बालासोर के जंगल में ओरांगउटान के पाँच बच्चे मिले हैं; यह जानवर भारत में नहीं होता, और इसीलिए यह ख़बर तस्करी की है
8 सितंबर की सुबह भोगराई के बिचित्रपुर जंगल में गश्ती दल को डेढ़ फ़ुट के पाँच लाल बालों वाले बच्चे मिले। घंटे भर में हज़ारों लोग जमा हो गए। ओडिशा के वन मंत्री ने कहा कि ये मलेशिया, इंडोनेशिया, बोर्नियो और सुमात्रा के जीव हैं, और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में एक की क़ीमत 20 से 25 लाख रुपये है।

लाल-भूरे बाल, लंबी बाँहें, क़द डेढ़ फ़ुट के आसपास। ऐसे पाँच जीव मंगलवार 8 सितंबर की सुबह ओडिशा के बालासोर ज़िले के भोगराई ब्लॉक में, बडापाई गाँव के पास, बिचित्रपुर के जंगल में पेड़ों के बीच बैठे मिले। देखने वाला वन विभाग का गश्ती दल था।
ओपन पत्रिका के अनुसार घंटे भर में हज़ारों लोग वहाँ जमा हो गए।
पाँचों ओरांगउटान थे। बच्चे। और ओरांगउटान भारत में नहीं होता।
जो मिला, जैसा मिला
चार बच्चे स्वस्थ थे, खा-पी रहे थे। पाँचवें का इलाज सिमिलिपाल राष्ट्रीय उद्यान से आई पशु-चिकित्सकों की टीम कर रही थी। उम्र का सही अनुमान अभी नहीं है; अधिकारी उन्हें किशोर कह रहे हैं।
बालासोर के प्रभागीय वनाधिकारी प्रतीक प्रकाश इंडलकर मौक़े पर थे। मुख्य वन्यजीव वार्डन प्रेम कुमार झा ने कहा कि देखरेख के बाद पाँचों को भुवनेश्वर के नंदनकानन प्राणी उद्यान में रखा जाएगा, जहाँ पहले क्वारंटीन और चिकित्सकीय जाँच होगी।
जंगल में तलाशी अभियान चला, इस सवाल के साथ कि क्या और जीव हैं, या कोई सबूत: पिंजरा, बोरी, कोई निशान कि ये यहाँ छोड़े कैसे गए।
वन कार्यालय में पहला दिन
प्रभागीय वनाधिकारी इंडलकर ने द फ़ेडरल से कहा: "हमने पाँच बच्चे ओरांगउटान बचाए हैं और उन्हें वन कार्यालय ले आए हैं। पाँच में से चार स्वस्थ हैं, खाना खा रहे हैं और ओआरएस पी रहे हैं। पशु-चिकित्सक उनकी जाँच और इलाज कर रहे हैं।" विभाग ने वन्यजीव क़ानून के तहत औपचारिक शिकायत दर्ज की है और पुलिस के साथ यह देख रहा है कि पीछे कोई गिरोह है या नहीं।
रिपोर्टें नाम और उम्र पर एक नहीं हैं: गाँव पीटीआई और ओपन में बडापाई है, संबाद इंग्लिश में बारापाही; उम्र ओपन में तय नहीं, आईएएनएस में "लगभग एक से दो साल"। संबाद के अनुसार गश्त उदयपुर वन प्रभाग के दल की थी; ओडिशा टीवी के अनुसार गाँव वालों ने पहले "पाँच बंदर" दिखने की ख़बर दी थी।
वन मंत्री का बयान
ओडिशा के वन एवं पर्यावरण मंत्री गणेश राम सिंहखुंटिया ने द ट्रिब्यून से कहा: "ये जानवर भारत में नहीं पाए जाते और ज़्यादातर मलेशिया, इंडोनेशिया, बोर्नियो और सुमात्रा के वर्षावनों में दिखते हैं।"
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में एक ओरांगउटान की क़ीमत 20 से 25 लाख रुपये हो सकती है, और ये हवाई, जल या रेल मार्ग से लाए गए हो सकते हैं। राज्य ने वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो से जाँच माँगी है और हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों और बंदरगाहों से सीसीटीवी फ़ुटेज देखने को कहा है।
