इंडोनेशिया के अनुरोध के बाद भी ओरांगउटान शावकों की वापसी का फ़ैसला केंद्र करेगा
इंडोनेशिया के वन मंत्रालय ने 10 सितंबर को भारत की सीआईटीईएस प्रबंधन प्राधिकरण को औपचारिक चिट्ठी भेजकर बालेश्वर में मिले पाँच ओरांगउटान शावक वापस माँगे हैं। उससे एक दिन पहले ओडिशा सरकार ने केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण को लिखकर इन्हीं शावकों को नंदनकानन में रखने की इजाज़त माँगी थी। संधि का पाठ लौटाने का हुक्म नहीं देता; भारतीय क़ानून की एक धारा उससे आगे जाती है।

इंडोनेशिया के वन मंत्रालय ने 10 सितंबर को भारत की सीआईटीईएस प्रबंधन प्राधिकरण को औपचारिक पत्र भेजा और बालेश्वर में मिले पाँच ओरांगउटान शावक वापस माँगे।
उससे एक दिन पहले ओडिशा सरकार ने केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण को लिखकर इन्हीं शावकों को नंदनकानन में रखने की इजाज़त माँगी थी।
ये पाँच 8 सितंबर की सुबह भोगराई के बिचित्रपुर जंगल में मिले थे। वे वहाँ कैसे पहुँचे, विदेशी जानवरों की तस्करी का रास्ता कैसा दिखता है और अनुसूची चार का क़ानून उन पर कैसे लगता है, यह भारत पन्ना ने 9 सितंबर के अंक में दर्ज किया था। तब तक जकार्ता या कुआलालंपुर की तरफ़ से कोई बयान नहीं आया था। अब आ गया है, और उसके साथ वह सवाल खुल गया है जिसका जवाब ख़बरों में एक पंक्ति से दिया जा रहा है: कि सीआईटीईएस ऐसे जानवरों को मूल देश लौटाना अनिवार्य बनाता है।
संधि का पाठ यह नहीं कहता।
इंडोनेशिया की चिट्ठी और उसका पता
संबाद इंग्लिश ने 11 सितंबर को इंडोनेशिया के वन मंत्रालय में प्रजाति एवं आनुवंशिक संरक्षण के निदेशक अहमद मुनावीर के हवाले से लिखा कि पत्र 10 सितंबर को भेजा गया और उसमें एक शर्त लगी है: अगर आनुवंशिक साक्ष्य से इंडोनेशियाई मूल सिद्ध हो, तो मंत्रालय शीघ्र वापसी के लिए ज़रूरी हर क़दम पर समन्वय करने को तैयार है।
पत्र किसे गया, यह ब्योरा मायने रखता है। वह ओडिशा को नहीं गया, न पर्यावरण मंत्रालय के किसी सामान्य पते पर। वह भारत की सीआईटीईएस प्रबंधन प्राधिकरण को गया, यानी उस पद को जिसे वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम की धारा 49E के तहत केंद्र सरकार अधिसूचना से नामित करती है, और जो वनों के अपर महानिदेशक की रैंक से नीचे का नहीं हो सकता। इंडियन एक्सप्रेस ने उसी दिन लिखा कि ओडिशा सरकार के सूत्रों के अनुसार किसी भारतीय एजेंसी से राज्य को इस बारे में औपचारिक रूप से कुछ मिला ही नहीं; अधिकारियों ने ख़बरें देखी हैं।
मंत्रालय के जनसंपर्क एवं विदेश सहयोग ब्यूरो के प्रमुख रिस्तियांतो प्रिबादी ने सरकारी समाचार एजेंसी अंतारा को बताया कि जकार्ता और नई दिल्ली के राजनयिक मिशनों, इंडोनेशिया की राष्ट्रीय अनुसंधान एवं नवाचार एजेंसी और कृषि मंत्रालय के साथ मिलकर काम हो रहा है। लौटने पर स्वास्थ्य जाँच, संगरोध और व्यवहार का आकलन होगा, और आगे जंगल में छोड़ने के लिए पुनर्वास की गुंजाइश भी रखी गई है। एएफ़पी से उन्होंने कहा कि मंत्रालय ने जकार्ता स्थित भारतीय दूतावास के रास्ते भारत सरकार से बातचीत शुरू कर दी है।
