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काम की बात

बुज़ुर्ग रिश्तेदार के लिए मुफ़्त वॉकर, व्हीलचेयर या सुनने की मशीन चाहिए, तो राष्ट्रीय वयोश्री योजना में आवेदन का पूरा तरीक़ा यह है

राष्ट्रीय वयोश्री योजना बीपीएल या कम आय वाले बुज़ुर्गों को छड़ी से लेकर व्हीलचेयर तक आठ उपकरण मुफ़्त देती है, पर आवेदन की मशीनरी किसी एक जगह लिखी नहीं मिलती। सामाजिक न्याय मंत्रालय और एएलआईएमको के अपने दस्तावेज़ों से यह लेख वह मशीनरी जोड़ता है, और जहां दस्तावेज़ चुप हैं वहां चुप्पी को दर्ज करता है।

एक मैनुअल व्हीलचेयर, राष्ट्रीय वयोश्री योजना के तहत मिलने वाले आठ उपकरणों में से एक
तस्वीर: Nick Yudin, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

एक मेज़ पर पंक्ति में रखी छड़ियाँ, कुछ वॉकर, दो-चार पहियों वाली कुर्सियाँ, और कोने में बंधे कार्टन में सुनने की मशीनें। किसी ज़िला मुख्यालय के हॉल में लगे शिविर की यही शक्ल होती है, जिस दिन राष्ट्रीय वयोश्री योजना के तहत उपकरण बंटते हैं। सामान मुफ़्त है। पर वहां तक पहुंचने का रास्ता, साथ ले जाने वाले काग़ज़ात और इंतज़ार का समय, तीनों का अपना हिसाब है। यह हिसाब किसी एक जगह लिखा नहीं मिलता।

राष्ट्रीय वयोश्री योजना सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की है। इसे ज़मीन पर उतारने वाली अकेली एजेंसी भारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम है, जिसे एएलआईएमको कहा जाता है। योजना बीपीएल या कम आय वाले बुज़ुर्गों को चलने, सुनने, देखने और दांत की तकलीफ़ में काम आने वाले उपकरण मुफ़्त देती है।

यह लेख योजना के आंकड़े नहीं गिनता। यह सिर्फ़ मशीनरी बताता है: कौन पात्र है, कहां जाना है, क्या साथ ले जाना है, क्या मिलता है, कितना समय लगता है, और आवेदन ठुकराए जाने पर रास्ता क्या बचता है। हर बात एएलआईएमको के अपने योजना-दस्तावेज़ से, मंत्रालय के लोकसभा जवाब से, और एएलआईएमको की अपनी मौजूदा वेबसाइट व पंजीकरण पोर्टल से जांची गई है। जहां दस्तावेज़ चुप हैं, वहां यह लेख भी चुप्पी को चुप्पी कहेगा, अनुमान से नहीं भरेगा।

साठ साल, बीपीएल या पंद्रह हज़ार: पहली शर्त के काग़ज़

पात्रता की पहली शर्त उम्र है। साठ साल या उससे ऊपर। इसके लिए आधार कार्ड चाहिए, या कम से कम आधार पंजीकरण की रसीद, अगर कार्ड अभी बना नहीं। एएलआईएमको के अपने 2017 के योजना-दस्तावेज़ में एक तीसरी स्थिति भी दर्ज है: आधार बिल्कुल न हो तो दस्तावेज़ के अपने शब्दों में तय की गई किसी और पहचान दस्तावेज़ से भी काम चल सकता है। दस्तावेज़ यह नहीं बताता कि वे दस्तावेज़ कौन-कौन से हैं। यह सूची कहीं और प्रकाशित नहीं मिली। इसलिए यह लेख यहां अनुमान नहीं लगाएगा।

