भारत की पहली फ़िल्म कौन-सी थी, और यह सवाल आज तक खुला क्यों है
श्री पुंडलिक 1912 में आई, राजा हरिश्चंद्र 1913 में। बहस तारीख़ की नहीं है। बहस इस बात की है कि फ़िल्म किसे कहते हैं, और वह तय कभी हुआ ही नहीं।
18 मई 1912 को बंबई के गिरगाँव में कोरोनेशन सिनेमैटोग्राफ़ पर एक फ़िल्म लगी। नाम था श्री पुंडलिक। लंबाई लगभग 1,500 फ़ुट, यानी क़रीब बाईस मिनट। वह दो हफ़्ते चली।
राजा हरिश्चंद्र उसके लगभग एक साल बाद आई। पत्रकारों और बुलाए हुए लोगों के लिए 21 अप्रैल 1913 को ग्रांट रोड के ओलंपिया थिएटर में, और आम दर्शकों के लिए 3 मई 1913 को उसी कोरोनेशन पर। वह तेईस दिन चली।
तारीख़ों में कोई विवाद नहीं है।
विवाद इस बात पर है कि इनमें से किसे भारत की पहली फ़िल्म कहा जाए। और यह सवाल इसलिए खुला है कि जिस कसौटी पर इसे तय होना था, वह कसौटी कभी तय नहीं की गई।
तोरणे की फ़िल्म के ख़िलाफ़ तीन दलीलें
श्री पुंडलिक दादासाहेब तोरणे ने बनाई थी। शूटिंग स्क्रिप्ट उन्होंने नानासाहेब चित्रे और रामराव कीर्तिकर के साथ मिलकर लिखी।
भारत सरकार और ज़्यादातर सिनेमा इतिहासकार राजा हरिश्चंद्र को पहली भारतीय फ़ीचर फ़िल्म मानते हैं। पुंडलिक को बाहर रखने की तीन दलीलें दी जाती हैं।
पहली, वह एक चलते हुए मराठी नाटक की फ़ोटोग्राफ़िक रिकॉर्डिंग थी। कैमरे के लिए कुछ रचा नहीं गया था, जो मंच पर हो रहा था वह दर्ज कर लिया गया।
दूसरी, कैमरा चलाने वाला भारतीय नहीं था। कैमरा, कच्चा फ़िल्म स्टॉक और कैमरामैन, तीनों बॉर्न ऐंड शेपर्ड की बंबई शाखा से आए थे। उस अंग्रेज़ का सिर्फ़ एक नाम बचा है, जॉनसन। पहला नाम कहीं दर्ज नहीं है।
तीसरी, नेगेटिव प्रोसेस होने के लिए लंदन भेजा गया था।
अब इन तीनों को ध्यान से पढ़िए।
तीनों में से एक भी तथ्य पर सवाल नहीं उठाती। तीनों मानती हैं कि तोरणे ने 1912 में फ़िल्म बनाई और दिखाई। तीनों यह कह रही हैं कि उस काम को "फ़िल्म बनाना" कहना चाहिए या नहीं।
यह परिभाषा का झगड़ा है, इतिहास का नहीं।
और परिभाषा किसने तय की
यहीं यह मामला दिलचस्प हो जाता है।
अगर कसौटी यह है कि कैमरे के लिए दृश्य रचा गया हो, तो दुनिया भर की शुरुआती फ़िल्मों का एक बड़ा हिस्सा फ़िल्म नहीं रहेगा, क्योंकि शुरुआती सिनेमा का बड़ा हिस्सा यही था, मंच का रिकॉर्ड।
अगर कसौटी यह है कि कैमरामैन उसी देश का हो, तो यह किसी भी दूसरे माध्यम पर लागू नहीं होती। पहली भारतीय किताब की पहचान छापने वाली मशीन की राष्ट्रीयता से नहीं होती।
अगर कसौटी यह है कि प्रोसेसिंग देश में हुई हो, तो 1912 में भारत में प्रोसेसिंग लैब थी ही नहीं। यह शर्त उस दौर में कोई पूरी कर ही नहीं सकता था।
एक ब्योरा और, जो इस पूरी बहस पर अजीब रोशनी डालता है। दोनों फ़िल्में एक ही हॉल में लगी थीं। गिरगाँव का कोरोनेशन सिनेमैटोग्राफ़ 1912 में पुंडलिक दिखा रहा था और 1913 में राजा हरिश्चंद्र। जिन दर्शकों ने पहली देखी होगी, उनमें से कई ने दूसरी भी उसी परदे पर देखी होगी। उनके लिए यह "पहली फ़िल्म" का सवाल था ही नहीं, दोनों फ़िल्में थीं।