प्रिबादी ने प्रजाति पर जो कहा, उसमें भी शर्त है: शारीरिक लक्षणों के प्रारंभिक अवलोकन से पाँचों सुमात्रा के ओरांगउटान लगते हैं, पर प्रजाति और आनुवंशिक मूल डीएनए जाँच से ही तय होंगे। डाउन टू अर्थ ने 9 सितंबर को इन्हें बोर्नियो का ओरांगउटान लिखा था। सुमात्रा पूरा का पूरा इंडोनेशिया में है; बोर्नियो इंडोनेशिया, मलेशिया और ब्रुनेई में बँटा है। आगे जो प्रावधान लगेगा वह "निर्यातक देश" से सलाह माँगता है, इसलिए प्रजाति का जवाब यह भी तय करता है कि जवाबी चिट्ठी किस राजधानी को जानी चाहिए। इंडोनेशिया के ग़ैर-सरकारी ओरांगउटान इन्फ़ॉर्मेशन सेंटर के संस्थापक पानुत हादिसिसवोयो ने एएफ़पी से कहा कि वापसी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए और डीएनए जाँच जानवरों के लौट आने के बाद हो।
ओडिशा ने उसी हफ़्ते दूसरी चिट्ठी लिखी
ओडिशा के वन एवं पर्यावरण मंत्री गणेश राम सिंहखुंटिया ने शुक्रवार को कहा कि राज्य सरकार ने दो दिन पहले केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण को पत्र भेजकर पाँचों को नंदनकानन में रखने की अनुमति माँगी है। उन्होंने जोड़ा कि अनुमति मिल जाए तो यह जानवरों से प्रेम करने वालों के लिए अच्छी ख़बर होगी और सैलानियों की आवाजाही भी बढ़ सकती है।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) प्रेम कुमार झा ने पत्रकारों से कहा, "हमारा ध्यान इस पर है कि ये ज़िंदा रहें। हमने इन्हें नंदनकानन प्राणि उद्यान के हैंड-रियरिंग सेंटर में रखा है। शुरू में ये सदमे में थे, अब ठीक हैं।" मूल देश भेजने या यहाँ प्रदर्शनी में रखने का फ़ैसला, उनके शब्दों में, बाद के चरण में होगा। डीएनए के लिए ख़ून के नमूने चिड़ियाघर पहुँचने के क़रीब दस दिन बाद लिए जाने हैं।
राज्य की इस माँग के पीछे एक ख़ाली बाड़ा है। केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की अपनी वार्षिक सूची के मुताबिक़ नंदनकानन ने 31 मार्च 2026 को 4,170 जानवरों के साथ साल पूरा किया, जिनमें आठ आम चिंपैंज़ी हैं और एक भी ओरांगउटान नहीं। उसी सूची में पूरे देश के चिड़ियाघरों के ओरांगउटान गिने जा सकते हैं, और वे पाँच हैं: गुवाहाटी के असम राज्य चिड़ियाघर में सुमात्रा की प्रजाति के एक नर और एक मादा, तथा मैसूरु के श्री चामराजेंद्र प्राणि उद्यान में बोर्नियो की प्रजाति के तीन, उसी साल एक मादा की मौत के बाद।

उतने ही, यानी पाँच, बालेश्वर में एक सुबह मिल गए।
सीआईटीईएस लौटाने का हुक्म नहीं देता
अभिसमय का पूरा पाठ संयुक्त राष्ट्र संधि शृंखला के खंड 993 में दर्ज है। उसका अनुच्छेद आठ वह जगह है जहाँ ज़ब्ती के बाद की कार्रवाई लिखी गई है।
पहला खंड सदस्य देशों से कहता है कि वे संधि के उल्लंघन में हुए व्यापार को दंडनीय बनाएँ और "ऐसे नमूनों की ज़ब्ती या निर्यातक देश को वापसी" का इंतज़ाम रखें। वाक्य में "या" है, "और" नहीं।
