झाँसी के एक तार बाबू ने इलाहाबाद के दफ़्तर से तय किया कि हिंदी गद्य किस शक्ल में लिखा जाएगा
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने जनवरी 1903 से दिसंबर 1920 तक 'सरस्वती' का संपादन किया। भेजी हुई रचनाएँ वे बिना पूछे सुधार देते थे। नवंबर 1905 के एक लेख में उनका लिखा एक शब्द डेढ़ साल की सार्वजनिक लड़ाई की जड़ बना।

14 सितंबर की तारीख़ हिंदी के खाते में 1949 से दर्ज है। उस रोज़ संविधान सभा ने देवनागरी में लिखी हिंदी को संघ की राजभाषा माना। उन दिनों की बहस में क्या दर्ज है और क्या नहीं, यह भारत पन्ना ने 10 सितंबर के अंक में गोविंद बल्लभ पंत पर छपे लेख में देखा था।
वह तारीख़ हिंदी के दर्जे की है।
हिंदी किस शक्ल में लिखी जाएगी, यह सवाल उससे पहले निपट चुका था। 'सब देश' लिखा जाए या 'सब देशों', 'गवर्नमेन्ट' चले या 'गवर्नमेण्ट', 'जब' के आगे 'तब' आए या 'तो', कविता ब्रजभाषा में हो या उसी हिंदी में जिसमें अख़बार छपता है। ये सवाल किसी सदन में नहीं उठे। इलाहाबाद के इंडियन प्रेस से निकलने वाली एक मासिक पत्रिका के दफ़्तर में उठे, और वहीं तय हुए।
नवंबर 1905 में उस पत्रिका के संपादक ने एक लेख छापा जिसमें पाँच नामी हिंदी लेखकों के वाक्य उठाकर उनकी ग़लतियाँ गिनाई गई थीं। उसी लेख में एक वाक्य आया:
'भाषा की यह अनस्थिरता बहुत ही हानिकारिणी है।'
उस वाक्य के एक शब्द पर अगले डेढ़ साल तक तीन पत्रिकाओं में सार्वजनिक लड़ाई चली।
झाँसी का तार बाबू, और एक स्कूली किताब की समालोचना
महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म रायबरेली ज़िले के दौलतपुर गाँव में हुआ, जो गंगा किनारे है और ज़िला मुख्यालय से क़रीब 55 किलोमीटर दूर। पिता का नाम रामसहाय द्विवेदी था।
बेटे का नाम पिता ने अपने नाम से तुक मिलाकर 'महावीर सहाय' रखा था। गाँव की पाठशाला के प्रधानाध्यापक ने पंजिका में 'महावीर प्रसाद' लिख दिया। वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह के अनुसार पिता समय रहते इस पर ध्यान नहीं दे पाए और लिपिक की वह भूल स्थायी हो गई। हिंदी गद्य को व्याकरण से बाँधने वाले आदमी का अपना नाम एक रजिस्टर की ग़लती से बना।
जन्म की तारीख़ पर स्रोत आपस में नहीं मिलते। अंग्रेज़ी विकिपीडिया 15 मई 1864 देता है। हिंदी विकिपीडिया के एक ही पन्ने पर दोनों तारीख़ें हैं, ऊपर के परिचय-बक्से में 9 मई और नीचे के पाठ में 15 मई। द वायर हिंदी ने 2018 में जयंती-विशेष 9 मई को छापा। मृत्यु की तारीख़ पर कोई विवाद नहीं है, 21 दिसंबर 1938।
