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क़लम

कबीर तीन जगह बचे हैं, और सबसे नई पोथी उसी पंथ की है जो उनके नाम से चलता है

गुरु ग्रंथ साहिब 1604 का है और उसकी मूल प्रति आज भी मौजूद है। बीजक की कोई पांडुलिपि 1800 से पहले की नहीं मिली। कबीरपंथ का अपना ग्रंथ तीनों में सबसे देर का लिखा हुआ है।

कबीर तीन जगह बचे हैं, और सबसे नई पोथी उसी पंथ की है जो उनके नाम से चलता है

कबीर ने कुछ नहीं लिखा।

यह अपने आप में कोई ख़ास बात नहीं है, उस दौर के ज़्यादातर संत कवियों ने नहीं लिखा। ख़ास बात यह है कि उनके बाद जो लिखा गया, वह तीन अलग-अलग जगहों पर, तीन अलग-अलग समुदायों में, और तीन अलग-अलग रूपों में लिखा गया।

तीनों आज मौजूद हैं। तीनों एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।

पहला है गुरु ग्रंथ साहिब, जो पंजाब में 1604 में संकलित हुआ। दूसरा है राजस्थान की पंचवाणी और सर्वंगी पांडुलिपियाँ, जो दादूपंथ और उससे जुड़ी परंपराओं ने रखीं। तीसरा है बीजक, जो कबीरपंथ का अपना ग्रंथ है।

अब वह बात जिससे यह लेख शुरू होता है।

सबसे नया वही निकला जिससे सबसे पुराना होने की उम्मीद थी

कबीरपंथ ख़ुद को कबीर की सीधी शिष्य-परंपरा मानता है। उसका ग्रंथ बीजक है।

बीजक की कोई भी पांडुलिपि अठारहवीं सदी से पुरानी आज तक नहीं मिली।

यह किसी एक विद्वान की राय नहीं है। पीटर फ़्रीडलैंडर लिखते हैं कि उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में विद्वानों और संतों की तमाम कोशिशों के बावजूद अठारहवीं सदी से पुरानी बीजक पांडुलिपि कभी नहीं मिली। लिंडा हेस और शुकदेव सिंह अपनी किताब के परिशिष्ट में लिखते हैं कि 1805 से पुरानी तारीख़ वाली बीजक पांडुलिपि की सूचना किसी ने नहीं दी है। इमरे बंघा ने सबसे पुरानी उपलब्ध प्रति की तारीख़ पर काम करके उसे 1797-98 या 1802-03 पर पहुँचाया है।

बीजक के पहले अंग्रेज़ी संपादक रेवरेंड अहमद शाह ने 1911 में अपनी भूमिका में यह ख़ुद लिख दिया था कि अफ़सोस की बात है कि कोई प्राचीन पांडुलिपि देखी नहीं जा सकती।

अब तीनों को एक कतार में रखिए।

राजस्थान की सबसे पुरानी तारीख़ वाली प्रति 1582 की है। पंजाब में गोइंदवाल की पोथियाँ 1570 के आसपास की हैं, और गुरु ग्रंथ साहिब 1604 का। बीजक लगभग 1800 का।

कबीर की मृत्यु आम तौर पर 1518 के आसपास मानी जाती है। यानी पंजाब का रिकॉर्ड उनके बाद लगभग पचास साल का है, राजस्थान का साठ-सत्तर साल का, और उनके अपने पंथ का लगभग तीन सौ साल बाद का।

लगभग 280 सालकबीर की मृत्यु और उनके अपने पंथ के ग्रंथ की सबसे पुरानी उपलब्ध प्रति के बीच का फ़ासला

1604 इतना पक्का क्यों है

गुरु ग्रंथ साहिब की तारीख़ अनुमान नहीं है।

संकलन 1604 में अमृतसर में गुरु अर्जुन के निर्देश पर हुआ और लिपिकार भाई गुरदास थे। जो मूल पोथी उस समय तैयार हुई, कर्तारपुर पोथी, वह आज भी मौजूद है। उसमें 974 पन्ने हैं और लिपिकार ने ख़ुद दर्ज किया है कि उसने विषय-सूची किस दिन शुरू की।

