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सियासतनामा

565 रियासतों वाला आँकड़ा सरकार का नहीं है, और उनमें से 327 रियासतें थीं ही नहीं

यह संख्या माउंटबेटन ने 25 जुलाई 1947 के भाषण में 'लगभग' कहकर बोली थी। सरकार के अपने श्वेत पत्र में वह एक ही बार छपी है, उसी भाषण के हवाले में। विभाग का अपना आँकड़ा 552 है।

565 रियासतों वाला आँकड़ा सरकार का नहीं है, और उनमें से 327 रियासतें थीं ही नहीं

आज़ादी की हर कहानी एक ही वाक्य से शुरू होती है: देश में 565 रियासतें थीं।

भारत सरकार के अपने श्वेत पत्र में यह संख्या पूरे दस्तावेज़ में एक ही बार छपी है।

और वह सरकार के विश्लेषण में नहीं है। वह परिशिष्ट छह में है, जो 25 जुलाई 1947 को चैंबर ऑफ़ प्रिंसेस में हुई बैठक की प्रेस विज्ञप्ति है। बोलने वाले वायसराय माउंटबेटन थे, और उन्होंने कहा था कि "लगभग 565 रियासतों में से" ज़्यादातर भौगोलिक रूप से भारत से जुड़ी हुई हैं।

लगभग। भाषण में। अनुमान के तौर पर।

वी. पी. मेनन की किताब में भी यह संख्या एक ही बार आती है, और वहाँ भी वह माउंटबेटन के इसी वाक्य को उद्धरण चिह्नों में दोहरा रहे हैं। मेनन ख़ुद पूरी किताब में 554 गिनते हैं।

रियासत विभाग का अपना आँकड़ा, जो श्वेत पत्र के पैरा 147 में है, 552 है।

जो संख्या तय ही नहीं थी

श्वेत पत्र ख़ुद इस शब्द को "लचीला" कहता है।

पैरा 24 में लिखा है कि बटलर समिति और साइमन कमीशन ने यह लचीला शब्द 562 इकाइयों पर लगाया, जबकि संवैधानिक सुधारों की संयुक्त संसदीय समिति ने 600 इकाइयों को रियासत कहा। और फिर वह वजह बताता है: इस शब्द के एक सिरे पर हैदराबाद और कश्मीर जैसी इकाइयाँ थीं जो ब्रिटेन के आकार की थीं, और दूसरे सिरे पर काठियावाड़ की वे छोटी जोतें जो कुछ एकड़ में फैली थीं।

यह ढीलापन क़ानून में लिखा हुआ था। भारत सरकार अधिनियम 1935 की धारा 311(1) रियासत की परिभाषा इस तरह देती है: कोई भी ऐसा क्षेत्र, चाहे उसे रियासत कहा जाए, इस्टेट कहा जाए, जागीर कहा जाए या कुछ और।

जागीरें और इस्टेट परिभाषा के अंदर हैं। इसीलिए संख्या तैरती रहती है।

अब वह हिसाब जो लगभग कहीं नहीं छपता

बटलर समिति ने उन्हीं 562 इकाइयों को तीन श्रेणियों में बाँटा था, और श्वेत पत्र का पैरा 33 तीनों की गिनती देता है।

पहली श्रेणी: वे रियासतें जिनके शासक अपने अधिकार से चैंबर ऑफ़ प्रिंसेस के सदस्य थे। संख्या 108।

दूसरी: वे जिनका प्रतिनिधित्व चैंबर में उनके अपने चुने हुए बारह सदस्य करते थे। संख्या 127।

तीसरी: इस्टेट, जागीरें और अन्य। संख्या 327।

108 और 127 और 327 जोड़िए। 562 बनते हैं।

यानी उन 562 इकाइयों में से 327, लगभग अट्ठावन फ़ीसदी, रियासतें थीं ही नहीं। श्वेत पत्र उन्हें ख़ुद "इस्टेट, जागीरें और अन्य" कहता है।

327 / 562सरकार के अपने वर्गीकरण में इतनी इकाइयाँ रियासत नहीं, जागीर या इस्टेट थीं

उसी दस्तावेज़ से तीन और आँकड़े। 202 रियासतें ऐसी थीं जिनका क्षेत्रफल दस वर्ग मील से कम था। सिर्फ़ 15 का क्षेत्रफल दस हज़ार वर्ग मील से ऊपर था। और परमसत्ता के साथ संधि सिर्फ़ 40 रियासतों की थी।

