कच्चे तेल की क़ीमत 117 डॉलर पार, आयात बिल में रुपये का हिस्सा नाममात्र
गुरुवार को सेंसेक्स 1,247.71 अंक गिरकर 73,580.54 पर बंद हुआ और अंतर-बैंक बाज़ार में रुपया 23 पैसे टूटकर 95.96 पर आया, पर रिज़र्व बैंक की अपनी संदर्भ दर के हिसाब से हफ़्ते भर में रुपया सिर्फ़ 2 पैसे गिरा है। पीपीएसी के मुताबिक़ भारत जो कच्चा तेल ख़रीदता है उसकी क़ीमत 117.65 डॉलर प्रति बैरल पहुँच गई है, ब्रेंट से ऊपर। दिल्ली में पेट्रोल-डीज़ल का दाम 25 मई से नहीं बदला।

गुरुवार को दिल्ली के किसी भी पेट्रोल पंप पर दाम वही रहा जो 25 मई से चला आ रहा है। पेट्रोल 102 रुपये 12 पैसे। डीज़ल 95 रुपये 20 पैसे। उसी दिन बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सेंसेक्स 1,247.71 अंक गिरकर 73,580.54 पर बंद हुआ, यानी 1.67 फ़ीसदी की गिरावट। निफ़्टी 383.70 अंक टूटकर 23,063.10 पर आया। पेट्रोलियम मंत्रालय की योजना एवं विश्लेषण इकाई, पीपीएसी, के हिसाब से भारत जिस औसत दर पर कच्चा तेल ख़रीदता है वह 23 सितंबर को 117.65 डॉलर प्रति बैरल पहुँच गई थी।
तेल का आँकड़ा और रुपये का आँकड़ा एक साथ छपे। ज़्यादातर रिपोर्टों ने दोनों को एक ही झटके का बराबर हिस्सा मान लिया। हिसाब लगाने पर तस्वीर वैसी नहीं निकलती।
पहला फ़र्क़ ख़ुद रुपये के आँकड़े में है। जो 95.96 का अंक गुरुवार शाम से हर जगह घूम रहा है, वह अंतर-बैंक विदेशी मुद्रा बाज़ार का बंद भाव है। रिज़र्व बैंक की अपनी संदर्भ दर कुछ और कहती है, और यह फ़र्क़ बड़ा असर डालता है। दूसरा फ़र्क़ ख़ुद तेल के आँकड़े में है। भारत जो तेल ख़रीदता है, उसकी क़ीमत पीपीएसी की अपनी बास्केट से तय होती है, और वह बास्केट सौ डॉलर के पार बहुत आगे निकल चुकी है।
अंतर-बैंक का बंद भाव 95.96, रिज़र्व बैंक की अपनी दर 95.91
रिज़र्व बैंक हर कारोबारी दिन एक संदर्भ दर तय करता है। यह दर कुछ बैंकों से ली गई दरों के आधार पर एक तय समय पर बनती है। फिर यह बैंक की अपनी वेबसाइट पर दर्ज होती है। यह उस दिन के आख़िरी सौदे की क़ीमत नहीं होती। यह एक तय पल पर बाज़ार की झलक भर होती है। रिज़र्व बैंक के संदर्भ दर संग्रह के मुताबिक़ गुरुवार, 24 सितंबर को यह दर 95.9099 रुपये प्रति डॉलर थी, यानी सामान्य बोलचाल में 95.91। एक हफ़्ते पहले, गुरुवार 17 सितंबर को यही दर 95.8855, यानी 95.89 थी।
फ़र्क़ सिर्फ़ 2 पैसे का है।