पढ़ाई पैसे के अभाव में टूटती रही। तेरह की उम्र में अंग्रेज़ी पढ़ने रायबरेली ज़िला स्कूल गए, वहाँ साल भर फ़ारसी पढ़ी, फिर उन्नाव और फतेहपुर के स्कूलों में कुछ समय। इसके बाद पिता के पास मुंबई, जहाँ संस्कृत, गुजराती, मराठी और अंग्रेज़ी पढ़ी। डिग्री कोई नहीं।
नौकरी रेलवे में मिली। पच्चीस की उम्र में अजमेर में एक साल। फिर टेलीग्राफ़ का काम सीखकर इंडियन मिडलैंड रेलवे में तार बाबू। उसके बाद झाँसी में ज़िला ट्रैफ़िक अधीक्षक के दफ़्तर में मुख्य लिपिक।

इसी बीच इंडियन प्रेस की एक स्कूली किताब उनके हाथ पड़ी, जो स्कूलों के लिए मंज़ूर हो चुकी थी और जिसमें उन्हें अशुद्धियाँ दिखीं। उन्होंने उसकी कड़ी समालोचना शिक्षा विभाग को भेज दी और एक नक़ल इंडियन प्रेस के मालिक चिंतामणि घोष को। 'सरस्वती' के आख़िरी संपादक श्रीनारायण चतुर्वेदी ने अपने लेख 'सरस्वती की कहानी' में लिखा है कि घोष नाराज़ होने के बजाय प्रभावित हुए। द्विवेदी की छपी हुई कृतियों की सूची में 1901 की एक किताब है, 'हिन्दी शिक्षावली तृतीय भाग की समालोचना'।
श्यामसुंदर दास के त्यागपत्र के बाद घोष ने वैतनिक संपादक का प्रस्ताव द्विवेदी को भेजा। संपादन जनवरी 1903 से शुरू हुआ।
नौकरी कब छूटी, इस पर ब्योरे बँटे हुए हैं। हिंदी विकिपीडिया कहता है कि त्यागपत्र 1904 में दिया गया, यानी 'सरस्वती' का संपादन एक साल नौकरी के साथ चला। भारतकोश जैसे कई हिंदी स्रोत कहते हैं कि नौकरी 1903 में छोड़कर पत्रिका सँभाली गई। वजह पर तीनों एक हैं, उच्चाधिकारी से पटरी नहीं बैठी। वेतन के आँकड़े भी एक ही जगह मिलते हैं, हिंदी विकिपीडिया पर, जो 200 रुपये मासिक की नौकरी छोड़कर 20 रुपये मासिक पर संपादकी बताता है। इन दोनों आँकड़ों का कोई प्राथमिक स्रोत हमें नहीं मिला, इसलिए इन्हें हवाला मानकर पढ़ा जाए, प्रमाण मानकर नहीं।
नवंबर 1905 का लेख 'भाषा और व्याकरण'
'सरस्वती' का छठा खंड आज भी पूरा पढ़ा जा सकता है। गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार के संग्रह से स्कैन हुई प्रति आर्काइव डॉट ऑर्ग पर है। उसके मुखपृष्ठ पर तीन पंक्तियाँ हैं: 'पुस्तक ६', 'सम्पादक पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी', 'इण्डियन प्रेस, इलाहाबाद'।
खंड की लेख-सूची में साहित्य-विषय के नीचे ग्यारह प्रविष्टियाँ हैं। दसवीं है 'भाषा और व्याकरण'। लेखक के ख़ाने में नाम नहीं, सिर्फ़ 'सम्पादक' लिखा है।
लेख में उन्होंने भारतेंदु हरिश्चंद्र, राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिन्द', गदाधर सिंह, काशीनाथ खत्री और बालकृष्ण भट्ट के वाक्य उठाकर उन पर टिप्पणी की। भट्ट का वाक्य 'हिन्दी प्रदीप' से लिया गया था: 'जब तुम कुछ कर ही नहीं सकते तब मूँड़ मारकर घर क्यों नहीं बैठे रहते?'