मुख्य विलय-पत्र पर दस्तख़त भी सब नहीं कर सकते थे। श्वेत पत्र का पैरा 81 कहता है कि वह पत्र सिर्फ़ उन रियासतों से स्वीकार किया गया जो पूरा अधिकार क्षेत्र रखती थीं। बाक़ी के लिए अलग पत्र था, और जिनके पास कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था, उन्होंने कोई पत्र नहीं भरा।

शामिल होने की क़ीमत क्या थी

यहाँ से यह लेख असली सवाल पर आता है, जो गिनती का नहीं, तरीक़े का है।

विलय-पत्र की काम की धारा तीसरी है, और वह एक वाक्य की है: शासक अनुसूची में दिए गए विषयों को उन विषयों के रूप में स्वीकार करता है जिन पर डोमिनियन विधायिका उसकी रियासत के लिए क़ानून बना सकेगी।

अनुसूची में तीन विषय बताए जाते हैं, रक्षा, विदेशी मामले और संचार। छपी हुई अनुसूची में चार शीर्षक हैं। चौथा है सहायक विषय, जिसमें डोमिनियन विधायिका के चुनाव, ऊपर वाले विषयों से जुड़े अपराध, जाँच और आँकड़े आते हैं। कुल प्रविष्टियाँ बीस हैं।

और इन विषयों की परिभाषा नए सिरे से लिखी ही नहीं गई। पैरा 81 बताता है कि उनकी सामग्री 1935 के अधिनियम की सातवीं अनुसूची की पहली सूची से ली गई है। 1947 का दस्तावेज़ असल में 1935 का दस्तावेज़ है, जिसकी संघीय सूची छाँट दी गई थी।

अब वे धाराएँ जो बताती हैं कि दस्तख़त करना सस्ता क्यों था।

धारा आठ: इस पत्र की कोई बात मेरी इस रियासत पर संप्रभुता को प्रभावित नहीं करती।

धारा पाँच: इस पत्र की शर्तें अधिनियम या स्वतंत्रता अधिनियम के किसी संशोधन से नहीं बदलेंगी, जब तक मैं ख़ुद एक पूरक पत्र से उसे स्वीकार न करूँ।

धारा सात: इस पत्र की कोई बात मुझे भारत के किसी भावी संविधान को मानने के लिए बाध्य नहीं करती।

माउंटबेटन ने उसी 25 जुलाई के भाषण में यह बात इन शब्दों में बेची कि रियासतें सिर्फ़ तीन विषयों पर शामिल हो रही हैं, बिना किसी वित्तीय ज़िम्मेदारी के, और बाक़ी किसी मामले में केंद्र सरकार को उनकी आंतरिक स्वायत्तता या संप्रभुता में दख़ल का अधिकार नहीं है।

उसी भाषण में तारीख़ भी थी। 15 अगस्त से पहले आना होगा।

तीन हफ़्ते।

सरदार पटेल ने 5 जुलाई को, विभाग बनने के दिन, यही कहा था कि हम इन तीन विषयों पर शामिल होने से ज़्यादा कुछ नहीं माँग रहे, बाक़ी मामलों में उनके स्वायत्त अस्तित्व का पूरा सम्मान करेंगे।

तो अगस्त 1947 में दस्तख़त करने वाले शासक ने वे तीन विषय छोड़े जो वह वैसे भी नहीं चला सकता था, कुछ चुकाया नहीं, काग़ज़ पर संप्रभुता रखी, और किसी भी विस्तार पर वीटो भी अपने पास रखा।

असली सौदा दूसरे दस्तख़त में था

15 अगस्त तक तीन को छोड़कर बाक़ी सब शामिल हो चुके थे। वह हिस्सा छह हफ़्ते में निपट गया था, 5 जुलाई से 15 अगस्त के बीच।

असली काम 14 दिसंबर 1947 के बाद शुरू हुआ, जब दूसरे दस्तख़त कराए गए। विलय समझौतों और करारों में जो शब्द हैं वे ये हैं: पूर्ण और अनन्य अधिकार, क्षेत्राधिकार और शक्तियाँ।