चौथा खंड जीवित नमूनों के लिए है, और वह तीन बातें क्रम से कहता है। एक, नमूना ज़ब्त करने वाले देश की प्रबंधन प्राधिकरण को सौंपा जाएगा। दो, वह प्राधिकरण निर्यातक देश से सलाह-मशविरे के बाद नमूना उस देश को उसी के ख़र्च पर लौटाएगी, या किसी बचाव केंद्र अथवा ऐसी जगह भेजेगी जिसे वह उचित और संधि के उद्देश्यों के अनुरूप समझे। तीन, वह इस फ़ैसले के लिए वैज्ञानिक प्राधिकरण की राय ले सकती है या सचिवालय से परामर्श कर सकती है। पाँचवाँ खंड बचाव केंद्र की परिभाषा देता है: वह संस्था जिसे प्रबंधन प्राधिकरण जीवित नमूनों, ख़ासकर ज़ब्त किए गए नमूनों, की देखभाल के लिए नामित करे।
तीन चीज़ें इस पाठ से निकलती हैं। सलाह-मशविरा अनिवार्य है। चुनाव ज़ब्त करने वाले देश की प्राधिकरण के हाथ में है। और वापसी का बिल माँगने वाले देश को थमाया गया है, ज़ब्त करने वाले को नहीं।
7 फ़रवरी 2025 से लागू परिशिष्टों में होमिनिडी कुल के नीचे परिशिष्ट एक में छह नाम हैं, और उनमें ओरांगउटान की तीनों प्रजातियाँ हैं: Pongo abelii, Pongo pygmaeus और Pongo tapanuliensis। परिशिष्ट एक में होना व्यापार पर रोक लगाता है। वह लौटाने की बाध्यता नहीं जोड़ता।
सम्मेलन का प्रस्ताव 17.8 और ज़ब्त जानवरों के तीन रास्ते
संधि के पक्षकारों का सम्मेलन इसी सवाल पर एक प्रस्ताव चलाता है, जिसका नाम है Conf. 17.8, और जिसका मौजूदा पाठ उन्नीसवीं बैठक में संशोधित हुआ। उसने इसी विषय के तीन पुराने प्रस्तावों को रद्द करके उनकी जगह ली: Conf. 9.9, Conf. 9.10 और Conf. 10.7। भारतीय ख़बरों में इसका ज़िक्र नहीं है, और असल दिशानिर्देश इसी में हैं।
प्रस्ताव का तीसरा पैरा सिफ़ारिश करता है कि ज़ब्त जीवित नमूनों के निपटान पर फ़ैसला लेने से पहले प्रबंधन प्राधिकरण अपनी वैज्ञानिक प्राधिकरण से सलाह ले और उसकी राय हासिल करे, और यदि संभव हो तो निर्यातक या मूल देश की वैज्ञानिक प्राधिकरण तथा दूसरे संबंधित विशेषज्ञों से भी। वही पैरा कहता है कि परिशिष्ट एक के जीवित नमूनों के निपटान पर लिए गए किसी भी फ़ैसले की सूचना सचिवालय को दी जाए, और यह भी कि ज़ब्त किए गए परिशिष्ट एक के जंगली नमूनों की देखभाल को प्राथमिकता मिले।
ख़र्च पर पाँचवाँ पैरा दो हिस्सों में है। पहला यह कि देश ऐसा क़ानून बनाएँ जिससे ज़ब्ती, अभिरक्षा, भंडारण और वापसी का ख़र्च उस आयातक या वाहक से वसूला जा सके जिसने संधि तोड़ी। दूसरा यह कि जहाँ ऐसा क़ानून न हो और मूल देश जानवर वापस चाहता हो, वहाँ वही देश वापसी का ख़र्च उठाएगा या उसके लिए आर्थिक मदद जुटाएगा।
अनुलग्नक एक में निपटान के तीन रास्ते गिनाए गए हैं: जानवर को क़ैद में रखना, उसे किसी रूप में जंगल लौटाना, और इच्छामृत्यु। दस्तावेज़ जोड़ता है कि आख़िरी विकल्प कई बार सबसे उपयुक्त और सबसे मानवीय साबित होता है। उसी अनुलग्नक में वह वाक्य है जो भारत में दोहराई जा रही पंक्ति को सीधे काटता है: यद्यपि सीआईटीईएस चाहता है कि ज़ब्त जानवरों की मूल देश वापसी को निपटान के एक विकल्प के तौर पर विचारा जाए, संधि किसी भी तरह यह अपेक्षा नहीं करती कि जानवरों को उस देश के जंगल में छोड़ा जाए। अगला वाक्य और सख़्त है: निपटान के सवाल से बचने के लिए की गई वापसी ग़ैर-ज़िम्मेदार है।