तीनों शर्तें बाद में बनीं, उस काम के बाद जिस पर वे लागू की जा रही हैं। इसीलिए इस सिलसिले का पहला लेख किसी को ख़िताब नहीं दे रहा। ईमानदार जवाब यही है कि सवाल का जवाब देने के लिए पहले यह तय करना पड़ेगा कि फ़िल्म किसे कहते हैं, और वह किसी ने तय नहीं किया।
अप्रैल 2013 में यह बात बंबई हाई कोर्ट तक गई। भारतीय मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के निदेशक विकास पाटिल और तोरणे परिवार ने राजा हरिश्चंद्र वाले दावे को चुनौती दी।
अब वह हिस्सा जो लगभग कहीं नहीं छपता
ऊपर की पूरी बहस एक ऐसी चीज़ पर हो रही है जो देखी नहीं जा सकती।
श्री पुंडलिक की एक भी रील नहीं बची है।
राजा हरिश्चंद्र की चार में से दो रीलें बची हैं, पहली और चौथी। दूसरी और तीसरी ग़ायब हैं। जो बचा है वह अलग-अलग स्रोतों में दस मिनट या ग्यारह मिनट बताया जाता है, और पूरी फ़िल्म लगभग चालीस मिनट की थी।
यहाँ एक बात साफ़ कर देनी चाहिए। हर सालगिरह पर यह छपता है कि फ़िल्म की "एक रील बची है"। दो बची हैं। यह छोटी ग़लती है, पर यह बताती है कि यह जानकारी किसी ने जाँची नहीं, बस एक जगह से दूसरी जगह उतारी गई है।
और अब सबसे बड़ी बात, जो हिंदी में लगभग कभी नहीं लिखी गई।
फालके ने 1917 में इसी कहानी पर दोबारा फ़िल्म बनाई थी। 2013 में यह विवाद खड़ा हुआ कि राष्ट्रीय फ़िल्म संग्रहालय के पास जो प्रिंट है, वह 1913 वाला है या 1917 वाला। संग्रहालय में लगी एक आग में लगभग 1,700 नाइट्रेट प्रिंट जल चुके थे, और जो प्रिंट वहाँ था वह उसी आग में गया या नहीं, यह भी साफ़ नहीं है।
मतलब यह कि भारत पूरे यक़ीन के साथ यह नहीं कह सकता कि उसकी पहली फ़िल्म का एक भी फ़्रेम बचा है।
जो बचा, वह भी कटा हुआ बचा
1913 से 1931 के बीच भारत में तेरह सौ से ज़्यादा मूक फ़िल्में बनीं। यह गिनती फ़िल्म इतिहासकार आशीष राजाध्यक्ष की है।
1994 में इटली के पोर्देनोने मूक फ़िल्म समारोह के समय आकलन था कि इनमें से कम से कम पच्चीस किसी न किसी हालत में मौजूद हैं, पूरी या टुकड़ों में। उनमें से सिर्फ़ आठ फालके की थीं।
और जो बचीं, उनके साथ भी एक हुआ। फालके की फ़िल्मों की नक़ल जब बनाई गई, तो साउंड गेट बंद रखकर बनाई गई। इसका नतीजा यह हुआ कि पर्दे के बाईं तरफ़ का लगभग बीस फ़ीसदी हिस्सा कट गया।
यानी आज जो दिखता है, उसकी फ़्रेमिंग फालके की चुनी हुई नहीं है। वह एक तकनीकी लापरवाही की चुनी हुई है।
इस सिलसिले का तरीक़ा
पुरानी रील हर रविवार आएगी, और उसका काम पुरानी फ़िल्मों की तारीफ़ करना नहीं है।
इस पहले लेख में जो हुआ, वही आगे भी होगा। एक सवाल जिसका जवाब सब जानते हैं, उसे उठाकर देखा गया कि जवाब किस पर टिका है। नीचे कुछ नहीं निकला। दो फ़िल्में हैं, दोनों की तारीख़ पक्की है, दोनों में से कोई देखी नहीं जा सकती, और जिस कसौटी से इनके बीच फ़ैसला होना है वह कभी लिखी ही नहीं गई।
पहली फ़िल्म कौन-सी थी, इसका जवाब यह है कि यह सवाल जितना लगता है उतना सीधा नहीं है।
स्रोतMoMA — The Film Fragment, श्री पुंडलिक, संदर्भ-सूची, राजा हरिश्चंद्र, संदर्भ-सूची