भारत में अब एक ही क़ानूनी समय होगा, पर नियम तोड़ने पर सज़ा क्या है, यह लिखा ही नहीं गया
उपभोक्ता मामले विभाग के नए नियम कहते हैं कि किसी भी काम के लिए भारतीय मानक समय के अलावा कोई समय इस्तेमाल नहीं होगा। सज़ा के लिए वे मूल क़ानून की तरफ़ भेजते हैं, और उस क़ानून में समय से जुड़ा कोई अपराध है ही नहीं।
उपभोक्ता मामले विभाग ने विधिक मापविज्ञान (भारतीय मानक समय) नियम, 2026 अधिसूचित कर दिए हैं।
इनका सातवाँ नियम एक वाक्य में यह कहता है कि कोई भी संस्था हर काम के लिए भारतीय मानक समय के अलावा किसी और समय का इस्तेमाल, प्रदर्शन या रिकॉर्ड नहीं करेगी।
जनवरी 2025 के मसौदे में यहाँ लिखा था "सरकारी या व्यावसायिक कामों के लिए"। अधिसूचित नियम में वह सीमा हटा दी गई और "हर काम के लिए" कर दिया गया।
अक्षरशः पढ़ें तो दीवार पर लगी वह घड़ी भी इसमें आ जाती है जो न्यूयॉर्क का समय दिखाती है।
पहली गड़बड़: तारीख़ किस दिन से गिनी जाए
नियम कहते हैं कि वे राजपत्र में प्रकाशन की तारीख़ से एक सौ अस्सी दिन बाद लागू होंगे।
अधिसूचना के माथे पर तारीख़ 27 अगस्त 2026 छपी है, और हर जगह यही तारीख़ दोहराई जा रही है।
पर राजपत्र की आईडी में 29082026 दर्ज है, और ई-राजपत्र पोर्टल पर जारी करने की तारीख़ 27 अगस्त और प्रकाशन की तारीख़ 29 अगस्त लिखी है। पीआईबी ने इसकी घोषणा 30 अगस्त को सुबह 11:27 पर की।
यानी घड़ी 29 अगस्त से चलेगी, 27 अगस्त से नहीं। दो दिन का यह फ़र्क़ लागू होने की तारीख़ को फ़रवरी 2027 के आख़िरी हफ़्ते में सरका देता है।
यह हमारी अपनी गणना है, क्योंकि विभाग ने लागू होने की कोई तारीख़ अलग से नहीं छापी।
दूसरी गड़बड़: ज़िम्मेदारी किसकी है
लगभग हर रिपोर्ट में लिखा है कि सरकारी दफ़्तरों को अपनी घड़ियाँ एनटीपी और पीटीपी से मिलानी होंगी। ये दोनों इंटरनेट के वे तरीक़े हैं जिनसे जुड़ी हुई मशीनों तक एक साझा समय पहुँचाया जाता है।
अधिसूचना में यह बात इस तरह नहीं लिखी है।
नियम 8(1) सरकारी दफ़्तरों और सार्वजनिक संस्थानों से इतना कहता है कि वे किसी अधिकृत समय-स्रोत से अपना समय मिलाएँ। एनटीपी और पीटीपी का नाम वहाँ है ही नहीं।
वे नाम नियम 8(5) में आते हैं, और वह नियम समय देने वालों पर लागू होता है, लेने वालों पर नहीं। उसमें लिखा है कि अधिकृत समय-स्रोत अपनी सेवाएँ इन्हीं मानक तरीक़ों से देंगे।
रिपोर्टिंग में यह ज़िम्मेदारी बेचने वाले से ख़रीदने वाले पर चली गई है।
और उसी वाक्य का आख़िरी हिस्सा
नियम 8(5) एक और बात कहकर ख़त्म होता है, जिसका ज़िक्र कहीं नहीं मिला।
निदेशक, विधिक माप विज्ञान इन सेवाओं के लिए सदस्यता शुल्क तय कर सकते हैं।
सरकारी समय एक ऐसी सेवा बन सकता है जिसके पैसे लगेंगे।
तीसरी गड़बड़: सज़ा कहाँ है
नियम 11 कहता है कि इन नियमों का उल्लंघन करने वाला अधिनियम के प्रावधानों के तहत दंडनीय होगा।
अधिनियम यानी विधिक माप विज्ञान अधिनियम, 2009।
उस पूरे अधिनियम में "भारतीय मानक समय" शब्द एक बार भी नहीं आता। न "यूटीसी" आता है, न कोई ऑफ़सेट। समय से जुड़ा उसमें सिर्फ़ एक प्रावधान है, धारा 5(1)(iii), जो कहती है कि समय की इकाई सेकंड होगी।
अधिनियम की दंड वाली धाराएँ, 25 से 47 तक, हर एक किसी ख़ास नाप-तौल के अपराध से बँधी हैं। ग़लत बाट, बिना सत्यापन का माप, बिना लाइसेंस का काम, मुहर की नक़ल। ऐसी कोई धारा नहीं है जो कहती हो कि किसी भी नियम का उल्लंघन दंडनीय होगा।
