इसरो के उपग्रह ने जो गिरावट नापी वह प्रशांत महासागर की है, और सीएमएफ़आरआई के हिसाब से भारतीय तट तक उसकी बारी अप्रैल-मई 2027 में आएगी
10 सितंबर को इसरो ने बताया कि ओशनसैट-3 ने भूमध्यरेखीय प्रशांत में जून 2026 की सतही क्लोरोफ़िल-ए में साफ़ कमी देखी है। विज्ञप्ति में न कोई प्रतिशत है, न कोई मछली, न भारत का नाम। जो नाप ली गई वह एक दूसरे महासागर की है।

इसरो ने 10 सितंबर को एक विज्ञप्ति जारी की जिसका शीर्षक अपने आप में पूरा दावा है: ओशनसैट-3 ने भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में विकसित हो रहे अल नीनो का समुद्री उत्पादकता पर असर पकड़ लिया है।
अगले दिन की ख़बरों में यह "समुद्री उत्पादकता में तेज़ गिरावट" बन गई, और इंडियन एक्सप्रेस ने उस रिपोर्ट के साथ जो तस्वीर लगाई उसका फ़ाइल नाम तक यही है: हिंद महासागर के किनारे मछुआरे।
विज्ञप्ति में "तेज़" शब्द नहीं है। उसमें कोई प्रतिशत नहीं है, कोई टन-भार नहीं है, कोई मछली नहीं है, और भारत का नाम एक बार भी नहीं आता। जो जगह नापी गई वह प्रशांत महासागर की भूमध्यरेखा है, केरल से लगभग आधी दुनिया दूर।
यह इसलिए मायने रखता है कि विज्ञप्ति ग़लत नहीं है। वह ठीक वही कह रही है जो उपग्रह ने देखा, और उससे आगे कुछ नहीं कहती। भारतीय तट तक पहुँचने वाला रास्ता उसमें लिखा ही नहीं है, क्योंकि वह रास्ता समुद्र के पानी से होकर नहीं आता। वह हवा से होकर आता है, और उसमें महीनों लगते हैं। सीएमएफ़आरआई के निदेशक ने उसकी तारीख़ भी बता रखी है।
ओशनसैट-3 का जून 2026 का प्रेक्षण
ओशनसैट-3 का दूसरा नाम ईओएस-06 है। नवंबर 2022 में छोड़ा गया यह उपग्रह समुद्र के भौतिक और जैविक गुण नापने के लिए बना है, और उस पर दो उपकरण साथ काम करते हैं। पहला ओसीएम-3 है, यानी ओशन कलर मॉनिटर का तीसरा संस्करण, जो समुद्र की सतह से लौटती रोशनी के रंग से क्लोरोफ़िल-ए की सांद्रता निकालता है। दूसरा स्कैटरोमीटर है, जो समुद्र की सतह पर रेडियो तरंग फेंककर लौटी तरंग से हवा की दिशा और गति नापता है।
हैदराबाद के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र यानी एनआरएससी ने इन दोनों के आँकड़े एक साथ रखे। अवधि तय की गई अप्रैल, मई और जून, और साल 2023 से 2026 तक। क्षेत्र उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर।
तुलना का ढंग विज्ञप्ति में साफ़ लिखा है। जून 2024 और जून 2025 के संयुक्त चित्र तटस्थ ईएनएसओ स्थिति के प्रतिनिधि माने गए, और उनके सामने जून 2026 रखा गया, जब अल नीनो बन रहा था। इस तुलना में सतही क्लोरोफ़िल-ए में साफ़ कमी दिखी। उसी के साथ हवाओं की दिशा पलटी हुई मिली, पूरब से पश्चिम बहने वाली पुरवाई की जगह पश्चिम से पूरब बहने वाली पछुआ। एनआरएससी का कहना है कि हवा के इस कमज़ोर पड़ने और पलटने से पश्चिमी और मध्य भूमध्यरेखीय प्रशांत के कुछ हिस्सों में सामान्य अपवेलिंग दब जाती है, और नीचे से पोषक तत्वों की आपूर्ति घटने का असर सतह के क्लोरोफ़िल में दिखता है।
