राष्ट्रीय वयोश्री योजना के नौ वित्त-वर्षों में साढ़े आठ लाख बुज़ुर्गों को उपकरण मिले, आबादी के हिसाब से यह आधे फ़ीसदी से भी कम बैठता है
सामाजिक न्याय मंत्रालय की सोमवार, 21 सितंबर की विज्ञप्ति एक साथ तीन योजनाओं के आंकड़े देती है, पर तीनों की अवधि अलग-अलग है: वयोश्री के नौ वित्त-वर्ष, एल्डरलाइन के पांच और देखभालकर्ता प्रशिक्षण के तीन। जनसंख्या अनुमान से जोड़कर देखने पर 8,53,728 का आंकड़ा 2026 की अनुमानित 17.32 करोड़ बुज़ुर्ग आबादी के आधे फ़ीसदी से भी कम बैठता है, जबकि 2011 की जनगणना में दर्ज दिव्यांग बुज़ुर्गों की 53.76 लाख की संख्या के मुक़ाबले यह लगभग सोलह फ़ीसदी है।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने सोमवार, 21 सितंबर की शाम 5 बजकर 9 मिनट पर एक विज्ञप्ति जारी की। इसमें बुज़ुर्गों के लिए तीन योजनाओं के आंकड़े थे: मुफ़्त सहायक उपकरण देने वाली राष्ट्रीय वयोश्री योजना, हेल्पलाइन एल्डरलाइन, और देखभालकर्ताओं का प्रशिक्षण। तीनों एक छतरी योजना, अटल वयो अभ्युदय, के हिस्से हैं। विज्ञप्ति का सबसे बड़ा आंकड़ा वयोश्री योजना का था: वित्त-वर्ष 2017-18 से 2025-26 तक 8,53,728 वरिष्ठ नागरिकों को 46,32,716 उपकरण मुफ़्त मिले। संख्या बड़ी दिखती है। पर बड़ी किसके मुक़ाबले, यह ख़ुद विज्ञप्ति में कहीं नहीं है।
आठ साल की बात करना आसान है। पर वयोश्री योजना नौ वित्त-वर्ष पुरानी है, एल्डरलाइन पांच साल की, और देखभालकर्ता प्रशिक्षण सिर्फ़ तीन वित्त-वर्ष का। अवधि अलग है, आधार भी अलग होना चाहिए। यह लेख तीनों को उनकी अपनी अवधि और उनके सामने खड़ी आबादी के हिसाब से अलग-अलग नापता है।
साढ़े आठ लाख बनाम बुज़ुर्ग आबादी: दो हिसाब, दो नतीजे
विज्ञप्ति ख़ुद कोई प्रतिशत नहीं देती। यह हिसाब कहीं और से आता है।
सामाजिक न्याय मंत्रालय ने ख़ुद 2 अगस्त 2022 को लोकसभा में एक लिखित जवाब दिया था, जिसमें राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग की ओर से गठित जनसंख्या प्रक्षेपण तकनीकी समूह की रिपोर्ट का हवाला है। उस जवाब के मुताबिक़ 2011 की जनगणना में देश में 60 साल या उससे ऊपर के वरिष्ठ नागरिकों की संख्या 10.38 करोड़ थी, कुल आबादी का 8.6 फ़ीसदी। उसी जवाब में वर्ष 2026 के लिए, यानी 1 मार्च 2026 तक के लिए, इस आबादी का प्रक्षेपण 17.32 करोड़ दिया गया है, कुल आबादी का 10.1 फ़ीसदी। यह प्रक्षेपण अकेला नहीं है। राष्ट्रीय वयोश्री योजना के अपने 2016-17 के मूल दस्तावेज़ में भी 2026 के लिए लगभग यही अनुमान दर्ज है। दोनों दस्तावेज़ एक ही तकनीकी समूह की रिपोर्ट का हवाला देते हैं, इसलिए यह टकराव नहीं, पुष्टि है।