उस पर द्विवेदी की टिप्पणी थी कि विचार्य शब्दों के प्रयोग में विधि-निषेध का कोई बंधन दिखाई नहीं देता, यहाँ तक कि 'जो' के आगे कोई-कोई 'तब' का भी प्रयोग करते हैं। इसी के बाद वह वाक्य आता है जिसका एक शब्द आगे मुसीबत बना।
फिर उन्होंने छह वाक्य क्रम से लिखकर पाठक के सामने रख दिए, 'जब तुम घर पर होगे मैं आऊँगा' से लेकर 'जो तुम घर पर होगे तब मैं आऊँगा' तक, और कहा कि इनमें से तीसरा और छठा छोड़कर कोई खटकता नहीं, क्योंकि तीसरे में शर्त समय की है और छठे में घर पर होने की, इसलिए अर्थ अलग है और प्रयोग भी अलग होना चाहिए।
लेख के आगे के हिस्से में नियम बनते चले जाते हैं। प्रांतज और क्षणभंगुर शब्द साहित्य में न आएँ, यानी वे शब्द जो सिर्फ़ एक प्रांत के लोग समझते हों या किसी ख़ास वजह से थोड़े दिन के लिए पैदा हो गए हों। संस्कृत के जो शब्द हिंदी में दूसरे ही अर्थ में चल पड़े हैं, वे सर्वथा त्याज्य हैं, और उन्होंने चार गिनाए: बाधित, निर्भर, आन्दोलन, कटिबद्ध। उदाहरण भी दिया कि संस्कृत में 'बाधित' का अर्थ है बाधा दिया गया, पर हिंदी में लोग उसका अर्थ उपकृत और ऋणी करते हैं, और किसी का उपकार मानकर उससे यह कहना कि आपने मुझे बाधित किया, उल्टी बात है।
'प्रेम फसफसाया' और 'शोक चर्राया' जैसे शिष्टता तोड़ने वाले प्रयोग उन्हें मंज़ूर नहीं थे। विदेशी शब्दों पर संस्कृत व्याकरण के नियम चढ़ाने पर भी उन्हें आपत्ति थी: अंजुमन को अञ्जुमन, पोस्टमास्टर को पोष्टमास्टर और गवर्नमेन्ट को गवर्नमेण्ट लिखना उन्हें अनुचित लगता था। विदेशी शब्दों के प्रयोग से उन्हें कोई शिकायत नहीं थी, उन्होंने लिखा कि संस्कृत तक में विदेशी शब्द हैं।
लेख का अंत उस पंक्ति पर होता है जो बाद के हिसाब से सबसे दिलचस्प है। दूषित भाषा के उदाहरण में जिनके वाक्य उद्धृत किए गए, उनसे उन्होंने फिर से क्षमा माँगी, यह कहते हुए कि दोष दिखलाने के इरादे से ऐसा नहीं किया, सिर्फ़ अपनी बात समझाने के लिए किया।
क्षमा-याचना छपने के बाद भी काम नहीं आई।
आत्माराम के दस लेख
कलकत्ता से निकलने वाले 'भारतमित्र' के संपादक बालमुकुंद गुप्त ने उस एक शब्द को पकड़ लिया। उन्होंने 'आत्माराम' नाम से लेखों की एक क़तार शुरू की, कुल दस, और हर लेख के आख़िर में एक ही माँग दोहराई: 'अनस्थिरता' को व्याकरण से सिद्ध करके दिखाइए।
पहले लेख में: 'अब द्विवेदी जी अनस्थिरता को व्याकरण से सिद्ध करें और अपने राम उनके लिए एक और लेख तैयार करें।' दूसरे में: 'इस समय कृपा करके इतना बताते जाइये कि अनस्थिरता का क्या अर्थ है? स्थिरता और अस्थिरता के बीच में यह कहाँ से पैदा हो गई?' तीसरे में तंज़ और बारीक हो जाता है: 'दो सप्ताह हो गए, इससे आशा होती है कि अगली हाजिरी तक द्विवेदी जी अनस्थिरता को व्याकरण से सिद्ध कर डालेंगे। दो सप्ताह में उन्होंने व्याकरण भली भाँति उलट-पलट लिया होगा।' पाँचवें में: 'कहिए अनस्थिरता की क्या दशा है? वह व्याकरण से सिद्ध हुई कि नहीं? अच्छा और एक सप्ताह की मोहलत। पर मुहावरे का अर्थ भी पूछ रखना।'
गुप्त की असली चोट शब्द पर नहीं थी। वे द्विवेदी के अपने वाक्यों में वही ढीलापन पकड़ रहे थे जिसे द्विवेदी दूसरों में पकड़ते थे। उसी लेख की पहली पंक्ति उठाकर उन्होंने लिखा: 'आपका पहला ही वाक्य है, मन में जो भाव उदित होते हैं, वे भाषा की सहायता से दूसरों पर प्रकट किए जाते हैं। क्यों जनाब, भाषा की सहायता से मन के भाव दूसरों पर प्रकट किये जाते हैं या भाषा से? आप टाँगों की सहायता से चलते हैं या टाँगों से? आँखों की सहायता से देखते हैं या आँखों से?'
