भारत पन्ना
इत्मीनान

7 सितंबर 1931: गांधी अकेले लंदन गए, और जिस सरकार से बात करनी थी वह ख़ुद बिखर रही थी

दूसरा गोलमेज़ सम्मेलन आज ठीक 95 साल पहले शुरू हुआ। कराची अधिवेशन के प्रस्ताव के बाद गांधी कांग्रेस के इकलौते प्रतिनिधि के रूप में गए थे। सम्मेलन के दो हफ़्ते बाद ब्रिटेन ने स्वर्ण मानक छोड़ दिया।

गोलमेज़ सम्मेलन की मेज़, लंदन, 1931
तस्वीर: अज्ञात, विकिमीडिया कॉमन्स सार्वजनिक डोमेन

7 सितंबर 1931 को लंदन में एक सम्मेलन शुरू हुआ जिससे भारत के संविधान की रूपरेखा निकलनी थी।

वह 1 दिसंबर को ख़त्म हुआ और उससे कुछ नहीं निकला।

इसे आमतौर पर इस तरह पढ़ाया जाता है कि सम्मेलन सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के सवाल पर अटक गया। यह सही है। पर यह अधूरा है, और अधूरा होने की वजह यह है कि हम मेज़ के सिर्फ़ एक तरफ़ देखते हैं।

मेज़ के दूसरी तरफ़ जो सरकार बैठी थी, वह उस समय ख़ुद बिखर रही थी।

पहले यह कि गांधी वहाँ पहुँचे कैसे

इसकी शुरुआत उससे सात महीने पहले हुई।

मार्च 1931 में गांधी-इरविन समझौता हुआ। सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित हुआ, राजनीतिक क़ैदी छूटे, और बदले में कांग्रेस गोलमेज़ सम्मेलन में शामिल होने पर राज़ी हुई।

पहला गोलमेज़ सम्मेलन कांग्रेस के बिना हो चुका था, इसलिए उसकी हैसियत सीमित थी।

मार्च 1931 के कराची अधिवेशन में कांग्रेस ने तय किया कि वह एक ही प्रतिनिधि भेजेगी, और वह गांधी होंगे।

यह फ़ैसला अपने आप में एक दावा था। कांग्रेस कह रही थी कि वह किसी एक समुदाय या वर्ग का संगठन नहीं, पूरे भारत का प्रतिनिधि है, और इसलिए एक आदमी पूरे देश की तरफ़ से बोल सकता है।

यही दावा लंदन में सबसे ज़्यादा चुनौती में पड़ा।

लंदन में वे कहाँ रहे

गांधी ने ठहरने के लिए वेस्ट एंड का कोई होटल नहीं चुना।

वे किंग्सले हॉल में रहे, जो लंदन के ईस्ट एंड में है, यानी मज़दूरों की बस्ती में। यह एक सामुदायिक केंद्र था।

वे रोज़ वहाँ से सेंट जेम्स पैलेस तक जाते, जहाँ सम्मेलन होता था। सुबह की सैर ईस्ट एंड की गलियों में होती थी, और स्थानीय बच्चे उनके पीछे चलते थे।

यह चुनाव प्रतीकात्मक था और उन्होंने इसे प्रतीक की तरह ही इस्तेमाल किया। जिस साम्राज्य की राजधानी में वे बातचीत करने आए थे, उसी शहर की ग़रीबी में रहकर।

उनके साथ या उसी दौर में लंदन में सरोजिनी नायडू, मदन मोहन मालवीय, घनश्याम दास बिड़ला, मुहम्मद इक़बाल, मैसूर के दीवान सर मिर्ज़ा इस्माइल, एस.के. दत्त और सर सैयद अली इमाम भी थे।

पर कांग्रेस का प्रतिनिधि सिर्फ़ एक था।

अब मेज़ के दूसरी तरफ़ देखिए

सम्मेलन की अध्यक्षता प्रधानमंत्री रैमज़े मैकडॉनल्ड ने की।

उनकी सरकार उस समय दो हफ़्ते पुरानी थी।

24 अगस्त 1931 को मैकडॉनल्ड ने एक राष्ट्रीय सरकार बनाई थी, जिसमें कंज़र्वेटिव, कुछ लिबरल और बहुत थोड़े लेबर सांसद थे। यह सरकार आर्थिक संकट से निपटने के लिए बनी थी।

इसकी क़ीमत यह पड़ी कि लेबर पार्टी ने उन्हें और उनके साथ गए सांसदों को पार्टी से निकाल दिया।

यानी जो प्रधानमंत्री भारत के भविष्य पर सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहा था, वह अपनी ही पार्टी से निकाला जा चुका था और अपने ही आंदोलन में ग़द्दार कहा जा रहा था।