यह वह संख्या नहीं है जो गुरुवार शाम की ख़बरों में छाई रही। कई वेबसाइटों ने पीटीआई शैली की एक रिपोर्ट के हवाले से लिखा कि रुपया 23 पैसे गिरकर 95.96 पर बंद हुआ। वह अंतर-बैंक बाज़ार का कारोबार-अंत भाव है, संदर्भ दर नहीं। रुपया दिन में 95.84 पर खुला। कारोबार के दौरान यह 95.98 तक फिसला। अंत में अनंतिम रूप से 95.96 पर बंद हुआ, जो बुधवार के 95.73 के बंद भाव से 23 पैसे कमज़ोर है। यह भाव भी सही है। यह बस एक अलग चीज़ नापता है: पूरे दिन के आख़िरी कारोबार की क़ीमत, न कि किसी तय समय पर ली गई संदर्भ दर।
दिलचस्प यह है कि बुधवार, 23 सितंबर के लिए दोनों आँकड़े लगभग बराबर थे। रिज़र्व बैंक की संदर्भ दर 95.7310 थी। अंतर-बैंक बंद भाव 95.73 था। लगभग वही अंक। गुरुवार को यह बराबरी टूट गई। रिज़र्व बैंक की दर के हिसाब से रुपया बुधवार से गुरुवार के बीच, एक ही दिन में, क़रीब 18 पैसे गिरा। अंतर-बैंक बाज़ार की रिपोर्टों में यही गिरावट 23 पैसे बताई गई। पाँच पैसे का यह फ़ासला बताता है कि दोनों तरीक़े अलग हैं। कोई एक ग़लत नहीं है।
पीपीएसी की बास्केट 117 डॉलर पर, ब्रेंट से फ़ासला चौड़ा हुआ
ज़्यादातर रिपोर्टों में "कच्चा तेल सौ डॉलर के पार" लिखते हुए जिस क़ीमत का हवाला दिया जाता है, वह ब्रेंट है। यह उत्तरी सागर के तेल का अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क है। इस हफ़्ते ब्रेंट का बंद भाव अलग-अलग दिनों की रिपोर्टों में अलग-अलग बताया गया है, कहीं 99 डॉलर के नीचे तो कहीं 101 के ऊपर। भारत का आयात बिल इस उलझन से नहीं बनता। वह पीपीएसी की "इंडियन बास्केट" से बनता है, जो भारतीय रिफ़ाइनरियों में उस महीने आए तेल का भारित औसत है। पीपीएसी की अपनी वेबसाइट पर दर्ज नोट के मुताबिक़ 23 सितंबर को यह बास्केट 117.65 डॉलर प्रति बैरल पर थी। सितंबर के अब तक के दिनों का औसत 115.00 डॉलर बैठता है।

यह बास्केट ब्रेंट की सीधी नक़ल नहीं है। पीपीएसी हर महीने दो दरों का मिश्रण तय करता है। एक "स्वीट" ग्रेड है, जिसे डेटेड ब्रेंट नापता है। दूसरा "सोर" ग्रेड है, जिसे ओमान-दुबई का औसत नापता है। मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन के तहत 31 अगस्त को जारी अधिसूचना के मुताबिक़ सितंबर के लिए यह अनुपात 77.81 फ़ीसदी ब्रेंट और 22.19 फ़ीसदी दुबई-ओमान तय हुआ है। अगस्त में यह अनुपात 74.94 और 25.06 था, जुलाई में 79.40 और 20.60। यानी अनुपात में ब्रेंट का हिस्सा बढ़ा है और दुबई-ओमान का घटा है। इसी दौरान बास्केट की क़ीमत ख़ुद ऊपर-नीचे होती रही है: अप्रैल में 114.48 डॉलर, जून में गिरकर 83.22 डॉलर, फिर अगस्त में 90.19 डॉलर और सितंबर में 115 डॉलर तक चढ़ी। अनुपात ख़ुद यह नहीं बताता कि किस ग्रेड में कितनी हलचल आई। पीपीएसी की तालिका सिर्फ़ महीने का मिश्रित औसत देती है। उस औसत के भीतर क्या हुआ, इसका जवाब यह दस्तावेज़ नहीं देता।
