फ़िल्म संग्रहालय की प्रविष्टि: श्यामची आई (1953), प्रकार Publicity Material, अंग्रेज़ी विकिपीडिया: श्यामची आई (1953), छायाकार सी. एम. रेले और पुरस्कार का नाम Golden Lotus, दोनों बिना स्रोत, अंग्रेज़ी विकिपीडिया: पहला राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार; समारोह-स्थल विज्ञान भवन बताया गया है, स्रोत के रूप में यही 1954 की पुस्तिका दी गई है, मराठी विश्वकोश, महाराष्ट्र राज्य मराठी विश्वकोश निर्मिती मंडळ: श्यामची आई, प्रविष्टि 27 जनवरी 2021

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