राजा शिवप्रसाद वाली टिप्पणी पर उनका जवाब इससे भी सटीक था। द्विवेदी ने राजा साहब के वाक्य में 'सब देश' की जगह 'सब देशों' होना चाहिए था, यह बताया था। गुप्त ने याद दिलाया कि राजा साहब उर्दू से हिंदी में आए थे और 'हर' का तर्जुमा 'सब' कर बैठे, और यह भी कि ख़ुद द्विवेदी ने एक जगह 'हरेक की' की जगह 'सबकी' लिख डाला था, 'जिस अख़बार को उठाइए, जिस पुस्तक को उठाइए, सबकी वाक्य-रचना में आपको भेद मिलेगा।' जब द्विवेदी भूल सकते हैं, तो एक भूल राजा शिवप्रसाद की भी माफ़ होनी चाहिए।
द्विवेदी ने जवाब फ़रवरी 1906 की 'सरस्वती' में दिया। उनका कहना था कि भाषा की परिवर्तनशीलता के विषय में 'अस्थिरता' की जगह 'अनस्थिरता' लिखना अनुचित नहीं, क्योंकि अस्थिरता केवल स्थिरता का उलटा बताती है, और जहाँ उसकी मात्रा ज़्यादा हो वहाँ 'अनस्थिरता' बेहतर है। उसी जवाब में उन्होंने हिंदी में अब तक ढंग का व्याकरण न बन पाने को लेखकों की अशुद्धियों की वजह बताया। गुप्त ने इस पर 'व्याकरण विचार' लिखा: जितने व्याकरण हिंदी में हैं वे किसी काम के नहीं, शुद्ध हिंदी लिखना कोई जानता नहीं, जो जानते हैं सो केवल उस लेख के लेखक, और अगर भगवान ने द्विवेदी को यह अभाव मिटाने की शक्ति दी है तो एक अच्छा व्याकरण लिखने से उन्हें किसने रोका है। 'पर व्याकरण लिखना तो शायद चाहते नहीं। चाहते हैं, अपनी सर्वज्ञता का डंका बजाना।'
तीसरी पत्रिका भी मैदान में आ गई। 'हिन्दी बंगवासी' में गोविंदनारायण मिश्र ने 'आत्माराम की टें टें' लिखकर द्विवेदी का पक्ष लिया, और अन् उपसर्ग वाले हिंदी शब्दों की सूची गिना दी: अनरीति, अनरस, अनहोनी, अनमिल, अनमोल, अनपढ़, अनहित, अनगणित, अनसुनी, अनहुई। जब ये सब शुद्ध माने जाते हैं तो अनस्थिरता में अनर्थ क्या हुआ।
बहस डेढ़ साल चली। पत्रकारिता के इतिहासकार कृपाशंकर चौबे का आकलन है कि उस ऐतिहासिक विवाद ने एक काम यह किया कि व्याकरणसम्मत भाषा और वर्तनी की एकरूपता के प्रति तब के लेखक और संपादक सजग रहने लगे। इस पूरी बहस को भारत यायावर ने 'हिन्दी की अनस्थिरता: एक ऐतिहासिक बहस' नाम से संपादित किया है, और उनका आकलन है कि विवाद के बाद ख़ुद द्विवेदी की भाषा पहले से ज़्यादा परिनिष्ठित दिखाई देती है।
शब्द की लड़ाई गुप्त जीते। आज की हिंदी में 'अनस्थिरता' नहीं चलता, 'अस्थिरता' चलता है। नियम की लड़ाई द्विवेदी जीते, और उनके बनाए नियमों पर यह लेख भी लिखा जा रहा है।
भेजी हुई रचना और छपी हुई रचना
'सरस्वती' को भेजी गई रचना वापस उसी शक्ल में नहीं आती थी जिस शक्ल में गई थी। संपादक उसे सुधारकर छाप देते थे, अक्सर बिना पूछे।
