भारत पन्ना
सियासतनामा

139 धाराओं का हिंदू कोड बिल चार साल में चार धाराएँ ही पार कर सका, और उसे काटकर छोटा करने का प्रस्ताव प्रधानमंत्री का था

अंबेडकर के अपने इस्तीफ़ा-बयान में हिंदू कोड पाँचवें नंबर पर है। उससे पहले वे क़ानून मंत्रालय को 'ख़ाली साबुन की डिबिया' कहते हैं, अनुसूचित जातियों की हालत गिनाते हैं, विदेश नीति पर सवाल उठाते हैं और मंत्रिमंडल की समितियों को 'लोहे के परदे के पीछे' बताते हैं। वह बयान लोकसभा में पढ़ा भी नहीं जा सका।

संविधान सभा की बैठक में सदस्यों की बेंचें, यह तस्वीर 11 दिसंबर 1946 की है; इसी सभा का विधायी रूप वह सदन था जिसमें चार महीने बाद 139 धाराओं का हिंदू कोड बिल पेश हुआ और चार साल बाद चौथी धारा पर रुक गया
तस्वीर: Unknown author, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

25 सितंबर 1951 को लोकसभा में हिंदू कोड बिल की धारा 4 पर वोट पड़ा।

उस धारा का शीर्षक था "संहिता का अध्यारोही प्रभाव"। उसमें लिखा था कि हिंदू क़ानून का जो भी पाठ, नियम, व्याख्या, रीति या रिवाज इस संहिता से टकराएगा, वह लागू नहीं रहेगा। अंबेडकर इसे "हिंदू कोड की आत्मा" कह चुके थे। उस दोपहर एक के बाद एक संशोधन गिरे, फिर अंबेडकर का अपना संशोधन पास हुआ, और उपाध्यक्ष ने कहा कि सदन बाक़ी विधायी काम पर जाएगा।

पंडित लक्ष्मी कांत मैत्र ने पूछा कि आगे की धाराओं का क्या होगा। उपाध्यक्ष का जवाब दर्ज है: बाक़ी काम कार्यसूची में है, वह निपट जाने पर यह उठाया जाएगा।

वह कभी नहीं उठाया गया। विधेयक 11 अप्रैल 1947 को पेश हुआ था और उसमें 139 धाराएँ थीं। चार साल और पाँच महीने में उसकी चार धाराएँ पास हुईं। दो दिन बाद, 27 सितंबर 1951 को, क़ानून मंत्री ने प्रधानमंत्री को इस्तीफ़ा भेज दिया।

राव समिति ने कहा था कि क़ानून टुकड़ों में बनें

हिंदू कोड की जड़ 1937 के हिंदू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम में है। उस क़ानून ने विधवा को पति की संपत्ति में हिस्सा दिया और अदालतों में इतनी उलझनें खड़ी कीं कि 1941 में गृह विभाग ने उन्हें सुलझाने के लिए बी.एन. राव की अध्यक्षता में एक समिति बिठाई। 9 अप्रैल 1948 को अंबेडकर ने सदन में ब्योरा दिया: समिति ने 19 जून 1941 को रिपोर्ट दी, प्रांत-प्रांत घूमी, प्रश्नावलियाँ भेजीं और गवाह जाँचे; 1942 में दो मसौदा विधेयक दिए, एक उत्तराधिकार पर और एक विवाह पर; उत्तराधिकार वाला 1943 में विधानसभा में पेश हुआ और दोनों सदनों की संयुक्त समिति को गया।

उस रिपोर्ट की एक सिफ़ारिश बाद के पूरे झगड़े की जड़ बनी। 1 अप्रैल 1949 को नज़ीरुद्दीन अहमद ने उसे सदन में पढ़कर सुनाया, रिपोर्ट के पृष्ठ 23 से:

"जिस सिफ़ारिश पर हम सबसे ज़्यादा ज़ोर देना चाहते हैं, वह यह है कि हिंदू क़ानून की पूरी संहिता क्रमिक चरणों में तैयार की जाए, शुरुआत उत्तराधिकार से हो, उसके बाद विवाह का क़ानून आए और यथासमय बाक़ी विषय। ... इससे विवादित बिंदुओं पर सहमति के हल निकलने की गुंजाइश ज़्यादा रहेगी, क्योंकि मैदान जितना बड़ा होगा, समझौते की जगह उतनी ही ज़्यादा होगी।"

