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रसोई गैस की 89.9 फ़ीसदी कवरेज किस गिनती पर नापी गई है, विज्ञप्ति यह नहीं बताती; मंत्रालय की अपनी सेल की गिनती ढाई करोड़ ऊपर बैठती है

1 अक्टूबर से सब्सिडी वाले 14.2 किलो सिलेंडर की बुकिंग के लिए बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण अनिवार्य है। जिन्होंने यह नहीं करवाया, उन्हें गैस मिलती रहेगी, पर 5 या 10 किलो के सिलेंडर में, बाज़ार भाव पर और स्थानीय उपलब्धता के भरोसे। शनिवार, 19 सितंबर की विज्ञप्ति अंश और फ़ीसदी दोनों छापती है, हर नहीं।

बेंगलुरु में एक दुपहिया पर एलपीजी सिलेंडरों की डिलीवरी, अक्टूबर 2021; 14.2 किलो का यही सिलेंडर है जिसकी बुकिंग 1 अक्टूबर से बिना प्रमाणीकरण नहीं खुलेगी।
तस्वीर: SerChevalerie, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

1 अक्टूबर से किसी घर की रसोई गैस बंद नहीं हो रही। जो रुकेगा, वह 14.2 किलो का सब्सिडी वाला सिलेंडर है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने शनिवार, 19 सितंबर की शाम 7:42 बजे जारी विज्ञप्ति में लिखा है कि उस तारीख़ से सब्सिडी के साथ विनियमित खुदरा बिक्री मूल्य पर रिफ़िल बुक करने के लिए बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण पूरा करवाना होगा। जिन्होंने यह नहीं करवाया, उन्हें गैस मिलती रहेगी। पर 14.2 किलो में नहीं, और सब्सिडी पर नहीं।

विज्ञप्ति दो संख्याएँ देती है। पहली, 27.43 करोड़ सक्रिय घरेलू उपभोक्ताओं ने प्रमाणीकरण करवा लिया है। दूसरी, यह 89.9 फ़ीसदी कवरेज है। तीसरी संख्या वह है जिस पर ये दोनों टिकी हैं, और वह पूरी विज्ञप्ति में एक बार भी नहीं आती।

27.43 करोड़ का भाजक विज्ञप्ति में नहीं है

विज्ञप्ति का हिंदी पाठ यही कहता है: "19 सितंबर 2026 तक, 27.43 करोड़ सक्रिय घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं ने बीएए पूरा कर लिया है, जो 89.9 प्रतिशत कवरेज है।" किसका 89.9 फ़ीसदी, यह वाक्य नहीं बताता। पर हर निकाला जा सकता है। 27.43 को 0.899 से भाग दें तो 30.51 करोड़ आता है। वही भाजक है जो विज्ञप्ति अपने ही दो अंकों से मान रही है, और उसमें से 27.43 घटाएँ तो 3.08 करोड़ बचते हैं।

89.9 अपने आप में गोल किया हुआ अंक है, इसलिए इस भाजक की एक पट्टी बनती है। अगर असल कवरेज 89.85 फ़ीसदी है तो भाजक 30.53 करोड़, और अगर 89.95 है तो 30.49 करोड़। बाहर रह गए लोगों की संख्या इस पूरी पट्टी में 3.06 और 3.10 करोड़ के बीच रहती है। तीन करोड़ से नीचे वह किसी हाल में नहीं जाती।

अब इस 30.51 करोड़ को उसी मंत्रालय की अपनी सांख्यिकी इकाई के सामने रखिए। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल हर महीने राज्यवार सक्रिय घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं की एक शीट छापती है, जिसका स्रोत तीनों सार्वजनिक ओएमसी हैं। 1 अगस्त 2026 की शीट में अखिल भारत का जोड़ 3299.95235 लाख है। यानी 32.9995 करोड़। सेल की एलपीजी प्रोफ़ाइल रिपोर्ट, जो अप्रैल से जून 2026 की तिमाही की है, 1 जुलाई 2026 को यह संख्या 33.14 करोड़ बताती है, और उसी रिपोर्ट के एक दूसरे पन्ने पर यही आँकड़ा 33.18 करोड़ छपा है। और ख़ुद मंत्रालय ने 1 जनवरी 2026 की अपनी विज्ञप्ति में लिखा था कि देश में 33 करोड़ से ज़्यादा घरेलू एलपीजी उपभोक्ता हैं।

फ़र्क़ छोटा नहीं है। 32.9995 और 30.51 के बीच 2.49 करोड़ का अंतर है। पीपीएसी की गिनती पर 27.43 करोड़ की कवरेज 83.1 फ़ीसदी बैठती है, 89.9 नहीं, और बाहर रह गए लोग 3.08 करोड़ नहीं, 5.57 करोड़ हो जाते हैं। दोनों आँकड़े सरकारी हैं। हम इनमें से किसी को सही नहीं ठहरा रहे; दोनों दर्ज कर रहे हैं, क्योंकि दोनों में से कोई भी अपना स्रोत या अपनी परिभाषा नहीं छापता।