मैथिलीशरण गुप्त को लिखा उनका एक पत्र इस रवैये का सबसे साफ़ नमूना है। सत्यप्रकाश मिश्र ने उसे उद्धृत किया है: 'आगे से आप सरस्वती में लिखना चाहें तो इधर-उधर अपनी कविताएँ छपाने का विचार छोड़ दीजिए। जिस कविता को हम चाहें, उसे छापेंगे। जिसे न चाहें उसे न कहीं दूसरी जगह छपाइए, न किसी को दिखाइए, ताले में बंद करके रखिए।' यह संपादक की सलाह नहीं है, शर्त है। गुप्त ने शर्त मान ली। उनका पहला काव्य-संग्रह 'रंग में भंग' 1909 में छपा।
द्विवेदी ने अपने बचाव में जो लिखा, वह बताता है कि शिकायतें आ रही थीं। 'अपना लिखा सभी को अच्छा लगता है, परंतु उसके अच्छे-बुरे का विचार दूसरे लोग ही कर सकते हैं।' और उसी टिप्पणी में आगे: 'जो लेख हमने लौटाए वह समझ-बूझकर ही लौटाए, किसी और कारण से नहीं। अतएव यदि उसमें किसी को बुरा लगा तो हमें खेद है।' खेद प्रकट करने की ज़रूरत तभी पड़ती है जब किसी को बुरा लगा हो। उसी टिप्पणी में उन्होंने यह छूट भी दर्ज की कि लेखक अपने लेख का प्रूफ़ ख़ुद देख सकता है, और संशोधन ठीक न लगे तो सूचना देकर उसे अपने मन के मुताबिक़ करा सकता है। काग़ज़ पर यह छूट मौजूद थी।
कितना कुछ उन्होंने ख़ुद लिखा, इसका अंदाज़ा 1905 के उसी खंड की लेख-सूची से लगता है। 'सम्पादक' के नाम से उस एक साल में छपे लेखों में हैं: 'क्या चिड़ियाँ नीड़ बनाती हैं?', 'मार्तण्ड-महिमा', 'व्योम-विहरण', 'देवनागरी लिपि का उत्पत्ति-काल', 'देशव्यापक लिपि', 'स्कूली किताब', 'पुस्तक-परीक्षा', 'कालिदास की वैवाहिक कविता', और 'तार-द्वारा ख़बर भेजने का यन्त्र'।
आख़िरी वाला पढ़ने लायक़ है। झाँसी का पुराना तार बाबू अपने पाठकों को समझा रहा है कि काँच या चीनी मिट्टी के बरतन में ताँबे का टुकड़ा रखकर उस पर डेढ़ पाव तूतिया डाला जाता है, ऊपर लकड़ी का बुरादा, फिर तार लगा जस्ते का टुकड़ा, फिर पानी, और कई दिन में उसमें बिजली की शक्ति पैदा हो जाती है। ऐसे बरतन को बैटरी कहते हैं, और ज़रूरत के हिसाब से बैटरी लंबी करनी पड़ती है। रेल के किनारे खंभों पर लगे तार तारघर के यंत्र से जोड़ दिए जाते हैं। उसी लेख में उन्होंने हिसाब भी दिया कि कलकत्ते से कानपुर, जो क़रीब 700 मील है, रेल डाक 21 घंटे में पहुँचाती है, और तार से ख़बर भेजने में पाँच मिनट भी नहीं लगते।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने बाद में इस पूरे काम पर जो लिखा, वह संक्षिप्त और निर्णायक है: 'यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसी अव्यवस्थित, व्याकरण विरुद्ध और ऊटपटाँग भाषा चारों ओर दिखाई पड़ती थी, उसकी परंपरा जल्दी न रुकती।'
'जूही की कली' की वापसी
एक कविता ऐसी है जिसे उन्होंने सुधारा नहीं, लौटा दिया।
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने 'जूही की कली' 'सरस्वती' में छपने के लिए भेजी थी और द्विवेदी ने उसे अस्वीकार कर वापस कर दिया। निराला ने अपने निबंध 'पंत जी और पल्लव' में यह प्रसंग दर्ज किया है, और द्विवेदी के पत्र की पंक्ति भी: आपके भाव अच्छे हैं, पर छंद अच्छा नहीं है, इस छंद को बदल सकें तो बदल लीजिए।
