बिश्केक में आतंकवाद पर सबसे सख़्त वाक्य बोला गया, और उसमें किसी देश का नाम नहीं है
प्रधानमंत्री कार्यालय का जारी किया बयान कहता है कि जो देश आतंकवाद को नीति का साधन बनाते हैं उन्हें कड़ा संदेश देना होगा। कनेक्टिविटी वाले हिस्से में संप्रभुता की शर्त है, और वहाँ भी कोई परियोजना नामित नहीं है।
शंघाई सहयोग संगठन का 26वाँ शिखर सम्मेलन 1 सितंबर 2026 को बिश्केक में हुआ। संगठन के 25 साल पूरे हुए हैं।
प्रधानमंत्री कार्यालय ने प्रधानमंत्री का पूरा बयान जारी किया है। उसमें भारत की सोच के 3 स्तंभ गिनाए गए हैं, और तीनों के नाम बयान के हिंदी पाठ में अंग्रेज़ी में ही हैं: Security, Connectivity और Opportunity।
बयान का सबसे सख़्त हिस्सा पहले स्तंभ में है।
पहला वाक्य
उसमें लिखा है कि जो देश आतंकवाद को अपनी नीति का साधन बनाते हैं, आतंकियों को पनाह और समर्थन देते हैं, उन्हें कड़ा संदेश देना होगा कि आतंकवाद किसी के लिए strategic asset नहीं हो सकता।
उससे पहले यह भी है कि आतंकवाद के financing, recruitment, radicalisation और safe havens के पूरे ecosystem को ध्वस्त करना होगा, और इस विषय पर दोहरे मापदंड के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता।
इन तीनों वाक्यों में किसी देश का नाम नहीं है।
दूसरा वाक्य
कनेक्टिविटी वाले हिस्से में भी यही ढाँचा है।
बयान कहता है कि भारत उन सभी प्रयासों का समर्थन करता है जो बाज़ारों को जोड़ते हैं, व्यापार को सुगम बनाते हैं और विकास के नए रास्ते खोलते हैं। फिर एक शर्त आती है, कि इन प्रयासों में सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान ज़रूरी है, और यही एससीओ चार्टर की भी मूल भावना है।
यहाँ भी कोई परियोजना नामित नहीं है। न कोई गलियारा, न कोई पहल।
दोनों हिस्से इस तरह लिखे गए हैं कि सुनने वाला निशाना पहचान ले और पाठ किसी का नाम न ले।
यह कोई नई बात नहीं है और न ही यह अपने आप में शिकायत है। बहुपक्षीय मंचों पर बयान अक्सर ऐसे ही लिखे जाते हैं, ख़ासकर जब निशाने पर आया देश उसी मेज़ पर बैठा हो। पर यह बात दर्ज करने लायक़ है, क्योंकि इसी बयान का सार जब आगे बढ़ता है तो नाम अपने आप जुड़ जाते हैं, और वे नाम बयान के नहीं होते।
पश्चिम एशिया
तीसरा हिस्सा पश्चिम एशिया का है।
बयान कहता है कि वहाँ के संकट ने दिखाया है कि किसी एक क्षेत्र का संघर्ष वहीं तक सीमित नहीं रहता, और उसका असर पूरी दुनिया की energy security, maritime trade और supply chains पर पड़ता है। सबसे ज़्यादा नुक़सान ग्लोबल साउथ के देशों को होता है।
निष्कर्ष यह कि सभी तनावों और युद्धों का समाधान battlefield पर नहीं, dialogue और diplomacy से ही संभव है।
यहाँ भी कोई पक्ष नामित नहीं है।
एक दिन पहले प्रधानमंत्री की ईरान के राष्ट्रपति से बैठक हुई थी, और उसकी विज्ञप्ति में भी यही ढाँचा है। चिंता दर्ज है, संवाद और कूटनीति का आह्वान है, नौवहन और व्यापारिक जहाज़ों की सुरक्षा की बात है। किसी का नाम नहीं है।
बाक़ी बयान में
अफ़ग़ानिस्तान पर बयान कहता है कि भारत वहाँ के लोगों के विकास और मानवीय सहायता में योगदान देता रहा है और आगे भी देता रहेगा।
ड्रग तस्करी को केवल अपराध नहीं, युवा पीढ़ी और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बताया गया है।
कनेक्टिविटी में सड़क, रेल और हवाई गलियारों के साथ सीमा शुल्क की प्रक्रिया सरल करने, डिजिटल दस्तावेज़ीकरण बढ़ाने और लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाने की बात है।
और सफलता की कसौटी बयान ख़ुद तय करता है: युवाओं को कितने नए अवसर मिले, उद्यमियों के लिए कितने बाज़ार खुले, किसानों को तकनीक का कितना लाभ मिला, और नागरिकों का जीवन कितना बेहतर हुआ।
एक बात जो साफ़ रहे
यह बयान है, समझौता नहीं। इसमें कोई दस्तावेज़ नहीं है, कोई हस्ताक्षर नहीं, कोई रक़म नहीं।
अगले 25 साल के लिए बयान का अपना लक्ष्य वाक्य यही है कि सहयोग को vision से आगे बढ़ाकर ठोस outcomes तक ले जाया जाए।
स्रोतप्रधानमंत्री कार्यालय, एससीओ शिखर सम्मेलन में बयान, प्रधानमंत्री कार्यालय, ईरान के राष्ट्रपति से बैठक