उसी रिपोर्ट के पृष्ठ 11 पर: हर हिस्सा अलग क़ानून बन जाए, तब सबको मिलाकर एक संहिता बना ली जाए।

राव समिति ने अपने विधेयक अलग-अलग, अपनी-अपनी धारा-संख्या के साथ, एक ही जिल्द में छपवाए थे। नज़ीरुद्दीन अहमद का आरोप था कि क़ानून मंत्रालय की विभागीय समिति ने उस ढाँचे को ग़लत समझा और सारे हिस्सों को जोड़कर लगातार क्रमांक वाली एक संहिता बना दी। प्रवर समिति की बहुमत रिपोर्ट कहती है कि अलग-अलग भाग और अलग क्रमांक रखना अनजाना और निरर्थक था, इसलिए उन्हें एक ढाँचे में पिरोया गया।

यानी 1951 में जिस विधेयक को तोड़ने की नौबत आई, वह ख़ुद चार साल पहले टुकड़े जोड़कर बनाया गया था।

अंबेडकर की गिनाई हुई छह बातें

9 अप्रैल 1948 को अंबेडकर ने विधेयक को प्रवर समिति में भेजने का प्रस्ताव रखा। सत्र का आख़िरी दिन था और बहस सात बजे तक ख़त्म करनी थी, इसलिए उन्होंने कहा कि वे भाषण छोटा रखेंगे और सिर्फ़ वे बिंदु गिनाएँगे जो मौजूदा क़ानून से हटते हैं।

विधेयक सात विषय समेटता था: बिना वसीयत मरे हिंदू की संपत्ति के अधिकार, उत्तराधिकारियों का क्रम, भरण-पोषण, विवाह, तलाक़, दत्तक ग्रहण, और अल्पवयस्कता तथा संरक्षकता। उत्तराधिकार में उसने मिताक्षरा की जगह दायभाग का नियम पूरे देश पर लागू किया, यानी जन्म का हक़ और उत्तरजीविता ख़त्म। विधवा, बेटी और पूर्वमृत बेटे की विधवा को बेटे के बराबर दर्जा मिला, और बेटी को पिता की संपत्ति में बेटे का आधा हिस्सा। औरत की सीमित जायदाद पूरी मिल्कियत में बदली और प्रतिवर्तियों का दावा ख़त्म हुआ। दहेज न्यास की संपत्ति माना गया, जिसे लड़की 18 साल की उम्र में माँग सकती थी।

विवाह में संहिता ने दो रूप माने, संस्कार वाला और पंजीकृत, दोनों के लिए लड़के की उम्र 18 और लड़की की 14। जाति और उपजाति की शर्त हटा दी गई, गोत्र-प्रवर की भी। बहुविवाह की जगह एकविवाह आया। तलाक़ के सात आधार रखे गए: परित्याग, धर्म-परिवर्तन, रखैल रखना या बनना, लाइलाज विक्षिप्तता, उग्र और असाध्य कुष्ठ, संक्रामक यौन रोग, और क्रूरता। दत्तक में पति को पत्नी की सहमति लेनी थी, और विधवा तभी गोद ले सकती थी जब पति ने पंजीकृत दस्तावेज़ या वसीयत में लिखित अधिकार दिया हो।

भाषण के आख़िर में अंबेडकर ने ख़ुद छह बिंदु गिनाए जिन पर बहस होनी थी: जन्म से मिलने वाले हक़ और उत्तरजीविता का ख़ात्मा, बेटी का आधा हिस्सा, औरत की सीमित जायदाद का पूरी मिल्कियत में बदलना, विवाह और दत्तक में जाति की शर्त का हटना, एकविवाह, और तलाक़।

उसी दिन आर.के. चौधरी के इस आरोप पर कि यह सांप्रदायिक क़ानून है, अंबेडकर ने जवाब दिया कि अगर उनके मित्र का विकल्प यह है कि सांप्रदायिक उत्तराधिकार और विवाह क़ानून न हों बल्कि धर्म, पंथ या जाति के भेद के बिना सब नागरिकों पर लागू होने वाली एक समान नागरिक संहिता हो, तो वे उनके साथ हैं।