कविता का रचना-काल 1916 बताया जाता है। वह पहली बार 'मतवाला' के अठारहवें अंक में छपी, और उसी पर पहली बार 'निराला' उपनाम गया। बाद में वह 'अनामिका' और फिर 'परिमल' में संकलित हुई।
यहाँ एक टकराव है जिसे दर्ज करना ज़रूरी है। कुछ ब्योरे रचना-काल 1921 के आसपास और पहला प्रकाशन 1922 बताते हैं। अगर वह सही है तो निराला की अपनी बात नहीं बनती, क्योंकि द्विवेदी दिसंबर 1920 में कुर्सी छोड़ चुके थे। सिर्फ़ 1916 वाली तारीख़ इस प्रसंग को संभव बनाती है।
छंद पर द्विवेदी अकेले नहीं थे। निराला के मुक्त छंद को आलोचकों ने 'रबर छंद' और 'केंचुआ छंद' कहकर उड़ाया, और कइयों ने उसे छंद मानने से ही इनकार कर दिया। द्विवेदी की आपत्ति उसी क़तार में खड़ी थी, बस वह कुर्सी पर बैठे थे।
यह वही कुर्सी थी जिसने बंग महिला की 'दुलाई वाली', चंद्रधर शर्मा गुलेरी की 'उसने कहा था', विश्वंभरनाथ शर्मा की 'रक्षाबंधन' और प्रेमचंद की 'सौत' छापी। रामचंद्र शुक्ल का निबंध 'कविता क्या है?' और कामताप्रसाद गुरु का 'हिंदी व्याकरण' भी इसी संपादन-काल की देन हैं। जिस पत्रिका ने आधुनिक हिंदी कहानी को जगह दी, उसी ने आधुनिक हिंदी कविता की सबसे मशहूर शुरुआत लौटा दी।

गद्य और पद्य की भाषा एक हो
बीसवीं सदी की शुरुआत तक हिंदी में एक बँटवारा चला आ रहा था। गद्य खड़ी बोली में लिखा जाता था, अख़बार और निबंध उसी में छपते थे। गंभीर कविता ब्रजभाषा में होती थी, और खड़ी बोली पर आरोप यह था कि उसमें कविता का ध्वनि-सामर्थ्य नहीं है।
द्विवेदी ने इस बँटवारे को साहित्यिक सवाल नहीं माना। उन्होंने इसे प्रबंध का सवाल माना, और उनका तर्क वही था जो एक संपादक का हो सकता है: एक भाषा, एक व्याकरण, एक वर्तनी। अपने एक लेख में उन्होंने लिखा कि गद्य और पद्य की भाषा अलग-अलग नहीं होनी चाहिए, कि हिंदी अकेली ऐसी भाषा है जिसके गद्य में एक प्रकार की और पद्य में दूसरे प्रकार की भाषा लिखी जाती है, और सभ्य समाज की जो भाषा हो उसी में गद्य और पद्य दोनों होने चाहिए। आगे उन्होंने कवियों से कहा कि वे क्रम-क्रम से गद्य की भाषा में कविता लिखना आरंभ करें, क्योंकि बोलना एक भाषा में और कविता दूसरी भाषा में करना प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है।
अभियान का तरीक़ा वही था जो 'सरस्वती' का तरीक़ा था। उन्होंने खड़ी बोली में लिखने वाले कवियों को छापा और छापते चले गए: मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, राय देवीप्रसाद, गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही', अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध', नाथूराम 'शंकर' शर्मा, रामनरेश त्रिपाठी। पत्रिका में जगह पाना उस दौर में अपने आप में उपलब्धि थी, और जगह खड़ी बोली को मिल रही थी।