एक सफ़ाई जो यहाँ आमतौर पर दी जाती है, तारीख़ की है। पीपीएसी की शीट 1 अगस्त की है और विज्ञप्ति 19 सितंबर की। पर इस सफ़ाई की दिशा उलटी है। पीपीएसी की अपनी शृंखला में सक्रिय ग्राहक घट रहे हैं, बढ़ नहीं रहे: 1 अप्रैल 2026 को 3339.2 लाख, 1 जुलाई को 3313.8 लाख, 1 अगस्त को 3299.95 लाख। चार महीने में 39.25 लाख की कमी। इसी रफ़्तार से गिरते रहने पर 30.51 करोड़ तक पहुँचने में दो साल से ज़्यादा लगेंगे। डेढ़ महीने में नहीं।

और तीसरी दिक़्क़त परिभाषा की है, जो सबसे कम दिखती है। उपभोक्ता, कनेक्शन और परिवार तीन अलग गिनतियाँ हैं। पीपीएसी की अपनी रिपोर्ट एक ही आँकड़े के लिए दो नाम इस्तेमाल करती है, सक्रिय घरेलू ग्राहक और सक्रिय घरेलू कनेक्शन, और परिवारों की संख्या वह गिनती नहीं, 2011 की जनगणना से निकाला गया अनुमान है। उसी अनुमान पर वह 1 जुलाई 2026 को एलपीजी संतृप्ति 95.6 फ़ीसदी बताती है। 89.9, 83.1 और 95.6 तीन अलग हरों पर बने तीन अलग अंश हैं, और विज्ञप्ति यह नहीं बताती कि उसका हर कौन सा है।

1 अक्टूबर से रुकने वाली बुकिंग और उसका विकल्प

विज्ञप्ति का ढाँचा साफ़ है। जिन्होंने प्रमाणीकरण करवा लिया है, उन्हें कुछ नहीं करना; उनकी रिफ़िल पहले की तरह चलती रहेगी। जिन्होंने नहीं करवाया, उनके लिए सब्सिडी के साथ विनियमित क़ीमत पर बुकिंग तभी खुलेगी जब प्रमाणीकरण पूरा हो जाएगा। बीच का कोई रास्ता विज्ञप्ति में नहीं है।

जो नहीं करवाना चाहते, उनके लिए अलग पैराग्राफ़ है। उन्हें पहले अपनी ओएमसी के डिजिटल ज़रियों पर यह विकल्प दर्ज करवाना होगा: कंज्यूमर वेब पोर्टल, मोबाइल ऐप, वॉट्सएप चैटबॉट, आईवीआरएस या कोई और उपलब्ध चैनल। उसके बाद, विज्ञप्ति के अपने शब्दों में, "इन उपभोक्ताओं को ओएमसी के पास स्थानीय उपलब्धता के आधार पर, बिना किसी सब्सिडी के, लागू बाजार मूल्य पर 5 किलो या 10 किलो के सिलेंडर में एलपीजी की आपूर्ति की जाएगी।"

इस वाक्य में तीन शर्तें एक साथ हैं। सब्सिडी नहीं। सिलेंडर छोटा। और आपूर्ति स्थानीय उपलब्धता पर।

क़ीमत विज्ञप्ति में नहीं है, इसलिए वह कंपनी के अपने पन्ने से लेनी पड़ती है। इंडियन ऑयल की क़ीमत-सूची, जो 19 सितंबर को पढ़ी गई, दिल्ली में 14.2 किलो का सिलेंडर 942 रुपये का बताती है और लिखती है कि यह दर आख़िरी बार 7 जून 2026 को बदली थी। कोलकाता 968, मुंबई 941.50, चेन्नई 957.50। उसी सूची में 19 किलो का व्यावसायिक सिलेंडर दिल्ली में 2,747.50 रुपये का है, 1 सितंबर 2026 से। पाँच या दस किलो के सिलेंडर की कोई तालिका उस पन्ने पर है ही नहीं।

यह अपने आप में एक तथ्य है। जिस उत्पाद पर विज्ञप्ति तीन करोड़ से ज़्यादा घरों को भेज रही है, उसका भाव देश की सबसे बड़ी तेल कंपनी की सार्वजनिक क़ीमत-सूची में छपा नहीं है। इंडियन ऑयल पाँच किलो का सिलेंडर छोटू नाम से बेचती है, उसे फ़्री ट्रेड एलपीजी कहती है, और अपने पन्ने पर बताती है कि उसके लिए पते का प्रमाण नहीं चाहिए और कोई सुरक्षा जमा नहीं लगती। भाव वहाँ भी नहीं है।

