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काम की बात

सरकारी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु हो जाए तो परिवार को क्या-क्या मिलता है, और कहाँ से माँगना पड़ता है

पारिवारिक पेंशन पहले दस साल आख़िरी वेतन की आधी मिलती है, चाहे नौकरी कितनी भी छोटी रही हो। मृत्यु उपदान के लिए पाँच साल की न्यूनतम सेवा की शर्त नहीं है। और अनुकंपा नियुक्ति सबसे धीमा रास्ता है।

रात में नॉर्थ ब्लॉक, केंद्रीय सचिवालय, नई दिल्ली
तस्वीर: एडमंड गॉल, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 2.0

जिस परिवार में कोई सरकारी कर्मचारी अचानक चला जाता है, वहाँ पहले हफ़्ते में कोई काग़ज़ नहीं देखता।

और यही वह हफ़्ता है जिसमें कुछ काग़ज़ शुरू हो जाने चाहिए, क्योंकि हर एक की अपनी क़तार है।

यह लेख उन सब चीज़ों को एक जगह रखता है जो केंद्र सरकार के कर्मचारी की सेवाकाल में मृत्यु पर उसके परिवार को मिलनी हैं। यह किसी एक मामले की सलाह नहीं है, क्योंकि नियम सेवा, समूह और नियुक्ति की तारीख़ से बदलते हैं। यह उस सूची की तरह है जो हाथ में होनी चाहिए, ताकि दफ़्तर में सही चीज़ माँगी जा सके।

एक बुनियादी बात पहले

सरकारी कर्मचारी के परिवार को जो मिलता है, वह एक चीज़ नहीं है। वह कई अलग-अलग चीज़ें हैं, जो अलग-अलग नियमों से आती हैं।

पारिवारिक पेंशन पेंशन नियमों से आती है। मृत्यु उपदान भी उन्हीं से, पर अलग धारा से। समूह बीमा एक अलग योजना है। भविष्य निधि का शेष एक अलग खाता है। अवकाश नक़दीकरण सेवा नियमों से आता है। और अनुकंपा नियुक्ति एक अलग नीति है।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि इनमें से किसी एक का मिल जाना बाक़ी के मिल जाने का सबूत नहीं है। हर एक को अलग से पूछना पड़ता है।

दूसरी बुनियादी बात यह है कि इनमें से ज़्यादातर के लिए पहला दरवाज़ा एक ही है: उस कर्मचारी के दफ़्तर का कार्यालय प्रमुख। वही व्यक्ति है जिसे सेवा रिकॉर्ड भेजना है, वही जिसे फ़ॉर्म देने हैं, और वही जिससे मामले की स्थिति पूछी जा सकती है।

एक: पारिवारिक पेंशन

यह सबसे बड़ी और सबसे लंबी चलने वाली चीज़ है, और इसमें एक प्रावधान ऐसा है जो कम लोगों को पता होता है।

सामान्य दर पर पारिवारिक पेंशन आख़िरी वेतन का 30 फ़ीसदी होती है।

पर सेवा के दौरान मृत्यु होने पर पहले दस साल बढ़ी हुई दर लागू होती है, जो आख़िरी वेतन का 50 फ़ीसदी है। यह मृत्यु की तारीख़ के अगले दिन से शुरू होती है।

अब वह हिस्सा जो सबसे ज़्यादा मायने रखता है। संशोधित नियम के अनुसार यह बढ़ी हुई दर दस साल तक हर मामले में मिलती है, चाहे मृत कर्मचारी की सेवा कितनी भी लंबी या छोटी रही हो।

यानी जिसकी नौकरी को तीन साल हुए थे, उसके परिवार को भी पहले दस साल आधा वेतन मिलेगा।

दस साल बाद यह घटकर 30 फ़ीसदी हो जाती है और जीवन भर चलती है।

पारिवारिक पेंशन पहले पति या पत्नी को मिलती है। उनके बाद यह बच्चों को जाती है, और उसमें उम्र तथा विवाह से जुड़ी शर्तें लगती हैं। दिव्यांग संतान के लिए अलग और उदार प्रावधान हैं, जिनमें पात्रता आजीवन रह सकती है। कुछ शर्तों में आश्रित माता-पिता भी आते हैं।

फ़ॉर्म का नाम याद रखने लायक़ है। सरकारी कर्मचारी की मृत्यु पर पारिवारिक पेंशन का आवेदन फ़ॉर्म 14 पर होता है।

दो: मृत्यु उपदान

यह एकमुश्त रक़म है और इसकी सबसे अहम बात यह है कि इसमें कोई न्यूनतम सेवा की शर्त नहीं है।