सबसे बड़ा पत्थर 1914 में गिरा, जब हरिऔध का 'प्रियप्रवास' आया, कृष्ण के ब्रज छोड़ने पर खड़ी बोली में लिखा गया लंबा काव्य, संस्कृत छंदों में। ब्रज के पक्ष वाले पीछे हटते गए, हालाँकि उनमें से कई ने हथियार नहीं डाले और खड़ी बोली में कविता के विरोध में अंत तक लिखते रहे।
क़ीमत भी देखने लायक़ है। जिस ब्रजभाषा में सूर, बिहारी और घनानंद लिखे गए थे, वह जीवित साहित्यिक भाषा के तौर पर इस दौर में ख़त्म हो गई। द्विवेदी ख़ुद संस्कृत, ब्रजभाषा और खड़ी बोली, तीनों में लिख चुके थे, और उनके 1891 के अनुवाद दोहों और सवैयों में हैं। जिस छंद-परंपरा में उन्होंने ख़ुद काम शुरू किया था, उसे बंद कराने में उनका हाथ सबसे भारी रहा।
'द्विवेदी युग' का नामकरण
नाम आम है, पर उसका मालिक साफ़ नहीं है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने इतिहास में इस दौर को 'द्विवेदी युग' नहीं, 'द्वितीय उत्थान' कहा, और लिखा कि इस द्वितीय उत्थान के आरंभ काल में वे पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी को ही पद्य रचना की एक प्रणाली के प्रवर्तक के रूप में पाते हैं। डॉ. नागेंद्र ने 'जागरण-सुधार काल' नाम सुझाया, फिर 'द्विवेदी युग' को ही चलने दिया। 'द्विवेदी युग' पहली बार किसने चलाया, यह हमें किसी स्रोत में दर्ज नहीं मिला।
सीमाएँ भी एक नहीं हैं। शुक्ल ने संवत् 1957 से 1977 तक, यानी 1900 से 1920 तक रखा। कुछ किताबें 1893 से 1918 देती हैं, कुछ 1900 से 1918, और हिंदी विकिपीडिया 1900 से 1920।
इन सब सीमाओं में एक बात साझा है। हर सीमा उस तारीख़ से पहले शुरू होती है जिस तारीख़ को द्विवेदी को कुर्सी मिली। संपादकी जनवरी 1903 में शुरू हुई, और युग तीन से दस साल पहले से गिना जाता है। जिस आदमी के नाम पर युग है, उस युग की शुरुआत में वह अभी झाँसी में लिपिकी कर रहा था।
चालीस पृष्ठ का अंक, और उसके बाद के अठारह साल
दिसंबर 1905 के अंक में, यानी संख्या 12 में, संपादक ने 'विविध विषय' के नीचे साल भर का हिसाब पाठकों के सामने रखा। नियम के मुताबिक़ 'सरस्वती' की हर संख्या में 32 पृष्ठ होने चाहिए, यानी साल भर में 384। पिछला यानी पाँचवाँ खंड 444 पृष्ठों में ख़त्म हुआ था, जो हर महीने 37 पृष्ठ बैठता है। छठे खंड में पृष्ठ-संख्या और बढ़ाकर हर महीने 40 से ऊपर कर दी गई, और मूल्य पहले जैसा ही रखा गया। छपाई, काग़ज़ और रूप-रंग भी बेहतर हुए, यह भी उन्होंने ख़ुद दर्ज किया।
संपादन जनवरी 1903 से दिसंबर 1920 तक चला, यानी 216 अंक और 18 खंड, पुस्तक 4 से पुस्तक 21 तक। कई जगह 'सत्रह वर्ष' लिखा मिलता है, जो 1920 में से 1903 घटाने से निकलता है; अंकों की गिनती अठारह साल की बनती है।
1920 में वे गंभीर रूप से बीमार पड़े और कुर्सी छोड़ दी। उनके बाद 1921 से 1925 तक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी संपादक रहे, फिर देवीदत्त शुक्ल।