8,53,728 को 17.32 करोड़ से बांटें तो जवाब 0.49 फ़ीसदी बैठता है। आधे फ़ीसदी से भी कम। नौ साल में देश के हर दूसरे सौ बुज़ुर्गों में से एक तक भी योजना नहीं पहुंची, अगर आधार पूरी बुज़ुर्ग आबादी को माना जाए। वही हिसाब 2011 की जनगणना के 10.38 करोड़ के पुराने आधार पर लगाया जाए तो जवाब 0.82 फ़ीसदी बैठता है। दोनों तरह से गिनें, फिर भी एक फ़ीसदी को आंकड़ा नहीं छूता।
पर यह आधार ग़लत है, क्योंकि वयोश्री योजना पूरी बुज़ुर्ग आबादी के लिए है ही नहीं। उसी 2 अगस्त 2022 के जवाब में एक और आंकड़ा है: 2011 की जनगणना के मुताबिक़ बुढ़ापे में किसी न किसी दिव्यांगता से पीड़ित वरिष्ठ नागरिकों की संख्या 53,76,619 थी, यानी कुल बुज़ुर्ग आबादी का 5.18 फ़ीसदी। यह आंकड़ा वयोश्री योजना की असल शर्त के कहीं ज़्यादा नज़दीक है। 8,53,728 को इस 53,76,619 से बांटने पर हिसाब पूरी तरह बदल जाता है: 15.88 फ़ीसदी, यानी हर छह में से क़रीब एक।
दोनों हिसाब सच हैं, और दोनों अधूरे। पहला पूरी बुज़ुर्ग आबादी को आधार बनाता है, जिसमें वे करोड़ों लोग भी शामिल हैं जो न बीपीएल हैं, न दिव्यांग, और जिन्हें योजना कभी लक्षित करती ही नहीं। दूसरा 2011 की गिनती है, पंद्रह साल पुरानी, और उसमें आय की कोई शर्त नहीं जुड़ी। योजना की असल पात्र आबादी, यानी बीपीएल या कम आय वाले और उम्र से जुड़ी दिव्यांगता वाले वरिष्ठ नागरिकों की सही गिनती, किसी सरकारी दस्तावेज़ में इस शोध के दौरान नहीं मिली। इसलिए दोनों अनुमान साथ दिए गए हैं, किसी एक को चुनकर नहीं।
ऐसा तीसरा, ज़्यादा सटीक अनुमान बनाने के लिए बीपीएल या कम आय वाले परिवारों की सूची को उम्र से जुड़ी दिव्यांगता के आंकड़ों से मिलाना पड़ेगा, ज़िला दर ज़िला। यह काम अकल्पनीय नहीं है; समाज कल्याण विभाग और स्वास्थ्य विभाग दोनों के पास इसके टुकड़े अलग-अलग मौजूद हैं। पर दोनों को जोड़कर एक राष्ट्रीय संख्या बनाने वाला कोई प्रकाशित दस्तावेज़ इस शोध में नहीं मिला।
2011 की जनगणना का एक और आंकड़ा दिशा देता है: देश के 70 फ़ीसदी से ज़्यादा वरिष्ठ नागरिक गांवों में रहते हैं। वयोश्री योजना के शिविर किन राज्यों या किन ज़िलों में लगे, इसका ब्योरा सोमवार की विज्ञप्ति में नहीं है।
पात्रता की शर्त: उम्र, आय-सीमा और मेडिकल सर्टिफ़िकेट
पात्रता की पहली शर्त उम्र है: 60 साल या उससे ऊपर, आधार कार्ड के साथ, या कम से कम आधार पंजीकरण की रसीद के साथ। यह न्यूनतम शर्त है, अकेली नहीं।

राष्ट्रीय वयोश्री योजना 1 अप्रैल 2017 को शुरू हुई तो इसका दायरा सिर्फ़ बीपीएल श्रेणी के वरिष्ठ नागरिकों तक था। यह मंत्रालय के 5 दिसंबर 2023 के एक और लोकसभा जवाब में दर्ज है। 2020-21 में योजना संशोधित हुई। संशोधन के बाद बीपीएल कार्ड न होने पर भी कोई वरिष्ठ नागरिक पात्र है, बशर्ते उसकी मासिक आय 15,000 रुपये से ज़्यादा न हो। यह शर्त सोमवार की विज्ञप्ति में दोहराई नहीं गई, पर उसे बदलने वाला कोई नया दस्तावेज़ भी इस शोध में नहीं मिला।