तमिलनाडु में इंडेन का पाँच किलो और 14.2 किलो का सिलेंडर साथ खड़े, अक्टूबर 2011; आकार का यही फ़र्क़ है जो प्रमाणीकरण न कराने वालों के आगे विकल्प बनकर आता है।
तस्वीर: தகவலுழவன், विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

एक और नाम की गड़बड़ इसी 942 रुपये पर बैठी है। पीपीएसी के अगस्त 2026 के स्नैपशॉट में यही आँकड़ा "सब्सिडाइज़्ड डोमेस्टिक एलपीजी" की पंक्ति में है, 1 सितंबर 2026 की स्थिति में, और उसका विभाजन भी दिया है: करों और कमीशन से पहले 824.04 रुपये, वितरक कमीशन 73.08, जीएसटी 44.88, कुल 942। इंडियन ऑयल उसी 942 रुपये को अपनी सूची में "नॉन-सब्सिडाइज़्ड" लिखती है। एक ही मंत्रालय की दो इकाइयाँ, एक ही अंक, उल्टे नाम।

तीस जून से चौदह सितंबर: सात बार बढ़ी तारीख़

विज्ञप्ति ख़ुद यह क्रम गिनाती है। उपभोक्ताओं से पहले 30 जून 2026 तक प्रमाणीकरण पूरा करने को कहा गया था। फिर तारीख़ बढ़ी: 31 जुलाई, 7 अगस्त, 15 अगस्त, 23 अगस्त, 31 अगस्त, 7 सितंबर और आख़िर में 14 सितंबर 2026।

सात बार तारीख़ बढ़ी।

पहली बढ़त इकतीस दिन की थी, उसके बाद की छहों सात या आठ दिन की। 30 जून से 14 सितंबर तक कुल छिहत्तर दिन, यानी क़रीब ग्यारह हफ़्ते। एक हफ़्ते की बढ़त सात बार देने का मतलब है कि हर बार यह माना गया कि बचा हुआ काम एक हफ़्ते का है, और हर बार यह मानना ग़लत निकला।

जो विज्ञप्ति नहीं देती, वह हर तारीख़ पर की कवरेज है। 30 जून को कितने बाक़ी थे, 31 अगस्त को कितने, 14 सितंबर को कितने: इनमें से एक भी अंक न इस विज्ञप्ति में है, न मंत्रालय के पन्ने पर। इसलिए यह जाँचा ही नहीं जा सकता कि सात में से कौन सी बढ़त ने कितना फ़र्क़ डाला। केवल आख़िरी आँकड़ा छपा है, और वह भी तारीख़ बीत जाने के पाँच दिन बाद।

इस काम की उम्र तीन साल की है। मंत्रालय ने 9 जुलाई 2024 की अपनी विज्ञप्ति में लिखा था कि उसने अक्टूबर 2023 में तेल कंपनियों को उज्ज्वला और पहल के लाभार्थियों का बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण कराने और पूरा करने के निर्देश दिए थे। उसी विज्ञप्ति में यह भी दर्ज है कि 55 फ़ीसदी से ज़्यादा उज्ज्वला लाभार्थी तब तक प्रमाणीकरण करा चुके थे, और यह कि जिनका प्रमाणीकरण नहीं हुआ है उनकी कोई सेवा या लाभ रोका नहीं गया है।

उस आश्वासन की एक शक्ल इस साल मार्च में भी दिखती है। आकाशवाणी समाचार ने 17 मार्च 2026 को मंत्रालय की एक सोशल मीडिया पोस्ट के हवाले से रिपोर्ट किया कि ई-केवाईसी घर बैठे मुफ़्त हो सकती है और रिफ़िल की आपूर्ति किसी भी सूरत में प्रभावित नहीं होगी। मूल पोस्ट इस डेस्क ने नहीं पढ़ी; रिपोर्ट आकाशवाणी की है और तारीख़ उसकी अपनी है। सितंबर की विज्ञप्ति उसी शर्त को घटा देती है: आपूर्ति बंद नहीं होगी, पर सब्सिडी वाले 14.2 किलो की बुकिंग रुक जाएगी। इस बदलाव का ज़िक्र उसमें कहीं नहीं है।

721 से 210 रुपये: कच्चा तेल चढ़ा, एलपीजी का भाव उतरा

विज्ञप्ति का एक हिस्सा पैसे का है, जिसका शीर्षक है एलपीजी सब्सिडी की लागत। "घरेलू एलपीजी को लागत से कम कीमत पर बेचा जाता है," वह लिखती है, और फिर दो अंक देती है: सितंबर 2026 में प्रति 14.2 किलो सिलेंडर निहित सब्सिडी क़रीब 210 रुपये, जबकि जून 2026 में यह 721 रुपये तक पहुँच गई थी। तीन महीने में 511 रुपये की गिरावट। इन्हीं तीन महीनों में कच्चा तेल महँगा हुआ है, इसलिए यह अंक जितना सीधा दिखता है, उतना है नहीं।

पहले यह तय कर लें कि निहित सब्सिडी है क्या। यह वह पैसा नहीं है जो किसी के बैंक खाते में जाता है। पहल यानी डीबीटीएल के तहत जो रक़म खाते में जाती है, पीपीएसी के अगस्त स्नैपशॉट में उसका आँकड़ा अलग से है: 2023-24 में 1,143 करोड़, 2024-25 में 366 करोड़ और 2025-26 में अनंतिम रूप से 1,647 करोड़ रुपये। उज्ज्वला की मद उससे बड़ी है, 2025-26 में 12,212 करोड़। निहित सब्सिडी इन दोनों से अलग चीज़ है। वह तेल कंपनी की लागत और उसकी वसूली का फ़र्क़ है, जो कंपनी की किताब में बैठता है और किसी बजट मद से नहीं निकलता।

अब गिरावट। विनियमित क़ीमत इन तीन महीनों में हिली ही नहीं। इंडियन ऑयल की अपनी पुरानी दरों की तालिका बताती है कि दिल्ली में 14.2 किलो का भाव 8 अप्रैल 2025 को 853 रुपये था, 7 मार्च 2026 को 913 हुआ और 7 जून 2026 को 942। उसके बाद कोई बदलाव नहीं। पीपीएसी के तीन लगातार स्नैपशॉट भी यही दोहराते हैं: 1 जुलाई, 1 अगस्त और 1 सितंबर 2026, तीनों तारीख़ों पर दिल्ली में 942 रुपये, और तीनों में वही 824.04 का विभाजन। यानी 511 रुपये की गिरावट क़ीमत बढ़ने से नहीं आई।

तो लागत गिरी होगी। पर कच्चा तेल तो चढ़ा है। पीपीएसी के इन्हीं तीन स्नैपशॉट में भारतीय बास्केट का कच्चा तेल जून 2026 में 83.22 डॉलर प्रति बैरल, जुलाई में 82.04 और अगस्त में 90.19 डॉलर है। जवाब उसी तालिका की अगली पंक्ति में है। एलपीजी का अपना अंतरराष्ट्रीय भाव जून में 796 डॉलर प्रति टन था, जुलाई में 592 और अगस्त में 632। कच्चा तेल जून से अगस्त तक क़रीब आठ फ़ीसदी ऊपर गया, एलपीजी का भाव क़रीब इक्कीस फ़ीसदी नीचे।

यह तस्वीर आइल ऑफ़ मैन की एक एलपीजी भंडारण टंकी की है, भारत की नहीं; थोक में एलपीजी वहीं जमा होती है जहाँ से अंतरराष्ट्रीय भाव का असर घरेलू सिलेंडर तक पहुँचता है।
तस्वीर: Richard Hoare, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 2.0

यह जुदाई संयोग नहीं है। मंत्रालय ने 1 जनवरी 2026 की अपनी विज्ञप्ति में लिखा है कि भारत अपनी एलपीजी ज़रूरत का क़रीब 60 फ़ीसदी आयात करता है और घरेलू एलपीजी की क़ीमतें अंतरराष्ट्रीय क़ीमतों से जुड़ी हैं, जिनका मानक सऊदी सीपी है। सऊदी सीपी प्रोपेन और ब्यूटेन का भाव है, कच्चे तेल का नहीं, और दोनों एक साथ नहीं चलते।

हिसाब कहाँ तक पहुँचता है, यह भी दर्ज कर देना चाहिए। पीपीएसी के अपने दो अंकों से, यानी महीने के भाव और उसी महीने की विनिमय दर से, 14.2 किलो गैस की नंगी एफ़ओबी लागत निकाली जा सकती है: जून में 1,073.46 रुपये, जुलाई में 805.50 और अगस्त में 856.79। जून से अगस्त तक 216.67 रुपये की गिरावट। यह हमारा अपना गुणा-भाग है, पूरी आयात-समता लागत नहीं, क्योंकि उसमें भाड़ा, बीमा, बॉटलिंग और वितरण भी जुड़ते हैं जिनका कोई प्रकाशित आँकड़ा नहीं मिला।

फिर भी दिशा साफ़ है और पैमाना अधूरा। निहित सब्सिडी 511 रुपये गिरी; एफ़ओबी भाव की गिरावट उसका क़रीब आधा हिस्सा समझाती है। बाक़ी आधा किस मद से आया, यह किसी ऐसे काग़ज़ में नहीं मिला जो पढ़ा जा सके। निहित सब्सिडी की गणना का कोई सूत्र मंत्रालय ने नहीं छापा, पीपीएसी की क़ीमत-विभाजन तालिका में लागत की कोई पंक्ति नहीं है, और सितंबर का स्नैपशॉट अभी आया नहीं है।

एक और चीज़ उस तालिका में नहीं है। पीपीएसी 942 रुपये को तीन हिस्सों में तोड़कर दिखाती है, पर यह नहीं बताती कि कंपनी को वह सिलेंडर पड़ता कितने का है। दूसरी तरफ़ जून का अंक भी अपनी शर्त लिए हुए है। विज्ञप्ति कहती है कि जून में निहित सब्सिडी 721 रुपये तक पहुँची थी, न कि जून भर 721 रही। महीने के भीतर की ऊँचाई और महीने का औसत एक चीज़ नहीं होते, और सितंबर वाला 210 किस आधार पर निकला है, यह भी नहीं लिखा।

आगे की मद का आँकड़ा भी अभी नहीं है। पीपीएसी के अगस्त स्नैपशॉट में उज्ज्वला और पहल, दोनों की पंक्तियाँ 2025-26 पर ख़त्म हो जाती हैं। 2026-27 के लिए कितना रखा गया है, वह तालिका नहीं बताती। पिछली जनवरी की विज्ञप्ति ने 2025-26 के लिए उज्ज्वला लाभार्थियों को नौ रिफ़िल तक 300 रुपये प्रति सिलेंडर की मंज़ूरी और 12,000 करोड़ का ख़र्च दर्ज किया था। इस साल के लिए वैसी कोई मंज़ूरी इस डेस्क को नहीं मिली।

62,000 करोड़ की वसूली-कमी और 30,000 करोड़ का मुआवज़ा

विज्ञप्ति तीन बड़े अंक एक साथ रखती है। वित्त वर्ष 2022-23 में सरकार ने तेल कंपनियों को 22,000 करोड़ रुपये का मुआवज़ा दिया। 2025-26 और 2026-27 के दौरान 30,000 करोड़ रुपये दिए जा रहे हैं। और इसके बावजूद 31 अगस्त 2026 तक घरेलू एलपीजी पर सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की लागत और बिक्री मूल्य का अंतर 62,000 करोड़ रुपये से ऊपर चला गया।

बीच वाले अंक का अपना काग़ज़ है। मंत्रिमंडल ने 8 अगस्त 2025 को तीनों ओएमसी के लिए 30,000 करोड़ रुपये का मुआवज़ा मंज़ूर किया था, और उस विज्ञप्ति में साफ़ लिखा है कि यह बारह किश्तों में दिया जाएगा। वितरण मंत्रालय तय करेगा। कारण भी वही दर्ज है जो अब दोहराया जा रहा है: 2024-25 में अंतरराष्ट्रीय भाव ऊँचे रहे और बढ़ी हुई लागत उपभोक्ता तक नहीं पहुँचाई गई।

पिछली जनवरी में इसी घाटे का अंक 40,000 करोड़ रुपये बताया गया था, बिना किसी तारीख़ के। अब 31 अगस्त 2026 की तारीख़ के साथ 62,000 करोड़ से ऊपर है। दोनों एक ही विभाग के अंक हैं और आपस में लड़ते नहीं, क्योंकि एक अवधि का नाम नहीं लेता।

डायवर्जन का दावा विज्ञप्ति के दूसरे पैराग्राफ़ में है। हर कनेक्शन को आधार-प्रमाणित उपभोक्ता से जोड़ने से, वह कहती है, सब्सिडी वाले घरेलू सिलेंडरों का व्यावसायिक और औद्योगिक इस्तेमाल के लिए डायवर्जन रोकने में मदद मिलती है। कितना डायवर्जन, यह वह नहीं बताती। इस डेस्क को भी कोई प्रकाशित अनुमान नहीं मिला।

जो मिल सकता है, वह प्रोत्साहन का आकार है, और वह इंडियन ऑयल की अपनी दो दरों से निकलता है। 7 जून की दर पर दिल्ली में घरेलू गैस 66.34 रुपये प्रति किलो पड़ती है, और 1 सितंबर की दर पर व्यावसायिक 144.61 रुपये प्रति किलो। फ़र्क़ 78.27 रुपये प्रति किलो का है। एक 14.2 किलो के घरेलू सिलेंडर की गैस अगर व्यावसायिक भाव पर बिके तो 2,053 रुपये की होती है, जो उसकी अपनी क़ीमत से 1,111 रुपये ज़्यादा है। पीपीएसी की गिनती में 1 जुलाई 2026 को ग़ैर-घरेलू ग्राहक 37.1 लाख थे, घरेलू 33 करोड़ के आसपास।

आधार क़ानून की धारा 7 और उसका परंतुक

धारा 7 वही जगह है जहाँ से सब्सिडी के लिए आधार माँगने का अधिकार आता है। उसका ढाँचा यह है कि केंद्र या राज्य सरकार, किसी ऐसी सब्सिडी, लाभ या सेवा के लिए जिसका ख़र्च भारत की संचित निधि या राज्य की संचित निधि से जाता है, पहचान स्थापित करने की शर्त के तौर पर प्रमाणीकरण करवाने या आधार रखने का प्रमाण देने की माँग कर सकती है। परंतुक इसके ठीक बाद आता है, और वह एक ही हालत की बात करता है: जिस व्यक्ति को आधार संख्या दी ही नहीं गई है, उसे पहचान का वैकल्पिक और व्यवहार्य ज़रिया दिया जाएगा।

यह सुनने में छोटा फ़र्क़ है और व्यवहार में नहीं। आधार न होने की हालत अलग है, और आधार होते हुए उँगली का निशान न पढ़े जाने की हालत अलग। दूसरी हालत क़ानून में दूसरी जगह है। धारा 8(2) में 2019 के संशोधन से जोड़ा गया परंतुक कहता है कि बीमारी, चोट, बुढ़ापे की कमज़ोरी या किसी तकनीकी या अन्य कारण से प्रमाणीकरण विफल होने पर, माँग करने वाली संस्था पहचान का वैकल्पिक और व्यवहार्य ज़रिया देगी, जो विनियमों में तय किया जाएगा।

विज्ञप्ति जो विकल्प देती है, वह पहचान का ज़रिया नहीं है। वह दूसरा उत्पाद है: छोटा सिलेंडर, बाज़ार भाव पर, स्थानीय उपलब्धता के भरोसे। ये दोनों बातें एक ही चीज़ हैं या नहीं, इसका फ़ैसला हम नहीं कर रहे। क़ानून का पाठ ऊपर है और विज्ञप्ति का पाठ पिछले हिस्से में।

एक बात इससे भी पहले तय होनी चाहिए, और वह भी किसी काग़ज़ से तय नहीं होती। निहित सब्सिडी संचित निधि से नहीं जाती, पहल और उज्ज्वला की रक़म जाती है। दोनों की क़ानूनी जगह अलग है। 1 अक्टूबर की शर्त इनमें से किस पर लगी है, विज्ञप्ति यह नहीं बताती, क्योंकि वह किसी आदेश, परिपत्र या अधिसूचना का हवाला ही नहीं देती।

यह चुप्पी नई नहीं है। 10 सितंबर के अंक में हमने दर्ज किया था कि यूआईडीएआई ने चेहरे से प्रमाणीकरण का नया एसडीके जारी करते समय अपनी विज्ञप्ति में यह शर्त एक बार भी नहीं लिखी थी। अब वही अनुपस्थिति एक दूसरे मंत्रालय की विज्ञप्ति में है, और इस बार उसके पीछे तीन करोड़ से ज़्यादा घर खड़े हैं।

सक्रिय कनेक्शन घट रहे हैं, बिक्री भी

प्रमाणीकरण की कवरेज बढ़ने के साथ एक दूसरी संख्या घट रही है, और वह पीपीएसी के अपने काग़ज़ों में है। सक्रिय घरेलू ग्राहक 1 अप्रैल 2026 को 3339.2 लाख थे, 1 जुलाई को 3313.8 लाख और 1 अगस्त को 3299.95 लाख। इस शृंखला में 1 अप्रैल के आँकड़े 2015 से हर साल बढ़े हैं, 1486 लाख से 3339 लाख तक। इस बार अप्रैल के बाद वह मुड़ गई। साल-दर-साल तुलना अब भी ऊपर है: उसी तालिका में 1 जुलाई 2025 के मुक़ाबले 1 जुलाई 2026 पर बढ़त 0.3 फ़ीसदी दर्ज है, जो शृंखला की सबसे धीमी है।

तमिलनाडु में साइकिल-ठेले पर लदे इंडेन के सिलेंडर, मई 2013; गाँव-गली तक डिलीवरी के इसी दायरे में सक्रिय ग्राहकों की संख्या अब लगातार घट रही है।
तस्वीर: Tshrinivasan, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

नए कनेक्शन भी रुके हैं। एलपीजी प्रोफ़ाइल रिपोर्ट बताती है कि अप्रैल से जून 2026 की तिमाही में तीनों कंपनियों ने कुल 0.36 लाख नए घरेलू ग्राहक जोड़े, जो पिछले साल की इसी तिमाही से 96.6 फ़ीसदी कम है। उज्ज्वला पोर्टल पर 17 सितंबर 2026 की स्थिति में कुल कनेक्शन 10,56,83,896 दर्ज हैं और ताज़ा विस्तार के 25 लाख के लक्ष्य में 24,41,115 दिए जा चुके हैं।

बिक्री की गिरावट उससे भी तीखी है। पीपीएसी की अगस्त 2026 की फ़्लैश रिपोर्ट में महीने की एलपीजी खपत 2,424 टीएमटी है, जबकि अगस्त 2025 में 2,891 थी। 16.15 फ़ीसदी की कमी। 2026-27 में अब तक की खपत 11,290 टीएमटी है और पिछले साल इसी अवधि में 13,423 थी, यानी 15.89 फ़ीसदी कम।

इसी बरस का एक और ब्योरा साथ रखने लायक़ है। 17 अप्रैल 2026 की अंतर-मंत्रालयी ब्रीफ़िंग में सरकार ने ख़ुद दर्ज किया था कि उसने बुकिंग का अंतराल शहरों में 21 से बढ़ाकर 25 दिन और गाँवों में 45 दिन तक किया, व्यावसायिक एलपीजी में अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों को प्राथमिकता दी और प्रवासी मज़दूरों के लिए 5 किलो एफ़टीएल की आपूर्ति दोगुनी की। राशनिंग का वह दौर अप्रैल का है। गाँव और शहर का वह बीस दिन का फ़र्क़ बाद में हटा, और 8 सितंबर के अंक में हमने उसका हिसाब अलग से लिखा था। कितनी गिरावट राशनिंग की है, कितनी क़ीमत की और कितनी कनेक्शन हटने की, यह बँटवारा किसी दस्तावेज़ में नहीं है।

इस ख़बर के पीछे सिर्फ़ एक काग़ज़ है

यह पूरी रिपोर्ट एक सरकारी विज्ञप्ति और उसके आसपास पड़े सरकारी आँकड़ों पर खड़ी है। 1 अक्टूबर की तारीख़ के पीछे कोई आदेश, कोई ओएमसी परिपत्र और कोई राजपत्र अधिसूचना विज्ञप्ति में नहीं है, और मंत्रालय के अपने पन्ने की नई सूचनाओं में भी नहीं, जहाँ 19 सितंबर तक की ताज़ा प्रविष्टियाँ 16 सितंबर, 3 सितंबर और 17 अगस्त 2026 की हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 और एलपीजी नियंत्रण आदेश 2000 मौजूद हैं; सरकार ख़ुद अप्रैल में उनका नाम ले चुकी है। उनमें से किसी का हवाला इस बदलाव के साथ नहीं आया।

बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 19 सितंबर को यही ख़बर दी और विज्ञप्ति के अंक ज्यों के त्यों दोहराए। 89.9 को 100 में से घटाने का काम किसी ने नहीं किया।

विज्ञप्ति के भीतर दो तनाव पाठक के हिस्से आते हैं। वह लिखती है कि "इस प्रक्रिया का उद्देश्य किसी भी वास्तविक परिवार को एलपीजी से वंचित करना नहीं है", और अगली ही स्क्रीन पर प्रमाणीकरण न कराने वाले घर को छोटा सिलेंडर बाज़ार भाव पर देती है। और वह 89.9 फ़ीसदी कवरेज छापती है बिना यह कहे कि इससे कितने लोग बाहर रह जाते हैं।

बाहर रह गए लोगों में कितने उज्ज्वला के हैं, यह कहीं दर्ज नहीं। यह भी दर्ज नहीं कि प्रमाणीकरण न होने पर अब तक किसी कनेक्शन की बुकिंग रोकी गई है या नहीं। और 5 या 10 किलो के सिलेंडर का भाव, जिस पर तीन करोड़ से ज़्यादा घरों का अगला महीना टिका है, किसी सरकारी क़ीमत-सूची में छपा हुआ नहीं मिला।

स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, प्रविष्टि तिथि 19 सितंबर 2026 शाम 7:42, हिंदी पाठ: 1 अक्टूबर से बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण, 27.43 करोड़ और 89.9 प्रतिशत, सात बार बढ़ी तारीख़ें, निहित सब्सिडी 210 और 721 रुपये, उसी विज्ञप्ति का अंग्रेज़ी पाठ, वही तारीख़ और वही समय: 31 अगस्त 2026 तक 62,000 करोड़ रुपये से ऊपर की वसूली-कमी, पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल: राज्यवार सक्रिय घरेलू एलपीजी उपभोक्ता, 1 अगस्त 2026, अखिल भारत 3299.95235 लाख, स्रोत सार्वजनिक क्षेत्र की तीन ओएमसी, पीपीएसी, एलपीजी प्रोफ़ाइल रिपोर्ट, पहली तिमाही 2026-27: 1 जुलाई 2026 को 33.14 करोड़ सक्रिय घरेलू ग्राहक, तालिका 1 की पूरी शृंखला, 95.6 फ़ीसदी संतृप्ति, 10.573 करोड़ पीएमयूवाई लाभार्थी, 25,611 वितरक, पीपीएसी, स्नैपशॉट ऑफ़ इंडियाज़ ऑयल एंड गैस डेटा, अगस्त 2026: अगस्त में एलपीजी 632 डॉलर प्रति टन, कच्चा तेल 90.19 डॉलर प्रति बैरल, 1 सितंबर 2026 को दिल्ली में सिलेंडर की क़ीमत का विभाजन, पीपीएसी, स्नैपशॉट, जून 2026: जून में एलपीजी 796 डॉलर प्रति टन, कच्चा तेल 83.22 डॉलर, विनिमय दर 94.97, 1 जुलाई 2026 को दिल्ली में क़ीमत 942 रुपये, पीपीएसी, स्नैपशॉट, जुलाई 2026: जुलाई में एलपीजी 592 डॉलर प्रति टन, कच्चा तेल 82.04 डॉलर, विनिमय दर 95.82, पीपीएसी फ़्लैश रिपोर्ट, अगस्त 2026: एलपीजी खपत 2,424 टीएमटी, पिछले अगस्त से 16.15 फ़ीसदी कम; 2026-27 में अब तक 11,290 टीएमटी, 15.89 फ़ीसदी कम, इंडियन ऑयल, पेट्रोलियम उत्पादों की क़ीमतें, 19 सितंबर 2026 को पढ़ा गया: 14.2 किलो सिलेंडर की दर 7 जून 2026 को अंतिम बार बदली, दिल्ली 942 रुपये; 19 किलो की दर 1 सितंबर 2026 से दिल्ली में 2,747.50 रुपये; 5 या 10 किलो की कोई तालिका नहीं, इंडियन ऑयल, 14.2 किलो इंडेन की पुरानी दरें: 8 अप्रैल 2025 को दिल्ली 853 रुपये, 7 मार्च 2026 को 913 रुपये, पत्र सूचना कार्यालय, पेट्रोलियम मंत्रालय, 1 जनवरी 2026 शाम 6:35: घरेलू एलपीजी का अंतरराष्ट्रीय मानक सऊदी सीपी, 60 फ़ीसदी आयात, 33 करोड़ से ज़्यादा घरेलू उपभोक्ता, 40,000 करोड़ का घाटा, पीएमयूवाई को 300 रुपये प्रति सिलेंडर नौ रिफ़िल तक, पत्र सूचना कार्यालय, मंत्रिमंडल, 8 अगस्त 2025 दोपहर 4:02: तीन ओएमसी को 30,000 करोड़ रुपये का मुआवज़ा, बारह किश्तों में, पत्र सूचना कार्यालय, पेट्रोलियम मंत्रालय, 9 जुलाई 2024 शाम 7:44: अक्टूबर 2023 में ओएमसी को दिए गए निर्देश, 55 फ़ीसदी से ज़्यादा पीएमयूवाई लाभार्थी, और यह कि किसी की सेवा या लाभ रोका नहीं गया है, पत्र सूचना कार्यालय, अंतर-मंत्रालयी ब्रीफ़िंग, 17 अप्रैल 2026: बुकिंग अंतराल शहर में 21 से 25 दिन और गाँव में 45 दिन तक, आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 और एलपीजी नियंत्रण आदेश 2000 का हवाला, आधार (वित्तीय और अन्य सब्सिडी, लाभ और सेवाओं का लक्ष्यित परिदान) अधिनियम, 2016, यूआईडीएआई का प्रकाशित पाठ: धारा 7 और उसका परंतुक, धारा 8(2) का 2019 में जोड़ा गया परंतुक, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना पोर्टल, 17 सितंबर 2026 की स्थिति: 10,56,83,896 कनेक्शन, ताज़ा विस्तार में 24,41,115, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय का अपना पन्ना, 19 सितंबर 2026 को पढ़ा गया: नई सूचनाओं में 16 सितंबर, 3 सितंबर और 17 अगस्त 2026 की प्रविष्टियाँ, प्रमाणीकरण से जुड़ा कोई आदेश नहीं, आकाशवाणी समाचार, 17 मार्च 2026 दोपहर 12:58: मंत्रालय की सोशल मीडिया पोस्ट पर आधारित रिपोर्ट कि रिफ़िल की आपूर्ति किसी भी सूरत में प्रभावित नहीं होगी, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 19 सितंबर 2026: विज्ञप्ति के वही आँकड़े दोहराए गए, घटाव कहीं नहीं

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