एक और प्रेक्षण विज्ञप्ति में है जो चित्र से ज़्यादा बताता है। अप्रैल से जून 2026 के बीच ऊँचे क्लोरोफ़िल वाला इलाक़ा पश्चिम की ओर सिकुड़ता गया। यानी हरे रंग की पट्टी सिर्फ़ फीकी नहीं पड़ी, वह छोटी भी हुई।
विज्ञप्ति के आँकड़ों की अवधि 2023 से शुरू होती है, पर तुलना में 2023 का जून नहीं आता। जून 2023 भी एक बनते हुए अल नीनो का महीना था। उस साल क्या दिखा, विज्ञप्ति यह नहीं बताती, और इसका कोई कारण भी नहीं देती।
अंत में इसरो ने जो वाक्य लिखा है वह सबसे कम उद्धृत हुआ: इस निष्कर्ष को आगे भूमध्यरेखीय हवाओं, सतही तापमान, समुद्र-तल की ऊँचाई, थर्मोक्लाइन की गहराई और महासागरीय परिसंचरण की विसंगतियों के समवर्ती आकलन के साथ पढ़ा जाना चाहिए। एजेंसी ख़ुद कह रही है कि अकेले क्लोरोफ़िल का चित्र निष्कर्ष नहीं है।
क्लोरोफ़िल-ए किसका पैमाना है
क्लोरोफ़िल-ए वह हरा वर्णक है जिससे पौधे प्रकाश संश्लेषण करते हैं। समुद्र में उसे बनाने वाले पादपप्लवक हैं, यानी सूक्ष्म तैरते पौधे जो समुद्री भोजन शृंखला का पहला पायदान हैं। उपग्रह पादपप्लवक को गिन नहीं सकता, पर उनके वर्णक से बदले पानी के रंग को पढ़ सकता है। इसरो के चित्र-शीर्षक में इकाई मिलीग्राम प्रति घन मीटर दी गई है।
यह अनुमान है, गिनती नहीं। ओसीएम-3 सिर्फ़ ऊपरी कुछ मीटर देखता है, जबकि गर्म और शांत समुद्र में पादपप्लवक अक्सर नीचे खिसककर एक गहरी परत में जमा हो जाते हैं जो सतह के रंग में नहीं दिखती। बादल के नीचे का समुद्र उपग्रह को दिखता ही नहीं। और क्लोरोफ़िल की मात्रा यह नहीं बताती कि वहाँ कौन-सी प्रजाति है, जो मछली के लिए असली फ़र्क़ है।
इसलिए कम क्लोरोफ़िल का सीधा अर्थ कम मछली नहीं होता। वह इतना कहता है कि उस महीने, उस पट्टी में, ऊपरी पानी में भोजन बनाने की दर घटी हुई दिखी।
नीनो सूचकांकों की मौजूदा नाप
अल नीनो का मतलब है भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के सतही पानी का असामान्य गर्म होना। इसे नापने के लिए प्रशांत को खानों में बाँटा गया है, और हर खाने का अपना सूचकांक है। नीनो-4 पश्चिम-मध्य का खाना है, नीनो-3.4 बीच का, नीनो-3 पूरब का, और नीनो-1+2 सबसे पूरब का, पेरू और इक्वाडोर के तट से सटा हुआ।
एनओएए के क्लाइमेट प्रिडिक्शन सेंटर ने 10 सितंबर 2026 को अपनी मासिक ईएनएसओ समीक्षा जारी की, इसरो की विज्ञप्ति के ठीक उसी दिन। उसमें अगस्त के आँकड़े इस तरह हैं। नीनो-3.4 पर विसंगति +1.8 डिग्री सेल्सियस, नीनो-3 पर +2.5 डिग्री, नीनो-1+2 पर +3.4 डिग्री, और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत में कहीं-कहीं +3.0 डिग्री से ऊपर। सतह के नीचे की तस्वीर और तीखी है: गहराई पर विसंगतियाँ +10 डिग्री से भी ज़्यादा, और थर्मोक्लाइन सामान्य से नीचे धँसी हुई।
इसी पैराग्राफ़ में एक आँकड़ा है जो बाक़ी सबसे अलग चलता है। नीनो-4 सूचकांक अगस्त में घटकर +0.1 डिग्री रह गया, यानी लगभग तटस्थ। बाक़ी तीनों खाने चढ़े, यह अकेला उतरा।