आय या बीपीएल स्थिति के अलावा दूसरी शर्त सेहत की है। योजना का मूल दस्तावेज़ चार तरह की उम्र से जुड़ी दिव्यांगता या दुर्बलता गिनाता है: कम दिखना, सुनने में दिक़्क़त, दांत का न होना, और चलने-फिरने की दिव्यांगता जिसमें व्हीलचेयर चाहिए। इन चारों के लिए किसी सरकारी डॉक्टर का प्रमाण-पत्र ज़रूरी है। बाक़ी छोटे उपकरणों के लिए, जैसे चश्मा या छड़ी, लागू करने वाली एजेंसी ख़ुद पात्रता तय कर सकती है।
तीन और शर्तें कम चर्चित हैं। एक, पिछले तीन साल में उसी उपकरण को किसी और सरकारी योजना से मुफ़्त पा चुका व्यक्ति दोबारा पात्र नहीं, सिवाय ख़राब उपकरण बदलवाने के। दो, हर राज्य में कम से कम 30 फ़ीसदी लाभार्थी महिलाएं होनी चाहिए। तीन, अनुसूचित जाति और जनजाति के लाभार्थियों का हिस्सा उस ज़िले में उनकी आबादी के हिस्से से कम नहीं हो सकता। तीनों शर्तें योजना के मूल दस्तावेज़ में हैं, कोटे के तौर पर नहीं बल्कि न्यूनतम गारंटी के तौर पर।
उपकरण की सूची आठ चीज़ों की है: छड़ी, कुहनी की बैसाखी, वॉकर, ट्राइपॉड या क्वाडपॉड, श्रवण यंत्र, व्हीलचेयर, नक़ली दांत, और चश्मा। हर उपकरण की क़ीमत की एक ऊपरी सीमा है। असल भुगतान या तो एएलआईएमको की तय क़ीमत के बराबर होता है, या बाज़ार की असल क़ीमत के, जो भी दोनों में कम हो। एक ही व्यक्ति में एक से ज़्यादा दिव्यांगता हो तो हर एक के लिए अलग उपकरण मिलता है, अलग सीमा के साथ।
फ़ैसला ज़िला समिति का, पैसा सीधे एएलआईएमको तक
वयोश्री योजना के लागू होने की ज़िम्मेदारी तीन तहों में बंटी है। सबसे ऊपर सामाजिक न्याय मंत्रालय है, जो पैसा देता है और नीति तय करता है। बीच में राज्य का नोडल विभाग है, आमतौर पर समाज कल्याण विभाग। सबसे नीचे, और सबसे अहम, ज़िला स्तर की एक समिति है।
यह समिति ज़िलाधिकारी या उपायुक्त की अध्यक्षता में बनती है। इसमें ज़िले का मुख्य चिकित्सा अधिकारी, समाज कल्याण अधिकारी, महिला एवं बाल विकास विभाग का संयुक्त निदेशक, और ज़िला परिषद का मुख्य कार्यकारी अधिकारी सदस्य होते हैं। शहरी इलाक़ों में नगर आयुक्त भी इसमें शामिल होता है। लाभार्थियों को चुनने, योजना लागू करने और उसकी निगरानी करने का काम इसी समिति का है। यह ढांचा योजना के 2016-17 के मूल दस्तावेज़ में दर्ज है, और सोमवार की विज्ञप्ति में इसका कोई ज़िक्र नहीं। समिति चाहे तो बीपीएल राशन कार्ड या इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन जैसी योजनाओं के मौजूदा आंकड़े लाभार्थी चुनने के लिए इस्तेमाल कर सकती है, अलग से सर्वे किए बिना। मूल दस्तावेज़ ज़िलों को चुनने का झुकाव भी तय करता है: पिछड़े और ग्रामीण इलाक़ों को प्राथमिकता, और वृद्धाश्रमों में रहने वाले बुज़ुर्गों को भी। यह उसी 70 फ़ीसदी ग्रामीण हिस्से से मेल खाता है जो 2011 की जनगणना में दर्ज है।