संकट किस पैमाने का था, यह एक आँकड़े से दिखता है। जुलाई 1931 की एक रिपोर्ट में सरकार का घाटा 12 करोड़ पाउंड बताया गया था, और बैंक ऑफ़ इंग्लैंड पाउंड को स्वर्ण मानक पर टिकाए रखने में अपना भंडार ख़र्च कर रहा था।

गांधी एसएस राजपूताना पर, दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन के लिए लंदन जाते हुए, 1931
तस्वीर: James A. Mills, विकिमीडिया कॉमन्स सार्वजनिक डोमेन

21 सितंबर 1931

सम्मेलन शुरू हुए दो हफ़्ते हुए थे।

उस दिन ब्रिटिश सरकार को स्वर्ण मानक छोड़ना पड़ा। पाउंड की विनिमय दर एक चौथाई गिर गई।

स्वर्ण मानक का मतलब यह था कि मुद्रा की क़ीमत सोने से बँधी है। उसे छोड़ना उस दौर के अर्थशास्त्र में लगभग वैसा ही था जैसे किसी देश का अपनी नींव हिलते देखना।

ब्रिटेन ने उन्नीसवीं सदी से यही व्यवस्था चलाई थी और उसी पर वित्तीय दुनिया का भरोसा टिका था।

अब उस हफ़्ते की कल्पना कीजिए।

एक तरफ़ लंदन के अख़बारों में पाउंड, बैंक और बेरोज़गारी। दूसरी तरफ़ सेंट जेम्स पैलेस के एक कमरे में भारत के संविधान पर बहस।

दोनों में से कौन-सी ख़बर पहले पन्ने पर थी, यह पूछने की ज़रूरत नहीं।

इसका असर सीधा था। जिस सरकार को अपने अस्तित्व की चिंता हो, वह किसी बड़े संवैधानिक जोखिम पर दस्तख़त नहीं करती। और भारत को औपनिवेशिक दर्जे से आगे ले जाने वाला कोई भी क़दम उस समय ब्रिटिश राजनीति में बड़ा जोखिम था।

अल्पसंख्यक समिति

अब वह हिस्सा जिस पर सम्मेलन औपचारिक रूप से टूटा।

सबसे अहम काम अल्पसंख्यक समिति में होना था, जिसे यह तय करना था कि नए संविधान में अलग-अलग समुदायों का प्रतिनिधित्व किस तरह होगा।

गांधी की स्थिति साफ़ थी। कांग्रेस पूरे देश की तरफ़ से बोलती है, जिसमें मुसलमान, दलित और बाक़ी सब शामिल हैं। और अलग निर्वाचक मंडल, यानी वह व्यवस्था जिसमें एक समुदाय के मतदाता सिर्फ़ अपने समुदाय के उम्मीदवार को चुनें, देश को बाँट देगी।

उनके सामने कई लोग थे और सब एक-दूसरे से भी सहमत नहीं थे।

मुस्लिम लीग की तरफ़ से मुहम्मद अली जिन्ना। दलित वर्गों की तरफ़ से डॉ. भीमराव आंबेडकर। सिख, आंग्ल-भारतीय, भारतीय ईसाई और यूरोपीय, सबके अपने प्रतिनिधि।

आंबेडकर की दलील यह थी कि दलित वर्ग, जिनकी संख्या उन्होंने क़रीब चार करोड़ तीस लाख बताई, हिंदू बहुसंख्या के भीतर एक अलग अल्पसंख्यक हैं और उन्हें अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व चाहिए।

गांधी का जवाब यह था कि दलित हिंदू समाज का हिस्सा हैं और उन्हें अलग करना उस समाज को तोड़ना है। उनका कहना था कि छुआछूत को हिंदू समाज के भीतर से ख़त्म करना है, संविधान से अलग खाना बनाकर नहीं।

यह बहस उस कमरे में तय नहीं हुई। यह भारत में तय हुई, और उसका तरीक़ा किसी को पसंद नहीं आया।

सेंट जेम्स पैलेस, जहाँ सम्मेलन की बैठकें हुईं
तस्वीर: siegertmarc, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.0

लंकाशायर की यात्रा

सम्मेलन के बीच में गांधी एक ऐसी जगह गए जहाँ जाने की कोई ज़रूरत नहीं थी।

25 से 27 सितंबर 1931 के सप्ताहांत में वे लंकाशायर गए, मिल मालिकों के एक परिवार के न्योते पर।

यह जगह चुनना असामान्य था, क्योंकि लंकाशायर की कपड़ा मिलें भारत को कपड़ा बेचती थीं, और गांधी का स्वदेशी आंदोलन सीधे उन्हीं मिलों की बिक्री पर चोट कर रहा था।