दूसरी शर्त आर्थिक है, और इसके दो अलग रास्ते हैं। मंत्रालय के 5 दिसंबर 2023 के एक लोकसभा जवाब में साफ़ दर्ज है कि योजना 2020-21 में बदली गई थी। बदलाव के बाद बीपीएल श्रेणी का बुज़ुर्ग तो पात्र है ही, साथ ही वह बुज़ुर्ग भी पात्र है जिसकी मासिक आय 15,000 रुपये से ज़्यादा नहीं। यहां एक फ़र्क़ दर्ज करना ज़रूरी है। एएलआईएमको की अपनी वेबसाइट पर टंगा वही मूल योजना-दस्तावेज़, जो जुलाई 2017 में बना और सर्वर पर आख़िरी बार अक्तूबर 2020 में बदला गया, आज भी अपने पात्रता वाले हिस्से में सिर्फ़ बीपीएल श्रेणी की बात करता है। आय वाला विकल्प उसमें कहीं दर्ज नहीं है। बदलाव मंत्रालय के अपने लोकसभा जवाब में तो है, पर एएलआईएमको के प्रकाशित दस्तावेज़ में उसका कोई निशान नहीं। दोनों तरफ़ की बात यहां साथ रखी गई है, किसी एक को चुनकर नहीं।

बीपीएल साबित करने के तीन रास्ते हैं: ज़िला प्राधिकरण का प्रमाण-पत्र, बीपीएल राशन कार्ड, या इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना या राज्य की किसी और पेंशन योजना के तहत मिल रही पेंशन का प्रमाण। यानी बीपीएल कार्ड न हो तो पेंशन का काग़ज़ भी चलता है। आय साबित करने के लिए एएलआईएमको की अपनी जानकारी-पुस्तिका एक अलग रास्ता बताती है: तहसील से बना आय प्रमाण-पत्र, या पहले से मिल रही वृद्धावस्था पेंशन का रिकॉर्ड, या सांसद, विधायक या ग्राम प्रधान का प्रमाण-पत्र, जिसमें आय 15,000 रुपये से कम दर्ज हो। कौन-सा काग़ज़ आसान पड़ेगा, यह परिवार की अपनी परिस्थिति तय करती है। बीपीएल और आय, दोनों शर्तें एक साथ पूरी करने वाले आवेदक को कोई ख़ास प्राथमिकता मिलती है या नहीं, इसका ज़िक्र किसी दस्तावेज़ में नहीं है। दोनों में से कोई एक शर्त पूरी होना ही पर्याप्त बताया गया है।

एक भ्रम यहां साफ़ करना ज़रूरी है। एएलआईएमको एक और योजना भी चलाता है, दिव्यांगजनों के लिए एडीआईपी। उसकी आय-सीमा अलग है, 22,500 रुपये मासिक, और वह किसी भी उम्र के दिव्यांग के लिए है। वयोश्री सिर्फ़ साठ पार बुज़ुर्गों के लिए है, और उसकी सीमा 15,000 रुपये है। दोनों योजनाएं एक ही एजेंसी चलाती है, इसलिए दोनों की शर्तें मिल जाना आसान है। पर पात्रता की शर्त अलग-अलग है।

चार दिव्यांगताओं का मेडिकल सर्टिफ़िकेट, बाक़ी उपकरणों का भरोसा एजेंसी पर

चार तरह की दिव्यांगता के लिए मेडिकल सर्टिफ़िकेट अनिवार्य है: कम दिखना, सुनने में दिक़्क़त, दांत का न होना, और चलने-फिरने की वह दिव्यांगता जिसमें व्हीलचेयर चाहिए। यह सर्टिफ़िकेट किसी भी सरकारी डॉक्टर से बनवाया जा सकता है। किसी ख़ास बोर्ड या विशेषज्ञ की शर्त नहीं है।

बाक़ी उपकरणों के लिए, जैसे छड़ी, कुहनी की बैसाखी, वॉकर या ट्राइपॉड, मेडिकल सर्टिफ़िकेट की शर्त नहीं है। वहां लागू करने वाली एजेंसी ख़ुद देखकर तय कर सकती है कि आवेदक को इसकी ज़रूरत है या नहीं।

