भारत का पहला उपग्रह जो ऊपर से गुज़रेगा नहीं, एक ही जगह टिककर देखता रहेगा
ईओएस-05 शुक्रवार तड़के 2 बजकर 55 मिनट पर छोड़ा गया। अब तक के भारतीय निगरानी उपग्रह ज़मीन से कुछ सौ किलोमीटर ऊपर चक्कर लगाते हैं और किसी जगह के ऊपर से कुछ-कुछ दिन में गुज़रते हैं।
शुक्रवार तड़के 2 बजकर 55 मिनट पर श्रीहरिकोटा के दूसरे प्रक्षेपण मंच से जीएसएलवी-एफ़17 उड़ा और उसने ईओएस-05 को कक्षा में छोड़ दिया।
इसरो इसे यूँ बताता है: भूस्थिर कक्षा से काम करने वाला भारत का पहला इमेजिंग उपग्रह।
वाक्य छोटा है और उसमें जो बात दबी है, वह पूरी ख़बर है।
अब तक होता क्या था
भारत के निगरानी उपग्रह ज़मीन से कुछ सौ किलोमीटर ऊपर, नीची कक्षा में घूमते हैं। कार्टोसैट, रिसैट, ओशनसैट, सब वहीं हैं।
वहाँ से तस्वीर बहुत बारीक आती है। पर वह उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर तेज़ी से चक्कर काटता है, इसलिए किसी एक जगह के ऊपर वह चंद मिनट रहता है और फिर आगे बढ़ जाता है।
उसी जगह पर लौटने में उसे कई दिन लग जाते हैं।
बाढ़ के दिनों में यह अंतर सब कुछ तय करता है। पानी सुबह चढ़ता है और शाम तक गाँव में घुस जाता है। उपग्रह अगर तीन दिन बाद लौटेगा, तो वह जो तस्वीर लाएगा उसमें बाढ़ आ चुकी होगी और उतर भी चुकी होगी।
भूस्थिर कक्षा में ऐसा क्या है
क़रीब 36,000 किलोमीटर की ऊँचाई पर एक ख़ास बात होती है।
उस ऊँचाई पर उपग्रह को पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी करने में ठीक चौबीस घंटे लगते हैं। नीचे पृथ्वी भी चौबीस घंटे में एक चक्कर पूरा करती है।
दोनों की रफ़्तार मिल जाती है।
नतीजा यह कि ज़मीन से देखने पर वह उपग्रह आसमान में एक ही बिंदु पर टँगा दिखता है, और उपग्रह से देखने पर नीचे की एक ही पट्टी हमेशा सामने रहती है।
टीवी के डिश एंटीना इसी वजह से एक बार दिशा में सेट कर दिए जाते हैं और फिर हिलाए नहीं जाते।

तो नई तस्वीर कैसी होगी
यहाँ अदला-बदली साफ़ है। ऊँचाई बढ़ने से बारीकी घटती है, और लगातार देखते रहने की सहूलियत बढ़ती है।
ईओएस-05 का सबसे मोटा रिज़ॉल्यूशन 42 मीटर बताया गया है। यानी ज़मीन का 42 मीटर चौड़ा टुकड़ा तस्वीर में एक बिंदु बनेगा।
नीची कक्षा वाले कार्टोसैट इससे कहीं बारीक देखते हैं। पर वे लौटकर तीन दिन बाद आते हैं।
ईओएस-05 की योजना यह बताई गई है कि वह चुनी हुई जगह की तस्वीर हर पाँच मिनट में और पूरे भारतीय भूभाग की तस्वीर हर आधे घंटे में भेजेगा।
आधा घंटा और तीन दिन के बीच का फ़र्क़ किसी बारीकी से नहीं भरा जा सकता।
उपकरण क्या हैं
उपग्रह का वज़न 2,367 किलोग्राम है और उसका मुख्य उपकरण 700 मिलीमीटर का एक दूरदर्शी है।
