जिस रॉकेट ने शुक्रवार तड़के उड़ान भरी, उसका इंजन एक फ़्रांसीसी सौदे से निकला है
जितेंद्र सिंह और फ़्रांस के मंत्री फ़िलिप बैप्टिस्ट की बैठक हुई। विज्ञप्ति कहती है कि यह साझेदारी क़रीब छह दशक पुरानी है, और उस उम्र का सबसे ठोस सबूत रॉकेट के भीतर है।
1974 में एक फ़्रांसीसी कंपनी ने भारत के साथ एक सौदा किया।
कंपनी का नाम था सोसाइटी यूरोपियन दे प्रोपल्शन। उसके पास वाइकिंग नाम का एक तरल-ईंधन रॉकेट इंजन था, जो आगे चलकर आरियान रॉकेट में लगना था।
उसने वह तकनीक इसरो को देने पर सहमति दी। बदले में पैसा नहीं माँगा।
उसने भारतीय इंजीनियरों का काम माँगा। सौ आदमी-वर्ष।
यानी भारत ने अपने इंजीनियर फ़्रांस भेजे, वे वहाँ उस इंजन पर काम करते रहे, और उस काम की क़ीमत में तकनीक भारत आ गई।
वह इंजन आज भी चल रहा है
उस तकनीक से भारत में जो इंजन बना, उसका नाम विकास है। वह तिरुवनंतपुरम के तरल नोदन प्रणाली केंद्र में विकसित हुआ।
पचास साल बाद वह इंजन अब भी उड़ रहा है। पीएसएलवी में, जीएसएलवी में और एलवीएम3 में।
शुक्रवार तड़के जो जीएसएलवी-एफ़17 श्रीहरिकोटा से उठा और ईओएस-05 को कक्षा में छोड़ आया, उसमें भी विकास इंजन लगे थे।

अब क्या हुआ
केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने फ़्रांस के उच्च शिक्षा, अनुसंधान और अंतरिक्ष मंत्री प्रोफ़ेसर फ़िलिप बैप्टिस्ट के साथ वर्चुअल बैठक की।
दोनों ने मानव अंतरिक्ष उड़ान, उन्नत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और दोनों देशों की एजेंसियों तथा उद्योगों के बीच तालमेल पर बात की।
बातचीत दो आयोजनों से पहले हुई है। पेरिस में 9 और 10 सितंबर को इंटरनेशनल स्पेस समिट है, और बेंगलुरु में 7 से 9 सितंबर तक स्पेस एक्सपो।
प्रोफ़ेसर बैप्टिस्ट 28 से 30 सितंबर तक भारत आएँगे और बेंगलुरु में इसरो का केंद्र देखना चाहते हैं।
पेरिस में भारत क्या करेगा
इसरो के अध्यक्ष को पेरिस में मुख्य भाषण के लिए बुलाया गया है। विषय है, पृथ्वी की निचली कक्षा में भारत की भावी मानव अंतरिक्ष उड़ान।
प्रधानमंत्री का वीडियो संदेश भी प्रस्तावित है, और फ़्रांस ने उसके लिए आभार जताया।
सम्मेलन के तीन विषय बताए गए हैं। अंतरिक्ष विज्ञान और उसके इस्तेमाल, अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, और सुरक्षित अंतरिक्ष।
भारत ने जिन प्रस्तावित नतीजों का स्वागत किया, उनमें एक ध्यान देने लायक़ है। आवृत्ति प्रबंधन के लिए अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ के नियामक ढाँचे का समर्थन।
यह तकनीकी लगता है, पर इसका मतलब सीधा है। अंतरिक्ष में उपग्रहों की जगह और उनके रेडियो चैनल सीमित हैं, और उन्हें बाँटने वाली संस्था यही संघ है। जो देश इस ढाँचे के भीतर रहना चाहते हैं, वे यह कह रहे हैं कि जगह पहले आओ पहले पाओ के हिसाब से न बँटे।
दोनों देश साथ क्या कर चुके हैं
विज्ञप्ति दो मिशनों का नाम लेती है।
मेघा-ट्रॉपिक्स 2011 में गया था। वह उष्ण कटिबंध में नमी, बादल और बारिश का हिसाब रखने के लिए बना था, यानी मानसून समझने के लिए।
सरल 2013 में गया। उसमें अलतिका नाम का एक ऊँचाई मापक था, जो समुद्र की सतह की ऊँचाई नापता है।
तीसरा मिशन अभी बाक़ी है। उसका नाम त्रिशना है और वह तापीय अवरक्त में पृथ्वी की सतह देखेगा, यानी ज़मीन और पानी का तापमान। सीएनईएस के अपने पन्ने पर उसका प्रक्षेपण 2027 में बताया गया है।
तापमान नापने का सीधा इस्तेमाल खेती में है। खेत का तापमान बताता है कि पौधा पानी खींच पा रहा है या नहीं, और यह सूखे का सबसे शुरुआती संकेत होता है।
छह दशक की गिनती
विज्ञप्ति कहती है कि यह साझेदारी क़रीब छह दशक पुरानी है।
गिनती 1960 के दशक से चलती है, जब भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम तिरुवनंतपुरम के पास थुंबा से शुरू हुआ था और वहाँ से फ़्रांसीसी सोंडा रॉकेट छोड़े गए थे।
तब भारत रॉकेट ख़रीदता था। 1974 में उसने तकनीक ली। अब वह अपने रॉकेट से दूसरे देशों के उपग्रह छोड़ता है, और पेरिस में मानव उड़ान पर भाषण देने बुलाया जा रहा है।
एक ही रिश्ता, और उसमें भारत की जगह तीन बार बदल चुकी है।
स्रोतअंतरिक्ष विभाग, विज्ञप्ति, सेंटर नेशनल डेट्यूड्स स्पास्याल, त्रिशना मिशन पृष्ठ