प्रवर समिति की रिपोर्ट, और व्यवस्था का सवाल

प्रवर समिति में उन्नीस सदस्य नामज़द हुए और बीसवें ख़ुद प्रस्तावक। सूची में अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर, बख़्शी टेक चंद, जी. दुर्गाबाई, रेणुका राय, अम्मू स्वामीनाथन और एल. कृष्णस्वामी भारती जैसे नाम थे। रिपोर्ट 12 अगस्त 1948 को सदन में रखी गई, और 31 अगस्त 1948 को अंबेडकर ने प्रस्ताव रखा कि प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित विधेयक पर विचार किया जाए।

उसी दिन नज़ीरुद्दीन अहमद ने व्यवस्था का प्रश्न उठाया: जो विधेयक सदन ने प्रवर समिति को भेजा था, समिति ने उस पर विचार ही नहीं किया, उसकी जगह दूसरा मसौदा रख दिया गया, इसलिए रिपोर्ट किसी और चीज़ पर बनी है। कार्यवाही के पृष्ठ 778 पर बहस रुकी और 780 पर अध्यक्ष ने कहा कि वे सारे तथ्य पढ़कर व्यवस्था देंगे।

संविधान सभा की बहस के आधिकारिक प्रतिवेदन का पहला खंड, 9 दिसंबर 1946, जिसके पन्ने पर सरकारी प्रेस की छाप और पाँच आने की क़ीमत दर्ज है; इसी शृंखला की जिल्दों से निकलता है कि बहस किस पन्ने पर रुकी और व्यवस्था का इंतज़ार कितना लंबा रहा
तस्वीर: Prime Minister's Office, Government of India, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

व्यवस्था छह महीने बाद, 17 फ़रवरी 1949 को आई, जब ठाकुर दास भार्गव ने वही सवाल दोबारा उठाया। अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर ने टोका: लोग संहिता के ख़िलाफ़ हों या पक्ष में, मामला सार का है, तकनीकी बातों में सदन का वक़्त न लगे। उन्होंने यह भी साफ़ किया कि सदन तथ्य-खोजी अदालत नहीं बैठेगा और प्रवर समिति के हर सदस्य की गवाही नहीं लेगा, निष्कर्ष उसकी अपनी रिपोर्ट से निकलेगा।

रिपोर्ट के साथ असहमति-नोट लगे थे, और उनकी गिनती पर झगड़ा हुआ। 25 फ़रवरी 1949 को भार्गव ने कहा कि प्रवर समिति के 17 में से 11 सदस्यों ने असहमति-नोट लिखे हैं और वे 11 उस विधेयक का विरोध करते हैं जो समिति से निकला है। रेणुका राय ने बीच में कहा कि ये नोट बुनियादी सिद्धांतों पर नहीं हैं, और उसी दोपहर दोहराया कि ऐसे नोट क़रीब हर विधेयक के साथ लगते हैं। कृष्णस्वामी भारती ने कहा कि उनका असहमति-नोट विधेयक से आगे का है, वे उसका दायरा बढ़ाना चाहते हैं।

यह मतभेद रिकॉर्ड में जैसा है वैसा ही रहा। किसी ने सदन को यह नहीं बताया कि कौन-सा नोट किस बात पर था।

विरोध के तीन ठिकाने: सदन, कांग्रेस और बंगाल

सदन के भीतर विरोध के चेहरे तय थे। नज़ीरुद्दीन अहमद, ठाकुर दास भार्गव, लक्ष्मी कांत मैत्र, जसपत राय कपूर, शिब्बन लाल सक्सेना, और पंजाब से सरदार बी.एस. मान, जो चाहते थे कि सिखों को संहिता से बाहर रखा जाए। विरोध किन प्रावधानों पर था, इसका सबसे सीधा बयान 1 अप्रैल 1949 को नज़ीरुद्दीन अहमद ने दिया: सदन में शायद ही कोई सदस्य पूरी समेकित संहिता के पक्ष में है; कुछ विवाह वाले हिस्से के पक्ष में हैं, कुछ उत्तराधिकार वाले के, और संरक्षकता पर सबसे कम आपत्ति है। उसी बहस में मैत्र ने टोककर कहा कि भरण-पोषण वाला हिस्सा सबसे अच्छा है और बाक़ी सब रद्दी।