पिछले वित्त वर्ष, यानी 2025-26 में, भारत ने जो कच्चा तेल ख़रीदा उसका औसत दाम पीपीएसी की अपनी रेडी रेकनर रिपोर्ट के मुताबिक़ 68.49 डॉलर प्रति बैरल था। आज की 117.65 डॉलर की क़ीमत उससे 72 फ़ीसदी ऊपर है। यह अब तक की सबसे ऊँची सतह नहीं है। मार्च 2026 में, जब सरकार ने उत्पाद शुल्क घटाया था, ख़ुद सरकार ने बताया था कि कच्चे तेल का दाम एक महीने के भीतर 70 से 122 डॉलर तक पहुँच गया था। यही वह पैमाना है जिस पर अगला हिसाब टिका है।
दस डॉलर का हिसाब: पिछले साल जितनी ख़रीद पर सालाना 1.73 लाख करोड़ रुपये
यह हिसाब खुला है। कोई भी इसे दोहरा सकता है। पीपीएसी की रेडी रेकनर रिपोर्ट की तालिका 8.24 के मुताबिक़ भारत ने 2025-26 में 24.58 करोड़ टन कच्चा तेल आयात किया, जिसकी क़ीमत 123.38 अरब डॉलर, यानी 10,92,248 करोड़ रुपये चुकाई गई। औसत दाम बैठा 68.49 डॉलर प्रति बैरल। पीपीएसी ख़ुद टन को बैरल में बदलने के लिए जो अनुपात इस्तेमाल करता है, वह 1 टन बराबर 7.33 बैरल है। इसी अनुपात से 24.58 करोड़ टन, 180.15 करोड़ बैरल बैठता है। यह किसी एक हिसाब के लिए गढ़ा गया अनुपात नहीं है। यही रूपांतरण दर रेडी रेकनर के हर आयात-निर्यात हिसाब में एक जैसी इस्तेमाल होती है।
अब हिसाब सीधा है। अगर बास्केट की औसत क़ीमत में सिर्फ़ 10 डॉलर प्रति बैरल का उछाल आए, और भारत पिछले साल जितनी ही मात्रा ख़रीदे, तो सालाना असर 180.15 करोड़ बैरल गुणा 10 डॉलर, यानी 1,801.5 करोड़ डॉलर या 18.02 अरब डॉलर बैठता है। गुरुवार की रिज़र्व बैंक संदर्भ दर, 95.9099 रुपये प्रति डॉलर, पर बदलें तो यह रक़म 1,72,782 करोड़ रुपये होती है, यानी क़रीब 1.73 लाख करोड़ रुपये सालाना। तुलना के लिए, केंद्र ने 2025-26 में पूरे पेट्रोलियम क्षेत्र से 4,75,739 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया था। सिर्फ़ 10 डॉलर का यह उछाल उस राजस्व के एक-तिहाई से ज़्यादा के बराबर रक़म बना देता है, आयात बिल में अकेले।
यह सम सीधा है, पर इसकी सीमाएँ भी उतनी ही सीधी हैं। पहली सीमा मात्रा की है। यह हिसाब पिछले साल की मात्रा को स्थिर मानता है, जबकि खपत बढ़ रही है। पीपीएसी की फ़्लैश रिपोर्ट के मुताबिक़ चालू वित्त वर्ष के अप्रैल-अगस्त में पिछले साल के इसी दौर के मुक़ाबले पेट्रोल की खपत 6.48 फ़ीसदी और डीज़ल की 4.29 फ़ीसदी बढ़ी है। यानी असली रक़म इस अनुमान से ऊपर ही बैठेगी, नीचे नहीं। दूसरी सीमा मिश्रण की है। रिफ़ाइनरियाँ महँगे ग्रेड से सस्ते ग्रेड की तरफ़ मुड़ सकती हैं। कुछ ख़रीद पुराने अनुबंधों के तहत तय दाम पर भी हो सकती है, जो हाजिर बाज़ार के उतार-चढ़ाव से बंधी नहीं होती। तीसरी सीमा दर की है। यह हिसाब आज की संदर्भ दर को आगे भी स्थिर मान लेता है, जबकि रुपया कल कहाँ रहेगा, इसका कोई अनुमान इस लेख में नहीं है। यह सम सिर्फ़ इतना दिखाता है कि 10 डॉलर प्रति बैरल की हलचल किस पैमाने की रक़म है, चाहे वह किसी भी दिशा में हो। पैमाना बड़ा है। दिशा का सवाल अलग है, और इस लेख का विषय नहीं।
