गाँव में रसोई गैस की दूसरी बुकिंग पैंतालीस दिन बाद होती थी, शहर में पच्चीस दिन बाद
यह अंतर अब ख़त्म कर दिया गया है और दोनों जगह पच्चीस दिन का नियम लागू है। पेट्रोलियम राज्य मंत्री ने कहा कि आदेश तुरंत प्रभाव से लागू है।

अगर आप गाँव में रहते हैं और आपका रसोई गैस का सिलेंडर ख़त्म हो गया है, तो अब आप पिछली डिलीवरी के पच्चीस दिन बाद दूसरा बुक कर सकते हैं।
पहले यह अवधि पैंतालीस दिन थी।
शहरों में यह हमेशा पच्चीस दिन ही रही।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने पुष्टि की है कि यह बदलाव तुरंत प्रभाव से लागू है और पूरे देश में लागू होगा।
यह अंतराल होता क्या है
पहले यह समझ लीजिए कि यह नियम है क्या, क्योंकि बहुत से लोग इससे पहली बार तब टकराते हैं जब उन्हें ज़रूरत होती है।
घरेलू रसोई गैस के उपभोक्ता को हर बार सिलेंडर बुक कराना होता है। बुकिंग के बीच एक न्यूनतम अंतराल तय होता है, यानी पिछली डिलीवरी के इतने दिन बाद ही अगली बुकिंग हो सकती है।
अगर आप उससे पहले कोशिश करेंगे, तो व्यवस्था बुकिंग नहीं लेगी।
इसका मक़सद यह है कि कोई एक उपभोक्ता ज़रूरत से ज़्यादा सिलेंडर न ले ले, ख़ासकर उस वक़्त जब आपूर्ति तंग हो।
यह नियम कब सख़्त हुआ

यह पैंतालीस दिन वाला नियम हमेशा से नहीं था।
यह उस दौर में लगाया गया जब पश्चिम एशिया के संघर्ष की वजह से आपूर्ति पर दबाव आया।
भारत अपनी रसोई गैस का बड़ा हिस्सा आयात करता है, और उस आयात का बड़ा हिस्सा खाड़ी के देशों से आता है। उस रास्ते में कोई अड़चन आए तो उसका असर सीधे यहाँ के भंडार पर पड़ता है।
ऐसी हालत में सरकारों के पास दो रास्ते होते हैं। या तो क़ीमत बढ़ाकर माँग घटाई जाए, या मात्रा पर पाबंदी लगाकर।
भारत ने दूसरा रास्ता चुना, और बुकिंग के बीच का अंतराल बढ़ाना उसी का हिस्सा था।
इस चुनाव के पीछे एक साफ़ तर्क है। रसोई गैस की क़ीमत बढ़ाना राजनीतिक रूप से भारी पड़ता है और उसका असर सबसे ग़रीब घरों पर सबसे ज़्यादा पड़ता है।
मात्रा पर पाबंदी लगाने में यह दिक़्क़त नहीं आती, क्योंकि वह क़ीमत पर नहीं दिखती। बिल वही रहता है, बस सिलेंडर देर से आता है।
पर इसका मतलब यह नहीं कि उसकी कोई क़ीमत नहीं चुकानी पड़ती। वह क़ीमत रुपयों में नहीं, इंतज़ार में चुकाई जाती है, और इंतज़ार का बोझ सब पर बराबर नहीं पड़ता।
अब क्यों हटाया गया
मंत्रालय के मुताबिक़ आपूर्ति की स्थिति सुधरी है और लंबित रीफ़िल की संख्या उस समय के मुक़ाबले बहुत घट गई है जब यह उपाय लगाया गया था।
यानी जिस वजह से यह पाबंदी लगी थी, वह अब उतनी नहीं रही।
यह ठीक फ़ैसला है और इसका स्वागत होना चाहिए। जो नियम किसी संकट के लिए बना हो, उसे संकट टलने पर हटा दिया जाना चाहिए, और अक्सर ऐसा नहीं होता। अस्थायी उपायों का स्थायी हो जाना सरकारी कामकाज की जानी-पहचानी आदत है।
इस मामले में वह नहीं हुआ, और यह दर्ज होना चाहिए।
पर एक सवाल बचता है
अब उस बात पर आइए जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
