जिस गृह मंत्री के कार्यकाल में भारत का नक्शा भाषा के आधार पर बदला, संविधान सभा की भाषा-बहस के तीनों दिन उसका अपना कोई भाषण दर्ज नहीं है
गोविंद बल्लभ पंत का जन्म 10 सितंबर 1887 को अल्मोड़ा ज़िले के खूँट गाँव में हुआ। उनके नाम के साथ दो काम जुड़े हैं: राज्यों का भाषाई पुनर्गठन और हिंदी को राजभाषा बनाने का अभियान। हमने संविधान सभा की चार बहसें, राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट का एक वाक्य और कुली-बेगार आंदोलन पर इतिहासकार शेखर पाठक का लेखा पढ़कर देखा कि रिकॉर्ड में क्या है और क्या नहीं।

संविधान सभा के 13 सितंबर 1949 के रिकॉर्ड में बंगाल के सदस्य लक्ष्मी कांत मैत्र एक वाक्य दोहराते हैं जो उनका अपना नहीं है। मैत्र के मुताबिक़ संयुक्त प्रांत के प्रीमियर गोविंद बल्लभ पंत ने कहा था, "We are not going to impose this language on the non-Hindi people." उसे वे शानदार भाषण बताते हैं, और कुछ पंक्तियों बाद पंत की बात दोबारा उद्धृत करते हैं: हिंदी थोपी नहीं जाएगी, कोई सहमति का फ़ॉर्मूला निकालना होगा।
राजभाषा की बहस उन दिनों तीन बैठकों में चली, और 12, 13 तथा 14 सितंबर 1949 की पूरी कार्यवाही constitutionofindia.net पर खुली हुई है।
तीनों में भाषा पर पंत का अपना कोई भाषण नहीं है।
वह वाक्य जो सिर्फ़ हवाले में बचा है
मैत्र का पूरा तर्क अंकों पर था। वे देवनागरी लिपि मान चुके थे, हिंदी अंकों पर अड़े थे, और साथियों के ताने का हवाला देते हैं कि ऊँट निगलकर मच्छर पर क्यों अटके हो। इसी सिलसिले में वे पंत को याद करते हैं। उसी दिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा कि पंत, पुरुषोत्तम दास टंडन, श्रीकृष्ण सिन्हा और रविशंकर शुक्ल की ज़िम्मेदारी है कि वे अपने इलाक़ों में दूसरी भारतीय भाषाओं को क़ानूनन जगह दिलाएँ। दोनों जगह पंत सदन में मौजूद एक नाम हैं, बोलने वाले नहीं।
खूँट का लड़का, इलाहाबाद की डिग्री
जन्म 10 सितंबर 1887, अल्मोड़ा ज़िले के खूँट गाँव में। माँ गोविंदी बाई, पिता मनोरथ पंत, जो सरकारी नौकरी में लगातार दौरे पर रहते थे; परवरिश नाना बद्री दत्त जोशी ने की। परिवार की जड़ों पर दोनों विकिपीडिया आपस में नहीं मिलते। हिंदी पन्ना उन्हें कुमाऊँनी पर्वतीय ब्राह्मण परिवार का बताता है; अंग्रेज़ी पन्ना एम.वी. कामथ की किताब के पाँचवें पन्ने के हवाले से लिखता है कि यह मराठी कऱ्हाड़े ब्राह्मण परिवार था जो उत्तरी कर्नाटक से कुमाऊँ आया। हिंदी पन्ने के अनुसार 1907 में बीए, 1909 में क़ानून की डिग्री, और कॉलेज का लैम्सडेन पुरस्कार। वकालत 1910 में अल्मोड़ा से शुरू हुई, फिर रानीखेत, फिर काशीपुर, जहाँ उन्होंने प्रेम सभा बनाई।
उतार, बेगार और बर्दायश
इतिहासकार शेखर पाठक ने कुमाऊँ की इस व्यवस्था के तीन अलग रूप गिनाए हैं। कुली बेगार का मतलब था बिना किसी भुगतान के जबरन मज़दूरी। कुली उतार में न्यूनतम मज़दूरी की शर्त थी, जो अक्सर दी नहीं जाती थी। कुली बर्दायश में अफ़सरों, सिपाहियों, शिकारियों और सैलानियों के लिए अनाज, दूध, ईंधन और चारा उठवाया जाता था, वह भी बिना दाम। पाठक के मुताबिक़ इलाक़े की 85 से 90 फ़ीसदी आबादी काश्तकारों की थी, और गिनी-चुनी छूटों को छोड़कर हर वयस्क पुरुष इस प्रथा के दायरे में था।