पैसे का रास्ता ज़्यादा सीधा है। दिसंबर 2023 के लोकसभा जवाब में मंत्रालय ने साफ़ लिखा: वयोश्री योजना के तहत राज्यों या केंद्रशासित प्रदेशों को कोई फंड आवंटित करने का प्रावधान ही नहीं है। पूरा पैसा सीधे भारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम, यानी एएलआईएमको को जाता है, जो अकेली लागू करने वाली एजेंसी है। यह पैसा केंद्र सरकार के वरिष्ठ नागरिक कल्याण कोष से आता है। राज्यों का कोई अंशदान नहीं होता। योजना के नियम इस पैसे के इस्तेमाल पर भी सीमा लगाते हैं: निगरानी और मूल्यांकन पर कुल ख़र्च का ज़्यादा से ज़्यादा पांच फ़ीसदी, प्रशासनिक ख़र्च पर ज़्यादा से ज़्यादा दस फ़ीसदी, और वितरण शिविर के अतिरिक्त ख़र्च पर 25 लाख रुपये या असल लागत, जो भी कम हो। परियोजना शुरू करने के लिए एएलआईएमको को पचास फ़ीसदी तक रक़म पहले से भी मिल सकती है।
योजना के अपने 2016-17 के दस्तावेज़ में हर लाभार्थी पर औसत ख़र्च का अनुमान 7,000 रुपये लगाया गया था। यह उस वक़्त सिर्फ़ एक अनुमान था। सात साल बाद का एक आंकड़ा इसे परखने का मौक़ा देता है। दिसंबर 2023 के लोकसभा जवाब के मुताबिक़ बिहार में तब तक 7,205 वरिष्ठ नागरिकों को 505.43 लाख रुपये मूल्य के उपकरण मिल चुके थे। इसे बांटने पर प्रति लाभार्थी लागत 7,016 रुपये बैठती है, यानी 2016 के अनुमान से महज़ सोलह रुपये ज़्यादा। सात साल में लागत लगभग जस की तस रही, जबकि योजना के शिविरों का आकार कई गुना बढ़ गया।
शिविर दो चरणों में लगते हैं। पहला मूल्यांकन शिविर, जहां एएलआईएमको दिव्यांगता या दुर्बलता के हिसाब से ज़रूरी उपकरण तय करता है। दूसरा वितरण शिविर, जहां तय किए गए उपकरण दिए जाते हैं। दोनों शिविरों के बीच का समय कितना रहा, इसका कोई राष्ट्रीय औसत सार्वजनिक दस्तावेज़ों में नहीं मिला।
नौ वित्त-वर्ष: महामारी का गड्ढा और 2025-26 का रिकॉर्ड
राष्ट्रीय वयोश्री योजना के नौ वित्त-वर्षों का पूरा ब्योरा सोमवार की विज्ञप्ति में साल-दर-साल दिया गया है।
| वित्त-वर्ष | शिविर | लाभार्थी | उपकरण |
|---|---|---|---|
| 2017-18 | 26 | 34,293 | 1,14,661 |
| 2018-19 | 69 | 64,701 | 5,09,113 |
| 2019-20 | 43 | 44,476 | 2,73,460 |
| 2020-21 | 51 | 18,177 | 1,36,286 |
| 2021-22 | 49 | 40,906 | 2,73,589 |
| 2022-23 | 40 | 97,274 | 6,13,488 |
| 2023-24 | 83 | 63,331 | 3,18,874 |
| 2024-25 | 72 | 1,54,172 | 7,50,971 |
| 2025-26 | 156 | 3,36,398 | 16,42,274 |
यह नौ वित्त-वर्षों का आंकड़ा है, आठ का नहीं। तालिका में 2017-18 से 2025-26 तक कुल नौ पंक्तियां हैं, क्योंकि योजना 1 अप्रैल 2017 को शुरू हुई थी।