नीनो-4 वही पश्चिम-मध्य प्रशांत है जिसके बारे में एनआरएससी ने क्लोरोफ़िल की कमी बताई है। दोनों बातें आपस में टकराती नहीं हैं, क्योंकि महीने अलग हैं, जून और अगस्त, और नापी गई चीज़ें भी अलग हैं, एक तापमान और दूसरी हरियाली। पर इन्हें साथ पढ़ने पर जो निकलता है वह यह है कि इस बार की गर्मी पूरब में भारी है और पश्चिम में हल्की। जिस पट्टी की हरियाली घटती बताई गई है, उसी पट्टी का तापमान सूचकांक अगस्त तक सामान्य के पास लौट आया था।
इस घटना को क्या कहा जाए, इस पर सरकारी दस्तावेज़ आपस में एक सुर में नहीं हैं। एनओएए 10 सितंबर को कहता है कि उत्तरी गोलार्ध की शरद और शीत ऋतु में अति प्रबल घटना की संभावना 90 प्रतिशत से ज़्यादा है, और अक्टूबर-दिसंबर में 75 प्रतिशत संभावना है कि यह 1950 के बाद की हर अल नीनो घटना से तगड़ी निकलेगी। डब्ल्यूएमओ ने 3 सितंबर को कहा कि सितंबर-नवंबर और दिसंबर-फ़रवरी में अल नीनो के बने रहने की संभावना लगभग सौ प्रतिशत है और यह साल के अंत तक अति प्रबल स्तर पर पहुँचकर चरम छुएगा। आईएमडी ने 31 अगस्त की सितंबर मासिक समीक्षा में इसे "प्रबल अल नीनो स्थिति" कहा, आगे और मज़बूत होने की बात जोड़ी, और कोई सूचकांक या प्रतिशत नहीं दिया।
तारीख़ों का फ़र्क़ ग्यारह दिन का है, और आईएमडी की विज्ञप्ति सबसे पुरानी है। फिर भी तीनों दस्तावेज़ अभी एक साथ खुले पड़े हैं, और शब्द तीनों के अलग हैं।
आईएमडी की उसी समीक्षा में हिंद महासागर की स्थिति तटस्थ हिंद महासागर द्विध्रुव बताई गई है, इस जोड़ के साथ कि अंतरराष्ट्रीय केंद्रों के अनुसार सितंबर से यह धनात्मक की ओर जा सकता है। धनात्मक द्विध्रुव में पश्चिमी हिंद महासागर पूरब से गर्म होता है, और भारत के लिए वह अल नीनो का कुछ असर काटता रहा है।
अपवेलिंग टूटने का असर पेरू में दिख चुका है
अपवेलिंग का ढाँचा सीधा है। खुले समुद्र में पोषक तत्व, ख़ासकर नाइट्रेट और फ़ॉस्फ़ेट, नीचे ठंडे पानी में जमा रहते हैं, और सूरज ऊपर है। पादपप्लवक को दोनों चाहिए। जब हवा सतह के पानी को किनारे से या भूमध्यरेखा से परे धकेलती है, तो उसकी जगह भरने नीचे का ठंडा पोषक-भरा पानी ऊपर उठता है, और हरियाली फूट पड़ती है।
अल नीनो में व्यापारिक हवाएँ कमज़ोर पड़ती हैं और थर्मोक्लाइन, यानी गर्म ऊपरी पानी और ठंडे निचले पानी के बीच की सीमा, नीचे धँस जाती है। तब हवा जितना पानी खींच पाती है वह भी गर्म और पोषक-रहित होता है। एनओएए की 10 सितंबर की समीक्षा में यह धँसाव आँकड़े में दर्ज है।
इस पूरी शृंखला के अंतिम सिरे पर क्या होता है, इसका सबसे साफ़ उदाहरण इस साल पेरू में चल रहा है। पेरू की एंचोवेटा दुनिया की सबसे बड़ी एकल-प्रजाति मत्स्यिकी है और सीधे तटीय अपवेलिंग पर टिकी है। 2026 के पहले उत्तर-मध्य मौसम के लिए वहाँ के उत्पादन मंत्रालय ने कुल अनुमेय पकड़ 19,14,049 टन तय की, दस साल का सबसे नीचा कोटा। कारण के तौर पर तटीय अल नीनो दर्ज किया गया।