पाँच जीव, 20 से 25 लाख प्रति जीव: यानी जंगल में एक से सवा करोड़ रुपये का माल पड़ा था, अगर मंत्री का अनुमान सही है।
मंत्री के बयान के दो रूप दर्ज हैं। आईएएनएस में: "ये खाने की तलाश में यहाँ आए हो सकते हैं, या इसमें कोई अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी गिरोह शामिल हो सकता है।" पीटीआई में: "हमें संदेह है कि इन्हें पश्चिम बंगाल से लगे बालासोर ज़िले के जंगल में किसी अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी गिरोह ने छोड़ा होगा।"
बच्चा अकेला क्यों नहीं होता
अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की प्रजाति-प्रविष्टियों के अनुसार ओरांगउटान का बच्चा जन्म के बाद छह से आठ साल तक माँ के साथ रहता है; स्तनधारियों में यह सबसे लंबी निर्भरता में से एक है। जंगल में डेढ़ फ़ुट का बच्चा अकेला नहीं मिलता।
पीटीआई ने लिखा कि जंगल में बच्चा सात से नौ साल दूध पीता है। न्यू इंग्लैंड प्राइमेट कंज़र्वेंसी, आईयूसीएन के 2016 के आकलन के हवाले से, कहती है: दूध छह से सात साल, पूरी आज़ादी आठ से ग्यारह साल में, दो जन्मों के बीच लगभग आठ साल।
इसका एक ही अर्थ है, और संरक्षण संगठन उसे दशकों से दर्ज करते आए हैं: बच्चे को लेने के लिए माँ को हटाना पड़ता है। पाँच बच्चे यानी, बोर्नियो या सुमात्रा के किसी जंगल में, पाँच माँएँ जो अब नहीं हैं। यह अनुमान है, ज़ब्ती का तथ्य नहीं, पर यह वह अनुमान है जिस पर हर विशेषज्ञ सहमत है।
प्राकृतिक प्रवास क्यों असंभव है
ओरांगउटान की तीन प्रजातियाँ हैं: बोर्नियो की, सुमात्रा की, और 2017 में अलग पहचानी गई तपानुली की। तीनों "अति संकटग्रस्त" श्रेणी में हैं। तीनों सिर्फ़ इंडोनेशिया और मलेशिया के द्वीपों पर हैं।
बालासोर से बोर्नियो बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर और मलक्का जलडमरूमध्य के पार है। बीच में कोई जंगल का गलियारा नहीं, कोई ज़मीनी रास्ता नहीं। ओपन के अनुसार अधिकारियों ने इसीलिए पहले घंटे में ही कहा कि यह "मानवीय हस्तक्षेप" है।
बोर्नियो में कितने बचे हैं
कंज़र्वेंसी के अनुसार 2016 के आकलन में बोर्नियो के ओरांगउटान 1,04,700 थे। वर्ल्ड लैंड ट्रस्ट लिखता है कि 2002 से अब तक लगभग 1,50,000 जंगल से ग़ायब हुए हैं। कंज़र्वेंसी का एक और आँकड़ा: हर साल 2,000 से ज़्यादा ओरांगउटान का शिकार होता है, और अनाथ बच्चे या तो स्थानीय स्तर पर रखे जाते हैं या एशिया के दूसरे देशों, मध्य-पूर्व और यूरोप में भेजे जाते हैं।
भोगराई कहाँ है
भोगराई बालासोर ज़िले का उत्तर-पूर्वी छोर है, जहाँ ओडिशा की तटरेखा पश्चिम बंगाल से मिलती है। सड़क से यह दीघा के पास है; समुद्र यहाँ से कुछ किलोमीटर है; कोलकाता ढाई सौ किलोमीटर के आसपास।