एक वॉकर, जिसे योजना के अपने दस्तावेज़ के मुताबिक़ मेडिकल सर्टिफ़िकेट के बिना भी दिया जा सकता है
तस्वीर: DirkvdM, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 3.0

एक ही व्यक्ति में एक से ज़्यादा दिव्यांगता हो, तो हर एक के लिए अलग उपकरण मिलता है, और हर उपकरण की अपनी अलग मूल्य-सीमा होती है। एक शर्त उलटी दिशा में भी है। पिछले तीन साल में जो उपकरण किसी और सरकारी योजना से मुफ़्त मिल चुका है, वह दोबारा नहीं मिलेगा। अपवाद सिर्फ़ एक है: पुराना उपकरण ख़राब हो गया हो और उसे बदलना ज़रूरी हो।

यहां एडीआईपी योजना से एक और फ़र्क़ याद रखने लायक़ है। एडीआईपी में दिव्यांगता चालीस फ़ीसदी से कम नहीं हो सकती, और उसका प्रमाण यूडीआईडी नाम के एक अलग सरकारी पहचान-पत्र से मिलता है। राष्ट्रीय वयोश्री योजना के अपने 2017 के दस्तावेज़ में दिव्यांगता की कोई न्यूनतम फ़ीसदी दर्ज नहीं है, और यूडीआईडी की शर्त भी नहीं है। वहां सरकारी डॉक्टर के प्रमाण-पत्र से काम चल जाता है।

मंत्रालय, राज्य विभाग, और ज़िला समिति: तीन पड़ाव

योजना लागू करने का ढांचा तीन तहों में बंटा है। सबसे ऊपर सामाजिक न्याय मंत्रालय है, जो नीति बनाता है और पैसा देता है। बीच में राज्य का नोडल विभाग है, आमतौर पर समाज कल्याण विभाग। सबसे नीचे, और आवेदक के लिए सबसे ज़रूरी, ज़िला स्तर की एक समिति है।

यह समिति ज़िलाधिकारी या उपायुक्त की अध्यक्षता में बनती है। इसके सदस्य हैं ज़िले का मुख्य चिकित्सा अधिकारी, ज़िला समाज कल्याण अधिकारी या इसी दर्जे का कोई अधिकारी, महिला एवं बाल विकास विभाग का संयुक्त निदेशक, और ज़िला परिषद का मुख्य कार्यकारी अधिकारी। शहरी इलाक़ों में नगर आयुक्त भी इसमें जुड़ता है। लाभार्थी चुनने, योजना लागू करने और उसकी निगरानी करने का पूरा काम इसी समिति का है।

आंध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी ज़िले का कलेक्ट्रेट भवन, एलुरु; ज़िला स्तर की समिति ऐसे ही किसी दफ़्तर से चलती है
तस्वीर: IM3847, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

मंत्रालय के 5 दिसंबर 2023 के लोकसभा जवाब के मुताबिक़ देश के सभी ज़िले इस योजना के दायरे में हैं। कोई ज़िला बाहर नहीं है। योजना का अपना दस्तावेज़ ज़िलों को चुनने में एक झुकाव भी तय करता है: पिछड़े और ग्रामीण इलाक़ों को प्राथमिकता, और वृद्धाश्रमों में रहने वाले बुज़ुर्गों को भी। समिति चाहे तो बीपीएल राशन कार्ड या पेंशन योजनाओं के मौजूदा आंकड़े लाभार्थी चुनने के लिए इस्तेमाल कर सकती है, अलग से सर्वे किए बिना।

एएलआईएमको का काम सिर्फ़ पैसा ख़र्च करना नहीं है। योजना का दस्तावेज़ यह भी कहता है कि हर उपकरण के लिए तकनीकी मानक और विशेषताएं तय करना एएलआईएमको की ही ज़िम्मेदारी है। केंद्र सरकार के पास यह अधिकार भी है कि ज़रूरत पड़ने पर किसी ज़िले को हटाकर किसी और ज़िले को योजना में जोड़ दे। ज़िलों की सूची स्थायी नहीं है, बदल सकती है।