2020-21 सबसे कमज़ोर साल रहा, हालांकि शिविरों की संख्या, 51, पिछले साल के 43 से ज़्यादा थी। लाभार्थी फिर भी घटकर 18,177 रह गए, पिछले साल के 44,476 से क़रीब आधे। यह महामारी का साल था। देश भर में सार्वजनिक शिविर लगाना उस साल मुश्किल रहा, हालांकि विज्ञप्ति ख़ुद यह वजह नहीं बताती।
2025-26 दूसरी दिशा में असाधारण है। सोमवार की विज्ञप्ति 21 सितंबर 2026 को जारी हुई, वित्त-वर्ष 2025-26 ख़त्म होने के लगभग छह महीने बाद। इसलिए इस साल के 156 शिविर, 3,36,398 लाभार्थी और 16,42,274 उपकरण किसी अधूरे साल का अनुमान नहीं हैं। यह पूरे साल का दर्ज आंकड़ा है। यह पिछले नौ में से किसी भी साल से दोगुने से ज़्यादा है: शिविर पिछले साल के मुक़ाबले 2.17 गुना, लाभार्थी 2.18 गुना, उपकरण 2.19 गुना। तीनों संख्याएं लगभग एक ही अनुपात में बढ़ी हैं। इसका मतलब यह भी है कि हर शिविर का औसत आकार बढ़ा, सिर्फ़ शिविरों की गिनती नहीं। 2017-18 में हर शिविर औसतन 1,319 लाभार्थियों तक पहुंचा। 2025-26 में यह औसत बढ़कर 2,156 हो गया। विज्ञप्ति इस उछाल की कोई वजह नहीं देती।
पूरे नौ साल में 46,32,716 उपकरण 8,53,728 लोगों में बंटे, यानी औसतन हर लाभार्थी को 5.43 उपकरण मिले। यह अनुपात हर साल एक जैसा नहीं रहा; यह पहले साल के 3.34 से बढ़कर दूसरे साल 7.87 तक गया और फिर धीरे-धीरे 2025-26 के 4.88 पर टिका। योजना का वह नियम, जो एक ही व्यक्ति में कई दिव्यांगताएं होने पर हर एक के लिए अलग उपकरण देने की बात करता है, इस औसत को समझाने में मदद करता है, हालांकि पूरा अंतर नहीं।
एल्डरलाइन के पांच साल: उनतीस लाख कॉल का हिसाब
एल्डरलाइन, यानी नंबर 14567, 1 अक्टूबर 2021 को देश को समर्पित हुई। यह वयोश्री योजना से चार साल छोटी है, महज़ पांच वित्त-वर्ष की: 2021-22 से 2025-26 तक। इसमें पहला साल, 2021-22, ख़ुद पूरा नहीं है, क्योंकि हेल्पलाइन उस वित्त-वर्ष के आधे रास्ते में, अक्टूबर में शुरू हुई। पांच वित्त-वर्षों की फ़ंडिंग में पहला साल इसलिए बाक़ी चार से छोटा गिना जाना चाहिए, भले विज्ञप्ति उन्हें एक साथ जोड़ती है।
विज्ञप्ति के मुताबिक़ यह हेल्पलाइन मुफ़्त जानकारी, मार्गदर्शन, भावनात्मक सहारा और ज़मीनी स्तर पर सुधारात्मक कार्रवाई मुहैया कराती है। इसका काम दुर्व्यवहार, परित्याग, बचाव, भावनात्मक संकट और कल्याण योजनाओं तक पहुंच से जुड़े मामलों में है। यह लगभग सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में काम करती है।
पांच वित्त-वर्षों में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल डिफ़ेंस, यानी एनआईएसडी, को इस काम के लिए 162.21 करोड़ रुपये जारी हुए। इसी अवधि में हेल्पलाइन पर 29 लाख से ज़्यादा कॉल आईं। 162.21 करोड़ को 29 लाख से बांटें तो हर कॉल पर औसतन 559 रुपये से कम बैठता है। यह ऊपरी सीमा है, क्योंकि असल कॉल इस 29 लाख से ज़्यादा भी हो सकती हैं।