दूसरा ठिकाना ख़ुद कांग्रेस थी। 13 दिसंबर 1949 को बी. पट्टाभि सीतारामय्या, जिन्हें एक साल पहले जयपुर अधिवेशन में कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था, सदन में खड़े हुए और क़ानून मंत्री से कहा कि विधेयक वापस ले लें और अगली बार मतदाताओं के अधिकार और स्वीकृति के साथ, इससे भी कड़ा क़ानून लेकर आएँ। तब चुनाव-घोषणापत्र की ताक़त साथ होगी; अभी सरकार बिना अधिकार के आई है और हिफ़ाज़त के लिए चार महिला पुलिसकर्मियों पर निर्भर है। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले दिन का प्रदर्शन हिंदू कोड बिल के ख़िलाफ़ कम था, कांग्रेस से लोगों की नाराज़गी का इज़हार ज़्यादा।

तीसरा ठिकाना सदन के बाहर था। नज़ीरुद्दीन अहमद ने 1 अप्रैल 1949 को गिनाया कि बंगाल में विरोध सबसे तीखा है, कलकत्ता हाई कोर्ट के पाँच जज इसके ख़िलाफ़ राय दे चुके हैं, और हिंदू महासभा ने, जिसके अध्यक्ष उस वक़्त श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे, विधेयक का विरोध किया है। 25 फ़रवरी 1949 को रेणुका राय ने विरोध की तकनीक का हिसाब रखा: दिल्ली में पोस्टर और परिपत्र लगे हैं और सदस्यों के पास तार आ रहे हैं, जबकि समर्थक संस्थाएँ शरणार्थियों के पुनर्वास का पैसा तार भेजने में नहीं लगाना चाहतीं। एक तार की क़ीमत उन्होंने 165 रुपये बताई, जिसमें एक शरणार्थी औरत को तीन महीने का व्यावसायिक प्रशिक्षण मिल सकता था।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी अपनी मेज़ पर काग़ज़ों के बीच, यह तस्वीर 1940 की है; सदन में विरोध की गिनती में हिंदू महासभा का नाम आया और अध्यक्ष के नाते उनका, जबकि कलकत्ता के अख़बार वाली सूची में छपा वही नाम किसी और का निकला
तस्वीर: Unknown author, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

उसी भाषण में उन्होंने दो और तरीक़े गिनाए। एक, गवर्नर-जनरल का नाम विरोध के साथ जोड़ा गया और वह फ़रेब निकला। दो, कलकत्ता के एक अख़बार में विरोधियों की सूची में "श्यामा प्रसाद मुखर्जी" छपा, और छोटे कोष्ठक में लिखा था "उत्तरपाड़ा के"। नज़ीरुद्दीन अहमद ने पूछा कि क्या यह डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं थे। रेणुका राय का जवाब था कि वे केंद्रीय मंत्रिमंडल वाले नहीं थे।

19 दिसंबर 1949 की गिनती

चार साल में जो विरोध हर सत्र में सुनाई देता रहा, एक दिन गिना भी गया।

19 दिसंबर 1949 को अध्यक्ष ने विचार-प्रस्ताव पर दो संशोधन रखे। पहला नज़ीरुद्दीन अहमद का, कि विधेयक को 1949 के अंत तक और राय लेने के लिए परिचालित किया जाए; अध्यक्ष ने कहा कि तारीख़ बढ़ाने में देर हो चुकी है, और वह गिर गया। दूसरा यह कि विधेयक उसी प्रवर समिति को वापस भेजा जाए जिसे 9 अप्रैल 1948 को भेजा गया था। वह भी गिरा, और नज़ीरुद्दीन अहमद ने विभाजन माँगा।

अध्यक्ष ने गिनकर बताया कि "हाँ" पाँच हैं और बाक़ी सब "ना"। फिर मूल प्रस्ताव रखा गया, कि प्रतिवेदित विधेयक पर विचार किया जाए, और वह पास हो गया। प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना ने कहा कि "ना" की जीत हुई है। अध्यक्ष का जवाब था कि उनकी संख्या छह या सात ही है।