जंगल के इस टुकड़े में जीव छोड़ना दो में से एक बात कहता है: या तो कोई खेप रास्ते में बिगड़ी और उसे यहाँ फेंक दिया गया, या यह किसी बड़े रास्ते का पड़ाव था। जाँच अभी इनमें से किसी पर नहीं पहुँची है, और हम भी नहीं पहुँच रहे।
क़ानून: सीआईटीईएस से अनुसूची चार तक
वन्य जीव और वनस्पति की संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर सम्मेलन, जिसे सीआईटीईएस कहते हैं, ओरांगउटान को अपने परिशिष्ट एक में रखता है: व्यावसायिक व्यापार वर्जित।
भारत ने 2022 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में संशोधन किया, जो 1 अप्रैल 2023 से लागू है। नई अनुसूची चार में सीआईटीईएस के तीनों परिशिष्टों की प्रजातियाँ हैं। धारा 49M कहती है कि ऐसी किसी जीवित प्रजाति को रखने, हस्तांतरित करने, उसके जन्म और मृत्यु का पंजीकरण अनिवार्य है।
पीआईबी के अनुसार पर्यावरण मंत्रालय ने इसके नियम 28 फ़रवरी 2024 को अधिसूचित किए। नियम लागू होने के छह महीने के भीतर हर ऐसे जीव के मालिक को राज्य के मुख्य वन्यजीव वार्डन के पास परिवेश 2.0 पोर्टल से पंजीकरण कराना था, और उसके बाद क़ब्ज़े में आने के तीस दिन के भीतर।
2022 के संशोधन ने और क्या बदला
उसी संशोधन ने अधिनियम की अनुसूचियाँ छह से घटाकर चार कीं: पहली में सबसे ज़्यादा संरक्षित प्रजातियाँ, दूसरी में बाक़ी संरक्षित, तीसरी में वनस्पति, और चौथी सीआईटीईएस के लिए। पहले सीआईटीईएस भारत में सीधे लागू नहीं था; विदेशी जीवों का आयात सीमा-शुल्क और विदेश व्यापार नीति से चलता था, और देश के भीतर उनका रखना किसी वन्यजीव क़ानून में नहीं आता था।
अब वह आता है। अनुसूची चार की प्रजाति रखने, बेचने या प्रजनन कराने के लिए पंजीकरण चाहिए; बिना पंजीकरण रखना अपराध है।
पंजीकरण का उलटा असर
इस नियम का एक पहलू वह है जिस पर वन्यजीव संगठनों ने आपत्ति की थी: पंजीकरण से पहले से मौजूद विदेशी जीवों का क़ब्ज़ा वैध हो गया, बिना यह पूछे कि वे आए कहाँ से। यानी छह महीने की खिड़की में कोई भी पहले से तस्करी से लाया गया जीव काग़ज़ पर सफ़ेद हो सकता था।
पाँच बच्चे ओरांगउटान इस खिड़की से बाहर हैं, क्योंकि वह 2024 में बंद हो गई। इसलिए इनका क़ब्ज़ा, अगर कोई दावा करे भी, बिना आयात अनुमति के अवैध है, और आयात अनुमति सीआईटीईएस परिशिष्ट एक की प्रजाति के लिए व्यावसायिक उद्देश्य से मिलती नहीं।
समुद्र की ओर, और एक रेंज

बालासोर का तट वही है जहाँ चांदीपुर की एकीकृत परीक्षण रेंज है, जहाँ से रक्षा अनुसंधान संगठन मिसाइलों के परीक्षण करता है। यानी यह तट देश के सबसे ज़्यादा निगरानी वाले तटों में है। भोगराई उस रेंज से उत्तर में है, बंगाल की सीमा की ओर, जहाँ निगरानी मछुआरों की नावों और स्थानीय पुलिस की है।
समुद्र के रास्ते आने का अर्थ होगा बंगाल की खाड़ी पार करके किसी छोटी नाव से उतरना, या कोलकाता या पारादीप बंदरगाह से कंटेनर में। दोनों रास्तों पर सीसीटीवी की माँग इसीलिए है। किसी रास्ते का सबूत अभी नहीं है।
रास्ता कैसा दिखता है

