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कर्नाटक ने सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के दो अंतरे तय किए, जबकि 2026 के क़ानून में कहीं नहीं लिखा कि राष्ट्रगीत कितने अंतरों का है

8 सितंबर को मंत्रिमंडल के फ़ैसले के बाद कर्नाटक ने आदेश निकाला कि राज्य के कार्यक्रमों में पहले दो अंतरे गाए जाएँगे। केंद्र का 6 फ़रवरी 2026 का निर्देश छहों अंतरे माँगता है। अगस्त में बना नया क़ानून 'राष्ट्रगीत' शब्द का इस्तेमाल करता है, पर उसे परिभाषित कहीं नहीं करता।

बेंगलुरु, कर्नाटक में विधान सौध का अग्रभाग, जून 2019 की तस्वीर; इसी इमारत में राज्य का विधानमंडल और सचिवालय बैठते हैं, और दो अंतरों का आदेश राज्य सरकार का है
तस्वीर: Moheen Reeyad, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

सरकारी समारोह में वंदे मातरम् गाने वाले को एक व्यावहारिक सवाल का जवाब चाहिए होता है।

रुकना कहाँ है।

बेंगलुरु में अब वह जगह लिखित है। कर्नाटक के कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग का आदेश कहता है कि राज्य सरकार के कार्यक्रमों में गीत के पहले दो अंतरे गाए जाएँगे। दिल्ली में जवाब दूसरा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के 6 फ़रवरी 2026 के निर्देश में आधिकारिक रूप छहों अंतरों का है, और उसे बजने में तीन मिनट दस सेकंड लगते हैं।

दोनों आदेश एक ही शब्द पर टिके हैं। उस शब्द की परिभाषा किसी क़ानून में नहीं है।

8 सितंबर का फ़ैसला, 10 सितंबर का काग़ज़

मंत्रिमंडल ने 8 सितंबर 2026 को फ़ैसला लिया। आदेश 10 सितंबर को सामने आया, जिस पर अवर सचिव संदीप बी.के. के हस्ताक्षर हैं। द हंस इंडिया और सियासत ने आदेश की तारीख़ 10 सितंबर दी है, द साउथ फ़र्स्ट ने 8 सितंबर। पाठ द फ़ेडरल ने इस तरह उद्धृत किया: "राज्य सरकार के आयोजित कार्यक्रमों में वंदे मातरम् गीत के केवल पहले दो अंतरे गाए जाएँगे।" विभाग ने कारण बताया है, "एकरूपता, सम्मान और उचित शिष्टाचार।" डी.के. शिवकुमार ने 3 जून 2026 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, और इसी हफ़्ते उनकी सरकार ने सौ दिन पूरे किए हैं।

आदेश में जो अपवाद दर्ज है

छूट व्यक्ति से तय होती है, अवसर से नहीं। जिन कार्यक्रमों में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या राज्यपाल मौजूद हों, वहाँ पूरा गीत गाया जा सकता है। कई रिपोर्टों के मुताबिक़ केंद्र सरकार के प्रतिनिधित्व वाले कार्यक्रमों में भी छहों अंतरे गाए जाएँगे। नतीजा यह है कि एक ही सभागार में दो अलग-अलग लंबाई के गीत सुनाई दे सकते हैं, और फ़र्क़ मंच पर बैठे व्यक्ति के पद से तय होगा। आदेश ख़ुद केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश का हवाला देता है, उसे ख़ारिज नहीं करता।

जिस शब्द की क़ानून में कोई परिभाषा नहीं

6 अगस्त 2026 के राजपत्र में छपे अधिनियम ने 1971 के क़ानून की धारा 3 की जगह नई धारा रखी, जिसमें "राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत" लिखा है। पूरे अधिनियम में, और उससे पहले पेश विधेयक में भी, यह कहीं नहीं बताया गया कि राष्ट्रगीत किस रचना को कहते हैं, उसमें कितने अंतरे हैं, या आधिकारिक रूप कौन तय करेगा। लाइवलॉ पर छपी विधिक टिप्पणी में यही बात उठाई गई है कि संशोधन ने आपराधिक दायित्व का दायरा बढ़ाया पर "अपराध के इन आवश्यक तत्वों को परिभाषित नहीं किया।"