शिविर की तारीख़ किसी एक जगह दर्ज नहीं मिलती

उपकरण किसी दफ़्तर के काउंटर से नहीं मिलते। वितरण सिर्फ़ शिविर में होता है, दो चरणों में। पहला मूल्यांकन शिविर, जहां तय होता है कि किसे कौन-सा उपकरण चाहिए। दूसरा वितरण शिविर, जहां वही उपकरण दिया जाता है। शिविर की कोई एक राष्ट्रीय तारीख़-सूची कहीं प्रकाशित नहीं मिली।

योजना के अपने दस्तावेज़ के मुताबिक़ शिविर की सूचना स्थानीय स्तर पर दी जाती है: अख़बार, पर्चे, बैनर, और खंड विकास अधिकारी, आंगनवाड़ी व आशा कार्यकर्ताओं की मदद से। एएलआईएमको की अपनी जानकारी-पुस्तिका इसे और सीधे कहती है। शिविर नियमित अंतराल पर लगते हैं, मंत्रालय के निर्देश के हिसाब से। कोई तयशुदा सार्वजनिक कैलेंडर इसके पीछे नहीं है।

शिविर शुरू होने की कड़ी और पीछे तक जाती है। योजना के दस्तावेज़ के मुताबिक़ पहला क़दम राज्य सरकार या मंत्रालय की तरफ़ से एएलआईएमको को लिखित अनुरोध भेजना है। इसके बाद एएलआईएमको ज़िला प्रशासन को औपचारिक अनुमति के लिए पत्र लिखता है। अनुमति मिलने पर ही जगह और तारीख़ तय होती है। प्रचार तभी शुरू होता है: अख़बार, पर्चे, बैनर, होर्डिंग, और गाड़ी से किया जाने वाला प्रचार। कोई अकेला बुज़ुर्ग सीधे एएलआईएमको को लिखकर अपने लिए शिविर नहीं बुलवा सकता। यह कड़ी राज्य या ज़िला स्तर से ही शुरू होती है।

तो पता कैसे चले? तीन रास्ते काम के हैं। ज़िला समाज कल्याण अधिकारी के दफ़्तर में पूछना, एएलआईएमको के टोल-फ़्री नंबर 1800-180-5129 पर फ़ोन करना, या alimco.in पर दिए केंद्र-खोजक में अपना राज्य और ज़िला डालकर नज़दीकी एएलआईएमको केंद्र ढूंढना। कोई एनजीओ चाहे तो अपने इलाक़े में शिविर के लिए एएलआईएमको या मंत्रालय को औपचारिक अनुरोध भी भेज सकता है। यह विकल्प भी एएलआईएमको की अपनी जानकारी-पुस्तिका में दर्ज है।

अर्जुन पोर्टल: ऑनलाइन आवेदन यहां होता है, मित्रा ऐप की असली भूमिका अलग है

एक ऑनलाइन रास्ता भी है, पर उसका नाम वह नहीं है जो आमतौर पर बताया जाता है। दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग और एएलआईएमको का साझा पोर्टल अर्जुन, यानी adip.depwd.gov.in, एडीआईपी और वयोश्री दोनों योजनाओं के लिए साझा पंजीकरण मंच है। इस लेख ने यह पोर्टल 23 सितंबर 2026 को खुद खोलकर, कदम दर कदम, जांचा। पंजीकरण मुफ़्त है।