जब यह पाबंदी लगी, तो वह सब पर बराबर नहीं लगी।
शहर के उपभोक्ता के लिए अंतराल पच्चीस दिन रहा। गाँव के उपभोक्ता के लिए पैंतालीस।
यानी बीस दिन का फ़र्क़, और वह फ़र्क़ गाँव वालों पर पड़ा।
यह सवाल अब भी खुला है कि यह अंतर किस आधार पर तय हुआ।
जब यह पाबंदी लगी थी, तब भी इस पर सवाल उठे थे और इसे लेकर भ्रम फैला था। कुछ रिपोर्टों में इसे उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों पर लगी अलग पाबंदी की तरह बताया गया, जिसका खंडन भी हुआ।
तो कम से कम इतना तय है कि यह नियम आसानी से समझ आने वाला नहीं था, और जिन तक इसे पहुँचना था उन तक यह साफ़ शक्ल में नहीं पहुँचा।
बीस दिन का मतलब क्या होता है
यह अंतर काग़ज़ पर छोटा लगता है। रसोई में यह छोटा नहीं होता।
एक चार लोगों के परिवार में चौदह किलो का सिलेंडर आम तौर पर तीन से चार हफ़्ते चलता है, और यह इस बात पर निर्भर करता है कि कितनी बार खाना बनता है और क्या बनता है।
अगर सिलेंडर पच्चीसवें दिन ख़त्म हो जाए और अगली बुकिंग पैंतालीसवें दिन ही हो सके, तो बीच के बीस दिन कैसे कटेंगे।
इसका जवाब वही है जो हर गाँव में दिखता है। उन दिनों चूल्हा जलता है, लकड़ी या उपले से।
यही तो योजना का मक़सद उलटा हो जाना है
यह बात इसलिए अहम है कि उज्ज्वला योजना का पूरा तर्क इसी पर टिका है।
उस योजना का मक़सद था कि गाँव की औरतें लकड़ी और उपले के धुएँ से बचें, क्योंकि उस धुएँ से साँस की बीमारियाँ होती हैं और उसका बोझ सबसे ज़्यादा औरतों और छोटे बच्चों पर पड़ता है।
कनेक्शन देना उस मक़सद का पहला हिस्सा है। दूसरा हिस्सा यह है कि रीफ़िल लगातार मिलती रहे।
अगर रीफ़िल में बीस दिन की अतिरिक्त देरी लग जाए, तो कनेक्शन उन दिनों काम नहीं आता।
और जो घर एक बार चूल्हे पर लौट जाता है, उसका लौटना आसान हो जाता है।
इस योजना पर जो सबसे लगातार सवाल उठा है, वह यही रहा है। कनेक्शन कितने बँटे, यह आँकड़ा हमेशा दिया जाता है। हर कनेक्शन पर साल में कितनी रीफ़िल हुई, यह आँकड़ा कम दिया जाता है।
दूसरा आँकड़ा पहले से ज़्यादा बताता है, क्योंकि वही यह बताता है कि चूल्हा सचमुच बंद हुआ या नहीं।
पैंतालीस दिन वाला नियम सीधे उसी दूसरे आँकड़े पर असर डालता था। साल में तीन सौ पैंसठ दिन होते हैं। पच्चीस दिन के अंतराल पर ज़्यादा से ज़्यादा चौदह रीफ़िल हो सकती हैं, और पैंतालीस दिन के अंतराल पर आठ।
यानी वह नियम रीफ़िल की ऊपरी सीमा को लगभग आधा कर देता था।
धुएँ का हिसाब

लकड़ी और उपले पर खाना बनाने का असर अनुमान की बात नहीं है, उस पर बरसों से अध्ययन हुए हैं।
बंद रसोई में जलती लकड़ी से जो धुआँ बनता है, उसमें वही महीन कण होते हैं जिन पर बाहर की हवा के मामले में इतनी चिंता होती है। फ़र्क़ यह है कि रसोई में वे कण कहीं ज़्यादा गाढ़े होते हैं और साँस लेने वाला उनके ठीक सामने बैठा होता है।
इससे साँस की बीमारियाँ होती हैं, और बच्चों में उनका असर ज़्यादा दिखता है क्योंकि वे अक्सर खाना बनाते समय माँ के पास ही रहते हैं।