वाइल्डलाइफ़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया अप्रैल से दिसंबर 2025 की ज़ब्तियों का लेखा रखता है। उस अवधि में उसने वन्यजीव अपराध की 202 घटनाएँ दर्ज कीं, जिनमें 151 देशी प्रजातियों की और 51 जीवित विदेशी जीवों की तस्करी की थीं।
51 में से 46 मामलों में स्रोत बैंकॉक या कुआलालंपुर था; बीच के पड़ाव हांगकांग, सिंगापुर, श्रीलंका और ढाका। पकड़ने की मुख्य जगहें मुंबई और बेंगलुरु के हवाई अड्डे; फिर चेन्नई, कोच्चि, तिरुचिरापल्ली, मदुरै, हैदराबाद, कोलकाता।
ट्रस्ट का अपना निष्कर्ष: यह "दक्षिण-पूर्व एशिया की बहुत केंद्रित आपूर्ति-शृंखला" है जो भारत के अवैध पालतू और वन्यजीव बाज़ार को खिलाती है। साथ में एक चेतावनी: पश्चिमी और दक्षिणी हवाई अड्डों पर ज़्यादा ज़ब्तियाँ तस्करी का नक़्शा नहीं, प्रवर्तन का नक़्शा हो सकती हैं।
थाईलैंड से भारत: साढ़े तीन साल का हिसाब
वन्यजीव व्यापार पर नज़र रखने वाले संगठन ट्रैफ़िक ने 4 जुलाई 2025 को थाईलैंड-भारत हवाई मार्ग का लेखा छापा: जनवरी 2022 से मई 2025 के बीच जीवित जानवरों की 60 ज़ब्तियाँ, कुल 7,272 जीव, संख्या में 92.7 फ़ीसदी सरीसृप। भारत की ओर 12 हवाई अड्डों में सबसे ज़्यादा चेन्नई; 80 फ़ीसदी से ज़्यादा ज़ब्तियाँ भारतीय सिरे पर हुईं। उस लेख में किसी प्राइमेट का नाम नहीं है।
हज़ारों की भीड़ और पाँच बच्चे
ओपन की रिपोर्ट का एक वाक्य अलग से पढ़ने लायक़ है: घंटे भर में हज़ारों लोग जमा हो गए। बच्चे ओरांगउटान इंसानी बीमारियों के प्रति संवेदनशील होते हैं, और भीड़, शोर और छूने की कोशिश उनके लिए ख़तरा है। यही वजह है कि नंदनकानन में पहला क़दम क्वारंटीन है, और यही वजह है कि वन विभाग ने उन्हें तुरंत जंगल के भीतर "सुरक्षित जगह" ले जाकर रखा, जैसा ट्रिब्यून ने लिखा।
वाइल्डलाइफ़ ट्रस्ट ने अगली पंक्ति के अधिकारियों, वन, सीमा-शुल्क, पुलिस और सीमा-सुरक्षा, के लिए "वन्यजीव पहचान और ज़ब्ती-पश्चात मार्गदर्शिका" बनाई है, क्योंकि पकड़ने के बाद पहले घंटे में जीव सबसे ज़्यादा मरते हैं। बालासोर में गश्ती दल ने वह पहला घंटा ठीक निभाया; चार स्वस्थ हैं।
वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो क्या है
राज्य ने जाँच जिस ब्यूरो को सौंपने की माँग की है, वह पर्यावरण मंत्रालय के अधीन 2007 में बना केंद्रीय निकाय है, जिसका काम राज्यों की सीमाओं और देश की सीमाओं के पार चलने वाले वन्यजीव अपराध पर है। हवाई अड्डों और बंदरगाहों पर सीमा-शुल्क के साथ उसका समन्वय इसी के लिए है।
बालासोर का मामला उसके दायरे में इसलिए है कि जीव विदेशी हैं और रास्ता अंतरराष्ट्रीय है। राज्य का वन विभाग जंगल का मामला देख सकता है; हवाई अड्डे का सीसीटीवी और विदेशी नेटवर्क ब्यूरो का काम है।
गिबन, ख़रगोश, और डिलीवरी वाला
उसी लेखे में प्राइमेट हैं। जुलाई 2025 में चेन्नई में पालतू जानवरों के थैलों में छिपाए एक एजाइल गिबन और एक पूर्वी ग्रे गिबन पकड़े गए; दो हफ़्ते में उसी प्रजाति को चेन्नई लाने की यह दूसरी कोशिश थी। मुंबई में एक डिलीवरी कर्मी दो बच्चे गिबन ले जाते पकड़ा गया, और जाँच में व्हाट्सऐप पर चलने वाला तस्करी नेटवर्क मिला।