पंजीकरण की शुरुआत में योजना चुनने का विकल्प आता है, और उसमें राष्ट्रीय वयोश्री योजना अलग से सूचीबद्ध है। जिसके पास यूडीआईडी नंबर या उसका पंजीकरण नंबर है, वह मोबाइल नंबर डालकर ओटीपी से आगे बढ़ सकता है। जिसके पास यूडीआईडी नहीं है, पोर्टल उसे स्वावलंबन कार्ड की अलग वेबसाइट पर भेज देता है, ताकि वहां पहले यूडीआईडी बनवाया जाए। ज़्यादातर बुज़ुर्ग आवेदकों के पास दिव्यांगता का यूडीआईडी कार्ड पहले से नहीं होता। उनके लिए ऑनलाइन रास्ता एक और पड़ाव जोड़ देता है, सीधा नहीं रहता। स्वावलंबन कार्ड एक अलग प्रक्रिया है। यह शर्त योजना के अपने 2017 के दस्तावेज़ में नहीं है, जहां पहचान के लिए सिर्फ़ आधार या आधार-पंजीकरण की रसीद ही पर्याप्त बताई गई थी। हाल के वर्षों में बना डिजिटल ढांचा दस्तावेज़ से आगे निकल गया है, दस्तावेज़ को बदले बिना।

पोर्टल के अपने पहले पन्ने पर एक चार-चरण की तस्वीर भी है: नज़दीकी केंद्र पर जाना, आधार व आय प्रमाण के साथ मूल्यांकन कराना, उपकरण पाना, और मरम्मत के लिए बाद में आसरा केंद्र जाना। पोर्टल ख़ुद भी पहला क़दम दफ़्तर जाने का बताता है, फ़ॉर्म भरने का नहीं।

पोर्टल ख़ुद को पूरी तरह डिजिटल बताता है। पर उसके अपने बताए पहले क़दम में साफ़ लिखा है: नज़दीकी केंद्र पर जाकर आधार और आय प्रमाण दिखाना। डिजिटल होने का मतलब यहां रिकॉर्ड रखने और आगे बढ़ाने का तरीक़ा है। पूरी प्रक्रिया घर बैठे होना नहीं। पोर्टल के मुखपृष्ठ पर एक और उपयोगी कड़ी है, जांचे गए लाभार्थियों की खोज, जहां कोई भी यह देख सकता है कि किसी योजना में किसका नाम पहले से दर्ज है। एक विश्लेषणात्मक डैशबोर्ड भी है, जिसमें एडीआईपी, वयोश्री और सीएसआर तीनों के आंकड़े अलग-अलग देखे जा सकते हैं। ये दोनों कड़ियां जांच और पारदर्शिता के लिए हैं, नया आवेदन दर्ज करने के लिए नहीं।

पोर्टल पर एक लॉगिन विकल्प भी है, उन लोगों के लिए जो पहले पंजीकरण करा चुके हैं। वहां यूडीआईडी या आधार नंबर में से कोई एक चलता है, साथ में मोबाइल नंबर और कैप्चा। नए पंजीकरण में यह छूट नहीं है। वहां यूडीआईडी या उसका पंजीकरण नंबर अनिवार्य शर्त है, शुरू से ही। पोर्टल के डाउनलोड खंड में योजना के दिशा-निर्देश और उपयोगकर्ता पुस्तिकाएं भी रखी हैं, जिन्हें कोई भी बिना लॉगिन किए और बिना पंजीकरण का इंतज़ार किए पढ़ सकता है। ये दस्तावेज़ मुफ़्त हैं।

यहां एक आम भ्रम साफ़ करना ज़रूरी है। कई जगह लिखा मिलता है कि पंजीकरण एएलआईएमको मित्रा नाम की मोबाइल ऐप से होता है। एएलआईएमको की अपनी वेबसाइट और उसकी जानकारी-पुस्तिका, दोनों में मित्रा ऐप का काम कुछ और बताया गया है। यह उन लोगों के लिए है जिन्हें उपकरण मिल चुका है और शिकायत या मरम्मत दर्ज करानी है। ऐप गूगल प्ले स्टोर पर मुफ़्त मिलता है। इसके अलावा व्हाट्सऐप नंबर +91 9519268833 और +91 9519538833 पर भी शिकायत भेजी जा सकती है, या [email protected] पर ईमेल। नए आवेदन के लिए यह ऐप है ही नहीं। जो लेख या वेबसाइट इसे पंजीकरण का ज़रिया बताते हैं, वे एएलआईएमको के अपने विवरण से मेल नहीं खाते।