गाँव लौटने के बाद के अठारह साल ख़ाली नहीं गए। उनकी कृतियों की सूची में 1921 के बाद की तारीख़ें भरी पड़ी हैं: 'सुमन' (1923), 'अतीत स्मृति' और 'अद्भुत आलाप' (1924), 'महिलामोद' (1925), 'साहित्यालाप' (1926), 'आख्यायिका सप्तक' (1927), 'आध्यात्मिकी' और 'विदेशी विद्वान' और 'आलोचनांजलि' (1928), 'पुरातत्त्व प्रसंग' और 'प्राचीन चिह्न' (1929), 'साहित्य सीकर' और 'वाग्विलास' (1930), 'संकलन' और 'विचार-विमर्श' (1931), 'पुरावृत्त' (1933)। उसी सूची में अकेले 1928 की छह किताबें हैं और 1930 की चार, और 1921 से 1933 तक का कुल जोड़ पच्चीस के आसपास बैठता है। 1933 के बाद सूची में कोई किताब नहीं है। मृत्यु से पहले के पाँच साल ख़ाली दिखते हैं।
1932 में वे एक दिन के लिए काशी गए, जहाँ नागरी प्रचारिणी सभा ने उन्हें अभिनंदन पत्र दिया और शिवपूजन सहाय ने आग्रह किया कि सभा को उनके अभिनंदन में एक ग्रंथ भी छापना चाहिए। 'आचार्य द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ' 1936 में छपा, श्यामसुंदर दास और रायकृष्ण दास के संपादन में। उसकी भूमिका में सभा ने लिखा कि विषम आर्थिक परिस्थिति के कारण उन्हें आर्थिक सहायता पाने में बड़ी अड़चन हुई, और हमदर्दी जताने के बावजूद बड़े-बड़े श्रीमानों ने कोरा उत्तर दे दिया। सीतामऊ के राजकुल ने हाथ न पकड़ा होता तो ग्रंथ का प्रस्ताव रोकना पड़ता। उस ग्रंथ में गांधी, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, वासुदेवशरण अग्रवाल और जॉर्ज ग्रियर्सन की सम्मतियाँ हैं।
पत्नी की मृत्यु एक दुर्घटना में हुई थी। उनकी स्मृति में द्विवेदी ने दौलतपुर में एक स्मृति-मंदिर बनवाया और उसमें सरस्वती और लक्ष्मी की मूर्तियों के बीच पत्नी की मूर्ति रखवाई। वे नि:संतान थे। मंदिर आज भी गाँव में खड़ा है। उनके अपने घर का खंडहर तक नहीं बचा।
21 दिसंबर 1938 को दौलतपुर में उनका निधन हुआ।
स्रोत'सरस्वती', पुस्तक 6 (1905), इण्डियन प्रेस इलाहाबाद, गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार संग्रह का स्कैन, उर्वशी कुमारी, 'हिन्दी में साहित्यिक विवादों का स्वरूप', अपनी माटी, जून 2022, अनस्थिरता विवाद के उद्धरण, प्रदीप त्रिपाठी, 'महावीर प्रसाद द्विवेदी और सरस्वती', अपनी माटी, फ़रवरी 2018, कृष्ण प्रताप सिंह, द वायर हिंदी, 9 मई 2018, श्रीनारायण चतुर्वेदी के 'सरस्वती की कहानी' के हवाले से, हिंदी विकिपीडिया, रेलवे की नौकरी और कृतियों की सूची, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, जन्म तिथि 15 मई 1864, 'सरस्वती' पत्रिका, स्थापना और संपादकों का क्रम, 'द्विवेदी युग: नामकरण एवं काल सीमांकन', शुक्ल और नागेंद्र के मत, हिंदी साहित्य चैनल, 'सरस्वती' के अंक, मूल्य और संपादक, 'जूही की कली' का रचना-काल और पहला प्रकाशन, हिंदीकुंज, निराला के मुक्त छंद पर, 'जूही की कली' लौटाए जाने का ब्योरा, विकिसूक्ति, द्विवेदी के कथन और उनके स्रोत