गुरिंदर सिंह मान लिखते हैं कि पोथी के भीतरी साक्ष्य से 1604 की पुष्टि होती है, और साथ यह भी कि 1606 में गुरु अर्जुन की मृत्यु तक उसमें बदलाव होते रहे।

और एक और चीज़ है जो इस तारीख़ को बाँध देती है। इसी पोथी से नक़ल की गई एक और पोथी 1605 में तैयार हुई, यानी अगले ही साल। उसके बाद 1642 से 1692 के बीच की पच्चीस से ज़्यादा प्रतियाँ बची हुई हैं।

तारीख़ वाला उपलेख, मूल प्रति, और अगले साल की नक़ल। कबीर की किसी दूसरी परंपरा के पास इसके आसपास भी कुछ नहीं है।

राजस्थान वालों ने कबीर को कृष्ण की किताब में बचाया

सबसे पुरानी तारीख़ वाली राजस्थानी प्रति 1582 में फ़तेहपुर में लिखी गई थी।

वह कबीर का संग्रह नहीं है। वह एक वैष्णव संकलन है, ज़्यादातर सूरदास का, जिसके बीच के हिस्से में कबीर, रैदास और नामदेव आते हैं।

यानी राजस्थान में कबीर की सबसे पुरानी लिखित पंक्तियाँ निर्गुण संप्रदाय वालों ने नहीं, कृष्ण-भक्तों ने बचाईं।

और यह परंपरा कभी बंद नहीं की गई। फ़्रीडलैंडर लिखते हैं कि गुरु ग्रंथ साहिब के उलट पंचवाणी और सर्वंगी का पाठ कभी ठीक-ठीक तय नहीं किया गया, और 1614 की सबसे पुरानी ज्ञात प्रति के बाद से हर पांडुलिपि की सामग्री थोड़ी अलग रही। वे यह भी लिखते हैं कि ये संग्रह समय के साथ लंबे होते चले गए।

संग्रह बढ़ता क्यों गया

इसका जवाब दो संख्याओं में है।

1570 से 1681 के बीच की पांडुलिपियों में कबीर के 593 पद दर्ज मिलते हैं। यह विनंद कालेवार्ट का संग्रह है।

परसनाथ तिवारी ने जिन स्रोतों पर काम किया, वे 1604 से 1937 तक फैले हैं, और उनमें पद 1,579 हैं।

तीन सौ साल और जोड़ दीजिए, संग्रह लगभग तिगुना हो जाता है।

साखियों में भी यही फ़ासला है। शार्लोट वोदविल की तुलना के मुताबिक़ गुरु ग्रंथ साहिब में 243 साखियाँ हैं, कबीर ग्रंथावली में 811, और बीजक के अलग-अलग संस्करणों में 353 से 445 तक।

एक और बात, जो कम लोग जानते हैं। ख़ुद बीजक के तीन पाठ हैं, और आपस में अलग हैं। तिवारी और शुकदेव सिंह दोनों मानते हैं कि भगतही पाठ सबसे पुराना और सबसे प्रामाणिक है, और वह बाक़ियों से छोटा है, उसमें तीन सबद और छप्पन साखियाँ कम हैं।

पुराना पाठ छोटा है। जो बढ़ा, वह बाद में बढ़ा।

और अब वह चीज़ जो चार सौ साल से सामने पड़ी है

गुरु ग्रंथ साहिब में "सलोक भगत कबीर जी के" शीर्षक से 243 सलोक हैं, क्रमांक एक से दो सौ तैंतालीस तक, बिना किसी नाग़े के।

उनमें से छह कबीर के नहीं हैं।

पाँच पर गुरु अर्जुन देव की छाप है, यानी "महला ५", और वे क्रमांक 209, 210, 211, 214 और 221 पर हैं। एक पर गुरु अमरदास की, क्रमांक 220 पर।

इनमें से पाँच की शुरुआत ही "कबीर" शब्द से होती है। जैसे यह:

> कबीर धरती साध की तसकर बैसहि गाहि ॥ > धरती भारि न बिआपई उन कउ लाहू लाहि ॥२१०॥

पढ़ने वाला इसे कबीर का मानेगा। ग्रंथ यह नहीं छिपाता, वह ऊपर साफ़ लिखता है कि यह महला पाँच का है।

