एक भारतीय अफ़सर बैंकॉक में दोबारा चुना गया, और उस संस्था का नाम शायद आपने कभी नहीं सुना
डॉ. विनय प्रकाश सिंह 4 सितंबर को एशियाई-प्रशांत डाक संघ के महासचिव पद पर निर्विरोध दोबारा चुने गए। यह संघ जिस बड़ी संस्था का हिस्सा है, वह 1874 की है और 2018 में लगभग टूट गई थी।

4 सितंबर को बैंकॉक में एक चुनाव हुआ जिसमें कोई मुक़ाबला नहीं था।
एशियाई-प्रशांत डाक संघ की 14वीं कांग्रेस में डॉ. विनय प्रकाश सिंह को महासचिव के पद पर निर्विरोध दोबारा चुन लिया गया। उनका दूसरा चार-वर्षीय कार्यकाल जनवरी 2027 से दिसंबर 2030 तक चलेगा।
वे भारतीय डाक सेवा के 1988 बैच के अधिकारी हैं। पहली बार वे 2022 की 13वीं कांग्रेस में चुने गए थे और जनवरी 2023 में पदभार संभाला था।
यह ख़बर एक पैराग्राफ़ की है। जो चीज़ इससे बड़ी है, वह यह है कि यह संघ किस चीज़ का हिस्सा है।
पहले संघ के बारे में
एशियाई-प्रशांत डाक संघ की शुरुआत 1961 में मनीला में हुई एक गोलमेज़ बैठक से हुई।
उस बैठक में 18 देश शामिल हुए और उन्होंने एशियाई-ओशियानिक डाक अभिसमय का मसौदा तैयार किया। यह 1 अप्रैल 1962 को लागू हुआ।
आज इसके 32 सदस्य देश हैं।
मुख्यालय पहले चालीस साल मनीला में रहा, क्योंकि संघ खड़ा करने में फ़िलीपींस सरकार की भूमिका थी। 2002 में यह बैंकॉक चला गया, और उसी साल प्रमुख का पद सदस्य देशों द्वारा चुने जाने के लिए खोला गया।
पर यह संघ अपने आप में स्वतंत्र नहीं है। यह यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का एक प्रतिबंधित संघ है, जिसकी व्यवस्था उस यूनियन के संविधान के अनुच्छेद 8 में है। इस क्षेत्र में यह अकेला ऐसा संघ है।
अब उस बड़ी संस्था के बारे में
यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन की स्थापना 9 अक्तूबर 1874 को बर्न संधि से हुई। उस समय इसका नाम जनरल पोस्टल यूनियन था।
यह दुनिया की सबसे पुरानी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में है। आज यह संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी है और इसके 192 सदस्य देश हैं।
इसके बनने से पहले की हालत समझने लायक़ है, क्योंकि उसी से पता चलता है कि यह संस्था क्यों बनी।
1874 से पहले किसी देश से दूसरे देश चिट्ठी भेजने के लिए दोनों देशों के बीच अलग से समझौता ज़रूरी था। तीसरे देश से होकर जाने वाली चिट्ठी के लिए उस देश से भी अलग समझौता चाहिए था। भेजने वाले को कई देशों के डाक टिकट अलग-अलग ख़रीदने पड़ सकते थे, और कई बार चिट्ठी पहुँचने पर पाने वाले से पैसा लिया जाता था।
बर्न संधि ने इसे एक बात से हल किया। पूरी दुनिया को डाक के लिए एक ही क्षेत्र मान लिया गया।
इसका मतलब यह हुआ कि आप अपने देश में टिकट लगाकर चिट्ठी डालेंगे, और वह किसी भी सदस्य देश में पहुँचा दी जाएगी। बीच के देश उसे बिना अलग शुल्क के गुज़ार देंगे। पहुँचाने वाला देश उसे बाँट देगा।
यह आज इतना सामान्य लगता है कि इसके बारे में सोचा भी नहीं जाता। 1874 में यह एक बड़ी बात थी।

पर हिसाब कौन चुकाएगा
यहीं वह चीज़ आती है जिस पर यह पूरी व्यवस्था टिकी है, और जिसका नाम ज़्यादातर लोगों ने नहीं सुना।
टर्मिनल ड्यूज़।