जंगल में छोड़ने से पहले अनुलग्नक चार चिंताएँ गिनाता है। कल्याण, क्योंकि बिना तैयारी की रिहाई धीमी मौत की सज़ा बन सकती है। संरक्षण-मूल्य और लागत, क्योंकि थोड़े से जानवरों से नई आबादी नहीं बनती और ज़िम्मेदार पुनर्वास का ख़र्च अक्सर इस रास्ते को बंद कर देता है। जानवरों का स्रोत, क्योंकि मूल देश और पकड़े जाने की जगह पता न हो तो अलग-अलग आनुवंशिक वंशों के मिल जाने का ख़तरा है। और बीमारी, क्योंकि क़ैद में रहे जानवर रोगाणु साथ ले जा सकते हैं। दस्तावेज़ का निर्णय-वृक्ष इसी को एक सवाल में बदल देता है: क्या मूल देश और पकड़े जाने की जगह तय की जा सकती है। भुवनेश्वर में उस सवाल का जवाब अभी ख़ून के नमूने का इंतज़ार कर रहा है।
धारा 49Q: फ़ैसला केंद्र की प्रबंधन प्राधिकरण के पास है
भारतीय क़ानून इस मामले में संधि से आगे जाता है। वन्य जीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022 की धारा 30 ने मूल अधिनियम में अध्याय 5B जोड़ा, जो 1 अप्रैल 2023 से लागू है। उसी अध्याय की धारा 49Q इस मामले का रास्ता तय करती है।
पहली उपधारा कहती है कि जिस भी अनुसूचित नमूने के बारे में इस अधिनियम या उसके नियमों के ख़िलाफ़ अपराध हुआ है, वह केंद्र सरकार की संपत्ति हो जाएगा, और सीमा-शुल्क अधिनियम पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना धारा 39 उस पर यथावश्यक परिवर्तन सहित लागू होगी। तुलना के लिए, धारा 39 की पहली उपधारा में साधारण वन्यजीव राज्य सरकार की संपत्ति होता है। अनुसूचित नमूने के लिए क़ानून ने यह शब्द बदलकर केंद्र कर दिया है।
दूसरी उपधारा प्रक्रिया लिखती है। जहाँ अनुसूची चार की किसी प्रजाति का जीवित नमूना इस अधिनियम के उल्लंघन में भारत में आयात के परिणामस्वरूप इस अधिनियम, सीमा-शुल्क अधिनियम या किसी अन्य प्रवृत्त क़ानून के तहत ज़ब्त किया गया हो, वहाँ प्रबंधन प्राधिकरण निर्यातक देश से सलाह-मशविरे के बाद उस नमूने को उसी देश के ख़र्च पर उस देश को लौटाएगी, "या यह सुनिश्चित करेगी कि उसे किसी मान्यताप्राप्त चिड़ियाघर या बचाव केंद्र में रखा और पाला जाए, यदि उसे निर्यातक देश को लौटाया न जा सके।" तीसरी उपधारा प्राधिकरण को वैज्ञानिक प्राधिकरण से परामर्श की छूट देती है।

आख़िरी शर्त वह जगह है जहाँ भारतीय पाठ संधि से अलग हो जाता है। अनुच्छेद आठ दोनों विकल्प बराबर खुले रखता है। धारा 49Q(2) चिड़ियाघर को दूसरा रास्ता बनाती है, जो तभी खुलता है जब वापसी हो ही न सके। इसी संशोधन ने धारा 39 में नई उपधारा भी जोड़ी, जिसके अनुसार सरकारी संपत्ति बना जीवित जानवर, जब उसे उसके प्राकृतिक आवास में नहीं छोड़ा जा सकता, तब मान्यताप्राप्त चिड़ियाघर या बचाव केंद्र में रखवाया जाएगा।