उसके बाद मौसम बार-बार रोका गया। 24 अप्रैल से 3 मई तक तट की पहली 20 से 30 समुद्री मील की पट्टी में मछली पकड़ना बंद रहा। 12 मई को 6 से 14 डिग्री दक्षिण अक्षांश के बीच पंद्रह दिन का नया प्रतिबंध लगा, क्योंकि वहाँ के समुद्री अनुसंधान संस्थान इमार्पे ने जालों में आधे से ज़्यादा छोटी मछली पाई। इमार्पे की तकनीकी रिपोर्ट का वाक्य है कि उठाए गए क़दम बेड़े का किशोर मछली के झुंडों से टकराव घटाने के लिए पर्याप्त नहीं रहे।

3 जून तक उत्तर-मध्य क्षेत्र में कुल 4,71,111 टन उतरा था, यानी तय कोटे का 24.6 प्रतिशत, और उसमें संख्या के हिसाब से 51.6 प्रतिशत किशोर मछली थी। 11 जून को मंत्रालय ने मंत्रिस्तरीय संकल्प संख्या 00162-2026-प्रोड्यूसे के ज़रिए उत्तरी सिरे से 16 डिग्री दक्षिण तक एंचोवेटा पकड़ना पूरी तरह रोक दिया। पेरू में तंत्र वैसा ही चला जैसा किताब में लिखा है।
अरब सागर का अपवेलिंग मानसून से चलता है
भारत के दक्षिण-पश्चिमी तट पर भी अपवेलिंग होती है, और वह केरल की मत्स्यिकी की जड़ है। पर उसे चलाने वाली हवा प्रशांत की व्यापारिक हवा नहीं है। वह दक्षिण-पश्चिम मानसून है। जून से सितंबर के बीच मानसूनी हवा तट के समांतर चलती है, सतह के पानी को बाहर धकेलती है, और नीचे का ठंडा पोषक पानी ऊपर आता है। सीएमएफ़आरआई के शोध में तेल सार्डिन के प्रजनन का चरम जुलाई और अगस्त बताया गया है, जो केरल तट के अपवेलिंग महीनों के साथ बैठता है।
इसी वजह से केरल का सालाना ट्रॉलिंग प्रतिबंध इसी मौसम पर पड़ता है। राज्य के मत्स्य मंत्री साजी चेरियन की अध्यक्षता वाली बैठक में तय होने वाला यह प्रतिबंध 52 दिन चलता है, 9 जून की आधी रात से 31 जुलाई की आधी रात तक, और इसका मक़सद ट्रॉल जालों से अंडों, किशोर मछलियों और प्रजनक मछलियों की तबाही रोकना बताया जाता है। तमिलनाडु का 45 दिन का प्रतिबंध पूर्वी तट के हिसाब से 15 अप्रैल से 31 मई तक चलता है।

अल नीनो भारतीय तट तक पहुँचता है तो इसी हवा के रास्ते पहुँचता है। प्रशांत की गर्मी वायुमंडलीय परिसंचरण बदलती है, मानसून की ताक़त पर असर डालती है, और कमज़ोर मानसूनी हवा कमज़ोर अपवेलिंग बनाती है। इस साल वह कमज़ोरी नाप में है। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 8 सितंबर 2026 को आईएमडी के आँकड़ों के हवाले से लिखा कि 7 सितंबर तक देश भर में मानसून सामान्य से 14 प्रतिशत कम रहा, और दक्षिण प्रायद्वीप में यह कमी 27 प्रतिशत थी। दक्षिण प्रायद्वीप में केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक आते हैं, यानी वही तट जहाँ सार्डिन और बांगड़ा उतरते हैं।
दूसरा रास्ता धीमा है और सीधे पानी का है। प्रशांत की गर्मी कुछ महीनों बाद उत्तरी हिंद महासागर के सतही तापमान में उतरती है। सीएमएफ़आरआई के निदेशक ग्रिनसन जॉर्ज ने 10 जुलाई 2026 को इसकी तारीख़ बताई। उनके मुताबिक़ गर्मी अक्टूबर से दिसंबर के बीच तेज़ होगी और उत्तरी हिंद महासागर पर उसका असर अप्रैल-मई 2027 तक दिखेगा, समुद्री ऊष्मा लहरों, बढ़े हुए सतही तापमान और ऊँची लवणता के रूप में।