बात सीधी है। अगर भारत से कोई चिट्ठी जापान भेजी जाती है, तो टिकट का पैसा भारत को मिला। पर उस चिट्ठी को जापान के भीतर घर तक पहुँचाने का काम और ख़र्च जापान की डाक सेवा का है।
इसलिए भेजने वाला डाक विभाग पहुँचाने वाले डाक विभाग को कुछ रक़म देता है। वही टर्मिनल ड्यूज़ है।
इसकी दरें यूनियन के सदस्य मिलकर तय करते हैं, और यही तय करना दशकों से सबसे ज़्यादा झगड़े की जड़ रहा है।
1969 का वह फ़ैसला जिसने आगे मुश्किल खड़ी की
1969 में एक व्यवस्था बनी जिसका इरादा नेक था।
तय हुआ कि विकासशील देशों को विकसित देशों में डाक भेजने पर कम दर देनी होगी, ख़ास तौर पर दो किलोग्राम से हल्की चीज़ों पर। मक़सद यह था कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं को मदद मिले।
उस समय अंतरराष्ट्रीय डाक का मतलब मुख्य रूप से चिट्ठियाँ थीं।
फिर ऑनलाइन ख़रीदारी आ गई, और दो किलोग्राम से हल्के पैकेट अंतरराष्ट्रीय डाक का सबसे बड़ा हिस्सा बन गए।
चीन इस वर्गीकरण में उन्हीं देशों के समूह में था जिन्हें रियायती दर मिलती थी।
नतीजा जो निकला, वह चौंकाने वाला है। चीन से अमेरिका के किसी पते पर छोटा पैकेट भेजना अमेरिका के भीतर एक शहर से दूसरे शहर भेजने से सस्ता पड़ने लगा।
यानी एक अमेरिकी दुकानदार अपने ही देश में सामान भेजने पर चीन के भेजने वाले से ज़्यादा दे रहा था। और जो रक़म चीन दे रहा था, वह अमेरिकी डाक सेवा की उस पैकेट को छाँटने और बाँटने की लागत भी पूरी नहीं करती थी।
एक व्यवस्था जो ग़रीब देशों की मदद के लिए बनी थी, वह दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक को सस्ती ढुलाई दे रही थी।
15 अक्तूबर 2018
उस दिन अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने यूनियन को औपचारिक सूचना भेजी कि अमेरिका उसके संविधान की निंदा करता है और संघ से हट रहा है।
144 साल में यह पहली बार था कि इस संस्था का कोई संस्थापक सदस्य बाहर निकलने की बात कर रहा था। अमेरिका 1874 की बर्न संधि पर दस्तख़त करने वालों में था।
नोटिस देने और वास्तव में निकलने के बीच एक साल का समय होता है, इसलिए यह पूरा साल बातचीत में गया।
जून 2019 में सदस्य देशों ने वोट देकर तय किया कि सितंबर में एक असाधारण कांग्रेस बुलाई जाएगी, और वह सिर्फ़ इसी मुद्दे पर होगी।
जिनेवा में क्या हुआ
सितंबर 2019 की उस कांग्रेस में समझौता हुआ।
दरों की व्यवस्था बदली गई और देशों को अपनी दरें ख़ुद घोषित करने की छूट देने की दिशा में क़दम उठाया गया, कुछ सीमाओं के भीतर।
इसके बाद अमेरिका ने अपना नोटिस वापस ले लिया और संघ में बना रहा।
इस पूरे प्रकरण में देखने की चीज़ यह है कि संस्था टूटी नहीं, पर उसका सबसे पुराना सिद्धांत बदलना पड़ा। एक ही दर सबके लिए, यह विचार अब पहले जैसा नहीं रहा।

चिट्ठी की जगह पैकेट ने ले ली
इस पूरे झगड़े की जड़ में एक बदलाव है जो धीरे-धीरे हुआ और जिसे किसी संधि ने पहले से नहीं सोचा था।
1874 की व्यवस्था चिट्ठियों के लिए बनी थी। चिट्ठी हल्की होती है, उसका आकार तय होता है, और उसे बाँटने का ख़र्च लगभग हर जगह एक जैसा रहता है। इसलिए एक साझा दर बनाना आसान था।
पैकेट अलग चीज़ है। उसका वज़न अलग, आकार अलग, और उसे पहुँचाने में हस्ताक्षर, ट्रैकिंग और कभी-कभी सीमा शुल्क की जाँच भी जुड़ती है। लागत कई गुना ज़्यादा है।