यह रक़म सिर्फ़ फ़ोन उठाने की लागत नहीं है। इसमें बचाव अभियान, काउंसलिंग और मैदानी हस्तक्षेप का ख़र्च भी शामिल है। कितने कॉल सिर्फ़ जानकारी मांगने के थे, और कितने वाक़ई किसी बचाव अभियान में बदले, यह बंटवारा सोमवार की विज्ञप्ति में नहीं है।
देखभालकर्ता प्रशिक्षण: पैंतीस हज़ार, मांग के अनुमान का अभाव
तीसरा घटक सबसे नया है। बुज़ुर्गों की देखभाल करने वालों को प्रशिक्षित करने की योजना वित्त-वर्ष 2023-24 में शुरू हुई। यह सिर्फ़ तीन वित्त-वर्ष पुरानी है: 2023-24, 2024-25 और 2025-26।
इन तीन साल में 35,480 लोग प्रशिक्षित हुए। इसी अवधि में एनआईएसडी को 81.34 करोड़ रुपये जारी हुए, यानी प्रति प्रशिक्षु औसतन क़रीब 22,930 रुपये का ख़र्च। यह प्रशिक्षण पेशेवर देखभालकर्ता तैयार करने के मक़सद से शुरू हुआ, ताकि बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके।
एक सवाल बाक़ी रह जाता है। पैंतीस हज़ार प्रशिक्षित देखभालकर्ता ज़्यादा हैं या कम? यह तभी पता चलेगा जब भारत में प्रशिक्षित बुज़ुर्ग-देखभालकर्ताओं की असल ज़रूरत का कोई सत्यापित सरकारी अनुमान मौजूद हो। इस शोध में ऐसा कोई अनुमान किसी प्राथमिक सरकारी दस्तावेज़ में नहीं मिला। निजी और शोध स्रोतों में जो आंकड़े मिलते हैं, वे आपस में इतने अलग हैं कि किसी एक की परख किए बिना उन्हें छापना ग़लत होगा। यह तुलना इसलिए यहां नहीं की जा रही। यह एक खुला सवाल है।
तीन योजनाएँ, एक छतरी: अटल वयो अभ्युदय योजना
सोमवार की विज्ञप्ति के आख़िरी वाक्य में मंत्रालय यही जोड़ता है: सहायक उपकरण, सुलभ हेल्पलाइन और प्रशिक्षित देखभालकर्ता मिलकर वरिष्ठ नागरिकों के लिए सुरक्षित, स्वस्थ और स्वतंत्र जीवन का एक व्यापक सहयोग तंत्र बनाते हैं। तीनों को अटल वयो अभ्युदय योजना नाम की एक छतरी के नीचे रखा गया है।
तीनों की बनावट अलग है। वयोश्री योजना एक बार का लाभ है: उपकरण एक शिविर में मिलता है, और वहीं ख़त्म हो जाता है। एल्डरलाइन बार-बार इस्तेमाल होने वाली सेवा है, ज़रूरत पड़ने पर कभी भी। देखभालकर्ता प्रशिक्षण किसी बुज़ुर्ग को सीधे कुछ नहीं देता। यह किसी और को प्रशिक्षित करता है जो बुज़ुर्ग की देखभाल करे। एक को ज़मीन पर शिविर चाहिए, दूसरे को सिर्फ़ एक फ़ोन लाइन, तीसरे को कोई प्रशिक्षण संस्थान। तीनों की पहुंच का तरीक़ा उतना ही अलग है जितना उनका मक़सद।
तीनों का पैसा भी अलग-अलग रास्तों से बहता है। वयोश्री का पैसा एएलआईएमको को शिविर लगाने के लिए जाता है। एल्डरलाइन और देखभालकर्ता प्रशिक्षण का पैसा एनआईएसडी को जाता है, जो एक अलग संस्था है। तीनों एक ही मंत्रालय की एक ही विज्ञप्ति में हैं, पर तीन अलग एजेंसियां उन्हें ज़मीन पर उतारती हैं।