6 फ़रवरी 2026 का केंद्रीय निर्देश

गृह मंत्रालय ने आधिकारिक रूप अधिसूचित किया। उसमें छहों अंतरे हैं और बजने का समय लगभग तीन मिनट दस सेकंड। निर्देश यह भी कहता है कि जहाँ राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों प्रस्तुत हों, वहाँ राष्ट्रगीत पहले होगा, और श्रोता सावधान की मुद्रा में खड़े होंगे। स्कूलों के बारे में कहा गया है कि दिन की शुरुआत सामूहिक गायन से हो सकती है। एक अपवाद भी दर्ज है: गीत किसी न्यूज़रील या वृत्तचित्र का हिस्सा हो तो दर्शकों से खड़े होने की अपेक्षा नहीं, क्योंकि इससे प्रदर्शन बाधित होगा।

छह अंतरे, और पहले दो में क्या है

मूल रचना में छह अंतरे हैं, और पहले दो भूगोल का वर्णन हैं। सुजला, सुफला, मलयज से शीतल, शस्यश्यामला भूमि; चाँदनी से नहाई रात और फूलों से लदे पेड़। इन पंक्तियों का अंग्रेज़ी अनुवाद अरविंद घोष ने 20 नवंबर 1909 के कर्मयोगिन में छापा था। भाषा के स्तर पर ये हिस्से लगभग संस्कृत हैं, जबकि आगे की पंक्तियों में बांग्ला बढ़ जाती है। कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में इन्हीं दो अंतरों के बारे में लिखा कि इनमें "धार्मिक या किसी और दृष्टि से आपत्ति लायक़ कुछ भी नहीं है।"

आगे के अंतरों में क्या है, और आपत्ति किस पर रही है

तीसरे अंतरे से आगे वर्णन बदल जाता है। "त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी, कमला कमलदलविहारिणी, वाणी विद्यादायिनी" इन्हीं हिस्सों में है; अरविंद घोष के अनुवाद में "Thou art Durga, Lady and Queen... Thou art Lakshmi lotus-throned"। मातृभूमि यहाँ दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में पहचानी जाती है। दर्ज आपत्तियाँ दो तरह की हैं। पहली धार्मिक है, देवी की वंदना गाने पर एकेश्वरवादी आस्था की आपत्ति। दूसरी उस उपन्यास से जुड़ी है जिसमें गीत रखा गया है। कार्यसमिति के 1937 के बयान में पहली आपत्ति शब्दशः स्वीकार की गई, "समिति गीत के कुछ हिस्सों पर मुस्लिम मित्रों की ओर से उठाई गई आपत्ति को वैध मानती है", और इन अंतरों में "कुछ संकेत और एक धार्मिक विचारधारा" बताई गई "जो भारत के दूसरे धार्मिक समूहों की विचारधारा से मेल न खाती हो।" दूसरी आपत्ति पर बयान का जवाब यह है कि गीत उपन्यास से अलग, और उससे पहले लिखा गया था।

आनंदमठ में यह गीत कहाँ आता है

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, 1894 से पहले ली गई तस्वीर; आनंदमठ उन्हीं का उपन्यास है और यह गीत उसके पहले भाग के दसवें अध्याय में आता है
तस्वीर: अज्ञात छायाकार, विकिमीडिया कॉमन्स सार्वजनिक डोमेन

उपन्यास के पहले भाग के दसवें अध्याय में। रात के जंगल में महेंद्र को भवानंद यह गीत सुनाता है, राजकोष की गाड़ी को लेकर हुई ख़ूनी भिड़ंत के बाद। पत्र सूचना कार्यालय के 6 नवंबर 2025 के बैकग्राउंडर में इसे "आनंदमठ के संतानों का गाया गीत" कहा गया है और उपन्यास का केंद्रीय विषय "देशभक्ति का धर्म" बताया गया है। उसी दस्तावेज़ में मठ की तीन मूर्तियों का ज़िक्र है: माँ जो थी, माँ जो है, और माँ जो होगी।

पहली बार कब छपा, इस पर सरकार के दस्तावेज़ में दो तारीख़ें

वही बैकग्राउंडर शुरू में कहता है कि गीत "साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में 7 नवंबर 1875 को पहली बार प्रकाशित हुआ।" उसी पन्ने पर, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाले हिस्से में लिखा है कि गीत "बंगदर्शन के मार्च-अप्रैल 1881 अंक में एक स्वतंत्र रचना के रूप में प्रकाशित हुआ।" इतिहासकार सुमित सरकार ने 2006 में मेनस्ट्रीम में लिखा था कि गीत 1875 में लिखा गया और पहली बार 1882 में आनंदमठ के साथ छपा। 150 साल की गिनती 7 नवंबर 1875 से की जा रही है।