यही वह गणना है जिस पर उज्ज्वला योजना खड़ी हुई थी, और उसका तर्क मज़बूत है।
इसलिए रीफ़िल में देरी को असुविधा की तरह गिनना ठीक नहीं है। वह एक स्वास्थ्य कार्यक्रम में पड़ा हुआ छेद है।
गाँव और शहर का असली फ़र्क़
यह पूछना ज़रूरी है कि यह नियम अलग-अलग क्यों बना, और उसका एक संभावित तर्क समझ में आता है।
गाँवों में वितरक कम होते हैं और वे दूर-दूर होते हैं। एक एजेंसी के दायरे में कई गाँव आते हैं और गाड़ी सब जगह रोज़ नहीं जा सकती।
इसलिए आपूर्ति का ढाँचा वहाँ पहले से धीमा है।
पर यहीं तर्क उलट जाता है।
अगर गाँव में पहुँचाना पहले से मुश्किल है, तो वहाँ अतिरिक्त पाबंदी लगाने का मतलब यह होता है कि जो पहले से पीछे है उसे और पीछे कर दिया जाए।
तंगी के वक़्त राशनिंग का तर्क समझा जा सकता है। पर राशनिंग बराबर होनी चाहिए, या फिर उसका बोझ उन पर कम पड़ना चाहिए जिनके पास विकल्प कम हैं।
यहाँ उल्टा हुआ।
शहर में विकल्प क्या हैं
इसे साफ़ करने के लिए दोनों जगह के विकल्प देखिए।
शहर में सिलेंडर देर से आए तो कुछ घरों में बिजली का चूल्हा या इंडक्शन होता है। बाहर से खाना मँगाया जा सकता है। पड़ोस में दुकानें हैं।
गाँव में इनमें से ज़्यादातर विकल्प नहीं होते। बिजली की आपूर्ति भरोसे लायक़ नहीं होती और इंडक्शन चूल्हा हर घर में नहीं है।
जो विकल्प बचता है, वह लकड़ी है।
इसलिए एक ही पाबंदी के दो जगह दो अलग नतीजे होते हैं। शहर में वह असुविधा है। गाँव में वह धुआँ है।
छोटा सिलेंडर वाला विकल्प
एक चीज़ है जो इस पूरी बहस में कम आती है और जिसे जानना चाहिए।
चौदह किलो के अलावा पाँच किलो का घरेलू सिलेंडर भी मिलता है, और उसे कई जगह छोटू कहा जाता है।
इसका फ़ायदा यह है कि उसकी क़ीमत कम होती है, इसलिए एक बार में कम पैसा लगाना पड़ता है। जिन घरों में नक़दी हर महीने बराबर नहीं आती, उनके लिए यह अंतर बड़ा होता है।
चौदह किलो का सिलेंडर भरवाने के लिए एक साथ जो रक़म चाहिए, वह कई घरों के लिए एक हफ़्ते की कमाई के बराबर होती है। यही वजह है कि कनेक्शन होने पर भी रीफ़िल टलती रहती है।
पाँच किलो वाला सिलेंडर हर वितरक के पास हर वक़्त उपलब्ध नहीं होता, ख़ासकर गाँवों में। पर उसकी माँग की जा सकती है और वह हक़ के दायरे में है।
अब क्या करना है
नियम बदल गया है, इसलिए इसका व्यावहारिक हिस्सा दर्ज कर देना चाहिए।
अगर आप गाँव में रहते हैं और आपकी पिछली डिलीवरी को पच्चीस दिन हो चुके हैं, तो आप अब बुकिंग कर सकते हैं।
बुकिंग तेल कंपनी के ऐप, वेबसाइट, दिए गए फ़ोन नंबर पर मिस्ड कॉल या व्हाट्सऐप नंबर से हो सकती है। तीनों तेल कंपनियों की अपनी-अपनी व्यवस्थाएँ हैं और वे कनेक्शन के काग़ज़ पर लिखी होती हैं।
अगर पच्चीस दिन बीत जाने के बाद भी व्यवस्था बुकिंग न ले, तो पहले वितरक से बात कीजिए। उसके बाद तेल कंपनी की शिकायत लाइन पर।