बीसवीं सदी के आख़िर तक अंतरराष्ट्रीय डाक में चिट्ठियों का बोलबाला था। फिर ईमेल आया और चिट्ठियाँ घटने लगीं। लगभग उसी समय ऑनलाइन ख़रीदारी आई और पैकेट बढ़ने लगे।
नतीजा यह हुआ कि जिस चीज़ के लिए दरें बनी थीं, वह सिकुड़ती गई, और जो चीज़ बढ़ रही थी, उसके लिए दरें बनी ही नहीं थीं।
इसीलिए 2018 का झगड़ा चिट्ठियों पर नहीं, दो किलोग्राम से हल्के पैकेट पर हुआ।
भारतीय डाक दुनिया की सबसे बड़ी है
इस बातचीत में भारत का वज़न एक आँकड़े से आता है।
भारत में क़रीब 1.65 लाख डाकघर हैं, और यह दुनिया का सबसे बड़ा डाक नेटवर्क है। किसी और देश का इतना फैला हुआ नहीं है।
इनमें से क़रीब 16 हज़ार शहरी इलाक़ों में हैं और एक लाख उनचास हज़ार से ज़्यादा गाँवों में।
यानी दस में से नौ डाकघर गाँव में है।
इनके साथ क़रीब 2.4 लाख डाक सेवक जुड़े हैं, जो शाखा डाकघरों का ज़्यादातर काम चलाते हैं।
विस्तार भी चलता रहा है। 2017 से 2022 के बीच वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित ज़िलों में 4,900 से ज़्यादा नए शाखा डाकघर खोले गए। वित्त वर्ष 2023-24 में उन गाँवों में 5,700 से ज़्यादा नए डाकघर खुले जहाँ बैंक नहीं था।
अब इस नेटवर्क को टर्मिनल ड्यूज़ के साथ रखकर देखिए।
बाहर से आया कोई पैकेट अगर किसी दूर के गाँव तक पहुँचाना है, तो वह आख़िरी हिस्सा सबसे महँगा होता है। शहर में एक डाकिया एक चक्कर में कई पैकेट बाँट देता है। गाँव में वही चक्कर एक या दो पैकेट के लिए लगाना पड़ सकता है।
भेजने वाला देश जो रक़म देता है, वह इस फ़र्क़ को नहीं देखती।
इसीलिए जिस देश का नेटवर्क जितना फैला हुआ है, उसके लिए यह हिसाब उतना ही टेढ़ा है। और भारत का नेटवर्क सबसे फैला हुआ है।

और एक कूपन जिससे दुनिया का सबसे मशहूर घोटाला निकला
यूनियन ने सिर्फ़ दरें तय नहीं कीं। उसने कुछ चीज़ें ईजाद भी कीं, और उनमें से एक की कहानी असाधारण है।
1906 की रोम कांग्रेस में अंतरराष्ट्रीय उत्तर कूपन बनाने का फ़ैसला हुआ। पहला कूपन 1 अक्तूबर 1907 को जारी हुआ।
समस्या जिसे यह हल करता था, वह मामूली लगती है पर असली थी। अगर आप किसी दूसरे देश में चिट्ठी भेजें और चाहें कि जवाब आए, तो जवाब का टिकट उस देश का लगेगा, जो आपके पास नहीं है। और पैसा भेजना उस दौर में मुश्किल था।
कूपन इसका जवाब था। आप अपने देश में कूपन ख़रीदकर चिट्ठी के साथ भेज देते। पाने वाला उसे अपने देश के डाकघर में देकर उतने टिकट ले लेता जितने एक चिट्ठी के जवाब के लिए चाहिए।
अब गड़बड़ी देखिए। कूपन की क़ीमत हर देश अपनी मुद्रा में तय करता था, और मुद्राओं की दरें बदलती रहती थीं। पहले विश्व युद्ध के बाद यूरोप की मुद्राएँ बुरी तरह गिर चुकी थीं।
1920 में एक आदमी ने इस पर ध्यान दिया। यूरोप में जो कूपन क़रीब एक अमेरिकी सेंट में मिल रहा था, वह अमेरिका में छह सेंट के टिकटों के बराबर था।
उसका नाम चार्ल्स पोंज़ी था।
उसने निवेशकों से कहा कि वह यूरोप से सस्ते कूपन ख़रीदकर अमेरिका में भुनाएगा, और उन्हें 45 दिन में पचास फ़ीसदी या 90 दिन में सौ फ़ीसदी मुनाफ़ा देगा।
गणित काग़ज़ पर काम करता था। व्यवहार में नहीं, क्योंकि इतने कूपन ख़रीदना, ढोना और भुनाना संभव ही नहीं था।