साथ ले जाने के काग़ज़, और एक तय फ़ॉर्म का न होना

जो भी रास्ता अपनाएं, कुछ काग़ज़ हर हाल में साथ चाहिए।

दस्तावेज़किस लिए
आधार कार्ड, या आधार-पंजीकरण की रसीदउम्र और पहचान
बीपीएल प्रमाण-पत्र, बीपीएल राशन कार्ड, या पुरानी पेंशन का काग़ज़ग़रीबी-रेखा साबित करने के लिए
तहसील, वृद्धावस्था पेंशन रिकॉर्ड, या सांसद-विधायक-ग्राम प्रधान का आय प्रमाण-पत्र15,000 रुपये से कम आय साबित करने के लिए, बीपीएल कार्ड न होने पर
सरकारी डॉक्टर का प्रमाण-पत्रकम दिखने, सुनने, दांत या चलने की दिव्यांगता के लिए
यूडीआईडी नंबर, अगर पहले से बना हैअर्जुन पोर्टल पर ऑनलाइन पंजीकरण के लिए
आधार पत्र का एक पुराना नमूना, ब्योरे निजता के लिए धुंधले किए गए; उम्र और पहचान दोनों इसी से साबित होते हैं
तस्वीर: Arjunaraoc, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

एक बात दस्तावेज़ में साफ़ लिखी है। आवेदन का ठीक-ठीक फ़ॉर्म और उसकी प्रक्रिया किसी एक तयशुदा साँचे में बंधी नहीं है। योजना का अपना नियम कहता है कि आवेदन का प्रोफ़ॉर्मा और तरीक़ा एएलआईएमको ख़ुद तय करेगा, स्थानीय हालात के हिसाब से जैसा उपयुक्त लगे। इसलिए हर राज्य या ज़िले में काग़ज़ी फ़ॉर्म का ठीक रूप अलग हो सकता है। कितनी प्रतियां चाहिए, यह भी किसी दस्तावेज़ में तय नहीं मिला।

योजना के दस्तावेज़ में एक नमूना रजिस्टर भी है, जिसे एएलआईएमको हर शिविर के बाद भरता है। इसके ख़ाने बताते हैं कि आख़िर में क्या-क्या दर्ज होगा: नाम, माता-पिता या पति का नाम, पता, उम्र, बीपीएल राशन कार्ड नंबर, आधार नंबर, दिव्यांगता का प्रकार, और दस्तख़त या अंगूठे का निशान। यह रजिस्टर आवेदक के भरने के लिए नहीं है, यह एएलआईएमको का अपना रिकॉर्ड है। पर इसके ख़ाने ही सबसे अच्छा संकेत देते हैं कि पूछा क्या जाएगा।

फ़ोटो की भी यही कहानी है। एएलआईएमको को जो रजिस्टर रखना होता है, उसमें हर लाभार्थी की तस्वीर का ख़ाना है। पर आवेदक को घर से पासपोर्ट-साइज़ फ़ोटो लाने का कोई निर्देश किसी दस्तावेज़ में नहीं मिला। इससे यही अंदाज़ा लगता है कि तस्वीर पंजीकरण या मूल्यांकन शिविर में ही खींची जाती है, हालांकि यह बात दस्तावेज़ में सीधे नहीं लिखी है।

मिलने वाले आठ उपकरण, और क़ीमत की सीमा तय करने का तरीक़ा

योजना आठ तरह के उपकरण देती है: छड़ी, कुहनी की बैसाखी, वॉकर या बैसाखी, ट्राइपॉड या क्वाडपॉड, सुनने की मशीन, व्हीलचेयर, नक़ली दांत, और चश्मा। हर उपकरण के लिए भुगतान की एक सीमा है, और यह सीमा दो में से जो कम हो, वही होती है: एएलआईएमको की अपनी तय क़ीमत, या बाज़ार की असल क़ीमत।