छतरी योजना का तर्क यह है कि एक ही बुज़ुर्ग व्यक्ति की ज़िंदगी में तीनों जगह बन सकती है: चलने में दिक़्क़त के लिए उपकरण, किसी संकट में हेल्पलाइन, और रोज़मर्रा की देखभाल के लिए प्रशिक्षित हाथ। पर विज्ञप्ति यह नहीं बताती कि कितने लोगों को एक से ज़्यादा घटक का फ़ायदा मिला। तीनों आंकड़े अलग-अलग गिने और छापे गए हैं, जोड़े हुए नहीं।
विज्ञप्ति की चुप्पी: तीन अनुत्तरित सवाल
तीन सवाल इस विज्ञप्ति के अपने आंकड़ों से उठते हैं, और तीनों का जवाब इसी दस्तावेज़ में नहीं है।
पहला: क्या 8,53,728 अलग-अलग लोग हैं, या इसमें कोई दोहराव है? योजना का नियम किसी को एक ही उपकरण तीन साल के भीतर दोबारा पाने से रोकता है। पर तीन साल बाद, या किसी दूसरे उपकरण के लिए, वही व्यक्ति दोबारा गिना जा सकता है। नौ साल के आंकड़े में ऐसा हुआ या नहीं, यह विज्ञप्ति नहीं बताती।
दूसरा: शिविर किन राज्यों और किन ज़िलों में लगे, इसका ब्योरा सोमवार की विज्ञप्ति में सिरे से नहीं है। दिसंबर 2023 के जवाब में बिहार जैसे अलग-अलग राज्यों के आंकड़े मौजूद थे। मौजूदा विज्ञप्ति सिर्फ़ राष्ट्रीय जोड़ देती है।
तीसरा: 2025-26 में शिविरों और लाभार्थियों की संख्या पिछले साल से दोगुने से ज़्यादा क्यों हुई, इसकी कोई वजह दर्ज नहीं है। बजट बढ़ा, नए ज़िले जुड़े, या मूल्यांकन का तरीक़ा बदला, तीनों संभव हैं। तीनों अपुष्ट हैं।
इन ख़ालीपन के बावजूद जो आंकड़े दिए गए हैं, वे नौ साल तक लगातार, हर वित्त-वर्ष के लिए अलग-अलग दर्ज किए गए हैं। यह लगातार दर्ज होना बताता है कि हर शिविर, हर लाभार्थी और हर उपकरण की गिनती किसी न किसी स्तर पर होती रही है। सवाल गिनती के होने का नहीं है। सवाल उसके पूरा प्रकाशित न होने का है।
स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, 21 सितंबर 2026, शाम 5:09: सहायक उपकरण, एल्डरलाइन और प्रशिक्षित देखभालकर्ताओं पर विज्ञप्ति (अंग्रेज़ी), पत्र सूचना कार्यालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, 21 सितंबर 2026, शाम 5:09: वही विज्ञप्ति हिंदी में, पत्र सूचना कार्यालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, 2 अगस्त 2022: वरिष्ठ नागरिकों की जनसंख्या पर राज्यमंत्री प्रतिमा भौमिक का लोकसभा में लिखित जवाब, पत्र सूचना कार्यालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, 5 दिसंबर 2023: राष्ट्रीय वयोश्री योजना के क्रियान्वयन पर राज्यमंत्री प्रतिमा भौमिक का लोकसभा में लिखित जवाब, भारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम (एएलआईएमको): राष्ट्रीय वयोश्री योजना का मूल योजना-दस्तावेज़, 2016-17