जिस विरोध ने 31 अगस्त 1948 के प्रस्ताव को उस दिन तक रोके रखा था, गिनती में वह पाँच से सात के बीच निकला।

सितंबर 1951: विधेयक दो बार कटा

17 सितंबर 1951 को विधेयक फिर कार्यसूची में आया। यह उस संसद का आख़िरी सत्र था और मंत्रिमंडल तय कर चुका था कि विधेयक इसी संसद में निकाला जाए।

कुछ ही दिन में प्रधानमंत्री ने नया रास्ता रखा। श्यामनंदन सहाय के सवाल पर जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि सरकार विधेयक के भाग एक और भाग दो लेने का इरादा रखती है, वक़्त बचा तो और लेगी, पर इन दो भागों को अधूरा नहीं छोड़ना चाहती। कितने दिन तय हैं, यह पूछने पर उन्होंने कहा कि उम्मीद है इसी हफ़्ते ख़त्म हो जाएगा। भाग दो का विषय था विवाह और तलाक़।

19 सितंबर को सरदार बी.एस. मान ने शिकायत की कि अख़बारों के ज़रिए झूठी तसल्ली फैलाई जा रही है कि सरकार सिर्फ़ विवाह और तलाक़ पर चलेगी, जबकि किसी ने साफ़-साफ़ यह नहीं कहा कि बाक़ी हिस्से छोड़े जा रहे हैं। दुर्गाबाई ने पूछा कि उन्हें यह ख़बर कहाँ से मिली कि उत्तराधिकार वाले अध्याय गिराए जाएँगे। कृष्णस्वामी भारती ने कहा कि प्रधानमंत्री और क़ानून मंत्री दोनों कह चुके हैं कि बाक़ी अध्याय इस सत्र में आना लगभग असंभव है, और इसे 99 फ़ीसदी सरकारी फ़ैसला माना जा सकता है। उपाध्यक्ष ने क़ानून मंत्री के बयान को सरकार की आधिकारिक राय माना और बहस उसी आधार पर चली।

उसी दिन अंबेडकर ने तोड़ने की प्रक्रिया ख़ुद सदन के सामने रखी। धारा 55 तक पहुँचने पर वे ज़रूरी संशोधन लाएँगे ताकि यह हिस्सा अपने आप में पूरा हो जाए और संहिता से बाहर निकल आए, और फिर प्रस्ताव करेंगे कि यह विधेयक बाक़ी भागों से स्वतंत्र रूप से पास किया जाए। नियमों में, उन्होंने जोड़ा, ऐसा कुछ नहीं है जो संसद को एक पूरे विधेयक में से एक हिस्सा निकालकर स्वतंत्र विधेयक की तरह पास करने से रोकता हो।

नेहरू ने इसे दोहराया और अपनी स्थिति दर्ज कराई: सरकार पूरे विधेयक के साथ खड़ी है, दिक़्क़त समय की है, और बाक़ी हिस्से भी पास कराना चाहेंगे। उसी साँस में उन्होंने जोड़ा कि इस सत्र में उसकी गुंजाइश नहीं।

फिर दूसरी कटाई हुई। अंबेडकर के बयान के मुताबिक़ दो-तीन दिन की बहस के बाद प्रधानमंत्री एक और प्रस्ताव लाए, कि पूरा विधेयक ही छोड़ दिया जाए, विवाह और तलाक़ वाला हिस्सा भी। 26 सितंबर 1951 को नेहरू ने सदन में कहा कि सरकार इस मामले को अगले मौक़े तक स्थगित मान रही है, और उम्मीद है वह मौक़ा इसी संसद में आएगा। वह संसद इसके बाद बैठी ही नहीं।

इस्तीफ़े की पाँच वजहें, अंबेडकर के अपने क्रम में

इस्तीफ़ा 27 सितंबर 1951 को गया और अगले दिन मंज़ूर हुआ। प्रधानमंत्री ने सत्र के अंत तक बने रहने को कहा, और अंबेडकर ने संवैधानिक परिपाटी के नाते मान लिया। बयान पर तारीख़ 10 अक्टूबर 1951 है।

