सुभद्रा कुमारी चौहान की आठ पंक्तियाँ सब जानते हैं, और उनकी कहानियाँ कोई नहीं
झाँसी वाली कविता ने अपनी लेखिका को खा लिया। पीछे जो रह गया वह दो कहानी-संग्रह हैं, जेल की दो सज़ाएँ, और 43 की उम्र में एक सड़क दुर्घटना।

हिंदी में शायद ही कोई पंक्ति इतनी बार दोहराई गई हो।
"खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।"
यह कविता स्कूल की किताबों में है, मंचों पर है, और उन करोड़ों लोगों की याददाश्त में है जिन्होंने हिंदी की और कोई कविता याद नहीं की।
इसे लिखने वाली का नाम भी लोग जानते हैं।
और उनके बारे में लगभग यही जानते हैं।
एक कविता जो अपनी लेखिका से बड़ी हो गई
यह घटना साहित्य में कभी-कभी होती है, और जब होती है तो लेखक के लिए महँगी पड़ती है।
सुभद्रा कुमारी चौहान ने कहानियाँ लिखीं, दो संग्रह छपे, कविताएँ बहुत लिखीं, और उनका जीवन उस दौर की राजनीति में गहरे धँसा हुआ था।
इनमें से कुछ भी झाँसी वाली कविता के आगे टिक नहीं पाया।
आज उनका नाम लीजिए तो सामने वही अड़तीस पंक्तियाँ आती हैं, और बाक़ी सब उनके पीछे छिप जाता है।
यह लेख उसी पीछे वाले हिस्से के बारे में है।
1923: जेल जाने वाली पहली महिला सत्याग्रही
1923 में झंडा सत्याग्रह चला। देश भर में राष्ट्रीय झंडे फहराकर ब्रिटिश शासन की वैधता को चुनौती दी जा रही थी।
जबलपुर में इस आंदोलन की अगली क़तार में सुभद्रा कुमारी चौहान और उनके पति ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान थे।
उसी साल नागपुर में उन्हें गिरफ़्तार किया गया और जेल भेजा गया।
यह भारत में पहली बार था जब कोई महिला सत्याग्रही जेल गई।
उम्र उन्नीस के आसपास थी। और वे उस समय गर्भवती थीं।
कुछ महीनों बाद गर्भावस्था के कारण उन्हें रिहा कर दिया गया।
यह उनकी आख़िरी गिरफ़्तारी नहीं थी। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में वे फिर जेल गईं।
इन दो तारीख़ों के बीच उन्नीस साल हैं, और उन उन्नीस सालों में उन्होंने वह सब लिखा जिसके लिए उन्हें याद किया जाना चाहिए था।

छात्रावास में एक खोज
इससे पहले की एक घटना है, जो हिंदी साहित्य के लिए शायद उतनी ही महत्वपूर्ण है।
सुभद्रा इलाहाबाद के क्रॉस्थवेट गर्ल्स स्कूल में पढ़ीं और 1919 में मिडिल की परीक्षा पास की।
छात्रावास में उनके साथ एक और लड़की रहती थी, उनसे छोटी, जो चुपचाप कविताएँ लिखती थी और उन्हें छिपाकर रखती थी।
सुभद्रा ने वह छिपा हुआ ढेर ढूँढ़ निकाला।
और उन्होंने उस लड़की से कहा कि वह लिखे, और खड़ी बोली में लिखे।
उस लड़की का नाम महादेवी वर्मा था।
छायावाद की चार बड़ी हस्तियों में गिनी जाने वाली महादेवी वर्मा की शुरुआत में एक धक्का उस सहपाठी का है जिसे आज सिर्फ़ एक कविता के लिए जाना जाता है।
यह भी उन चीज़ों में है जो झाँसी वाली कविता के पीछे छिप गईं।
जो किताबें कोई नहीं पढ़ता
अब उन किताबों पर आइए जिनके लिए यह कमीशन लिखा गया है।
बिखरे मोती 1932 में छपा। यह कहानियों का संग्रह है।
सीधे-सादे चित्र 1946 में आया, और मेरा नया बचपन भी उसी साल।
उन्मादिनी नाम का एक और संग्रह उनके नाम पर दर्ज है।