रुपये का हिस्सा अलग से जोड़ें तो हफ़्ते भर में सिर्फ़ 301 करोड़ रुपये
इसी तरह का एक सम रुपये के लिए भी लगाया जा सकता है, तेल की क़ीमत को स्थिर रखकर। पिछले साल का पूरा तेल आयात बिल, 123.38 अरब डॉलर, अगर 17 सितंबर की संदर्भ दर 95.8855 पर बदला जाए, तो रक़म 11,83,025.71 करोड़ रुपये बैठती है। वही बिल गुरुवार की 95.9099 वाली दर पर बदलें तो 11,83,326.76 करोड़ रुपये बनता है। फ़र्क़ सिर्फ़ 301 करोड़ रुपये का है।
पिछले हिस्से का 1,72,782 करोड़ रुपये वाला हिसाब इससे 574 गुना बड़ा है। बुधवार से गुरुवार के तीखे, 18 पैसे वाले एक-दिन के बदलाव को भी इसी तराज़ू पर रखें, तब भी फ़र्क़ 2,207 करोड़ रुपये से आगे नहीं जाता। यह दस डॉलर वाले हिसाब का डेढ़ फ़ीसदी से भी कम है।
फिर भी यह रुपये को बरी नहीं करता। साल भर के पैमाने पर उसका असर सचमुच बड़ा है। पीपीएसी की अपनी 10,92,248 करोड़ रुपये की रक़म से उलटा हिसाब लगाएँ तो 2025-26 की औसत दर क़रीब 88.5 रुपये प्रति डॉलर बैठती है। यह आज की 95.91 से साढ़े सात रुपये कम है। बारह महीनों की यह गिरावट असली है। यह सिर्फ़ इस एक हफ़्ते की कहानी नहीं है।
बाज़ार में गुरुवार को गिरावट, वजह एक नहीं
सेंसेक्स सुबह 74,272.40 पर खुला, बुधवार के 74,828.25 के बंद भाव से 555.85 अंक नीचे। दिन चढ़ने के साथ गिरावट गहरी होती गई। बाज़ार अंततः 1,247.71 अंक की चोट के साथ बंद हुआ। निफ़्टी सुबह 225 अंक नीचे 23,221.80 पर खुला था। दिन के अंत तक यह 383.70 अंक गिरकर 23,063.10 पर पहुँचा। इस गिरावट के पीछे एक नहीं, कई वजहें गिनाई गई हैं। कमज़ोर वैश्विक संकेत एक वजह है। अमेरिकी दस-साला बॉन्ड की यील्ड का 5.11 फ़ीसदी तक चढ़ना दूसरी। कच्चे तेल के दाम में उछाल तीसरी, रुपये की गिरावट चौथी, पश्चिम एशिया के संकट पर बनी अनिश्चितता पाँचवीं, और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली छठी। अमेरिकी बाज़ार में नैस्डैक पिछली रात 1.1 फ़ीसदी गिरकर 26,936 पर बंद हुआ था। उसका असर भी एशियाई बाज़ारों तक पहुँचा।
इसी माहौल में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने गुरुवार रात पब्लिक अफ़ेयर्स फ़ोरम ऑफ़ इंडिया के तेरहवें वार्षिक सम्मेलन में कहा, "यह संकट टला नहीं है। यह न सिर्फ़ जारी है, बल्कि बिगड़ भी सकता है। हर संकट एक चुनौती है, और उसमें एक मौक़ा भी छुपा है। हम अब तक इससे निपटने और ख़ुद को इसके सबसे बुरे असर से बचाने में कामयाब रहे हैं। पर यह मैं नहीं कह सकता कि अगर संकट और बिगड़ता है तो हम वैसे ही टिके रह पाएंगे।"