लेखे में इन मामलों का अंत भी है: चेन्नई में प्रजाति की पहचान वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो ने की, यात्री गिरफ़्तार हुआ और गिबन वापस भेजे गए; मुंबई वाला कर्मी 31 साल का था और टिकट-निर्देश उसे व्हाट्सऐप समूहों से मिले थे।
अप्रैल से जून के बीच मुंबई हवाई अड्डे पर थाईलैंड से आए धारीदार ख़रगोशों की तीन ज़ब्तियाँ हुईं, जिनकी प्रजाति तक तय नहीं हो पाई: सुमात्रा की या अन्नामाइट की।
पैटर्न में तीन चीज़ें दोहराई जाती हैं: बच्चे जानवर, क्योंकि छोटे और सस्ते में छिपते हैं; हवाई सामान या कूरियर; और तस्करी के आख़िरी सिरे पर कोई साधारण नौकरी वाला।
मुंबई की दो ज़ब्तियाँ
10 जून 2025 को मुंबई के सीमा-शुल्क अधिकारियों ने थाईलैंड से आए एक यात्री को शुगर ग्लाइडर और छिपकलियों समेत जीवों के साथ पकड़ा, सीबीएस की रिपोर्ट के अनुसार; उससे पहले एक यात्री के पास टारेंटुला और पोसम मिले थे। डेक्कन हेराल्ड ने मुंबई में 665 विदेशी जीवों की एक ज़ब्ती को "अपनी तरह की सबसे बड़ी" लिखा था।
संख्याएँ बताती हैं कि जीव अकेले नहीं आते। ओरांगउटान के पाँच बच्चे, अगर हवाई रास्ते से आए, तो किसी बड़ी खेप का हिस्सा रहे होंगे, और यही वह सवाल है जो तलाशी अभियान पूछ रहा है।
पूर्वोत्तर का ज़मीनी रास्ता
हवाई अड्डों के अलावा दूसरा रास्ता म्यांमार की सीमा है। मार्च 2024 में असम में इंडोनेशिया के 52 जीव, जिनमें लोरिस, बाबिरूसा और हॉर्नबिल थे, अवैध ढुलाई में पकड़े गए। मिज़ोरम-असम सीमा के लैलापुर में पहले कंगारू, नीले मकाओ और कैपुचिन बंदर पकड़े जा चुके हैं। 2022 में 22 ज़ब्तियों में 100 से ज़्यादा प्राइमेट पकड़े गए, जिनमें ओरांगउटान भी थे।
बालासोर इन दोनों रास्तों के बीच है: पूर्वोत्तर से आती सड़क और कोलकाता का बंदरगाह-हवाई अड्डा, दोनों ढाई-तीन सौ किलोमीटर में। इसीलिए मंत्री ने "हवाई, जल या रेल" तीनों कहा।
बाज़ार किसका है
जीवों की माँग भारत के भीतर है। द वायर और डाउन टु अर्थ ने पिछले साल विदेशी पालतू जानवरों के बढ़ते बाज़ार और क़ानून के "गंभीर अंतरालों" पर रिपोर्टें छापी थीं। ओरांगउटान पालतू नहीं होता; वह प्रदर्शनी, निजी चिड़ियाघर या आगे तस्करी का माल होता है।
डाउन टु अर्थ की 3 जुलाई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़-इंडिया ने अकेले 2022 में 56 ज़ब्तियों में लगभग 4,000 विदेशी जीव दर्ज किए।
मंत्री के 20 से 25 लाख के अनुमान का स्रोत उन्होंने नहीं बताया, और हमें कोई सरकारी मूल्य-सूची नहीं मिली। हम उसे उनके अनुमान के रूप में ही दे रहे हैं।
नंदनकानन में आगे क्या

क्वारंटीन, बीमारी की जाँच, फिर देखरेख। सीआईटीईएस के तहत परिशिष्ट एक के ज़ब्त जीवों को मूल देश लौटाने का प्रावधान है, अगर मूल देश माँगे और स्वीकार करे; व्यवहार में ऐसे जीव अक्सर ज़ब्त करने वाले देश के चिड़ियाघर में ही रहते हैं। इंडोनेशिया या मलेशिया की ओर से इस मामले में कोई बयान अभी नहीं है।