एक रास्ता ज़रूर था। धारा 52(3) सरकार को छूट देती है कि वह नियम बनाते समय उसी नियम में लिख दे कि उल्लंघन पर पाँच हज़ार रुपये तक जुर्माना लगेगा।
इन नियमों में वह नहीं लिखा गया। पूरी अधिसूचना में कोई रक़म नहीं है।
तो नियम 7 की मनाही के पीछे इस वक़्त कोई तय जुर्माना नहीं दिखता। यह दोनों दस्तावेज़ पढ़कर निकाला गया निष्कर्ष है, विभाग का बयान नहीं, और छपने से पहले विभाग से यही पूछा जाना चाहिए।
एक वाक्य जो अपने आप से नहीं जुड़ता
नियम 7 की मनाही के साथ एक परंतुक लगा है, और उसे पढ़कर समझ नहीं आता कि उसका मतलब क्या है।
वह कहता है कि अगर कोई क़ानून, आदेश या दिशानिर्देश आईएसटी के साथ साफ़ लेबल लगाकर विदेशी समय-क्षेत्र दिखाने की इजाज़त देता हो, तो वैज्ञानिक शोध, नौवहन या खगोल विज्ञान के लिए पूर्व अनुमति से दूसरे समय-पैमाने इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
दोनों हिस्सों का आपस में कोई रिश्ता नहीं बनता। विदेशी घड़ी दिखाने की इजाज़त का शोध में दूसरा पैमाना इस्तेमाल करने से क्या लेना-देना।
मसौदे में ये दो अलग परंतुक थे, और उनके अलावा छूट के लिए दो पूरे नियम अलग से थे। अधिसूचित पाठ में वे दोनों नियम हटा दिए गए और बचा हुआ हिस्सा एक वाक्य में जोड़ दिया गया।
अनुमति किससे लेनी है, कैसे लेनी है और कितने दिन में मिलेगी, यह कहीं नहीं लिखा।
तो यह सब है किसलिए
इन गड़बड़ियों के बावजूद नियमों के पीछे की वजह असली है, और वह विज्ञप्ति में साफ़ लिखी है।
अभी देश की बहुत सी व्यवस्थाएँ विदेशी उपग्रहों से समय लेती हैं। जनवरी 2025 की विज्ञप्ति में यह और सीधे लिखा था कि तमाम दूरसंचार और इंटरनेट सेवा कंपनियाँ जीपीएस जैसे विदेशी स्रोतों पर निर्भर हैं।
समय सिर्फ़ घड़ी नहीं है। बैंकों के लेनदेन, शेयर बाज़ार के ऑर्डर, बिजली की ग्रिड, मोबाइल नेटवर्क, सब इसी पर टिके हैं कि सबकी घड़ी एक ही हो और वह सही हो।
नियम 9 इसी को पकड़ता है। रक्षा, बिजली, दूरसंचार, बैंकिंग, परिवहन और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों को दोहरी समय-व्यवस्था रखनी होगी, और जीपीएस जैसी किसी भी उपग्रह आधारित समय-मशीन को कम से कम एक संदर्भ नाविक से या किसी अधिकृत स्रोत से लेना होगा।
नाविक भारत की अपनी उपग्रह नौवहन प्रणाली है। यही इन नियमों का सबसे ठोस हिस्सा है।
और एक बारीक़ी, जो तकनीकी लोगों के लिए है
नियम 2(f) आईएसटी की परिभाषा देता है, और उसमें एक बात ध्यान से लिखी गई है।
आईएसटी यूटीसी में साढ़े पाँच घंटे जोड़कर नहीं बनता। वह यूटीसी(एनपीएलआई) में साढ़े पाँच घंटे जोड़कर बनता है।
यूटीसी(एनपीएलआई) राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला की अपनी घड़ियों से निकला यूटीसी है, यानी अंतरराष्ट्रीय पैमाने का भारतीय रूप। असली यूटीसी पेरिस में अंतरराष्ट्रीय माप-तौल ब्यूरो हिसाब लगाकर छापता है, और वह बाद में छपता है।
नियम भारत के अपने पैमाने को क़ानूनी आधार बनाते हैं, और उससे अंतरराष्ट्रीय पैमाने तक की जवाबदेही एनपीएल के ज़िम्मे छोड़ते हैं।
छह महीने बाद यह सब लागू होगा। तब तक निदेशक को अधिकृत स्रोतों की सूची छापनी है, जो अभी सार्वजनिक नहीं है।
स्रोतउपभोक्ता मामले विभाग, विज्ञप्ति, भारत का राजपत्र, सा.का.नि. 761(अ), विधिक माप विज्ञान अधिनियम, 2009