वह बयान सदन में पढ़ा नहीं जा सका। महाराष्ट्र सरकार का संकलन उसे प्रेस-प्रति से छापता है, और संपादकीय टिप्पणी बताती है कि अध्यक्ष ने उन्हें लोकसभा में बयान रखने की इजाज़त नहीं दी, इसलिए वे सदन से बाहर निकल आए और प्रतियाँ सांसदों तथा प्रेस को बाँट दीं।

वजहें उसमें एक क्रम में रखी हैं, और हिंदू कोड सबसे आख़िर में है।

पहली को वे ख़ुद "पूरी तरह निजी" और सबसे कमज़ोर बताते हैं। वायसराय की कार्यकारी परिषद के अनुभव से वे जानते थे कि क़ानून मंत्रालय प्रशासनिक रूप से बेमानी है; उसे "एक ख़ाली साबुन की डिबिया, जिससे बूढ़े वकील खेल सकें" कहा जाता था। योजना विभाग का वादा हुआ था और विभाग बनने पर उन्हें नहीं रखा गया। विदेश और रक्षा की समितियों में वे कभी नहीं रहे; आर्थिक मामलों की समिति में मंत्रिमंडल ने तब रखा जब प्रधानमंत्री इंग्लैंड में थे, और लौटकर उन्होंने हटा दिया।

दूसरी वजह अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के साथ बरताव है। संविधान बने एक साल से ऊपर हो चुका था और आयोग अब तक नहीं बना था। उनका वाक्य है: "वही पुरानी ज़्यादती, वही पुराना दमन, वही पुराना भेदभाव जो पहले था, अब भी है, और शायद बदतर शक्ल में।" साथ में एक उदाहरण: साढ़े बारह फ़ीसदी प्रतिनिधित्व वाले नियम का फ़ायदा न पहुँचने के उनके आरोप को गृह मंत्री ने सदन में निराधार बताया, फिर विभागों से पुछवाया कि हाल में कितने अनुसूचित जाति के उम्मीदवार भर्ती हुए; ज़्यादातर का जवाब शून्य या शून्य के बराबर था।

तीसरी वजह विदेश नीति है: 15 अगस्त 1947 को कोई देश भारत का बुरा नहीं चाहता था और चार साल बाद सारे दोस्त छोड़ चुके हैं; क़ीमत वे आँकड़े में रखते हैं, सालाना 350 करोड़ रुपये के राजस्व में से क़रीब 180 करोड़ सेना पर। चौथी यह कि मंत्रिमंडल समितियों के फ़ैसले दर्ज करने का दफ़्तर बन गया है, रक्षा और विदेश की समितियाँ "लोहे के परदे के पीछे" काम करती हैं, और बाक़ी सदस्य नीति में हिस्सा लिए बिना सामूहिक ज़िम्मेदारी ढोते हैं।

पाँचवीं वजह हिंदू कोड है, और उसे वे इन शब्दों से शुरू करते हैं कि यही वह मामला है जिसने आख़िरकार उन्हें इस फ़ैसले तक पहुँचाया कि उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिए।

विधेयक का पूरा कैलेंडर यहीं दर्ज है। 31 अगस्त 1948 के प्रस्ताव के बाद चर्चा फ़रवरी 1949 तक नहीं होने दी गई; फिर वह दस महीनों में बँटी, फ़रवरी में चार दिन, मार्च में एक, अप्रैल में दो। दिसंबर 1949 में एक दिन। 1950 में एक भी नहीं। फिर 5, 6 और 7 फ़रवरी 1951, और उसके बाद, उनके शब्दों में, विधेयक सड़ने के लिए छोड़ दिया गया।

विरोध की असल ताक़त का हिसाब भी वे यहीं देते हैं। कांग्रेस संसदीय दल की बैठकों में विधेयक कई बार उठा और हर बार विरोधी विभाजन में हारे; आख़िरी बार 120 में से सिर्फ़ 20 उसके ख़िलाफ़ निकले, और उसी बैठक में 44 धाराएँ लगभग सवा तीन घंटे में पास हो गईं। इसलिए समय की कमी वाला तर्क वे मान नहीं सके। संसदीय कार्य मंत्री, जो पार्टी के मुख्य सचेतक भी थे, उन पर आरोप है कि वे संहिता के सबसे बड़े विरोधी रहे और समापन-प्रस्ताव लाने कभी नहीं आए; अंबेडकर लिखते हैं कि उन्होंने न कभी इतना बेवफ़ा मुख्य सचेतक देखा है, न बेवफ़ा सचेतक के प्रति इतना वफ़ादार प्रधानमंत्री।