उन्होंने कहा कि तेल की उपलब्धता भारत के लिए मुश्किल नहीं है। वैश्विक आपूर्ति रोज़ाना 10.2 करोड़ बैरल है। मांग 9.4 से 9.5 करोड़ बैरल के बीच है। असली ख़तरा जलडमरूमध्यों के बंद होने का है, होरमुज़ और बाब अल-मंदेब जैसे। पुरी ने भारत की रिफ़ाइनिंग क्षमता का हवाला भी दिया। यह अभी 26.7 करोड़ टन सालाना है। 2030 तक इसे 32 करोड़ टन तक ले जाने की योजना है। रूस और चीन ने निर्यात पर पाबंदी लगाई है। इसके बावजूद भारत रोज़ाना क़रीब 10 लाख बैरल रिफ़ाइंड ईंधन का निर्यात जारी रखे हुए है।

पंप पर सवा चार महीने से वही आंकड़ा, टैक्स हिस्सा पेट्रोल में क़रीब 28 फ़ीसदी
पीपीएसी की 24 सितंबर को जारी तालिका के मुताबिक़ चारों महानगरों में पेट्रोल-डीज़ल का दाम 25 मई 2026 से एक पैसा भी नहीं बदला है। दिल्ली में पेट्रोल 102.12 और डीज़ल 95.20 रुपये है। मुंबई में 111.21 और 97.83, चेन्नई में 107.77 और 99.55, कोलकाता में 113.51 और 99.82। इस ठहराव को, और उससे पहले मई के भीतर हुई बढ़ोतरियों को, इस डेस्क ने पहले भी दर्ज किया है। यहाँ सवाल अलग है। आज के इस दाम में टैक्स का हिस्सा कितना है।
केंद्र सरकार पेट्रोल पर 11.90 रुपये प्रति लीटर उत्पाद शुल्क लेती है। चार हिस्से हैं। मूल शुल्क 1.40 रुपये, विशेष अतिरिक्त शुल्क 3.00 रुपये, कृषि अवसंरचना उपकर 2.50 रुपये और सड़क व अवसंरचना उपकर 5.00 रुपये। यह दर 27 मार्च 2026 से नहीं बदली, जब सरकार ने विशेष अतिरिक्त शुल्क में 10 रुपये की कटौती की थी। डीज़ल की कहानी मिलती-जुलती है। कुल शुल्क 7.80 रुपये है: मूल शुल्क 1.80, कृषि उपकर 4.00 और सड़क उपकर 2.00 रुपये। डीज़ल पर विशेष अतिरिक्त शुल्क अब शून्य है, उसी मार्च की कटौती के बाद से। उस कटौती से पहले पेट्रोल पर यह शुल्क 13 रुपये था। डीज़ल पर 10 रुपये था। मंत्रालय ने ख़ुद उसी दिन की विज्ञप्ति में लिखा कि यह कटौती पंप पर नहीं उतरेगी। यह सिर्फ़ तेल कंपनियों का घाटा कम करेगी।

इसके ऊपर राज्य का वैट आता है। दिल्ली में यह हिसाब अकेले उत्पाद शुल्क से नहीं बनता। पीपीएसी की वैट तालिका के मुताबिक़ दिल्ली में पेट्रोल पर 19.40 फ़ीसदी वैट लगता है। डीज़ल पर 250 रुपये प्रति किलोलीटर, यानी 25 पैसे प्रति लीटर, एयर एंबियंस चार्ज के साथ 16.75 फ़ीसदी वैट लगता है। दिल्ली उन गिने-चुने राज्यों में है जहाँ यह वैट डीलर के कमीशन पर भी लगता है। यानी वैट का आधार सिर्फ़ मूल क़ीमत और उत्पाद शुल्क नहीं है। इसमें डीलर कमीशन भी जुड़ता है। इस आधार को पीछे से निकाला जा सकता है। पेट्रोल में 102.12 रुपये को 1.194 से भाग दें तो टैक्स-पूर्व क़ीमत 85.53 रुपये बैठती है। यानी वैट की रक़म 16.59 रुपये। उत्पाद शुल्क और वैट मिलाकर 28.49 रुपये बनते हैं, पंप के दाम का 27.9 फ़ीसदी। मोटे तौर पर क़रीब 28 फ़ीसदी।