सेवानिवृत्ति उपदान के लिए पाँच साल की अर्हक सेवा चाहिए। मृत्यु के मामलों में यह शर्त लागू नहीं होती।

रक़म सेवा की लंबाई से तय होती है, और स्लैब इस तरह चलते हैं। एक साल से कम सेवा पर परिलब्धियों का दोगुना। एक साल से पाँच साल तक छह गुना। पाँच साल से ग्यारह साल तक बारह गुना। ग्यारह से बीस साल तक बीस गुना। और बीस साल से ऊपर, हर पूरे छमाही काल के लिए आधी परिलब्धियाँ, अधिकतम तैंतीस गुना तक।

यहाँ एक ईमानदार चेतावनी ज़रूरी है। कुछ सारांशों में बीच के दो स्लैब मिलाकर एक कर दिए जाते हैं और पाँच से बीस साल तक बारह गुना लिख दिया जाता है। अंतर बड़ा है, इसलिए अपने मामले की गणना दफ़्तर से लिखित में लेनी चाहिए, किसी सारांश से नहीं।

ऊपरी सीमा भी बदल चुकी है। महँगाई भत्ता मूल वेतन के 50 फ़ीसदी तक पहुँचने पर यह सीमा 20 लाख रुपये से बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दी गई, और यह 1 जनवरी 2024 को या उसके बाद सेवानिवृत्त होने वाले तथा सेवा में मरने वाले सभी कर्मचारियों पर लागू है।

दिन में केंद्रीय सचिवालय की इमारत, नई दिल्ली
तस्वीर: मुकुलफ़ैज़, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

"परिलब्धियाँ" और "आख़िरी वेतन" का मतलब

इन नियमों को पढ़ते समय दो शब्द बार-बार आते हैं, और उनका मतलब वह नहीं है जो हाथ में आने वाली तनख़्वाह है।

उपदान की गणना जिन परिलब्धियों पर होती है, उनमें मूल वेतन और महँगाई भत्ता आता है। मकान किराया भत्ता, यात्रा भत्ता और दूसरे भत्ते आमतौर पर नहीं आते।

पारिवारिक पेंशन की गणना भी आम तौर पर मूल वेतन पर होती है, और उस पर अलग से महँगाई राहत जुड़ती है, जो साल में दो बार संशोधित होती है।

इसका सीधा असर यह है कि जो परिवार अपने अनुमान हाथ में आने वाली तनख़्वाह से लगाता है, उसे मिलने वाली रक़म कम लगती है, और जो अनुमान सिर्फ़ मूल वेतन से लगाता है, उसे महँगाई राहत जुड़ने पर ज़्यादा।

इसलिए दफ़्तर से जो गणना पत्रक मिले, उसमें यह ज़रूर देखिए कि किन-किन मदों को जोड़ा गया है।

एक और बात। महँगाई राहत पारिवारिक पेंशन पर आजीवन जुड़ती रहती है, यानी वह रक़म समय के साथ बढ़ती है। एकमुश्त मिलने वाली रक़मों पर ऐसा कुछ नहीं होता, वे उसी दिन की क़ीमत की होती हैं जिस दिन मिलती हैं।

तीन: समूह बीमा

केंद्रीय सरकार कर्मचारी समूह बीमा योजना 1 जनवरी 1982 से चल रही है और यह अनिवार्य है। हर महीने वेतन से एक छोटी रक़म कटती है।

इस कटौती के दो हिस्से होते हैं। एक हिस्सा बीमा का है और दूसरा बचत का, और मोटे तौर पर तीस फ़ीसदी बीमा में और सत्तर फ़ीसदी बचत में जाता है।

फ़र्क़ यह है कि सेवा के दौरान मृत्यु पर परिवार को बीमा की पूरी राशि मिलती है, साथ में बचत खाते का जमा।

रक़म कर्मचारी के समूह पर निर्भर करती है और समूह क से समूह घ तक अलग-अलग है।

यह रक़म उसे मिलती है जिसके नाम पर वैध नामांकन दर्ज हो।

यहीं एक बात रुककर कहने लायक़ है, और वह इस पूरे लेख की सबसे उपयोगी पंक्ति हो सकती है। नामांकन का काग़ज़ मृत्यु के बाद नहीं बदला जा सकता। जिस कर्मचारी ने नौकरी में आते समय जो नाम लिखा और फिर कभी नहीं बदला, उसी नाम पर पैसा जाएगा, चाहे उसके बाद शादी हुई हो, तलाक़ हुआ हो या वह व्यक्ति गुज़र चुका हो।

अगर आप सरकारी नौकरी में हैं और यह पढ़ रहे हैं, तो अपना नामांकन एक बार देख लेना पूरे परिवार के लिए सबसे सस्ता बीमा है।