1896 का कलकत्ता, 1906 का बरिसाल

रवींद्रनाथ ठाकुर, 1909 की तस्वीर; धुन उन्होंने 1896 में बनाई थी और उसी साल बीडन स्क्वायर के अधिवेशन में यह गीत गाया
तस्वीर: Generalstabens litografiska anstalt, विकिमीडिया कॉमन्स सार्वजनिक डोमेन

धुन रवींद्रनाथ ठाकुर की है। 1937 के कार्यसमिति बयान में यह एक पंक्ति में दर्ज है: "इसे 1896 में रवींद्रनाथ ठाकुर ने संगीतबद्ध किया।" उसी साल कलकत्ता के बीडन स्क्वायर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने इसे गाया। नारे का ब्योरा भी उसी बयान में है। अप्रैल 1906 में बरिसाल में बंगाल प्रांतीय सम्मेलन हुआ, अध्यक्षता ए. रसूल ने की। बयान के शब्दों में, पुलिस ने प्रतिनिधियों और स्वयंसेवकों पर "क्रूर लाठीचार्ज" किया और उनके पहने बंदे मातरम् के बिल्ले नोचकर फाड़ दिए गए। कुछ प्रतिनिधियों को इतना पीटा गया कि वे यही शब्द पुकारते हुए बेहोश होकर गिर पड़े। बैकग्राउंडर के मुताबिक़ राजनीतिक नारे के रूप में इसका पहला इस्तेमाल 7 अगस्त 1905 को हुआ।

1923 का काकीनाडा अधिवेशन

उस साल काकीनाडा में हुए कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता मौलाना मोहम्मद अली ने की थी। प्रचलित विवरणों के मुताबिक़ शुरुआत में पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने वंदे मातरम् गाना चाहा और अध्यक्ष ने आपत्ति की। मिलेनियम पोस्ट में छपे विवरण में लिखा है कि "वंदे मातरम् का पहला तीखा विरोध मोहम्मद अली की ओर से आया", जिनका उस अधिवेशन में जेल से रिहा होने के बाद अभिनंदन हुआ था। पलुस्कर ने आपत्ति नहीं मानी और गीत पूरा गाया। यह प्रसंग बाद के संस्मरणों में दर्ज है, किसी समकालीन अभिलेख में नहीं।

ठाकुर ने 1937 में नेहरू को जो लिखा

कार्यसमिति की बैठक से तीन दिन पहले, 26 अक्टूबर 1937 को, ठाकुर ने नेहरू को पत्र लिखा: "गीत के पहले हिस्से में व्यक्त कोमलता और भक्ति के भाव ने, हमारी मातृभूमि के सुंदर और कल्याणकारी रूपों पर उसके ज़ोर ने, मुझे विशेष रूप से आकर्षित किया, इतना कि मुझे उसे कविता के शेष हिस्से से और उस पुस्तक के उन अंशों से अलग करने में कोई कठिनाई नहीं हुई जिसका वह भाग है।" द वायर के मुताबिक़ पत्र का पाठ नेहरू की चुनी हुई रचनाओं के आठवें खंड में पृष्ठ 825 से 830 के बीच है। बोस को लिखे पत्र में उनकी पंक्ति और सीधी थी: "वंदे मातरम् का मूल देवी दुर्गा की स्तुति है; यह इतना स्पष्ट है कि इस पर बहस हो ही नहीं सकती।"

अक्टूबर 1937 में कार्यसमिति ने क्या तय किया

बयान की सिफ़ारिश एक वाक्य की है: "जहाँ कहीं राष्ट्रीय सभाओं में बंदे मातरम् गाया जाए, वहाँ केवल पहले दो अंतरे गाए जाएँ, और आयोजकों को पूरी छूट रहे कि वे बंदे मातरम् के अतिरिक्त या उसके स्थान पर कोई और ऐसा गीत गाएँ जिस पर आपत्ति न हो।" तारीख़ पर स्रोत अलग-अलग हैं। हेरिटेज टाइम्स ने पूरा पाठ 28 अक्टूबर 1937 का बताकर छापा, स्रोत के रूप में AICC Papers, 42/1936 दिया। आउटलुक ने वही पाठ 26 अक्टूबर 1937, कलकत्ता का बताया। जयराम रमेश और कई अख़बारों ने तारीख़ 29 अक्टूबर 1937 दी है।