बीमारी वाली व्याख्या को वे साफ़ ख़ारिज करते हैं।

1952 के बाद: एक विधेयक से चार अधिनियम

1952 के पहले आम चुनाव में अंबेडकर बंबई की अपनी लोकसभा सीट हार गए; वहाँ कांग्रेस के नारायण सदोबा काजरोलकर जीते।

पहले आम चुनाव में हर उम्मीदवार के लिए अलग मतपेटी और हर पेटी पर चिपका उसका चुनाव चिह्न, यह तस्वीर 1951-52 की है; इसी गिनती ने वह संसद बनाई जिसमें संहिता टुकड़ों में लौटी
तस्वीर: Unknown author, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

नई संसद में संहिता वैसे ही लौटी जैसी राव समिति ने 1941 में चाही थी। हिंदू विवाह और तलाक़ विधेयक 1952 भारत के राजपत्र, असाधारण, भाग दो-खंड दो में 11 दिसंबर 1952 को प्रकाशित हुआ और राज्यसभा में पेश हुआ। उत्तराधिकार वाला विधेयक 1954 में अलग से राज्यसभा में आया।

विवाह विधेयक दोनों सदनों की संयुक्त समिति को गया। 25 नवंबर 1954 की उसकी रिपोर्ट बताती है कि बाईस बैठकें हुईं; पहली पंद्रह की अध्यक्षता क़ानून मंत्री सी.सी. बिस्वास ने की और बीमारी के कारण छोड़ दी, जिसके बाद राज्यसभा के सभापति ने पी.वी. काणे को बिठाया। समिति ने विवाह की उम्र लड़के के लिए 18 से 21 और लड़की के लिए 15 से 16 कर दी।

तलाक़ पर उसका तर्क रिपोर्ट में दर्ज है: विशेष विवाह अधिनियम 1954 की तर्ज़ पर चलना न ज़रूरी है न वांछनीय, क्योंकि हिंदू क़ानून अब तक बहुविवाह को मानता आया है; और हिंदू समुदाय जिन ऊँचे आदर्शों पर जीता रहा है उन्हें देखते हुए तलाक़ आसान नहीं बनाया जाना चाहिए, क़ानून आपसी समायोजन के ज़्यादा से ज़्यादा मौक़े दे। रिपोर्ट के साथ लगे एक असहमति-नोट में माँग थी कि तलाक़ का उपाय पूरी तरह हटा दिया जाए, या तय अवधि तक रोका जाए, या सिर्फ़ औरतों को दिया जाए।

फिर भी जो अधिनियम बना उसमें उम्र संयुक्त समिति की नहीं, मूल विधेयक की रही: हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 5 में लड़के के लिए 18 और लड़की के लिए 15 साल। यह 1978 में बदलकर 21 और 18 हुआ।

चारों क़ानून इस क्रम में आए। हिंदू विवाह अधिनियम, संख्या 25, 18 मई 1955। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, संख्या 30, राष्ट्रपति की मंज़ूरी 17 जून 1956, राजपत्र में अगले दिन। हिंदू अल्पवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम, संख्या 32, 25 अगस्त 1956। हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, संख्या 78, 21 दिसंबर 1956। अंबेडकर की मृत्यु 6 दिसंबर 1956 को हुई थी। चौथे क़ानून को मंज़ूरी उसके पंद्रह दिन बाद मिली।

जो संहिता में था और क़ानून में नहीं आया

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 4 पढ़ने पर वही धारा 4 लौट आती है जिस पर 25 सितंबर 1951 को आख़िरी वोट पड़ा था। शब्द लगभग वही हैं: इस अधिनियम में जिस विषय पर प्रावधान है, उस पर हिंदू क़ानून का कोई पाठ, नियम, व्याख्या, रीति या रिवाज लागू नहीं रहेगा। पुरानी संसद ने जो एक चीज़ पास की, वही आगे चली।