यह इसलिए ज़रूरी है कि आदेश तुरंत प्रभाव से लागू है, पर सारे सॉफ़्टवेयर एक साथ नहीं बदलते। पुराना नियम कुछ जगह कुछ दिन चलता रह सकता है, और तब शिकायत करने से ही वह ठीक होता है।
सब्सिडी कहाँ खड़ी है
रीफ़िल के फ़ैसले में क़ीमत सबसे बड़ा कारक है, इसलिए उस पर एक बात दर्ज कर देनी चाहिए।
उज्ज्वला के लाभार्थियों के लिए हर सिलेंडर पर एक तय सब्सिडी दी जाती है, जो सीधे उनके बैंक खाते में जाती है। बाक़ी उपभोक्ताओं के लिए वह सब्सिडी अलग है।
इसका तरीक़ा यह है कि उपभोक्ता पहले पूरी क़ीमत चुकाता है और सब्सिडी बाद में खाते में आती है।
काग़ज़ पर यह पारदर्शी व्यवस्था है। व्यवहार में इसका मतलब यह होता है कि जिस दिन सिलेंडर लेना है, उस दिन पूरी रक़म चाहिए।
जिन घरों में रोज़ की कमाई पर गुज़र होती है, उनके लिए यह अंतर मायने रखता है। सब्सिडी बाद में मिल जाएगी, यह जानना उस दिन काम नहीं आता जिस दिन जेब में पैसे नहीं हैं।
कितने लोगों की बात है

पैमाने का अंदाज़ा हो तो बात अपनी जगह बैठती है।
पेट्रोलियम राज्य मंत्री ने बताया है कि एक जुलाई तक देश में सक्रिय घरेलू रसोई गैस उपभोक्ताओं की संख्या 32.68 करोड़ थी।
यह कनेक्शनों की संख्या है, परिवारों की नहीं, पर वह भारत के लगभग हर घर तक पहुँचने जैसा आँकड़ा है।
इनमें से बड़ी संख्या उज्ज्वला योजना के तहत जुड़े उपभोक्ताओं की है, और उनका बड़ा हिस्सा गाँवों में है।
तो जो नियम बीस दिन का अतिरिक्त इंतज़ार करा रहा था, वह करोड़ों घरों पर लागू था।
जो सबक़ इसमें है
इस पूरे मामले से एक बात निकलती है जो आगे भी काम आएगी।
जब भी किसी वस्तु की आपूर्ति तंग होती है और सरकार माँग को संभालने के लिए कोई नियम बनाती है, तो यह पूछा जाना चाहिए कि वह नियम सब पर बराबर लग रहा है या नहीं।
अगर नहीं, तो यह पूछा जाना चाहिए कि किस पर ज़्यादा लग रहा है, और उसके पास विकल्प क्या हैं।
इस मामले में यह सवाल तब नहीं पूछा गया जब नियम लगा। वह अब पूछा जा रहा है, जब नियम हट चुका है।
नियम हटना अच्छी ख़बर है। पर जिन महीनों में वह चला, उनमें जो घर चूल्हे पर लौटे, उनका हिसाब कहीं दर्ज नहीं है।
एक और चीज़ जो देखनी चाहिए
आगे यह देखने लायक़ रहेगा कि नियम हटने के बाद रीफ़िल की संख्या बढ़ती है या नहीं।
अगर वह बढ़ती है, तो इसका मतलब यह होगा कि लोग सचमुच उस पाबंदी की वजह से रुके हुए थे, और उनकी ज़रूरत उससे ज़्यादा थी जितनी उन्हें मिल पा रही थी।
अगर नहीं बढ़ती, तो इसका मतलब यह होगा कि असली अड़चन नियम नहीं, पैसा था।
दोनों जवाब अलग-अलग नीति की माँग करते हैं। पहले में आपूर्ति ठीक करनी होगी, दूसरे में सब्सिडी।
यह आँकड़ा तेल कंपनियों के पास हर महीने बनता है। उसे सार्वजनिक करना कोई बड़ा काम नहीं है, और उससे यह पता चल जाएगा कि पैंतालीस दिन वाला वह नियम कितना भारी पड़ा था।
तब तक बस इतना दर्ज है कि एक ऐसी पाबंदी हटी है जो शहर पर नहीं थी और गाँव पर थी।
स्रोतआकाशवाणी समाचार, पेट्रोलियम राज्य मंत्री के आँकड़े, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना