एएफ़डी को 43.8 फ़ीसदी वोट मिले और वह फिर भी सरकार नहीं बना पा रही
जर्मनी के सैक्सनी-अनहाल्ट राज्य में धुर-दक्षिणपंथी पार्टी का वोट पाँच साल में दोगुने से ज़्यादा हो गया। बहुमत फिर भी नहीं मिला, और कोई दल उसके साथ जाने को तैयार नहीं।

जर्मनी के सैक्सनी-अनहाल्ट राज्य में रविवार को हुए चुनाव में एएफ़डी को 43.8 फ़ीसदी वोट मिले।
पाँच साल पहले उसी राज्य में इस पार्टी को इससे आधे से भी कम मिले थे।
पार्टी के मुख्य उम्मीदवार उलरिष सीगमुंड ने जर्मन टेलीविज़न से कहा कि हमने इतिहास लिख दिया।
फिर भी वे मुख्यमंत्री नहीं बन पा रहे।
इस वाक्य में जो विरोधाभास है, वही इस चुनाव की असली ख़बर है। और उसे समझने के लिए दो चीज़ें जाननी पड़ेंगी: जर्मनी की चुनाव पद्धति, और वह अलिखित समझौता जिसे वहाँ दीवार कहते हैं।
तैंतालीस से बहुमत तक की दूरी
यह पहली बात समझने लायक़ है, क्योंकि भारतीय पाठक के लिए यह उलटा लगेगा।
भारत में चुनाव ज़्यादातर सीधे बहुमत वाली पद्धति से होते हैं, जिसमें जिस उम्मीदवार को सबसे ज़्यादा वोट मिले वह जीत जाता है। इसलिए यहाँ 43 फ़ीसदी वोट लेकर कोई पार्टी अक्सर बड़ा बहुमत बना लेती है।
जर्मनी में पद्धति अलग है। वहाँ सीटें वोट के अनुपात में बँटती हैं। जिस पार्टी को 43.8 फ़ीसदी वोट मिले, उसे लगभग उतनी ही फ़ीसदी सीटें मिलेंगी।
बहुमत के लिए पचास फ़ीसदी से ऊपर चाहिए।
इसलिए एएफ़डी सबसे बड़ी पार्टी है और बहुमत से दूर है। सरकार बनाने के लिए उसे किसी और के साथ की ज़रूरत होगी।
और यहीं वह दीवार आती है

जर्मनी की राजनीति में एक अलिखित समझौता है जिसे वहाँ दीवार कहा जाता है।
उसका मतलब यह है कि मुख्यधारा की कोई पार्टी एएफ़डी के साथ मिलकर सरकार नहीं बनाएगी, न उसके समर्थन से सरकार चलाएगी, न उसे समर्थन देगी।
यह किसी क़ानून में लिखा नहीं है। यह दलों का आपसी वचन है।
इसकी जड़ जर्मनी के इतिहास में है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी ने अपना संविधान इस समझ के साथ बनाया कि लोकतंत्र को उन ताक़तों से बचाना है जो उसी लोकतंत्र के रास्ते आकर उसे ख़त्म कर सकती हैं।
इसीलिए वहाँ ऐसी व्यवस्थाएँ हैं जो कहीं और नहीं मिलतीं, जैसे संविधान-विरोधी दलों पर प्रतिबंध की गुंजाइश और संविधान संरक्षण के लिए एक अलग एजेंसी।
दीवार उसी सोच का राजनीतिक विस्तार है।
जर्मनी की संवैधानिक भाषा में इसे बचाव करने वाला लोकतंत्र कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि लोकतंत्र को अपनी रक्षा का अधिकार है, और वह उन दलों पर सीमाएँ लगा सकता है जो उसकी बुनियाद के ख़िलाफ़ हों।
इस विचार पर बहस पुरानी है। जो इसके पक्ष में हैं वे कहते हैं कि 1933 का सबक़ यही है। जो विरोध में हैं वे कहते हैं कि यह तय करने का हक़ किसी को नहीं कि कौन सा विचार लोकतंत्र के भीतर है और कौन बाहर।
दीवार का दोहरा असर
यह व्यवस्था अब तक काम करती रही है। एएफ़डी कई राज्यों में मज़बूत हुई है और कहीं भी सरकार में नहीं आई।
पर इसका एक दूसरा असर भी है, और उसे मानना ज़रूरी है।