अंबेडकर की गिनाई छह बातों में सबसे पहली आगे नहीं पहुँची। हिंदू कोड बिल की धारा 86 जन्म से मिलने वाला हक़ ख़त्म करती थी और धारा 87 सारे संयुक्त परिवारों को उसी दिन से साझेदार-सहभागी मान लेती थी, मानो बँटवारा हो चुका हो। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 6 उलटी चली: मिताक्षरा सहदायिकी में मरने वाले पुरुष का हिस्सा उत्तरजीविता से ही बचे सहदायिकों को जाता रहा, और उत्तराधिकार का रास्ता तभी खुला जब उसके पीछे अनुसूची की श्रेणी एक की कोई महिला नातेदार हो। 1948 में जिसे ख़त्म करना था, 1956 में वह मुख्य नियम बना रहा।

एक बदलाव दूसरी दिशा में भी हुआ। हिंदू कोड बिल की धारा 117 का शीर्षक था "अपवित्र आचरण वाली पत्नी अपात्र", जिसके तहत पति के जीवनकाल में व्यभिचार करने वाली स्त्री उसकी संपत्ति पाने से वंचित हो जाती। यह धारा 1954 के हिंदू उत्तराधिकार विधेयक में भी थी, धारा 27 के रूप में। अधिनियम में वह नहीं है। उसकी धारा 28 उलटा कहती है कि किसी रोग, दोष या विकृति के आधार पर, और इस अधिनियम में दिए गए मामलों को छोड़कर किसी भी और आधार पर, कोई उत्तराधिकार से वंचित नहीं होगा।

जो संहिता बनी वह एक समुदाय की रही। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2 उसे हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख पर लागू करती है, और उसी धारा की उपधारा 2 अनुसूचित जनजातियों को तब तक बाहर रखती है जब तक केंद्र सरकार राजपत्र में अधिसूचना जारी न करे।

एक समान नागरिक संहिता का सवाल संविधान सभा में 23 नवंबर 1948 को उठा था, प्रारूप अनुच्छेद 35 पर। मोहम्मद इस्माइल साहिब, नज़ीरुद्दीन अहमद और महबूब अली बेग ने अलग-अलग संशोधन रखे कि किसी समुदाय को अपना व्यक्तिगत क़ानून छोड़ने पर मजबूर न किया जाए। तीनों गिर गए और अनुच्छेद अपना लिया गया। उसी बहस में अंबेडकर ने कहा कि अनुच्छेद सिर्फ़ इतना कहता है कि राज्य एक नागरिक संहिता सुरक्षित करने का प्रयास करेगा, और आने वाली संसद चाहे तो शुरुआत में उसे सिर्फ़ उन पर लागू कर सकती है जो घोषणा करें कि वे उससे बँधने को तैयार हैं, जैसा 1937 के शरीयत अधिनियम में हुआ।

वह अनुच्छेद आज भी संविधान के भाग चार में है, और उसी भाग का अनुच्छेद 37 कहता है कि इस भाग की बातें किसी अदालत में लागू नहीं कराई जा सकतीं।

स्रोतडॉ. बाबासाहेब आंबेडकर: राइटिंग्स ऐंड स्पीचेज़, खंड 14, भाग एक (महाराष्ट्र सरकार, 1995; डॉ. आंबेडकर फ़ाउंडेशन का पुनर्मुद्रण, 2014), खंड 14, भाग दो — धारावार बहस, और अनुबंध एक में इस्तीफ़ा-बयान, हिंदू विवाह और तलाक़ विधेयक 1952 पर संयुक्त समिति की रिपोर्ट, राज्यसभा सचिवालय, नवंबर 1954, भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग दो-खंड एक, संख्या 38, 18 जून 1956 — हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, हिंदू विवाह अधिनियम 1955, अधिनियम संख्या 25 (18 मई 1955), हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम 1956, अधिनियम संख्या 78 (21 दिसंबर 1956), संविधान सभा की बहस, 23 नवंबर 1948 — प्रारूप अनुच्छेद 35, हिंदू अल्पवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम 1956, अधिनियम संख्या 32, भारत निर्वाचन आयोग, पहले आम चुनाव की रिपोर्ट, खंड दो

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