बयान का वह वाक्य जो कम उद्धृत होता है

पाठ में एक पंक्ति ऐसी है जो दोनों पक्षों की बहस से बाहर रह जाती है: "किसी भी समय यह गीत, या कोई और गीत, कांग्रेस ने भारत के राष्ट्रगान के रूप में औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया था।" यानी बयान ख़ुद यह दावा नहीं करता कि वह किसी चीज़ को अपनाया हुआ घोषित कर रहा है। वह पहले दो अंतरों को "हमारे राष्ट्रीय आंदोलन का जीवंत और अविभाज्य हिस्सा" कहता है, और इसका आधार प्रचलन तथा बलिदान का रिकॉर्ड बताता है।

सात करोड़ से तीस करोड़ तक

बयान के अंत में एक टिप्पणी जुड़ी है जिसका ज़िक्र आज की बहस में नहीं होता। मुख्य हिस्से में तर्क दिया गया था कि गीत में "तीस करोड़ भारतीयों" का उल्लेख साबित करता है कि वह पूरे देश के लिए था। टिप्पणी में कार्यसमिति ख़ुद सुधार करती है: यह आँकड़ा बाद में आया, जब गीत को राष्ट्रीय महत्व मिल चुका था। "जैसा बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था, संख्या सात करोड़ थी।" यह तत्कालीन बंगाल प्रांत पर लागू होती थी, जिसमें बिहार शामिल था, और बिना किसी धार्मिक भेद के पूरी आबादी पर।

वह उप-समिति, जिसका काम कभी पूरा नहीं दिखा

बयान का आख़िरी हिस्सा एक और काम सौंपता है। कार्यसमिति ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और नरेंद्र देव की उप-समिति बनाई, जो देश भर से भेजे गए राष्ट्रीय गीतों की जाँच करे और एक प्रामाणिक संग्रह सुझाए। शर्त रखी गई कि गीत सरल हिंदुस्तानी में हों या उसमें ढाले जा सकें। पाठ में यह भी लिखा है कि "उप-समिति कवि रवींद्रनाथ ठाकुर से परामर्श करेगी और उनकी सलाह लेगी।" प्रांतीय समितियों से भी यही काम प्रांतीय भाषाओं में करने को कहा गया।

24 जनवरी 1950: प्रस्ताव नहीं, बयान

उस दिन की कार्यवाही में अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद पहले बताते हैं कि रास्ता क्या चुना गया: "एक समय सोचा गया था कि मामला सदन के सामने लाया जाए और सदन प्रस्ताव के ज़रिए निर्णय ले। पर महसूस किया गया कि प्रस्ताव के माध्यम से औपचारिक निर्णय लेने के बजाय बेहतर यह है कि मैं राष्ट्रगान के संबंध में एक वक्तव्य दूँ।" फिर वक्तव्य आता है: "जन गण मन नाम से जाने जाने वाले शब्दों और संगीत की रचना भारत का राष्ट्रगान है... और वंदे मातरम् गीत, जिसने भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, जन गण मन के समान सम्मान पाएगा और उसका दर्जा उसके बराबर होगा।" इसके बाद "(हर्षध्वनि)" दर्ज है, फिर एक पंक्ति: "मुझे आशा है कि इससे सदस्यों को संतोष होगा।" यह वक्तव्य संविधान का हिस्सा नहीं है, और उसमें "राष्ट्रगीत" शब्द भी नहीं आता। पत्र सूचना कार्यालय के 2025 के बैकग्राउंडर में लिखा है कि गीत को "1950 में संविधान सभा ने भारत के राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया।" कार्यवाही का पाठ और यह वाक्य मेल नहीं खाते।

राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत में क़ानूनी फ़र्क़

1971 का राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनियम दो चीज़ों की रक्षा करता था। धारा 2 राष्ट्रध्वज और संविधान के अपमान पर लागू होती है। धारा 3 का पुराना पाठ था: "जो कोई जानबूझकर भारतीय राष्ट्रगान के गायन को रोकेगा या ऐसे गायन में लगी किसी सभा में बाधा डालेगा, उसे तीन वर्ष तक की क़ैद, या जुर्माना, या दोनों से दंडित किया जाएगा।" राष्ट्रगीत का ज़िक्र इसमें नहीं था। 2026 के विधेयक के कथन में सरकार ने यह ख़ुद दर्ज किया: "वर्तमान में वंदे मातरम् के गायन के अपमान को रोकने के लिए कोई विशिष्ट क़ानूनी प्रावधान नहीं है।"