जब कोई पार्टी सबसे ज़्यादा वोट लेकर भी सत्ता से बाहर रखी जाती है, तो उसके समर्थकों के पास एक तैयार शिकायत आ जाती है: हमारा वोट गिना नहीं जाता।
यह शिकायत उस पार्टी के लिए सबसे कारगर हथियार बन जाती है, क्योंकि वह ख़ुद को व्यवस्था के बाहर का बताती है और व्यवस्था उसे बाहर रखकर उसकी बात सही साबित कर देती है।
इसीलिए जर्मनी में इस दीवार पर बहस लगातार चलती है। एक तरफ़ यह तर्क कि इसे बनाए रखना ही लोकतंत्र की रक्षा है। दूसरी तरफ़ यह कि इससे उस पार्टी को वह शहादत मिल रही है जिसकी उसे ज़रूरत है।
यह राज्य कहाँ है

सैक्सनी-अनहाल्ट पूर्वी जर्मनी में है, यानी उस हिस्से में जो 1990 तक पूर्वी जर्मनी नाम का अलग देश था।
एएफ़डी का सबसे मज़बूत आधार इसी पूर्वी हिस्से में है, और यह बात इस पूरे परिघटना को समझने की कुंजी है।
एकीकरण के बाद पूर्वी जर्मनी में जो हुआ, वह तेज़ और कठोर था। पुराने राजकीय कारख़ाने बंद हुए या बेचे गए। बेरोज़गारी बहुत बढ़ी। और बड़ी संख्या में नौजवान, ख़ासकर पढ़े-लिखे और महिलाएँ, पश्चिम की तरफ़ चले गए।
पैंतीस साल बाद भी पूर्वी हिस्से में औसत आमदनी और संपत्ति पश्चिम से कम है।
संपत्ति का अंतर सबसे गहरा है और उसका कारण साफ़ है। पश्चिम में परिवारों ने पीढ़ियों से मकान और ज़मीन जमा की। पूर्व में वह संभव नहीं था, क्योंकि निजी संपत्ति की गुंजाइश सीमित थी।
एकीकरण के बाद जब बाज़ार खुला, तो एक तरफ़ वे लोग थे जिनके पास जमा पूँजी थी और दूसरी तरफ़ वे जिनके पास नहीं थी।
पैंतीस साल में यह फ़ासला घटा है, ख़त्म नहीं हुआ। और जिन बच्चों ने अपने माता-पिता को यह सब झेलते देखा, वे अब मतदाता हैं।
यह प्रवासन की कहानी नहीं है
एएफ़डी की राजनीति का सबसे मुखर हिस्सा प्रवासन के विरोध का है, और उसकी ख़बरें उसी रूप में छपती हैं।
पर एक बात ग़ौर करने लायक़ है। पूर्वी जर्मनी में प्रवासियों की संख्या पश्चिमी जर्मनी के मुक़ाबले कम है।
यानी यह पार्टी वहाँ सबसे मज़बूत है जहाँ प्रवासी सबसे कम हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि प्रवासन का सवाल नक़ली है। इसका मतलब यह है कि वोट का कारण अकेले वह नहीं है।
जो कारण उसके नीचे है, वह पुराना है। एक ऐसा इलाक़ा जिसने एक व्यवस्था के ढहने के बाद दूसरी व्यवस्था अपनाई, और जिसे लगता रहा कि उस बदलाव की शर्तें उसने नहीं, किसी और ने तय कीं।
पाँच साल में दोगुना कैसे
किसी पार्टी का वोट पाँच साल में दोगुना होना असामान्य है, इसलिए यह पूछा जाना चाहिए कि यह वोट आया कहाँ से।
ऐसे मामलों में वोट तीन जगहों से आता है। पुरानी पार्टियों के मतदाता जो नाराज़ होकर बदल गए। वे लोग जो पहले वोट डालते ही नहीं थे और अब निकले। और नए मतदाता जो पहली बार वोट दे रहे हैं।
तीनों में से हर एक का मतलब अलग है।
पहली स्थिति में यह पुरानी पार्टियों की नाकामी है, और वोट वापस आ सकता है।
दूसरी स्थिति में यह उन लोगों का लौटना है जो व्यवस्था से कट चुके थे। ऐसा वोट ज़्यादा टिकाऊ होता है, क्योंकि वह किसी नाराज़गी से नहीं, किसी पहचान से जुड़ता है।