और गुरु अमरदास वाला सलोक ख़ुद अपनी पहचान दे देता है, क्योंकि वह "नानक" पर ख़त्म होता है, कबीर पर नहीं।

इससे एक पुरानी उलझन भी सुलझ जाती है। सिख संदर्भ-ग्रंथ अक्सर कबीर के सलोकों की संख्या 237 बताते हैं, जबकि मूल पाठ में 243 गिने जाते हैं। दोनों सही हैं। 243 में से छह घटा दीजिए।

पोथी अपने पाठक से ज़्यादा ईमानदार निकली।

जो दोहे सबसे ज़्यादा दोहराए जाते हैं

अब उन पंक्तियों की बात, जो हर हिंदी पाठ्यपुस्तक में कबीर के नाम से छपी हैं।

"निंदक नियरे राखिए", "बड़ा हुआ तो क्या हुआ", "दुख में सुमिरन सब करे", "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ", "साईं इतना दीजिए", "माटी कहे कुम्हार से", "मसि कागद छूयो नहीं"।

गुरु ग्रंथ साहिब के 243 कबीर-सलोकों में इनमें से एक भी नहीं है।

यह बात सावधानी से पढ़िए। यह कहना कि ये गुरु ग्रंथ साहिब में हैं ही नहीं, ग़लत होगा, क्योंकि कबीर के पद ग्रंथ में और जगह भी हैं। जो कहा जा रहा है वह यह है कि ये दोहे हैं, और दोहों वाले हिस्से में नहीं हैं।

आख़िरी वाला सबसे दिलचस्प है। "मसि कागद छूयो नहीं" वही पंक्ति है जिससे यह साबित किया जाता है कि कबीर निरक्षर थे।

गुरु ग्रंथ साहिब में स्याही और काग़ज़ वाली एक पंक्ति है, पर उसका मतलब उलटा है:

> कबीर सात समुंदहि मसु करउ कलम करउ बनराइ ॥ > बसुधा कागदु जउ करउ हरि जसु लिखनु न जाइ ॥८१॥

सात समुद्रों की स्याही बना लो, सारे जंगल की क़लम, और पूरी धरती का काग़ज़, फिर भी वह जस लिखा नहीं जाएगा।

यहाँ स्याही और काग़ज़ छोड़े नहीं जा रहे, बुलाए जा रहे हैं, और कम पड़ रहे हैं।

इसके ठीक अगला सलोक कबीर अपनी जाति के बारे में कहते हैं, और वही इस लेख के ऊपर दर्ज है।

तो कबीर की पंक्ति कौन-सी है

एक उदाहरण से यह सवाल साफ़ हो जाता है।

एक साखी तीनों परंपराओं में मिलती है और उसकी पहली पंक्ति तीनों में एक जैसी है: हड्डी लकड़ी की तरह जलती है, बाल घास की तरह।

दूसरी पंक्ति आदि ग्रंथ में कहती है कि सारे जगत को जलता देखकर कबीर उदास हो गए।

बीजक में वही दूसरी पंक्ति कहती है कि कबीर राम-रस में जल रहे हैं, जैसे कठोर कपास जलती है।

एक ही शुरुआत, और दो उलटे अंत। एक में संसार से विरक्ति, दूसरे में भक्ति की आग।

इनमें से कोई पाठ बिगड़ा हुआ नहीं है। दो समुदायों ने एक ही दोहा अलग-अलग तरीक़े से पूरा किया, और दोनों ने उसे सैकड़ों साल तक अपने-अपने ढंग से गाया।

इसलिए इस लेख का अंत वही है जो ईमानदारी से हो सकता है। हमारे पास कबीर की लिखी हुई एक भी पंक्ति नहीं है। हमारे पास तीन परंपराएँ हैं जो उन्हें याद रखती रहीं, और याद रखते हुए बदलती रहीं।

अनिश्चितता इस कहानी में गड़बड़ी नहीं है। अनिश्चितता ही कहानी है।

स्रोतश्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1375–1376, पीटर फ़्रीडलैंडर, Oral Tradition 29/2 (2015), इमरे बंघा, Bhakti and Power

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