उनका वाक्य इससे भी सीधा है। "तेल सार्डिन का स्टॉक इस साल भरपूर है, पर अगर अनुमानित गर्मी आती है तो 2027 में यह संसाधन प्रभावित होगा।" छोटी पेलैजिक मछलियों को, और उनमें भी तेल सार्डिन को, उन्होंने समुद्री ऊष्मा लहरों और महासागरीय गर्मी के प्रति सबसे संवेदनशील बताया।
तो सवाल "मछुआरों पर क्या बीतेगी" का उत्तर इस मौसम में नहीं है। सीएमएफ़आरआई की अपनी तारीख़ अगली गर्मियों की है।
2025 की पकड़ के आँकड़े
सीएमएफ़आरआई ने 30 अप्रैल 2026 को 2025 के समुद्री अवतरण के आँकड़े जारी किए। देश का कुल अवतरण 35.7 लाख टन रहा, जो 2024 से 3 प्रतिशत ऊपर है।
राज्यों की क़तार बदल गई। तमिलनाडु 6.85 लाख टन के साथ पहले नंबर पर आ गया और गुजरात को पीछे छोड़ दिया, जो 15 प्रतिशत की गिरावट के बाद दूसरे स्थान पर खिसका। संस्थान ने गुजरात की गिरावट के कारण गिनाए हैं: प्रतिकूल मौसम, लंबे चले मत्स्यन प्रतिबंध और चक्रवाती गड़बड़ियाँ। केरल 2 प्रतिशत की मामूली बढ़त के साथ तीसरे पर रहा। कर्नाटक में 2024 की तीखी गिरावट के बाद 44 प्रतिशत की उछाल आई और महाराष्ट्र में 18 प्रतिशत की बढ़त।
प्रजातियों की सूची इस कहानी के लिए ज़्यादा काम की है। देश में सबसे ज़्यादा उतरने वाली मछली भारतीय बांगड़ा रही, 2.70 लाख टन। उसके बाद शीर्षपाद यानी स्क्विड और कटलफ़िश की श्रेणी, 2.57 लाख टन, जो 25 प्रतिशत बढ़कर दस साल के सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँची। तीसरे नंबर पर तेल सार्डिन, 2.53 लाख टन। थ्रेडफ़िन ब्रीम में 55 प्रतिशत की बढ़त हुई, वह भी दशक की ऊँचाई पर। कुल पकड़ में पेलैजिक यानी ऊपरी पानी की मछलियों का हिस्सा 54 प्रतिशत रहा।

केरल में तेल सार्डिन राज्य का सबसे बड़ा संसाधन बनकर लौटा, 1.68 लाख टन पर, 2024 से 13 प्रतिशत ऊपर और दस साल की सबसे ऊँची पकड़। ये राज्यवार टन-भार सीएमएफ़आरआई की वेबसाइट पर छपी विज्ञप्ति में नहीं हैं; वे उसी दिन कोच्चि की प्रेस वार्ता से बिज़नेस स्टैंडर्ड और अन्य अख़बारों की रिपोर्टों में आए।
पैसे में यह इस तरह बैठता है। अवतरण केंद्रों पर कुल मूल्य 69,254 करोड़ रुपये आँका गया, जो 10.45 प्रतिशत ऊपर है, और खुदरा स्तर पर 97,702 करोड़ रुपये, 8.43 प्रतिशत ऊपर। अकेले केरल में अवतरण केंद्र मूल्य 12,665 करोड़ रुपये रहा, 17.8 प्रतिशत की बढ़त के साथ।
निदेशक ग्रिनसन जॉर्ज ने इस उछाल की वजह दो हिस्सों में बताई: "अनुकूल पर्यावरणीय स्थितियों ने इस अवधि में छोटी पेलैजिक मछलियों के स्टॉक की वापसी में निर्णायक भूमिका निभाई। इस पारिस्थितिक लाभ को नियंत्रित मत्स्यन दबाव ने और मज़बूत किया, जिससे वापसी के लिए ज़रूरी समय और जगह मिली।" यानी मौसम अकेला कारण नहीं था। जाल का दबाव भी उसमें गिना गया।