तीसरी स्थिति सबसे दूरगामी है। जो मतदाता अपनी पहली वोट किसी पार्टी को देता है, उसका उससे रिश्ता लंबा चलता है।
सैक्सनी-अनहाल्ट में इन तीनों का कितना-कितना हिस्सा है, यह विस्तृत आँकड़े आने पर पता चलेगा। पर 43.8 का आँकड़ा अपने आप में बताता है कि यह अकेले नाराज़गी का वोट नहीं है।
उम्मीदवार कौन है
उलरिष सीगमुंड पैंतीस साल के हैं और पहले विपणन के क्षेत्र में काम कर चुके हैं।
उनके बारे में जो लगातार लिखा गया है, वह यह है कि उनका तौर-तरीक़ा नरम है और उनका कार्यक्रम कठोर।
यह जोड़ अपने आप में उस बदलाव की निशानी है जो यूरोप की धुर-दक्षिणपंथी राजनीति में आया है। पुरानी शैली आक्रामक और खुरदुरी थी। नई शैली सलीक़ेदार है और सोशल मीडिया पर सहज।
इससे वह दायरा बढ़ता है जिस तक बात पहुँचती है, ख़ासकर उन नौजवानों तक जो पुराने अंदाज़ से दूर रहते।
आगे क्या होगा
अभी की स्थिति यह है कि एएफ़डी सबसे बड़ी पार्टी है और सरकार बनाने के लिए उसे साथी चाहिए, जो मिलने की संभावना कम है।
इसका नतीजा यह होगा कि बाक़ी पार्टियाँ आपस में मिलकर सरकार बनाएँगी।
ऐसी सरकारें अक्सर बेमेल होती हैं। उनमें ऐसी पार्टियाँ साथ आती हैं जिनके कार्यक्रम आपस में नहीं मिलते, और जिनका एक ही साझा आधार यह होता है कि वे तीसरे को बाहर रखना चाहती हैं।
ऐसी सरकारें चलती हैं, पर उनका काम धीमा रहता है और उनमें झगड़े ज़्यादा होते हैं।
और हर झगड़ा उस पार्टी के लिए दलील बन जाता है जो बाहर बैठी है।
राज्य सरकार के हाथ में क्या होता है

जर्मनी संघीय देश है और उसके राज्यों के पास असली अधिकार हैं, इसलिए यह चुनाव प्रतीकात्मक नहीं है।
पुलिस राज्य के अधीन है। स्कूल राज्य के अधीन हैं। सांस्कृतिक नीति राज्य की है। और शरणार्थियों को बसाने तथा उनके आवेदन निपटाने में राज्यों की बड़ी भूमिका होती है।
इसका मतलब यह है कि अगर कोई पार्टी किसी राज्य में सरकार बनाती है, तो वह उन्हीं विषयों पर काम कर सकती है जिन पर उसका सबसे ज़्यादा ज़ोर है।
राज्यों को संघीय स्तर पर भी दख़ल मिलता है, क्योंकि ऊपरी सदन में राज्य सरकारें ही प्रतिनिधित्व करती हैं।
इसलिए दीवार सिर्फ़ नैतिक सवाल नहीं है। उसके पीछे यह गणना भी है कि एक राज्य में सरकार बन जाना पूरे देश की व्यवस्था में जगह बना देगा।
यूरोप की बड़ी तस्वीर
यह अकेले जर्मनी की बात नहीं है।
पिछले कुछ बरसों में यूरोप के कई देशों में इसी तरह की पार्टियाँ मज़बूत हुई हैं, और कुछ जगह सरकार में भी आई हैं।
जहाँ वे सरकार में आईं, उन देशों में दो तरह के अनुभव रहे। कुछ जगह उनका रुख़ सत्ता में आने के बाद नरम हुआ, क्योंकि शासन चलाने की मजबूरियाँ अलग होती हैं। कुछ जगह उन्होंने संस्थाओं पर पकड़ बनाने की कोशिश की।
जर्मनी में यह प्रयोग अब तक नहीं हुआ, क्योंकि दीवार क़ायम है।
इसलिए वहाँ अब तक यह पता नहीं चला कि सत्ता मिलने पर क्या होगा।
एक बात जो नज़र से चूक जाती है
इन चुनावों की ख़बरों में एक चीज़ लगभग कभी नहीं आती, और वह मतदान का प्रतिशत है।
पूर्वी जर्मनी के राज्यों में कई चुनावों में मतदान बढ़ा है, और वह बढ़त उसी दौर में हुई है जिसमें यह पार्टी बढ़ी।