पहला दस्तख़त तीन विषयों का था। दूसरा सब कुछ का।

और क्रम सोचकर तय किया गया था। पहले पूर्वी भारत की छोटी और ग़रीब रियासतें, जिनके पास मोल-भाव की ताक़त सबसे कम थी। श्वेत पत्र ख़ुद लिखता है कि इससे बाक़ियों को गति मिली। जो अड़ना चाहते थे, उनके सामने खुला सवाल नहीं बचा, बना हुआ ढाँचा खड़ा था।

और जिसे लुटाना कहा जाता है, वह कटौती थी

बदले में जो दिया गया, उसे हिंदी में लगभग हमेशा राजाओं पर लुटाई गई रक़म बताया जाता है।

पटेल ने संविधान सभा में इसका हिसाब ख़ुद दिया था। उनके शब्दों में, प्रिवी पर्स की व्यवस्था से राजाओं पर होने वाला ख़र्च घटकर पहले के कम से कम एक-चौथाई पर आ जाएगा।

पहले वे बीस करोड़ रुपये सालाना से ज़्यादा ले रहे थे। प्रिवी पर्स ने उसे लगभग साढ़े चार करोड़ पर बाँध दिया।

यह छूट नहीं थी, यह सीमा थी। और इसने रियासत के ख़ज़ाने पर बिना हिसाब की पकड़ को एक तय, छपी हुई, तिमाही रक़म में बदल दिया।

पटेल ने यह भी दर्ज किया कि यह किस चीज़ की क़ीमत थी। अगर शासक बाहर रह जाते तो वे पहले जितनी भारी सिविल लिस्ट लेते रहते और कई मामलों में रियासत की आमदनी का बेरोक इस्तेमाल करते रहते। शासन के अधिकार छोड़ने के बदले कम से कम इतना तो देना ही था।

एक चीज़ जान-बूझकर कभी सूचीबद्ध नहीं की गई: निजी विशेषाधिकार। पैरा 240 कहता है कि ये अधिकार कार पर लाल प्लेट लगाने से लेकर दीवानी और फ़ौजदारी अधिकार क्षेत्र से छूट और सीमा शुल्क से छूट तक फैले थे, और इनकी पूरी सूची बनाना पहले भी न वांछनीय समझा गया था, न व्यावहारिक।

उन्हें अदालत के बाहर रखने के लिए संविधान में अनुच्छेद 363 डाला गया।

जिस चीज़ को तोड़ना पटेल ने वादाख़िलाफ़ी कहा था

उसी भाषण में पटेल ने एक और वाक्य कहा था, और वह इस लेख का अंत है।

उन्होंने कहा कि इन समझौतों के तहत हमारी ज़िम्मेदारी का मुख्य हिस्सा यह सुनिश्चित करना है कि प्रिवी पर्स के बारे में दी गई गारंटियाँ पूरी तरह लागू हों, और ऐसा न कर पाना वादाख़िलाफ़ी होगी तथा नई व्यवस्था के जमने को गंभीर नुक़सान पहुँचाएगा।

यह सौदा करने वाले आदमी ने 1949 में रिकॉर्ड पर कहा था कि उसे तोड़ने का मतलब क्या होगा।

संसद ने उसे बाईस साल बाद तोड़ा। और तरीक़ा यह था कि पहले प्रिवी पर्स नहीं हटाया गया, पाने वाले हटाए गए। 5 सितंबर 1970 को राज्यसभा में एक वोट से हारने के बाद राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 366(22) के तहत रातोंरात हर शासक की मान्यता ख़त्म कर दी। सुप्रीम कोर्ट की ग्यारह जजों की पीठ ने 15 दिसंबर 1970 को इसे 9 के मुक़ाबले 2 से रद्द कर दिया।

फिर संसद ने वही काम विधिवत किया, और संविधान में अनुच्छेद 363क लिखा, जिस पर 28 दिसंबर 1971 को मंज़ूरी मिली।

जो रियायत हटाई जा सकती थी, वह हटा दी गई। उसे हटाने की कुंजी 1949 में ही संविधान के भीतर रख दी गई थी, उस एक शब्द में कि शासक वही है जिसे राष्ट्रपति मान्यता दे।

बाईस साल बाद किसी ने वह कुंजी ढूँढ़ ली।

स्रोतभारत सरकार, श्वेत पत्र, परिशिष्ट सात, श्वेत पत्र, पूरा पाठ, भारत सरकार अधिनियम, 1935

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