2012 से 2015 का सार्डिन अकाल
पिछली बार जो हुआ था, उसका रिकॉर्ड सीएमएफ़आरआई के ही एक शोधपत्र में दर्ज है। श्याम एस. सलीम का 2021 का यह अध्ययन 1985 से 2017 तक के 33 साल के अवतरण आँकड़ों पर टिका है।
गिरावट का पैमाना यह था। 2012 में देश का तेल सार्डिन अवतरण 3.9 लाख टन था। 2013 में यह 2.1 लाख टन पर आया और 2014 में लगभग 1.5 लाख टन। शोधपत्र इसे 2012 के मुक़ाबले 46 से 82 प्रतिशत तक की गिरावट बताता है। केरल, कर्नाटक और गोवा वाले दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र ने अकेले लगभग 3 लाख टन गँवाए।
2015 के आँकड़े पर यही शोधपत्र दो जगह दो बातें कहता है। एक जगह वह उस साल देश का अवतरण 0.068 मिलियन टन बताता है, यानी क़रीब 68 हज़ार टन। दूसरी जगह वह 68,431 टन की संख्या अकेले केरल तट की पकड़ के लिए देता है। दोनों संख्याएँ लगभग एक हैं, जबकि एक पूरे देश की है और दूसरी एक राज्य की, और पत्र इस फ़र्क़ को कहीं नहीं सुलझाता। जो दोनों पाठों में एक जैसा है वह यह कि केरल की उस साल की पकड़ पिछले साल की 1.55 लाख टन और 2012 की रिकॉर्ड 3.92 लाख टन के सामने एक तिहाई से भी नीचे थी।
2015 प्रबल अल नीनो का साल था, कम बारिश और ऊँचे सतही तापमान के साथ। शोधपत्र यह लिखता भी है। पर वह इसे अकेला कारण नहीं बताता। उसी वाक्य में वह दो और कारण जोड़ता है: अधिकतम संपोषणीय उपज से आगे जाकर स्टॉक पर की गई मछलीमारी, और 2010 से 2012 के बीच किशोर मछलियों की अत्यधिक पकड़। तीनों मिलकर अकाल बने।
और इसके ठीक बाद शोधपत्र वह वाक्य रखता है जो कारण-कथा को सबसे ज़्यादा संभालता है: ये गिरावटें असामान्य नहीं हैं, क्योंकि तेल सार्डिन का स्टॉक इसी तरह 1929, 1943, 1963, 1986 और 1994 में भी ढह चुका है। इनमें से किसी भी ढहान को किसी उपग्रह ने नहीं देखा था, और पहले तीन तो उपग्रह युग से पहले के हैं।
इस प्रजाति की जीवन-रचना इस उतार-चढ़ाव को समझाती है। तेल सार्डिन एक साल में लगभग 15 सेंटीमीटर का हो जाता है, ढाई साल के जीवनकाल में जल्दी परिपक्व होता है, और पादपप्लवक तथा प्राणिप्लवक दोनों खाता है। जो मछली ढाई साल जीती है, उसका स्टॉक दो ख़राब मौसमों में गिर सकता है और दो अच्छे मौसमों में लौट सकता है। शोधपत्र का 2015 वाला 68 हज़ार टन और सीएमएफ़आरआई का 2025 वाला 2.53 लाख टन, दोनों देश के आँकड़े पढ़े जाएँ तो एक ही प्रजाति के दस साल हैं।
इनकॉइस की मत्स्य सलाह और उसकी पहुँच
मछुआरे तक सरकारी समुद्री सूचना इनकॉइस से पहुँचती है, यानी हैदराबाद स्थित भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र, जो पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन है। इसकी सबसे पुरानी सेवा संभावित मत्स्यन क्षेत्र सलाह है, जिसकी जड़ें जून 1990 के मार्सिस कार्यक्रम में हैं।