अब हर दफ़्तर की हद। केंद्र सरकार धारा 49E के तहत प्रबंधन प्राधिकरण और 49F के तहत वैज्ञानिक प्राधिकरण नामित करती है, और धारा 49G के मुताबिक़ दोनों उसके सामान्य या विशेष निर्देशों के अधीन काम करते हैं। 2022 में जोड़ी गई धारा 62B केंद्र को किसी राज्य सरकार से सूचना माँगने और उसे निर्देश देने का अधिकार देती है।
केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण अधिनियम के अध्याय 4A का प्राणी है। धारा 38-I की पहली उपधारा कहती है कि कोई चिड़ियाघर अनुसूची एक में सूचीबद्ध जंगली या पालतू जानवर प्राधिकरण की पूर्व अनुमति के बिना न ख़रीदेगा, न बेचेगा, न हस्तांतरित करेगा; 2022 में इस सूची से अनुसूची दो का उल्लेख हटा दिया गया। दूसरी उपधारा अलग बात कहती है: कोई चिड़ियाघर किसी जंगली या पालतू जानवर को मान्यताप्राप्त चिड़ियाघर के अलावा कहीं से न लेगा और कहीं और को न देगा। ज़ब्त जानवर मान्यताप्राप्त चिड़ियाघर तक धारा 39 और 49Q के रास्ते पहुँचता है, इस धारा के रास्ते नहीं।
मुक़दमे के दरवाज़े पर भी नाम लिखे हुए हैं। धारा 55 के अनुसार कोई अदालत इस अधिनियम के किसी अपराध का संज्ञान गिनाए गए अफ़सरों की शिकायत के बिना नहीं ले सकती। 2022 में इसमें खंड (ad) जुड़ा, जिससे प्रबंधन प्राधिकरण और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो का अधिकृत अधिकारी भी शिकायतकर्ता बन सकते हैं। उसी धारा में केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण के सदस्य-सचिव का नाम है, पर सिर्फ़ अध्याय 4A के उल्लंघन के लिए। राज्य की तरफ़ से मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक शिकायत कर सकते हैं।
मुक़दमा चलने तक जानवर मुक़दमे का माल हैं
धारा 50 की पहली उपधारा के खंड (c) के तहत अधिकारी ऐसा अनुसूचित नमूना ज़ब्त कर सकते हैं जिसके बारे में इस अधिनियम का अपराध हुआ प्रतीत होता हो। ज़ब्ती के बाद क्या होगा, यह उसी धारा में लिखा है, और यहीं वापसी की घड़ी दूसरी घड़ी से टकराती है।
उपधारा (3A) कहती है कि वन्यजीव संरक्षण के सहायक निदेशक या सहायक वन संरक्षक से नीचे का न हो, ऐसा अधिकारी, जिसने या जिसके अधीनस्थ ने कोई जंगली या पालतू जानवर ज़ब्त किया है, उसे किसी व्यक्ति की अभिरक्षा में दे सकता है, पर सिर्फ़ इस बंधपत्र पर कि ज़रूरत पड़ने पर वह जानवर उस मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा जिसे उस अपराध की सुनवाई का अधिकार है। उपधारा (4) आगे कहती है कि इस शक्ति के तहत ज़ब्त की गई चीज़ें तुरंत मजिस्ट्रेट के सामने ले जाई जाएँगी, मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को सूचना देते हुए।

सज़ा का पैमाना भी 2022 में बदला। धारा 51 की पहली उपधारा के पहले परंतुक में अनुसूची चार के परिशिष्ट एक की प्रजाति से जुड़ा अपराध जोड़ा गया, और ऐसा अपराध तीन साल से कम नहीं, सात साल तक की क़ैद और कम से कम पच्चीस हज़ार रुपये जुर्माने से दंडनीय है। दूसरी बार वही अपराध हो तो जुर्माना कम से कम एक लाख रुपये है। दोषसिद्धि होने पर अदालत उसी धारा की दूसरी उपधारा के तहत जानवर को राज्य सरकार के पक्ष में ज़ब्त करने का आदेश दे सकती है।