चार: भविष्य निधि और अवकाश नक़दीकरण

ये दोनों उस कर्मचारी का अपना पैसा हैं, इसलिए इनमें पात्रता का सवाल नहीं होता, सिर्फ़ प्रक्रिया का।

भविष्य निधि का पूरा शेष नामांकित व्यक्ति को मिलता है। पुरानी पेंशन व्यवस्था वाले कर्मचारी के लिए यह सामान्य भविष्य निधि है। जो कर्मचारी राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली में हैं, उनके लिए व्यवस्था अलग है और उसमें मृत्यु पर मिलने वाले विकल्पों की अपनी शर्तें हैं। किस व्यवस्था में कौन है, यह नियुक्ति की तारीख़ से तय होता है, और यही पहला सवाल दफ़्तर से पूछना चाहिए।

अवकाश नक़दीकरण उन अर्जित छुट्टियों का पैसा है जो कर्मचारी ने नहीं ली थीं। इसकी एक ऊपरी सीमा होती है।

पाँच: अनुकंपा नियुक्ति

यह सबसे ज़्यादा उम्मीद जगाने वाला और सबसे कम भरोसेमंद रास्ता है, और इस लेख का काम यही कहना है।

नीति यह है कि मृत कर्मचारी के आश्रित परिवार के किसी सदस्य को सरकारी नौकरी दी जा सकती है, ताकि परिवार तत्काल संकट से निकल सके।

इसमें दो शब्द ध्यान से पढ़िए: "जा सकती है" और "तत्काल संकट"।

यह अधिकार नहीं है। यह विवेकाधीन है, और अदालतों ने बार-बार कहा है कि यह पद पाने का कोई निहित हक़ नहीं देता।

इसकी अपनी सीमाएँ हैं। सीधी भर्ती की रिक्तियों का एक छोटा प्रतिशत ही इसके लिए रखा जाता है, आवेदन की समयसीमा होती है, और परिवार की आर्थिक स्थिति देखी जाती है। जिस परिवार को अच्छी पारिवारिक पेंशन और बड़ा उपदान मिल रहा हो, उसका मामला कमज़ोर माना जा सकता है।

इसलिए व्यावहारिक सलाह यह है कि इस रास्ते पर आवेदन ज़रूर कीजिए और समयसीमा के भीतर कीजिए, पर बाक़ी चारों चीज़ों को इसके भरोसे मत छोड़िए।

वाराणसी के एक डाकघर का भीतरी हिस्सा
तस्वीर: होर्हे रोयान, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

और कुछ चीज़ें जो सूची में नहीं आतीं

तीन चीज़ें ऐसी हैं जिनके बारे में कोई नहीं बताता और जो बाद में महँगी पड़ती हैं।

पहली, चिकित्सा सुविधा। पारिवारिक पेंशन पाने वाले आमतौर पर केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना में बने रह सकते हैं, पर इसके लिए अलग से कार्ड बनवाना और अंशदान देना होता है। जो परिवार यह नहीं कराता, वह इलाज के समय पाता है कि सुविधा अपने-आप नहीं चलती रहती।

दूसरी, सरकारी आवास। सेवा में मृत्यु होने पर परिवार को मकान ख़ाली करने के लिए एक निर्धारित अवधि मिलती है, जो सामान्य से ज़्यादा होती है। यह अवधि कितनी है, यह पूछकर लिख लेना चाहिए, क्योंकि उसके बाद क्षति भुगतान लगने लगता है।

तीसरी, बकाया वेतन और यात्रा भत्ते जैसे छोटे दावे, जो अलग फ़ाइल में चलते हैं और अक्सर सबसे आख़िर में निपटते हैं।

अगर मृत कर्मचारी राज्य सरकार का था

यह लेख केंद्र सरकार के नियमों पर है, और यह साफ़ कह देना ज़रूरी है।

हर राज्य के अपने पेंशन नियम हैं। ज़्यादातर राज्यों के नियम केंद्रीय नियमों के ढाँचे पर बने हैं, इसलिए मोटी बनावट वही रहती है: पारिवारिक पेंशन बढ़ी हुई दर पर एक तय अवधि के लिए, फिर सामान्य दर पर; मृत्यु उपदान सेवा की लंबाई के स्लैब पर; समूह बीमा; भविष्य निधि।

पर संख्याएँ अलग होती हैं। बढ़ी हुई दर की अवधि अलग हो सकती है, उपदान की ऊपरी सीमा अलग होती है, और अनुकंपा नियुक्ति की नीति तो हर राज्य की अपनी है।

सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों और स्वायत्त निकायों के अपने नियम होते हैं, जो सरकारी नियमों से मिलते-जुलते हो सकते हैं पर एक जैसे नहीं होते।

इसलिए इस लेख की सूची को ढाँचे की तरह इस्तेमाल कीजिए और हर संख्या अपने दफ़्तर से लिखित में लीजिए। मौखिक जानकारी पर कोई दावा नहीं टिकता।

प्रक्रिया कहाँ से शुरू होती है

पहला काम मृत्यु प्रमाणपत्र की कई प्रमाणित प्रतियाँ बनवाना है। हर दावा अपनी एक प्रति माँगेगा।

दूसरा काम कार्यालय प्रमुख को लिखित सूचना देना है, ताकि सेवा रिकॉर्ड और पेंशन का मामला औपचारिक रूप से खुल जाए।

तीसरा काम फ़ॉर्म भरना है। पारिवारिक पेंशन के लिए फ़ॉर्म 14। बाक़ी दावों के अपने फ़ॉर्म हैं, जो पेंशनभोगी पोर्टल पर उपलब्ध हैं।

चौथा काम निगरानी का है, और यहीं भविष्य पोर्टल काम आता है। यह पेंशन एवं पेंशनभोगी कल्याण विभाग की व्यवस्था है, जिससे पेंशन स्वीकृति और भुगतान की प्रक्रिया के हर चरण को ऑनलाइन देखा जा सकता है। जिस परिवार को यह पता हो कि फ़ाइल इस समय किस मेज़ पर है, उसका इंतज़ार आँख मूँदकर किए गए इंतज़ार से छोटा होता है।

तेरह हज़ार अफ़सरों ने अपना कोष क्यों बनाया

यह पूरी सूची पढ़ने के बाद एक सवाल स्वाभाविक है। जब इतना कुछ मिलना तय है, तो अलग से किसी मदद की ज़रूरत क्यों पड़ती है।

इसका जवाब हाल की एक सरकारी विज्ञप्ति में मिलता है। केंद्रीय सचिवालय सेवा के फ़ोरम ने अपने दिवंगत सहकर्मियों के परिवारों के लिए एक पारस्परिक सहायता पहल शुरू की है। उसी विज्ञप्ति में दर्ज है कि 2020 से अब तक इन अफ़सरों ने मिलकर लगभग 1.30 करोड़ रुपये का योगदान दिया है, जिससे क़रीब 65 से 70 दिवंगत अफ़सरों के परिवारों की मदद की गई।

औसत निकालिए तो यह प्रति परिवार क़रीब उन्नीस हज़ार रुपये बैठता है। नई पहल का लक्ष्य प्रति परिवार कम से कम 15 लाख रुपये का है, और सेवा में क़रीब 13,000 सदस्य हैं।

जवाब समय में है। ऊपर गिनाई गई हर चीज़ मिलती है, पर तुरंत नहीं मिलती। फ़ाइल बनने, सेवा रिकॉर्ड मिलान होने और स्वीकृति आने में महीने लग सकते हैं।

और घर का ख़र्च उसी महीने से शुरू हो जाता है जिस महीने वेतन बंद होता है।

यही वह खाई है जिसे भरने के लिए सहकर्मी अपने पैसे से कोष बनाते हैं। यह व्यवस्था की जगह नहीं लेता, उसकी देरी की जगह लेता है।

आख़िर में

अगर आप वह व्यक्ति हैं जिसके हाथ में यह काम आ पड़ा है, तो सबसे छोटी सलाह यह है।

एक काग़ज़ पर पाँच पंक्तियाँ लिखिए: पारिवारिक पेंशन, मृत्यु उपदान, समूह बीमा, भविष्य निधि, अवकाश नक़दीकरण। छठी पंक्ति में अनुकंपा नियुक्ति लिखिए।

हर पंक्ति के आगे तारीख़ लिखिए कि आवेदन कब दिया, और किसे दिया।

यह सूची इसलिए काम करती है क्योंकि दफ़्तर में हर चीज़ अलग फ़ाइल है, और जो चीज़ किसी ने नहीं माँगी, वह अक्सर अपने-आप नहीं आती।

नॉर्थ ब्लॉक के बाहर खड़ी सरकारी एंबेसडर गाड़ियाँ
तस्वीर: क्रिश्चियन हौगेन, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

स्रोतपेंशनभोगी पोर्टल, सेवानिवृत्ति और मृत्यु के बाद के लाभ, केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, भविष्य पोर्टल, पेंशन स्वीकृति और भुगतान की निगरानी, कार्मिक मंत्रालय की विज्ञप्ति, सीएसएस शील्ड पहल

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