डीज़ल में यही तरीक़ा अपनाने पर, एयर एंबियंस चार्ज को अलग रखकर, टैक्स-पूर्व क़ीमत 81.33 रुपये बैठती है। वैट 13.62 रुपये बनता है। एयर एंबियंस चार्ज जोड़कर कुल राज्य कर 13.87 रुपये होता है। उत्पाद शुल्क और राज्य कर मिलाकर 21.67 रुपये बनते हैं, यानी 95.20 रुपये के पंप दाम का 22.8 फ़ीसदी, क़रीब 23 फ़ीसदी। यह हिसाब पीपीएसी की दो अलग तालिकाओं, उत्पाद शुल्क और वैट, को जोड़कर निकाला गया है। यह किसी एक तैयार आँकड़े की नक़ल नहीं है। वैट राज्य का विषय है। यह हिस्सा हर राज्य में अलग बैठेगा। पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान भी दिल्ली की तरह डीलर कमीशन पर वैट लगाने वाले राज्यों में हैं। बाक़ी राज्यों में यही गणना थोड़ी अलग बैठेगी, क्योंकि वहाँ वैट का आधार डीलर कमीशन से पहले ही तय हो जाता है।
मार्जिन का तीसरा आँकड़ा: डीज़ल का घाटा घट रहा, पेट्रोल का बढ़ रहा
क़ीमत जमी है। लागत नहीं जमी है। रेटिंग एजेंसी आईसीआरए के 23 सितंबर के आकलन के मुताबिक़ सरकारी तेल कंपनियों का विपणन मार्जिन, यानी रिफ़ाइनिंग को छोड़कर सिर्फ़ बिक्री पर होने वाला मुनाफ़ा या घाटा, पेट्रोल पर ऋणात्मक 8 रुपये और डीज़ल पर ऋणात्मक 9 रुपये प्रति लीटर बैठ रहा है। घरेलू एलपीजी पर अंडर-रिकवरी क़रीब 300 रुपये प्रति सिलेंडर आँकी गई है। तीनों को जोड़कर कंपनियों का रोज़ाना घाटा क़रीब 530 करोड़ रुपये बताया गया है।
यह इस डेस्क की तीसरी झलक है। 4 सितंबर को रिटेलइंटेल के आकलन में, फ़ाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के आधार पर, पेट्रोल पर मार्जिन ऋणात्मक 4.20 रुपये था और डीज़ल पर ऋणात्मक 24.90 रुपये, जब बास्केट 101.07 डॉलर पर थी। पाँच दिन बाद, बास्केट के 108.91 डॉलर पर चढ़ने के बावजूद, आईसीआरए का आकलन पेट्रोल पर ऋणात्मक 5 रुपये और डीज़ल पर ऋणात्मक 23 रुपये आया था। डीज़ल का घाटा घटता दिखा, जबकि बास्केट चढ़ी। अब, बास्केट के 117.65 डॉलर तक पहुँचने के बाद, डीज़ल का घाटा और घटकर 9 रुपये रह गया है। पेट्रोल का बढ़कर 8 रुपये हो गया है। तीन में से किसी भी रिपोर्ट में इस उलटी दिशा की वजह नहीं बताई गई है।