उपकरणक़ीमत कैसे तय होती है
छड़ी, कुहनी की बैसाखी, वॉकर, ट्राइपॉड-क्वाडपॉडएएलआईएमको की तय क़ीमत या असल लागत, जो कम हो
सुनने की मशीनएएलआईएमको की तय क़ीमत या असल लागत, जो कम हो
व्हीलचेयरएएलआईएमको की तय क़ीमत या असल लागत, जो कम हो
नक़ली दांतएएलआईएमको की तय क़ीमत या असल लागत, जो कम हो
चश्माएएलआईएमको की तय क़ीमत या असल लागत, जो कम हो

योजना का अपना दस्तावेज़ कहता है कि एएलआईएमको हर उपकरण की क़ीमत-सूची अपनी वेबसाइट पर छापेगी, विशेषताओं और मानकों के साथ। इस शोध में वह मौजूदा, उपकरण-दर-उपकरण सूची कहीं नहीं मिली। इसलिए यहां उसे छापा नहीं जा रहा। दस्तावेज़ में सिर्फ़ एक पुराना अनुमान है, हर लाभार्थी पर औसतन 7,000 रुपये, जो 2017 में लगाया गया था।

उपकरण की गुणवत्ता के लिए भी एक शर्त है। योजना का दस्तावेज़ कहता है कि जहां लागू हो, वहां हर उपकरण भारतीय मानक ब्यूरो के मानकों पर खरा उतरना चाहिए। जहां यह मानक लागू नहीं होता, वहां एएलआईएमको अपने विशेषज्ञों से गुणवत्ता जांच कराता है, और जांच पूरी होने के बाद ही उपकरण बांटे जाते हैं।

उपकरण के अलावा एक साल की मुफ़्त मरम्मत भी योजना का हिस्सा है। लागू करने वाली एजेंसी को यह मरम्मत ख़ुद देनी होती है, अलग से पैसा लिए बिना। शिविर के खर्च की भी सीमा है। निगरानी और मूल्यांकन पर कुल ख़र्च का पांच फ़ीसदी से ज़्यादा ख़र्च नहीं हो सकता। प्रशासनिक ख़र्च की सीमा दस फ़ीसदी है, और वितरण शिविर के अतिरिक्त ख़र्च की सीमा 25 लाख रुपये या असल लागत है, जो भी कम हो। परियोजना शुरू करने के लिए केंद्र सरकार एएलआईएमको को लागत का पचास फ़ीसदी तक पहले से भी दे सकती है, ताकि सामान जुटाने में देरी न हो। उपकरण की क़ीमत भले तय हो, शिविर चलाने का बजट भी एक ऊपरी सीमा में बंधा है।

कैंप के बाद का सार्वजनिक रिकॉर्ड, और इनकार पर चुप्पी

वितरण शिविर के बाद एक प्रमाण-पत्र बनता है, जिस पर एएलआईएमको और ज़िला प्रशासन दोनों दस्तख़त करते हैं। इसके बाद हर लाभार्थी का पूरा ब्योरा दोनों की वेबसाइट पर चढ़ाया जाता है: नाम, तस्वीर, उम्र, लिंग, माता-पिता या पति का नाम, बीपीएल राशन कार्ड नंबर, पता, फ़ोन नंबर, और दिव्यांगता का प्रकार, मिले उपकरण व उनकी क़ीमत भी। फ़ोन नंबर देना वैकल्पिक है। आधार नंबर वांछनीय है, अनिवार्य नहीं। यह योजना के अपने दस्तावेज़ में साफ़ लिखा नियम है, कोई अफ़वाह नहीं। यह ब्योरा वेबसाइट पर कितने समय तक टिकेगा, या हटाने का अनुरोध कैसे किया जा सकता है, इसका कोई ज़िक्र दस्तावेज़ में नहीं है।