इन कहानियों का विषय वह नहीं है जिसकी उम्मीद झाँसी वाली कविता पढ़कर की जाती है।
इनमें वीरता नहीं है। इनमें घर है।
औरतों का घरेलू श्रम, विधवा का जीवन, दहेज, छुआछूत, बाल विवाह, और वह सब जो उस समय के मध्यवर्गीय हिंदू परिवार के भीतर चल रहा था और जिस पर बात नहीं होती थी।
यह याद रखना चाहिए कि यह 1930 और 1940 का दशक है। हिंदी कथा साहित्य में औरत मुख्य रूप से पुरुष लेखकों के लिखे किरदार के रूप में मौजूद थी।
सुभद्रा कुमारी चौहान उन थोड़े नामों में हैं जो उस दौर में औरत की तरफ़ से लिख रही थीं, और सामाजिक सुधार को नारे की तरह नहीं, रोज़ के ब्योरे की तरह ला रही थीं।

दो कविता संग्रह, और उनमें क्या-क्या था
कविता की तरफ़ भी वे सिर्फ़ एक रचना नहीं हैं।
उनका पहला काव्य-संग्रह मुकुल 1930 में छपा। दूसरा त्रिधारा है।
इनमें जो कविताएँ हैं, उनमें दो और नाम ऐसे हैं जो अपने समय में ख़ूब पढ़े गए।
"वीरों का कैसा हो वसंत" एक आह्वान कविता है, जो वसंत के परंपरागत रूपक को लेकर उसे आंदोलन की तरफ़ मोड़ देती है।
दूसरी का नाम है "जलियाँवाला बाग में वसंत"।
इस शीर्षक को दोबारा पढ़िए।
जलियाँवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 को गोलियाँ चलीं। वसंत ऋतु उत्सव, फूल और रंग की ऋतु है, और हिंदी कविता की सबसे पुरानी परंपराओं में से एक उसी पर टिकी है।
एक ऐसी जगह पर वसंत की कविता लिखना जहाँ सैकड़ों लोग मारे गए थे, अपने आप में एक साहित्यिक निर्णय है। ऋतु वही रहती है, पर उसका अर्थ पलट जाता है।
यह वह कवि नहीं है जो सिर्फ़ जोश की तुकबंदी करती हो। यह रूपक के साथ काम करना है, और सोच-समझकर करना है।
और जिस रानी पर वह कविता लिखी गई
अब उस कविता पर लौटिए, और उसकी सबसे मशहूर पंक्ति पर ध्यान दीजिए।
"बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।"
यह पंक्ति हर बंद के अंत में लौटती है, और लौटते-लौटते वह वही बात कहती चली जाती है जिस पर आमतौर पर ध्यान नहीं जाता।
कवि यह नहीं कह रही कि यह इतिहास है। वे साफ़ बता रही हैं कि यह कहानी उन्होंने बुंदेलखंड के हरबोलों से सुनी है, यानी उन घुमंतू गायकों से जो गाँव-गाँव जाकर वीरगाथाएँ गाते थे।
यानी कविता अपने स्रोत की घोषणा अपने भीतर करती है, और वह स्रोत मौखिक परंपरा है, अभिलेख नहीं।
यह ईमानदारी है, और आज के लिहाज़ से उल्लेखनीय ईमानदारी है।
लक्ष्मीबाई के बारे में जो कुछ इस कविता में है, उसका बड़ा हिस्सा लोकगीतों और स्मृति से आया है, और उसमें और अंग्रेज़ी अभिलेखों में कई जगह फ़र्क़ है। इतिहासकार वह फ़र्क़ दशकों से दर्ज करते रहे हैं।
पर कविता ने कभी दावा नहीं किया कि वह अभिलेख है। वह पहली पंक्ति से बता रही है कि वह सुनी हुई कहानी है।
जिन्होंने इसे इतिहास की किताब की तरह पढ़ा, वह चूक पाठक की है, कवि की नहीं।

घर में जो किया, वह भी लिखने जितना बड़ा था
सुधारक होना और सुधार करना दो अलग बातें हैं, और इस मामले में दोनों साथ हैं।
उनकी सबसे बड़ी संतान का नाम सुधा था।
सुधा की शादी अमृत राय से हुई, जो प्रेमचंद के बेटे थे।