बिजोई इमैनुएल, 1986

धारा 3 का दायरा अदालत ने एक बार तय किया है। 11 अगस्त 1986 को न्यायमूर्ति ओ. चिन्नप्पा रेड्डी और न्यायमूर्ति एम.एम. दत्त ने केरल के तीन बच्चों का निष्कासन रद्द किया, जो यहोवा के साक्षी संप्रदाय से थे और राष्ट्रगान के समय आदरपूर्वक खड़े होते थे पर गाते नहीं थे। निर्णय की पंक्ति है: "कोई क़ानूनी प्रावधान नहीं है जो किसी को राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य करता हो।" और आगे: "राष्ट्रगान के समय आदरपूर्वक खड़े होना पर स्वयं न गाना, न तो गायन को रोकता है और न ऐसी सभा में बाधा डालता है कि धारा 3 का अपराध बने।"

चौकसे मामला: 2016 का आदेश, 2018 में ढील

दूसरा मुक़दमा भी राष्ट्रगान का है, राष्ट्रगीत का नहीं। श्याम नारायण चौकसे की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने 30 नवंबर 2016 के अंतरिम आदेश में सिनेमाघरों में फ़िल्म से पहले राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य किया था; 9 दिसंबर 2016 के आदेश में कहा गया कि गान के दौरान दरवाज़े बंद रहें पर उन पर कुंडी न लगे। 2018 के अंतिम निर्णय में अदालत ने अपना ही आदेश बदलकर इसे ऐच्छिक कर दिया। राष्ट्रगीत के अंतरों पर इनमें से किसी निर्णय में कुछ तय नहीं हुआ।

2026 के संशोधन ने कौन-सा वाक्य बदला

नए संसद भवन में राज्यसभा का सभागार, मई 2023 की तस्वीर; संशोधन विधेयक 24 जुलाई 2026 को इसी सदन में पेश हुआ और 29 जुलाई को यहीं से पारित हुआ
तस्वीर: Ministry of Parliamentary Affairs GODL-India

विधेयक संख्या LIX of 2026 राज्यसभा में 24 जुलाई 2026 को पेश हुआ। उद्देश्यों और कारणों के कथन पर गृह मंत्री अमित शाह के नाम के साथ तारीख़ 10 जुलाई 2026 दर्ज है, और उसका आधार 24 जनवरी 1950 का वक्तव्य है। विधेयक 29 जुलाई को राज्यसभा और 30 जुलाई को लोकसभा से पारित हुआ, और 6 अगस्त को राजपत्र में 2026 के अधिनियम 11 के रूप में छपा। नई धारा 3 का पाठ है: "जो कोई जानबूझकर (क) राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत के गायन को रोकेगा; या (ख) ऐसे गायन में लगी किसी सभा में बाधा डालेगा, वह तीन वर्ष तक की क़ैद, या जुर्माना, या दोनों से दंडनीय होगा।"

धारा 3क, जो अपने आप साथ आ गई

संशोधन में दूसरी बार अपराध करने पर सज़ा का कोई ज़िक्र नहीं है, पर वह सज़ा लागू होती है। 1971 के अधिनियम में धारा 3क 20 दिसंबर 2005 के संशोधन अधिनियम (2005 का 51) से जोड़ी गई थी। उसका पाठ कहता है कि जो व्यक्ति धारा 2 या धारा 3 के अपराध में पहले दोषसिद्ध हो चुका हो और फिर दोषी पाया जाए, उसे दूसरी और हर अगली बार "एक वर्ष से कम नहीं" की क़ैद होगी। राष्ट्रगीत अब धारा 3 के भीतर है, इसलिए यह न्यूनतम सज़ा उस पर भी चलेगी, बिना 2026 के अधिनियम में एक शब्द लिखे।