यह सलाह रोज़ बनती है और तट के 586 मत्स्य अवतरण केंद्रों के हवाले से जारी होती है। तट को 14 सेक्टरों में बाँटा गया है, गुजरात से लेकर लक्षद्वीप, अंडमान और निकोबार तक, और हर सेक्टर के लिए नक़्शा और पाठ उसी इलाक़े की भाषा में निकलता है। पाठ में अक्षांश-देशांतर, वहाँ की गहराई, और तट की किसी पहचानी जाने वाली जगह से दूरी और दिशा होती है, जैसे कोई अवतरण केंद्र या लाइटहाउस। नक़्शे पर हवा की गति और दिशा भी डाली जाती है, ताकि मछुआरा एक दिन बाद पहुँचे तब भी खिसकी हुई जगह का अंदाज़ा लगा सके। बड़े मत्स्य बंदरगाहों पर इनकॉइस ने इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड लगाए हैं जो रंगीन नक़्शा दिखा सकते हैं।
इस सलाह का आधार क्या है, यह इनकॉइस के अपने पन्ने पर लिखा है, और वहीं एक बात ध्यान खींचती है। सतही तापमान एनओएए-एवीएचआरआर और यूमेटसैट की मेट-ऑप शृंखला से आता है, और क्लोरोफ़िल ओशनसैट-2 तथा मोडिस एक्वा से। जो उपग्रह इस हफ़्ते ख़बर में है, ओशनसैट-3, उस सूची में नहीं है। पन्ने पर संशोधन की तारीख़ नहीं दी गई, इसलिए यह पुरानी सूची भी हो सकती है।
ढाँचे का असली फ़र्क़ इससे बड़ा है। यह सलाह बताती है कि आज मछली कहाँ जमा है, यह नहीं कि इस मौसम में समुद्र कितना भोजन बनाएगा। सेवा मत्स्यन प्रतिबंध के दिनों में और चक्रवात, ऊँची लहरों या सूनामी जैसी ख़राब समुद्री स्थिति में रोक दी जाती है, यानी ठीक उन दिनों में जब जोखिम सबसे ज़्यादा है। इनकॉइस ख़ुद कहता है कि इसका लाभ मुख्यतः पारंपरिक, मोटरीकृत और छोटे यंत्रीकृत क्षेत्र के उन मछुआरों को मिलता है जो रिंग सीन और गिल नेट से पेलैजिक मछली पकड़ते हैं, और लाभ खोज का समय तथा डीज़ल बचने के रूप में मिलता है। कितने मछुआरों तक यह वास्तव में पहुँचती है, इसका कोई आँकड़ा इस पन्ने पर नहीं है।
कितने लोग, और पैसा कहाँ से आता है
गिनती का काम अभी चल रहा है। समुद्री मत्स्य जनगणना 2025 में 3 नवंबर से 18 दिसंबर 2025 के बीच नौ तटीय राज्यों और चार केंद्रशासित प्रदेशों के लगभग 4,000 मत्स्य गाँवों के 12 लाख मछुआरा परिवारों की गणना हुई, पहली बार पूरी तरह डिजिटल तरीक़े से, जिसमें सीएमएफ़आरआई नोडल एजेंसी है। नतीजे अभी सार्वजनिक नहीं हुए। तब तक जो आँकड़ा चलता है वह इनकॉइस का अपना अनुमान है, कि 8,100 किलोमीटर के तट पर लगभग 70 लाख लोग मछली पकड़ने पर निर्भर हैं।
निर्यात के आँकड़े इस तस्वीर में एक आख़िरी सुधार जोड़ते हैं। एमपीईडीए के अध्यक्ष पी. जवाहर के हवाले से 1 जून 2026 की सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार भारत ने 2025-26 में 19,72,018 टन समुद्री उत्पाद भेजे, जिनका मूल्य 73,890.46 करोड़ रुपये रहा, दोनों अब तक के सबसे ऊँचे। पर इसमें जमे हुए झींगे का हिस्सा डॉलर कमाई का 66.52 प्रतिशत है, और वह झींगा ज़्यादातर तालाबों में पाला जाता है। समुद्र का शिकार वह है ही नहीं। जिस कमाई के आँकड़े पर मत्स्य क्षेत्र की सेहत नापी जाती है, उसका दो-तिहाई हिस्सा उस पानी से नहीं आता जिसका चित्र ओशनसैट-3 ने खींचा।