यह अंतरजातीय विवाह था, और उस समय इस पर बहुत बात हुई और कई सवाल उठे।
सुभद्रा कुमारी चौहान ने इस शादी का समर्थन किया।
यानी जो बात उनकी कहानियों में लिखी थी, वह उनके अपने घर में भी हुई, और उसकी क़ीमत उन्होंने चुकाई।
एक और बात इसी सिलसिले की। सुधा ने आगे चलकर अपनी माँ के जीवन पर एक किताब लिखी, जिसका नाम है मिला तेज से तेज।
अपनी माँ पर बेटी की लिखी यह किताब उन कुछ स्रोतों में है जिनसे उनका जीवन विस्तार से पता चलता है।
और एक छोटा-सा दायरा जो पूरा हो जाता है
इस कहानी में एक संयोग है जिस पर ध्यान देने लायक़ है।
सुधा और अमृत राय के बेटे आलोक राय हिंदी के जाने-माने विद्वान हैं, और उनका सबसे चर्चित काम हिंदी के आधुनिक इतिहास पर है, यानी ठीक उस सवाल पर कि हिंदी एक भाषा के रूप में कैसे बनी और उसमें क्या-क्या छूटा।
यानी एक तरफ़ प्रेमचंद, जिन्हें भाषा बदलनी पड़ी। दूसरी तरफ़ सुभद्रा कुमारी चौहान, जिन्होंने खड़ी बोली में लिखने के लिए महादेवी वर्मा को उकसाया।
और उन दोनों का नाती वह आदमी, जो आगे चलकर यह लिखता है कि हिंदी बनी कैसे।
जिस ख़ाने में वे नहीं रखी गईं
हिंदी साहित्य का इतिहास पढ़ाते समय उनके दौर को छायावाद कहा जाता है, और छायावाद के चार स्तंभ गिनाए जाते हैं।
जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा।
सुभद्रा कुमारी चौहान इस सूची में नहीं हैं।
इसकी एक वजह साहित्यिक है और उसे मान लेना चाहिए। छायावाद की पहचान उसकी प्रतीकात्मकता, सूक्ष्मता और वैयक्तिक अनुभूति से बनी। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता इसके उलट सीधी है, बोलचाल के क़रीब है, और अक्सर सामूहिक संबोधन में है।
वे छायावादी नहीं थीं, यह सही है।
पर इसका नतीजा यह हुआ कि उन्हें किसी और ख़ाने में भी नहीं रखा गया।
राष्ट्रीय काव्यधारा में माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन और रामधारी सिंह दिनकर जैसे नाम गिनाए जाते हैं। इस सूची में वे कभी-कभी आती हैं, कभी-कभी नहीं।
गद्य की तरफ़ उनका नाम और कम आता है, जबकि दो कहानी-संग्रह उनके नाम पर हैं।
एक विडंबना यहाँ ध्यान देने लायक़ है। जिस लड़की की छिपाई हुई कविताएँ उन्होंने छात्रावास में ढूँढ़ी थीं, वह छायावाद के चार स्तंभों में गिनी जाती है।
और वे ख़ुद किसी स्तंभ में नहीं गिनी जातीं।
लोकप्रियता और प्रतिष्ठा एक चीज़ नहीं हैं
यह इस पूरी कहानी का सबसे काम का सबक़ है, और यह सिर्फ़ उन्हीं पर लागू नहीं होता।
हिंदी में कई ऐसे लेखक हैं जिनकी एक रचना को सब जानते हैं और जिनका बाक़ी काम आलोचना की किताबों में नहीं मिलता।
इसकी वजह अक्सर यह होती है कि जो चीज़ सबको समझ आती है, उसे आलोचना गंभीरता से लेने में हिचकती है। सरलता को कमज़ोरी मान लेने की आदत पुरानी है।
सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता जान-बूझकर सरल है। वह मंच पर, स्कूल में और घर में सुनाई जाने के लिए लिखी गई थी, और यह उसका दोष नहीं, उसका डिज़ाइन है।
पर वही सरलता उन्हें उस दायरे से बाहर रखती रही जिसमें कठिन लिखने वाले गिने जाते हैं।