इंडियन एक्सप्रेस ने 11 सितंबर को लिखा कि ओडिशा के पुलिस महानिदेशक विनयतोष मिश्रा ने उसी दिन एसटीएफ़ से विधिवत एफ़आईआर दर्ज करने को कहा, यानी शावक मिलने के तीन दिन बाद। उसी रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से लिखा है कि एसटीएफ़ ने कम से कम तीन लोगों को हिरासत में लिया है; किसी गिरफ़्तारी की पुष्टि नहीं है और किसी पर आरोप तय नहीं हुए हैं।
धारा 49Q(2) की शुरुआत "अवैध आयात के परिणामस्वरूप ज़ब्ती" से होती है। जब तक वह सिद्ध न हो, वापसी का प्रावधान चालू ही नहीं होता, और जब वह सिद्ध होने की राह पर हो, तब जानवर उस मुक़दमे का माल हैं जिसे मजिस्ट्रेट देखता है।
भारत ने पहले क्या किया है
दो मिसालें हैं, और दोनों एक-दूसरे से उलटी हैं।
मोंगाबे ने जनवरी 2025 की अपनी रिपोर्ट में लिखा कि चेन्नई में पकड़े गए सियामांग गिबन मलेशिया वापस भेजे गए। उसी रिपोर्ट में आईयूसीएन के छोटे कपियों के विशेषज्ञ समूह की उपाध्यक्ष सूज़न चेन का कहना है कि ये जानवर अपने देश की प्राकृतिक धरोहर हैं और अगर वे स्थानीय प्रजाति नहीं हैं तो उन्हें मूल देश लौटाकर जंगल में लौटने का मौक़ा मिलना चाहिए, किसी चिड़ियाघर में नहीं। ट्रैफ़िक की दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय निदेशक कनिथा कृष्णसामी ने उसी रिपोर्ट में वापसी को अनिवार्य बताया और यह भी कि सीआईटीईएस इसे विकल्पों में से एक के रूप में सुझाता है। रिपोर्ट यह भी दर्ज करती है कि 1970 की यूनेस्को संधि के तहत जिस तरह ज़ब्त सांस्कृतिक वस्तुओं की वापसी अनिवार्य है, तस्करी किए गए वन्यजीवों के लिए अंतरराष्ट्रीय क़ानून में वैसा कोई प्रावधान नहीं है।
दूसरी मिसाल असम की है। 2022 में असम-मिज़ोरम सीमा पर लैलापुर चेकपोस्ट पर एक गत्ते के डिब्बे में दो ओरांगउटान शावक मिले थे। उनके नाम पनोई और जोंकी रखे गए और वे असम राज्य चिड़ियाघर भेज दिए गए। द प्रिंट के अनुसार यह पुष्टि हो चुकी थी कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय रास्तों से भारत लाया गया था, पर उन्हें मूल देश नहीं लौटाया जा सका, क्योंकि गिरोह तक पहुँचने वाली जाँच अटक गई।
वे अब भी वहीं हैं। केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की 2025-26 की सूची में असम राज्य चिड़ियाघर की प्रविष्टि संख्या 111 सुमात्रा के ओरांगउटान की है: साल की शुरुआत में एक नर और एक मादा, साल के अंत में भी एक नर और एक मादा, और बीच के बारह महीनों में न कोई जन्म, न अधिग्रहण, न स्थानांतरण, न मौत। पूरी पंक्ति में शून्य के अलावा कुछ नहीं है।
जो अभी तय नहीं है
प्रजाति तय नहीं है, और उसके साथ निर्यातक देश भी तय नहीं है। ख़ून के नमूने चिड़ियाघर पहुँचने के दस दिन बाद लिए जाने हैं, और डीएनए का जवाब उसके बाद आएगा।
अवैध आयात सिद्ध होगा या नहीं, यह भी खुला है, और उसके बिना धारा 49Q(2) चालू नहीं होती। एफ़आईआर का निर्देश शुक्रवार को मिला है और अधिनियम के तहत अदालत का संज्ञान धारा 55 में गिनाए अफ़सरों की शिकायत पर ही होगा।