यह भी साफ़ रहना चाहिए कि विपणन मार्जिन और अंडर-रिकवरी एक चीज़ नहीं हैं। पीपीएसी के अपने पन्ने पर "पेट्रोलियम प्राइसेज़ एंड अंडर रिकवरीज़" शीर्षक के नीचे जो तालिका है, वह 2002-03 से 2009-10 तक ही जाती है। यह पेट्रोल के जून 2010 में और डीज़ल के अक्तूबर 2014 में नियंत्रणमुक्त होने से पहले का दौर है। उसके बाद का कोई नियमित सरकारी सिलसिला वहाँ दर्ज नहीं है। एक अपवाद है, 27 मार्च 2026 की मंत्रालय की अपनी विज्ञप्ति। उसमें उस दिन के 122 डॉलर के बास्केट पर सरकार ने ख़ुद अंडर-रिकवरी 26 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल और 81.90 रुपये प्रति लीटर डीज़ल पर आँकी थी, कुल रोज़ाना क़रीब 2,400 करोड़ रुपये। वह एक बार का हिसाब था। नियमित तालिका नहीं। आज जो भी आँकड़ा चल रहा है, वह उद्योग जगत का आकलन है। सरकार ने अपना हिसाब दोबारा सार्वजनिक नहीं किया है।
स्रोतभारतीय रिज़र्व बैंक, संदर्भ दर संग्रह, 17-24 सितंबर 2026 की डॉलर दरें, 24 सितंबर 2026 को देखा गया, पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (पीपीएसी), इंडियन बास्केट की अंतरराष्ट्रीय क़ीमत, तालिका 24 सितंबर 2026 को अद्यतन, 23 सितंबर 2026 तक का आँकड़ा, पीपीएसी, इंडियन क्रूड बास्केट अनुपात की अधिसूचना, सितंबर 2026 के लिए, 31 अगस्त 2026, पीपीएसी रेडी रेकनर, वित्त वर्ष 2025-26, तालिका 8.24: भारत के कच्चे तेल आयात की मात्रा और मूल्य, पीपीएसी, महानगरों में पेट्रोल-डीज़ल की खुदरा बिक्री क़ीमत, तालिका 24 सितंबर 2026 को जारी, पीपीएसी, प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादों पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क व सीमा शुल्क की दरें, पीपीएसी, राज्यवार वैट/बिक्री कर/जीएसटी दरें, पीपीएसी, पेट्रोलियम क़ीमतें और अंडर-रिकवरी, वर्तमान व ऐतिहासिक (2002-03 से 2009-10) तालिकाएँ, पीआईबी, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, उत्पाद शुल्क में 10 रुपये की कटौती पर विज्ञप्ति, 27 मार्च 2026, दोपहर 2:36 बजे, पीआईबी, आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति, 'डीरेगुलेशन ऑफ़ डीज़ल प्राइसेज़', 18 अक्तूबर 2014, बिज़नेस स्टैंडर्ड, पीएएफ़आई के 13वें वार्षिक सम्मेलन में हरदीप सिंह पुरी का बयान, 24 सितंबर 2026, रात 8:39 बजे, बिज़नेस स्टैंडर्ड, शेयर बाज़ार लाइव, 24 सितंबर 2026 का बंद भाव, इंडिया टीवी न्यूज़, सेंसेक्स-निफ़्टी का बंद भाव और गिरावट की वजहें, 24 सितंबर 2026, आउटलुक बिज़नेस, अंतर-बैंक बाज़ार में रुपये का बंद भाव, 24 सितंबर 2026, बिज़नेस स्टैंडर्ड, आईसीआरए के हवाले से तेल कंपनियों के विपणन मार्जिन पर रिपोर्ट, 23 सितंबर 2026, कश्मीर ऑब्ज़र्वर, पीटीआई की ख़बर, आईसीआरए के सितंबर की शुरुआत के आकलन पर, 9 सितंबर 2026