संसद में क्या-क्या कहा गया

राज्यसभा में विधेयक गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने रखा। उन्होंने कहा कि 1971 का क़ानून ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान के अपमान को दंडित करता है और अब वही दंड राष्ट्रगीत के अपमान पर भी होगा। राजद सांसद मनोज कुमार झा ने कहा कि "श्रद्धा को क़ानून से नहीं बनाया जा सकता।" चर्चा के दौरान विपक्षी सदस्यों ने सदन से बहिर्गमन किया। दिसंबर 2025 में राज्यसभा में 150 साल पर हुई चर्चा में अमित शाह ने कहा था कि गीत को दो अंतरों तक सीमित करने के बाद तुष्टीकरण की राजनीति शुरू हुई।

19 अगस्त और 22 अगस्त: दो प्रस्ताव

19 अगस्त 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति ने तय किया कि पार्टी के कार्यक्रमों में 1937 के प्रस्ताव के अनुसार पहले दो अंतरे गाए जाएँगे। अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा, "मैंने वही किया जो पिछले 80 साल से होता आया है।" 22 अगस्त को नई दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की बैठक में अध्यक्ष नितिन नबीन ने प्रस्ताव रखा, जिसकी शुरुआती पंक्ति है: "भारतीय जनता पार्टी 19 अगस्त 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति के निर्णय की कड़ी निंदा करती है।" प्रस्ताव में छहों अंतरों की रक्षा और देशव्यापी जन-जागरण का संकल्प दर्ज है।

150 साल का कार्यक्रम

7 नवंबर 2025 को नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सालभर चलने वाले आयोजन की शुरुआत की, जो 7 नवंबर 2026 तक चलेगा। उन्होंने 150 रुपये का स्मारक सिक्का और एक डाक टिकट जारी किया, और vandemataram150.in पोर्टल शुरू किया, जिस पर नागरिक अपने गाए हुए वीडियो डाल सकते हैं। उसी भाषण में उन्होंने कहा कि 1937 में गीत के महत्वपूर्ण अंतरे हटा दिए गए और इस विभाजन ने बँटवारे के बीज बोए।

अब किस आयोजन में कौन-सा रूप गाया जाएगा

कर्नाटक सरकार के अपने कार्यक्रमों में दो अंतरे। उन्हीं कार्यक्रमों में, यदि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या राज्यपाल मौजूद हों, तो पूरा गीत। केंद्र सरकार के कार्यक्रमों और गृह मंत्रालय के निर्देश वाले अवसरों पर छहों अंतरे, तीन मिनट दस सेकंड। स्कूलों की सुबह की सभा पर केंद्रीय निर्देश लागू होता है, जबकि कर्नाटक का आदेश राज्य सरकार के कार्यक्रमों की बात करता है। इन सब पर एक ही आपराधिक धारा चलेगी, और उस धारा के पूरे पाठ में "वंदे मातरम्" एक बार भी नहीं आता। वह नाम विधेयक के उद्देश्यों और कारणों के कथन में है, अधिनियम की धारा में नहीं।

स्रोतभारत का राजपत्र, असाधारण, भाग 2 खंड 1, संख्या 26, 6 अगस्त 2026: राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2026 (2026 का अधिनियम 11) का पूरा पाठ, राज्यसभा में 24 जुलाई 2026 को पेश विधेयक संख्या LIX of 2026, उद्देश्यों और कारणों का कथन तथा 1971 के अधिनियम की धारा 3 का उद्धरण, हेरिटेज टाइम्स, 9 दिसंबर 2025: अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यसमिति के 28 अक्टूबर 1937 के बयान का पूरा पाठ, स्रोत AICC Papers, 42/1936, संविधान सभा की कार्यवाही, 24 जनवरी 1950, इंडियन कानून पर उपलब्ध पाठ, बिजोई इमैनुएल बनाम केरल राज्य, सर्वोच्च न्यायालय, 11 अगस्त 1986 का निर्णय, राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 (1971 का 69) की धाराएँ 2, 3 और 3क, पत्र सूचना कार्यालय बैकग्राउंडर, 6 नवंबर 2025: '150 Years of Vande Mataram', द हंस इंडिया, 10 सितंबर 2026: कर्नाटक के कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग के आदेश की रिपोर्ट, लाइवलॉ, 2026: संशोधन में अपराध की परिभाषा न होने पर विधिक टिप्पणी, द वायर: 26 अक्टूबर 1937 को ठाकुर के नेहरू को लिखे पत्र के उद्धरण, स्रोत Selected Works of Jawaharlal Nehru खंड 8

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।