डार्वेन नाम के जिस क़स्बे में वे गए, वहाँ अकेले दस हज़ार से ज़्यादा लोग बेरोज़गार थे।

यानी वे उन मज़दूरों के बीच गए जिनकी बेरोज़गारी में उनके अपने आंदोलन का हिस्सा था।

जो हुआ, वह अटपटा था। भीड़ ने उनका स्वागत किया। उनके कपड़ों पर टिप्पणियाँ हुईं और उत्सुकता भी।

गांधी ने वहाँ जो तर्क रखा, वह यह था कि भारत के गाँवों में जो ग़रीबी है, वह लंकाशायर की बेरोज़गारी से कहीं गहरी है, और भारत का जुलाहा भी उन्हीं की तरह काम माँग रहा है।

यह बहस उन्होंने जीती या नहीं, यह कहना मुश्किल है। पर उन्होंने वह किया जो राजनीति में कम होता है: विरोधी पक्ष के सबसे नाराज़ लोगों के बीच जाकर अपनी बात रखी।

नतीजा क्या निकला

1 दिसंबर 1931 को सम्मेलन ख़त्म हुआ।

संवैधानिक ढाँचे पर सहमति नहीं बनी। सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व पर तो बिल्कुल नहीं।

गांधी ख़ाली हाथ लौटे, और उन्होंने ख़ुद यह बात छिपाई नहीं।

भारत लौटते ही स्थिति बदल चुकी थी। सरकार ने वायसराय के अध्यादेशों के ज़रिए सख़्ती शुरू कर दी थी, और कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा दोबारा शुरू करने का फ़ैसला किया।

4 जनवरी 1932 की रात गांधी को बंबई में गिरफ़्तार कर लिया गया और यरवदा जेल भेज दिया गया।

लंदन से लौटे उन्हें एक महीना भी नहीं हुआ था।

और फिर वह हुआ जो कमरे में तय नहीं हुआ था

अगस्त 1932 में ब्रिटिश सरकार ने सांप्रदायिक निर्णय की घोषणा की, जिसमें दलित वर्गों को अलग निर्वाचक मंडल दिया गया।

यानी जिस सवाल पर लंदन में सहमति नहीं बनी थी, उसे ब्रिटिश सरकार ने अपनी तरफ़ से तय कर दिया।

गांधी उस समय यरवदा जेल में थे। उन्होंने 20 सितंबर 1932 से आमरण अनशन शुरू कर दिया।

इसके बाद जो बातचीत हुई, वह जेल में हुई, और उसका नतीजा पूना पैक्ट था। अलग निर्वाचक मंडल की जगह संयुक्त निर्वाचक मंडल में दलित वर्गों के लिए आरक्षित सीटें तय हुईं, और उनकी संख्या सांप्रदायिक निर्णय में दी गई संख्या से ज़्यादा थी।

यही व्यवस्था आगे चलकर भारतीय संविधान में आरक्षित सीटों के रूप में उतरी।

इसलिए 1931 का वह सम्मेलन नतीजे के हिसाब से असफल था, पर वह जिस सवाल पर अटका, वह सवाल आज भी भारतीय राजनीति के ढाँचे में मौजूद है।

तीन सम्मेलन हुए थे, दो में कांग्रेस थी ही नहीं

इस सिलसिले को पूरा देखने पर तस्वीर बदल जाती है।

पहला गोलमेज़ सम्मेलन नवंबर 1930 से जनवरी 1931 तक चला। कांग्रेस उसमें नहीं थी, क्योंकि उस समय सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था और उसके नेता जेल में थे।

उस पहले सम्मेलन में जो सबसे बड़ी बात हुई, वह यह थी कि अखिल भारतीय संघ का विचार स्वीकार हुआ, यानी ब्रिटिश भारत के प्रांत और रियासतें मिलकर एक संघीय ढाँचा बनाएँ। रियासतों के कई शासक इसके लिए तैयार दिखे, और यही उस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी गई।

दूसरा सम्मेलन वह है जिसकी बात यह लेख कर रहा है, और उसमें कांग्रेस थी।

तीसरा नवंबर से दिसंबर 1932 तक चला। उसमें कांग्रेस फिर नहीं थी, क्योंकि गांधी जेल में थे और आंदोलन दोबारा शुरू हो चुका था। वह सम्मेलन छोटा था और उसे शायद ही कोई याद करता है।

यानी तीन में से दो सम्मेलनों में देश का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन मौजूद नहीं था।

यह अपने आप में उस पूरी प्रक्रिया के बारे में एक बात कहता है।

जो निकला, वह चार साल बाद निकला

अब सबसे उलटी बात।

इन तीनों सम्मेलनों की रिपोर्टें बेकार नहीं गईं। उन्हीं के आधार पर भारत शासन अधिनियम 1935 बना।