इसलिए उसने वह किया जिससे उसका नाम अमर हो गया। पुराने निवेशकों को नए निवेशकों के पैसे से भुगतान करने लगा।
आज "पोंज़ी स्कीम" कहते समय शायद ही किसी को याद रहता है कि यह नाम एक डाक कूपन से आया है, जिसे यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन ने चिट्ठी का जवाब आसान बनाने के लिए बनाया था।
इसका भारत से क्या लेना-देना
तीन तरह से।
पहला, भारत भी उन देशों में है जिन्हें इस व्यवस्था में रियायती श्रेणी मिली हुई थी। दरों में हुआ हर बदलाव भारतीय डाक के अंतरराष्ट्रीय हिसाब पर असर डालता है, दोनों तरफ़ से। भारत से बाहर जाने वाले पैकेट पर भी, और बाहर से भारत आने वाले पैकेट पर भी।
दूसरा, भारत अब सिर्फ़ भेजने वाला देश नहीं है। यहाँ बाहर से आने वाले छोटे पैकेट की संख्या तेज़ी से बढ़ी है, और उन्हें छाँटने तथा घर तक पहुँचाने का ख़र्च भारतीय डाक उठाती है। यानी जो शिकायत 2018 में अमेरिका ने की थी, उसका ढाँचा भारत पर भी लागू होता है।
तीसरा, इसी वजह से इन बैठकों में कौन बैठा है, यह मायने रखता है। दरें तय करने का काम तकनीकी लगता है, पर वह असल में बँटवारे का काम है।
तो इस चुनाव का मतलब क्या है
महासचिव का पद नीति बनाने का नहीं, चलाने का है। वह सदस्य देशों के बीच समन्वय करता है, प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग देखता है, और क्षेत्र की तरफ़ से बड़ी यूनियन में बात रखता है।
डॉ. सिंह का करियर इसी काम का रहा है। वे डाक सेवा बोर्ड के सदस्य रहे, डाक विभाग में वरिष्ठ उप महानिदेशक और मुख्य सतर्कता अधिकारी, उत्तर प्रदेश सर्कल के मुख्य पोस्टमास्टर जनरल, और इंडिया पोस्ट मुख्यालय में मुख्य महाप्रबंधक।
इसके बाहर उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग में, अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के साथ, और आर्मी पोस्टल सर्विस कोर में भी काम किया है।
उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आधुनिक इतिहास में स्वर्ण पदक लिया और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली से प्रबंधन में पीएचडी की।
निर्विरोध चुना जाना अपने आप में एक बात कहता है, कि 32 देशों में से किसी ने दूसरा नाम आगे नहीं बढ़ाया। इस क्षेत्र में चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी सदस्य हैं, इसलिए यह सहमति मामूली नहीं है।
पर इस ख़बर को पढ़ने का सबसे उपयोगी तरीक़ा यह है कि यह याद दिलाती है कि एक ऐसी व्यवस्था मौजूद है जिसके बिना विदेश भेजी गई कोई चिट्ठी या पैकेट पहुँचता ही नहीं, और जिसके बारे में सोचा तभी जाता है जब वह टूटने लगती है।
2018 में वह लगभग टूट गई थी।
और जिस कुर्सी पर अगले चार साल एक भारतीय अफ़सर बैठेगा, वह उसी व्यवस्था के एशियाई हिस्से की कुर्सी है।
स्रोतसंचार मंत्रालय की विज्ञप्ति, 6 सितंबर 2026, एशियाई-प्रशांत डाक संघ, अपनी पृष्ठभूमि पर, यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन, प्रतिबंधित संघों की सूची, बर्न संधि, 9 अक्तूबर 1874, सीएसआईएस, 2019 की असाधारण कांग्रेस और उसका नतीजा, भारतीय डाक, नेटवर्क के आँकड़े, अंतरराष्ट्रीय उत्तर कूपन का इतिहास, अमेरिकन जर्नल ऑफ़ इंटरनेशनल लॉ, अमेरिका के नोटिस वापस लेने पर