उसके साथ तीन तरह के संवेदक बताए गए हैं। दृश्य और निकट-अवरक्त प्रकाश की छह पट्टियाँ 42 मीटर पर, उसी परास में 158 पट्टियों वाला एक हाइपरस्पेक्ट्रल संवेदक 318 मीटर पर, और लघु-तरंग अवरक्त की 256 पट्टियाँ 191 मीटर पर।
⚠ ये विस्तृत आँकड़े इसरो के मिशन पन्ने पर नहीं दिए गए हैं। ये मिशन के सार्वजनिक विवरणों से लिए गए हैं और इनकी पुष्टि इसरो के किसी दस्तावेज़ से नहीं हो सकी।
पट्टियों की संख्या का मतलब यह होता है कि रोशनी को कितने टुकड़ों में बाँटकर पढ़ा जा रहा है। जितने ज़्यादा टुकड़े, उतना ज़्यादा पता चलता है कि नीचे चीज़ बनी किस चीज़ से है। फ़सल में रोग है या पानी की कमी, यह इसी तरीक़े से पहचाना जाता है।
और अब वह हिस्सा जो कहीं नहीं छपेगा
यह उपग्रह नया नहीं है।
12 अगस्त 2021 को इसी परिवार का पहला उपग्रह, जीसैट-1 यानी ईओएस-03, जीएसएलवी-एफ़10 पर छोड़ा गया था। वज़न 2,268 किलोग्राम।
रॉकेट के पहले दो चरण ठीक चले। फिर ऊपरी क्रायोजेनिक चरण में आग जलनी थी और नहीं जली। उड़ान के क़रीब 340 सेकंड बाद, लगभग 139 किलोमीटर की ऊँचाई पर मिशन वहीं ख़त्म हो गया।
उससे पहले इसरो की सोलह उड़ानें लगातार सफल रही थीं। वह सिलसिला उसी दिन टूटा।
और वह पहली कोशिश भी नहीं थी। इसी उपग्रह को मार्च 2020 और मार्च 2021 में भी छोड़ा जाना था, और दोनों बार प्रक्षेपण उड़ान से पहले रोक दिया गया।
तो भारतीय कैमरे को भूस्थिर कक्षा तक पहुँचाने की यह चौथी कोशिश थी, और पहली कोशिश के साढ़े छह साल बाद यह पूरी हुई।
एक छोटी-सी गड़बड़
इसरो के अपने मिशन पन्ने पर जीएसएलवी-एफ़17 की तारीख़ 29 अगस्त 2026 लिखी है।
उड़ान 4 सितंबर को हुई।
तारीख़ खिसकना रॉकेट के काम में आम है। पन्ना उसके बाद बदला नहीं गया, इतनी ही बात है, पर जो पाठक इसरो की साइट खोलकर तारीख़ मिलाएगा उसे दो अलग तारीख़ें मिलेंगी।
आगे क्या
उपग्रह को उप-भूतुल्यकाली अंतरण कक्षा में छोड़ा गया, उड़ान के लगभग 19 मिनट बाद।
यह अंतिम कक्षा नहीं है। अंतरण कक्षा एक लंबा अंडाकार होता है, और उपग्रह अपने ही इंजन से कई बार धक्का देकर धीरे-धीरे उसे गोल करता है और तय ऊँचाई पर पहुँचता है। इसमें कुछ दिन लगते हैं।
उसके बाद उपकरण खोले जाते हैं, जाँचे जाते हैं, और तब जाकर तस्वीरें आनी शुरू होती हैं।
इसरो ने अभी यह नहीं बताया कि ये तस्वीरें किसे और किस शर्त पर मिलेंगी। खेती, जल संसाधन, शहरी नियोजन, वानिकी और समुद्री संसाधन, इन कामों का ज़िक्र है। मौसम विभाग या राज्यों की आपदा एजेंसियों को यह आँकड़ा किस रूप में जाएगा, यह अभी दस्तावेज़ों में नहीं है।
स्रोतभारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, जीएसएलवी-एफ़17 मिशन पृष्ठ, प्रधानमंत्री कार्यालय, विज्ञप्ति, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, जीएसएलवी-एफ़10 मिशन का ब्योरा