और वह अधिनियम भारत के अपने संविधान का ढाँचा बना। हमारे संविधान का बड़ा हिस्सा, ख़ास तौर पर संघ और राज्यों के बीच शक्तियों का बँटवारा, इसी अधिनियम से आया।

इसलिए यह कहना कि 1931 का सम्मेलन बेनतीजा रहा, नतीजे की परिभाषा पर निर्भर करता है। तात्कालिक रूप से वह विफल था। दूरगामी रूप से उसकी बहसें एक दस्तावेज़ में उतरीं जो आज भी हमारे साथ है।

पर उस अधिनियम का आधा हिस्सा कभी लागू ही नहीं हुआ

यहाँ इस कहानी का सबसे कम बताया जाने वाला हिस्सा आता है।

1935 का अधिनियम दो बड़े हिस्सों में था।

एक हिस्सा प्रांतीय स्वायत्तता का था, यानी प्रांतों में चुनी हुई सरकारें। यह 1 अप्रैल 1937 को लागू हुआ। उसी साल चुनाव हुए और कांग्रेस ग्यारह में से सात प्रांतों में सरकार बनाने की स्थिति में आई। ये सरकारें 1939 तक चलीं।

दूसरा हिस्सा वह संघीय ढाँचा था जिस पर पहले सम्मेलन में सहमति बनी थी। उसे लागू होने के लिए एक शर्त थी: एक तय संख्या में रियासतों को उसमें शामिल होना पड़ता।

वह संख्या कभी पूरी नहीं हुई।

रियासतों के शासक हिचकते रहे। उन्हें डर था कि संघ में शामिल होने पर उनकी संप्रभुता घटेगी, और यह भी कि चुने हुए ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधि उनसे संख्या में कहीं ज़्यादा होंगे। इसलिए वे मोलभाव करते रहे।

फिर सितंबर 1939 में दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया, और वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने संघीय योजना को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया। बाद में उसे औपचारिक रूप से छोड़ दिया गया।

यानी गोलमेज़ सम्मेलनों की सबसे बड़ी उपलब्धि, वह संघीय ढाँचा जिस पर पहली बार सहमति बनी थी, कभी अस्तित्व में नहीं आया।

जो आया, वह प्रांतीय स्वायत्तता थी, और उसी ने 1937 के चुनाव और उनके बाद की राजनीति को जन्म दिया।

अभिलेखागार में रखे दस्तावेज़। तीनों गोलमेज़ सम्मेलनों की रिपोर्टों से भारत शासन अधिनियम 1935 बना
तस्वीर: mooncow, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

इससे क्या सीखा जाए

एक बात जो इस कहानी से निकलती है, वह कूटनीति के बारे में है।

गांधी 1931 में उस चीज़ के लिए गए थे जो उस समय मिलनी नहीं थी, और मिलनी इसलिए नहीं थी कि सामने वाला पक्ष उस समय कुछ भी बड़ा तय करने की हालत में नहीं था।

इतिहास की किताबें असफलता को अक्सर बातचीत करने वालों के मत्थे मढ़ देती हैं। कभी-कभी वजह मेज़ पर नहीं, कैलेंडर पर होती है।

7 सितंबर 1931 उस लिहाज़ से एक ग़लत तारीख़ थी। दो हफ़्ते बाद पाउंड गिरा, और उसी के साथ उस सम्मेलन से कुछ निकलने की गुंजाइश भी।

दूसरी बात प्रतिनिधित्व के बारे में है, और वह आज भी उतनी ही जीवित है।

कराची में कांग्रेस ने तय किया था कि एक आदमी पूरे देश की तरफ़ से बोलेगा। लंदन में यही दावा सबसे पहले टूटा, और तोड़ने वाले भारतीय ही थे।

यह सवाल कि कौन किसकी तरफ़ से बोलने का हक़ रखता है, उस कमरे में नहीं सुलझा। वह पूना पैक्ट में भी पूरी तरह नहीं सुलझा, और आरक्षित सीटों के रूप में वह आज भी हमारे संविधान में मौजूद है।

इसलिए यह सम्मेलन असफल होकर भी ख़त्म नहीं हुआ। उसकी बहस चलती रही, बस कमरा बदल गया।

स्रोतगांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, भारत सरकार, ब्रिटिश संसद का अभिलेख, 1931 का गोलमेज़ सम्मेलन, 1931 की राष्ट्रीय सरकार, ब्रिटिश राष्ट्रीय अभिलेखागार, स्वर्ण मानक छोड़ने पर, गांधी की लंकाशायर यात्रा पर शोध परियोजना, गांधी की गिरफ़्तारियों का कालक्रम, भारत शासन अधिनियम 1935 का विवरण

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।