यह अपने आप में एक जानकारी है। जो लोग वोट देने नहीं जाते थे, वे अब जा रहे हैं।
लोकतंत्र में भागीदारी बढ़ना अच्छी बात मानी जाती है। यहाँ वह उन लोगों की भागीदारी है जो मौजूदा व्यवस्था से नाख़ुश हैं।
इसलिए इस नतीजे को सिर्फ़ एक पार्टी की जीत की तरह पढ़ना अधूरा है। यह उन लोगों के लौटने की भी ख़बर है जो व्यवस्था से बाहर हो चुके थे, और उनका लौटना उस पार्टी के ज़रिए हुआ जिससे बाक़ी सब दूरी बनाए हुए हैं।
भारत के लिए इसमें क्या है
पहली नज़र में यह दूर की ख़बर है। पर उसमें एक सवाल है जो हर लोकतंत्र से जुड़ता है।
जब कोई पार्टी चुनाव में सबसे ज़्यादा वोट पाए और फिर भी सत्ता से बाहर रखी जाए, तो यह लोकतंत्र की रक्षा है या उसका उल्लंघन।
इसका कोई एक जवाब नहीं है, और यही इसे दिलचस्प बनाता है।
एक तरफ़ यह तर्क है कि जनता का फ़ैसला अंतिम होता है और उसे किसी नैतिक कसौटी से नहीं रोका जा सकता।
दूसरी तरफ़ यह तर्क है कि लोकतंत्र सिर्फ़ गिनती नहीं है, वह उन शर्तों का नाम भी है जिनके बिना अगला चुनाव नहीं हो पाएगा।
जर्मनी ने अपने इतिहास की वजह से दूसरा रास्ता चुना है। उस इतिहास में एक पार्टी लोकतांत्रिक तरीक़े से सत्ता में आई थी और उसने उसी लोकतंत्र को ख़त्म कर दिया था।
जो अब तक तय है
रविवार के नतीजों से तीन बातें साफ़ हैं।
पहली, एएफ़डी का समर्थन पूर्वी जर्मनी में और बढ़ा है, और यह अब किसी एक चुनाव की बात नहीं रही।
दूसरी, दीवार अभी खड़ी है और उसे गिराने की बात किसी बड़ी पार्टी ने नहीं की।
तीसरी, इन दोनों को साथ रखिए तो एक ऐसी स्थिति बनती है जो टिकाऊ नहीं दिखती। एक पार्टी जिसका समर्थन बढ़ता जा रहा हो और जो सत्ता से बाहर रखी जाती रहे, यह संतुलन लंबे समय तक नहीं चलता।
इसका हल क्या होगा, यह जर्मनी को तय करना है। और जिस तरह वह इसे तय करेगा, उस पर बाक़ी यूरोप की नज़र रहेगी।
तीन रास्ते जो खुले हैं
जर्मनी के सामने मोटे तौर पर तीन ही रास्ते हैं और तीनों पर वहाँ बहस हो रही है।
पहला, दीवार को क़ायम रखना और बाक़ी दलों की मिली-जुली सरकारें चलाते रहना। यह अब तक का रास्ता है और यह हर चुनाव के बाद थोड़ा और कठिन होता जा रहा है।
दूसरा, दीवार को गिरा देना और उस पार्टी को सरकार में आने देना। इसके समर्थकों का तर्क यह है कि सत्ता की ज़िम्मेदारी उसे बदल देगी, या जनता उसका काम देखकर उसे हटा देगी। इसके विरोधियों का तर्क यह है कि यह जुआ है और इसकी क़ीमत बहुत बड़ी हो सकती है।
तीसरा, वह रास्ता जिसकी चर्चा सबसे कम होती है। पुरानी पार्टियाँ उन कारणों पर काम करें जिनसे यह वोट पैदा हुआ है, यानी पूर्वी हिस्से का आर्थिक पिछड़ापन और वह अहसास कि उनकी बात नहीं सुनी जाती।
तीसरा रास्ता सबसे धीमा है और उसका नतीजा अगले चुनाव में नहीं दिखता। शायद इसीलिए उस पर सबसे कम काम हुआ है।
रविवार का नतीजा इन तीनों में से किसी की तरफ़ इशारा नहीं करता। वह सिर्फ़ यह बताता है कि फ़ैसले का वक़्त क़रीब आ रहा है।
स्रोतसीएनएन, सैक्सनी-अनहाल्ट के नतीजों पर रिपोर्ट, अल जज़ीरा, नतीजों पर रिपोर्ट, एनपीआर, चुनाव पर रिपोर्ट