नंदनकानन में ओरांगउटान पहले से हैं या नहीं, और पाँच बच्चों की देखभाल की उसकी क्षमता क्या है, इस पर उद्यान का बयान अभी नहीं आया है।
नंदनकानन में इससे पहले एक ओरांगउटान रही है। ईटीवी भारत ने 30 मई 2019 की सुबह ख़बर दी कि देश की अकेली ओरांगउटान बिन्नी 41 साल की उम्र में साँस की नली के संक्रमण से मरी; वह 2003 में पुणे के चिड़ियाघर से आई थी। फ़्री प्रेस जर्नल ने मृत्यु फ़रवरी 2019 लिखी है।
ओडिशा टीवी के अनुसार नंदनकानन की टीम भोगराई भेजी गई है, और क्वारंटीन में स्वास्थ्य, प्रजाति और संभावित मूल की जाँच होगी; प्रजाति के लिए डीएनए परीक्षण का ज़िक्र है।
शाम तक की तस्वीर
कौन लाया। किस रास्ते से। यहाँ क्यों छोड़ा। और क्या यह खेप पूरी थी या इसका कुछ हिस्सा आगे निकल गया।
जाँच वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो के पास जा रही है। सीसीटीवी की माँग हवाई अड्डों, स्टेशनों और बंदरगाहों से हुई है। जंगल की तलाशी में मंगलवार शाम तक कोई पिंजरा या बोरी मिलने की ख़बर नहीं थी।
ब्यूरो की भूमिका पर शब्द भी अलग हैं: पीटीआई में राज्य ने जाँच का "आग्रह" किया, आईएएनएस में ब्यूरो को "सूचित" किया गया, द फ़ेडरल में जाँच उसे "सौंपी" गई। रात सवा आठ बजे तक की रिपोर्टों में किसी गिरफ़्तारी, संदिग्ध या प्रजाति की पहचान की ख़बर नहीं है।
पाँच बच्चे जो चार हज़ार किलोमीटर दूर के जंगल के हैं, मंगलवार को बालासोर के एक जंगल में अकेले थे। यह वाक्य अपने आप में पूरा मामला है।
स्रोतद ट्रिब्यून, वन मंत्री का बयान, 8 सितंबर 2026, ओपन, घटनास्थल की रिपोर्ट, पीआईबी, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 49M के नियम, 6 मार्च 2024, वाइल्डलाइफ़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया, अप्रैल–दिसंबर 2025 की ज़ब्तियाँ, द फ़ेडरल, प्रभागीय वनाधिकारी और मंत्री के पूरे बयान, 8 सितंबर 2026, द वायर, पीटीआई की रिपोर्ट, 8 सितंबर 2026, फ़्री प्रेस जर्नल, शिकायत, तलाशी और नंदनकानन का इतिहास, 8 सितंबर 2026, हंस इंडिया, आईएएनएस की रिपोर्ट, 8 सितंबर 2026, ओडिशा टीवी, नंदनकानन की टीम और जाँच का ब्योरा, 8 सितंबर 2026, संबाद इंग्लिश, दिन की पहली विस्तृत रिपोर्ट, 8 सितंबर 2026, ओडिशा बाइट्स, मंत्री और मुख्य वन्यजीव वार्डन के बयान, 8 सितंबर 2026, कलिंगा टीवी, मुख्य वन्यजीव वार्डन का बयान, 8 सितंबर 2026, ईटीवी भारत, नंदनकानन की ओरांगउटान बिन्नी की मृत्यु, 30 मई 2019, न्यू इंग्लैंड प्राइमेट कंज़र्वेंसी, बोर्नियो ओरांगउटान की प्रजाति-प्रविष्टि, आईयूसीएन 2016 के हवाले से, वर्ल्ड लैंड ट्रस्ट, बोर्नियो ओरांगउटान की प्रजाति-प्रविष्टि, ट्रैफ़िक, थाईलैंड-भारत हवाई मार्ग की ज़ब्तियों का विश्लेषण, 4 जुलाई 2025, डाउन टु अर्थ, भारत के विदेशी पालतू बाज़ार पर रिपोर्ट, 3 जुलाई 2026