एक विसंगति दर्ज करने लायक़ है। मत्स्यपालन मंत्रालय की 12 जनवरी 2026 की विज्ञप्ति 16.98 लाख टन और 62,408 करोड़ रुपये के आँकड़े को 2023-24 का बताती है, जबकि एमपीईडीए ने वही दो संख्याएँ 2024-25 के लिए दी हैं। दो सरकारी दस्तावेज़, एक ही जोड़ी आँकड़े, दो अलग वित्त वर्ष।
स्रोतइसरो, 10 सितंबर 2026: 'EOS-06/Oceansat-3 detects impact of the developing El Niño on Marine Productivity in the Equatorial Pacific Ocean', एनआरएससी का विश्लेषण और चित्र-शीर्षक, एनओएए क्लाइमेट प्रिडिक्शन सेंटर/एनसीईपी/एनडब्ल्यूएस, 10 सितंबर 2026: ENSO Diagnostic Discussion, नीनो सूचकांक और अक्टूबर-दिसंबर का पूर्वानुमान, विश्व मौसम विज्ञान संगठन, 3 सितंबर 2026: El Niño/La Niña Update (August 2026), भारत मौसम विज्ञान विभाग, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, 31 अगस्त 2026: Monthly Outlook for Rainfall and Temperature during September 2026, खंड 4 (प्रशांत और हिंद महासागर की सतही तापमान स्थिति), भारत मौसम विज्ञान विभाग, 13 अप्रैल 2026: 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून का दीर्घावधि पूर्वानुमान, श्रेणीवार संभाव्यता तालिका, आईसीएआर-सीएमएफ़आरआई, 30 अप्रैल 2026: भारत के 2025 के समुद्री मत्स्य अवतरण के आँकड़े और निदेशक ग्रिनसन जॉर्ज का वक्तव्य, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 30 अप्रैल 2026: सीएमएफ़आरआई के आँकड़ों पर राज्यवार टन-भार की रिपोर्ट, न्यूकेरल, 10 जुलाई 2026: सीएमएफ़आरआई के निदेशक ग्रिनसन जॉर्ज का अप्रैल-मई 2027 पर बयान, डेक्कन क्रॉनिकल, 10 जुलाई 2026: सीएमएफ़आरआई की अल नीनो सलाह और तेल सार्डिन पर वही वक्तव्य, श्याम एस. सलीम, सीएमएफ़आरआई: 'Oil Sardine Landings and Revenue Realization under a Climate Change Regime in India', J Fisheries Livest Prod 9:310, 2021, इनकॉइस, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय: संभावित मत्स्यन क्षेत्र सलाह का आधिकारिक विवरण, उपग्रह स्रोत, 586 अवतरण केंद्र और 14 सेक्टर, पत्र सूचना कार्यालय, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, 1 जून 2026: एमपीईडीए अध्यक्ष का 2025-26 के समुद्री उत्पाद निर्यात का ब्योरा, पत्र सूचना कार्यालय, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय, 12 जनवरी 2026: मत्स्य उत्पादन, रोज़गार और निर्यात के आँकड़े, आईसीएआर-सीएमएफ़आरआई: समुद्री मत्स्य जनगणना 2025 का दायरा और गणना की अवधि, बिज़नेस स्टैंडर्ड, 8 सितंबर 2026: आईएमडी के आँकड़ों पर 7 सितंबर तक की मानसून कमी, सीफ़ूडसोर्स, 2026: पेरू की उत्तर-मध्य एंचोवेटा कोटा कटौती और इमार्पे की सिफ़ारिश, इन्फ़ोबाए पेरू, 11 जून 2026: प्रोड्यूसे की मौसम-स्थगन अधिसूचना, 3 जून तक का अवतरण और किशोर मछली का अनुपात, इंडियन एक्सप्रेस, 11 सितंबर 2026, अंजलि मरार: इसरो की विज्ञप्ति पर आधारित रिपोर्ट