एक ही समय में सबसे ज़्यादा दोहराया जाना और सबसे कम पढ़ा जाना, दोनों संभव है। उनका मामला इसका सबसे साफ़ उदाहरण है।
आख़िरी सफ़र
15 फ़रवरी 1948 को वे नागपुर से जबलपुर लौट रही थीं।
सिवनी के पास उनकी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई और उनकी मृत्यु हो गई।
उम्र 43 साल थी। जन्म 16 अगस्त 1904 को इलाहाबाद में हुआ था।
यह उम्र ध्यान देने लायक़ है। निराला 65 तक जिए, महादेवी वर्मा 79 तक, पंत 76 तक। उनके दौर के ज़्यादातर बड़े नाम लंबा जिए और उनके पास अपनी जगह पक्की करने का समय रहा।
सुभद्रा कुमारी चौहान के पास वह समय नहीं था। जो लिखा जा सकता था, उसका बड़ा हिस्सा लिखा ही नहीं गया।
आज़ादी को छह महीने भी नहीं हुए थे। वे उस समय विधानसभा की सदस्य थीं, यानी उस व्यवस्था का हिस्सा जिसे बनाने के लिए वे जेल गई थीं।
गांधी की हत्या को उस दिन सिर्फ़ सोलह दिन हुए थे।
यानी जिस देश के लिए वे उन्नीस साल की उम्र में गर्भवती हालत में जेल गई थीं, उसे आज़ाद हुए देखकर वे कुछ ही महीने जी पाईं।
उन्हें कैसे पढ़ा जाए
झाँसी वाली कविता ख़राब कविता नहीं है। वह वही करती है जो उसे करना था, और उसे इतनी बार दोहराया गया है तो इसकी वजह है।
पर एक कविता की सफलता एक तरह की सज़ा भी बन सकती है।
जब कोई रचना इतनी लोकप्रिय हो जाए कि वह लेखक की पहचान बन जाए, तो बाक़ी सब उसकी छाया में चला जाता है। प्रकाशक वही छापते हैं जो बिकता है। पाठ्यक्रम बनाने वाले वही रखते हैं जो सब पहचानते हैं। और अगली पीढ़ी को यह पता ही नहीं चलता कि और भी कुछ था।
सुभद्रा कुमारी चौहान के मामले में जो छूट गया, वह छोटा नहीं है।
एक कहानीकार जो 1930 के दशक में औरतों के घरेलू जीवन पर लिख रही थी। एक कार्यकर्ता जो जेल जाने वाली पहली महिला सत्याग्रही थी। एक सहपाठी जिसने महादेवी वर्मा को लिखने पर लगाया। और एक माँ जिसने अपनी बेटी की अंतरजातीय शादी में साथ दिया।
इनमें से किसी के लिए उन्हें याद नहीं किया जाता।
अगर उनका कुछ और पढ़ना हो, तो बिखरे मोती से शुरू कीजिए। वह 1932 का है और उसकी कहानियाँ आज भी मिल जाती हैं।
उनकी कहानियाँ अब कई डिजिटल संग्रहों में एक साथ मिल जाती हैं, इसलिए ढूँढ़ना पहले जितना मुश्किल नहीं रहा।
एक कहानी का नाम "मँझली रानी" है, और उसका शीर्षक ही उस दूरी को दिखा देता है जो उनकी कविता और उनके गद्य के बीच है।
कविता में रानी वह है जो घोड़े पर लड़ती है। कहानी में रानी वह है जो घर के भीतर बीच वाली है, न सबसे बड़ी न सबसे छोटी, और जिसकी जगह उसी क्रम से तय होती है।
एक ही शब्द, दो बिल्कुल अलग दुनियाएँ। और लिखने वाली एक ही।
जिन्होंने सिर्फ़ पहली दुनिया पढ़ी है, उन्होंने आधी लेखिका पढ़ी है।
झाँसी वाली कविता आपको पहले से याद है। यह वाला हिस्सा नया लगेगा, और शायद उससे ज़्यादा उनका अपना लगेगा।
स्रोतसुभद्रा कुमारी चौहान का जीवन-वृत्त, भारतीय संस्कृति पोर्टल, नागपुर सत्याग्रह और सुभद्रा कुमारी चौहान, लाइव हिस्ट्री इंडिया, उनके जीवन पर, महादेवी वर्मा और छात्रावास वाली मुलाक़ात पर