जो परिवार आवेदन करने जा रहा है, उसे यह जान लेना चाहिए। लाभार्थी का नाम और तस्वीर, दोनों सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनेंगे। वितरण के बाद दस फ़ीसदी लाभार्थियों की एक नमूना जांच भी होती है, ताकि सामान ठीक जगह पहुंचा या नहीं, यह पता चल सके।

उपकरण ख़राब निकले तो शिकायत का रास्ता साफ़ है: टोल-फ़्री नंबर, मित्रा ऐप, या नज़दीकी आसरा केंद्र। एक सवाल का जवाब किसी दस्तावेज़ में नहीं मिला। कोई पात्र बुज़ुर्ग शिविर में गया, जांच हुई, और फिर भी आवेदन ठुकरा दिया गया, तो अपील किस दफ़्तर में होगी? इसका कोई तयशुदा रास्ता योजना के दस्तावेज़ या एएलआईएमको की जानकारी-पुस्तिका में दर्ज नहीं मिला। मूल्यांकन शिविर से वितरण शिविर तक कितने दिन लगने चाहिए, यह भी दर्ज नहीं। सिर्फ़ इतना लिखा है कि एएलआईएमको अपनी टीम वितरण शिविर से कम से कम सात कार्य-दिवस पहले भेजती है, तंबू और बैठक-व्यवस्था जैसी तैयारी के लिए।

एक ही मंत्रालय की एक अलग विज्ञप्ति में एल्डरलाइन, यानी नंबर 14567, का कार्यक्षेत्र गिनाया गया है, जिसमें कल्याण योजनाओं तक पहुंच का ज़िक्र भी शामिल है। यह वयोश्री योजना की अपनी अपील-व्यवस्था नहीं है। पर अटके हुए आवेदन के लिए अगला फ़ोन इसी नंबर पर किया जा सकता है।

योजना के नियमों में एक और सुरक्षा है, हालांकि वह आवेदक के लिए नहीं, सरकार के लिए है। केंद्र सरकार को लगे कि पैसा उस मक़सद के लिए ख़र्च नहीं हुआ जिसके लिए मंज़ूर हुआ था, तो वह रक़म ब्याज सहित एएलआईएमको से वापस ली जा सकती है, और आगे की मदद भी रुक सकती है। एएलआईएमको के खर्च का हिसाब हर साल सामान्य वित्तीय नियमों के तहत ऑडिट भी होता है। पैसे का हिसाब सिर्फ़ काग़ज़ पर नहीं रहता।

स्रोतभारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम (एएलआईएमको): राष्ट्रीय वयोश्री योजना का मूल योजना-दस्तावेज़, जुलाई 2017 में बना, सर्वर पर आख़िरी बार अक्तूबर 2020 में बदला गया, पत्र सूचना कार्यालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, 5 दिसंबर 2023: राष्ट्रीय वयोश्री योजना के क्रियान्वयन पर राज्यमंत्री प्रतिमा भौमिक का लोकसभा में लिखित जवाब, एएलआईएमको की आधिकारिक वेबसाइट, 22-23 सितंबर 2026 को देखी गई: योजनाओं की सूची, एएलआईएमको मित्रा ऐप का विवरण, अर्जुन पोर्टल का लिंक, एएलआईएमको की अपनी जानकारी-पुस्तिका (Information Guide & FAQ), 11 जून 2025 को बनी और अभी वेबसाइट पर मौजूद: दस्तावेज़, पंजीकरण के रास्ते, शिविर और शिकायत की जानकारी, अर्जुन: दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग और एएलआईएमको का साझा एडीआईपी-वयोश्री पोर्टल, 23 सितंबर 2026 को सीधे खोलकर जांचा गया, पत्र सूचना कार्यालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, 21 सितंबर 2026, शाम 5:09: अटल वयो अभ्युदय योजना और एल्डरलाइन के कार्यक्षेत्र पर विज्ञप्ति

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।