ख़र्च पर इंडोनेशिया ने कहा है कि वह हर ज़रूरी क़दम पर समन्वय को तैयार है। संधि और प्रस्ताव 17.8, दोनों वह बिल माँगने वाले देश पर डालते हैं, जब तक ज़ब्त करने वाले देश के पास तस्कर से वसूली का अपना क़ानून न हो।
और जंगल में छोड़ने का सवाल, जिसे प्रिबादी ने वापसी के बाद की संभावना बताया है, प्रस्ताव के अनुलग्नक में उन थोड़े से मामलों के लिए रखा गया है जहाँ मूल देश और पकड़े जाने की जगह दोनों मालूम हों।
गुवाहाटी के दो अब भी अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं।
स्रोतसंयुक्त राष्ट्र संधि शृंखला, खंड 993, संधि सं. 14537: लुप्तप्राय वन्य जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर अभिसमय, वॉशिंगटन, 3 मार्च 1973 — अनुच्छेद 8 और 9 का पूरा पाठ, सीआईटीईएस, पक्षकारों का सम्मेलन: प्रस्ताव Conf. 17.8 (Rev. CoP19), ज़ब्त नमूनों के निपटान पर, तथा अनुलग्नक 1 के दिशानिर्देश, सीआईटीईएस सचिवालय: परिशिष्ट 1, 2 और 3, 7 फ़रवरी 2025 से प्रभावी — होमिनिडी कुल में Pongo abelii, Pongo pygmaeus और Pongo tapanuliensis परिशिष्ट 1 में, इंडिया कोड: वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 का अद्यतन पाठ — धारा 38-I, 39, 49Q, 50, 51 और 55, भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग 2 खंड 1, सं. 27, 20 दिसंबर 2022: वन्य जीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022 (2022 का 18) — धारा 30 से जोड़ा गया अध्याय 5B और उसकी धाराएँ 49D से 49R, पत्र सूचना कार्यालय, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, 6 मार्च 2024: संशोधन अधिनियम 1 अप्रैल 2023 से लागू, केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण: भारतीय चिड़ियाघरों में जानवरों की वार्षिक सूची 2025-26 — नंदनकानन, असम राज्य चिड़ियाघर और श्री चामराजेंद्र प्राणि उद्यान की प्रविष्टियाँ, इंडियन एक्सप्रेस, 11 सितंबर 2026: इंडोनेशिया के वन मंत्रालय की चिट्ठी, प्रेम कुमार झा का बयान, एसटीएफ़ की हिरासत और एफ़आईआर का निर्देश, इंडियन एक्सप्रेस, 11 सितंबर 2026: गणेश राम सिंहखुंटिया का बयान और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण को भेजी गई चिट्ठी, अंतारा (इंडोनेशिया की सरकारी समाचार एजेंसी), 11 सितंबर 2026: रिस्तियांतो प्रिबादी का बयान और वापसी के बाद की प्रक्रिया, एएफ़पी, 11 सितंबर 2026: जकार्ता स्थित भारतीय दूतावास के ज़रिए संपर्क और पानुत हादिसिसवोयो का बयान, संबाद इंग्लिश, 11 सितंबर 2026: अहमद मुनावीर के हवाले से 10 सितंबर की चिट्ठी का ब्योरा, डाउन टू अर्थ, 9 सितंबर 2026: प्रजाति की पहचान और प्रतीक प्रकाश इंदलकर का बयान, मोंगाबे, जनवरी 2025: चेन्नई के सियामांग गिबन की मलेशिया वापसी, सूज़न चेन, कनिथा कृष्णसामी और दिलीप चेत्री के बयान, द प्रिंट: लैलापुर में 2022 में मिले दो शावक, उनके नाम, और जाँच अटकने की वजह