सरयू के बगड़ में रजिस्टर

रजिस्टर इस पूरे ढाँचे की धुरी था। हर गाँव के प्रधान के पास एक बही रहती थी जिसमें सब ग्रामीणों के नाम दर्ज थे, और बारी-बारी सबको यह काम करना पड़ता था। जनवरी 1921 में बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में वही बहियाँ सरयू और गोमती के संगम में बहा दी गईं। पाठक लिखते हैं कि 10 जनवरी को अल्मोड़ा से लगभग 50 कार्यकर्ता हरगोविंद पंत, बद्री दत्त पांडे और चिरंजीलाल के साथ वहाँ पहुँचे, और "कुली उतार बंद करो" लिखा बैनर लेकर जुलूस निकला। अल्मोड़ा के डिप्टी कमिश्नर डब्ल्यू.सी. डिबल उसी मेले में मौजूद थे; पाठक की गिनती में उनके पास 21 अफ़सर, 25 सिपाही और 500 कारतूस थे, इसलिए वे कुछ कर नहीं सके।
तारीख़ और भीड़, दोनों पर झगड़ा
यहाँ स्रोत आपस में नहीं मिलते, और यह अंतर छोटा नहीं है। अंग्रेज़ी विकिपीडिया का कुली-बेगार पन्ना कहता है कि आंदोलन 14 जनवरी 1921 को शुरू हुआ और लगभग 40 हज़ार लोग शामिल हुए। पाठक की गिनती अलग है: जुलूस 12 जनवरी को निकला, सभा में 10 हज़ार से ज़्यादा लोग थे, और रजिस्टर अगले दिन नदी में डाले गए; 14 जनवरी को कुछ और बहाए गए। उसी लेख के साथ छपी तस्वीर का कैप्शन बद्री दत्त पांडे को 12 जनवरी 1921 को बोलते हुए बताता है।
पंत उस मेले में थे या काशीपुर में
अंग्रेज़ी विकिपीडिया का कुली-बेगार पन्ना नेतृत्व का बँटवारा साफ़ लिखता है: अल्मोड़ा में बद्री दत्त पांडे, गढ़वाल में अनसूया प्रसाद बहुगुणा, और काशीपुर में गोविंद बल्लभ पंत। कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ़ इंडिया का सदस्य पन्ना इसे 1914 का काम बताता है, बागेश्वर से सात साल पहले, और कहता है कि युवा वकील के तौर पर उन्होंने काशीपुर की एक ग्राम पंचायत की मदद की थी। अंग्रेज़ी विकिपीडिया का पंत वाला पन्ना भी यही साल देता है। दोनों में से कोई उन्हें सरयू के किनारे नहीं रखता।
पाठक की अपनी टिप्पणी
अपने लेख के आख़िरी हिस्से में पाठक इस पर सीधी आपत्ति दर्ज करते हैं। वे लिखते हैं कि बाद के सालों में यह दावा किया जाने लगा कि बेगार सिर्फ़ ईश्वर, गांधी, बद्री दत्त पांडे, हरगोविंद पंत, गोविंद बल्लभ पंत, मुकुंदी लाल और चिरंजी लाल की वजह से ख़त्म हुई, और ऐसे नेता-केंद्रित ब्योरों में किसानों तथा गाँव के कार्यकर्ताओं का हिस्सा दबता चला गया। पाठक यह भी जोड़ते हैं कि 1929 में अल्मोड़ा और बागेश्वर आने पर ख़ुद गांधी ने कहा था कि कुमाऊँ के लोगों ने यह प्रथा अपने बल पर ख़त्म की।
कुमाऊँ परिषद किस साल बनी
संगठन के जन्म-वर्ष पर तीन पन्ने तीन बात कहते हैं। पाठक 1916 लिखते हैं। कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ़ इंडिया भी 1916 देता है और उसे पंत से जोड़ता है। हरगोविंद पंत का विकिपीडिया पन्ना कहता है कि परिषद उन्होंने 1915 में बनाई। अधिवेशनों की कड़ी पाठक के लेख में साफ़ है: पहला अल्मोड़ा में 1917, दूसरा हल्द्वानी में दिसंबर 1918, तीसरा कोटद्वार में दिसंबर 1919, और चौथा काशीपुर में दिसंबर 1920, जिसकी अध्यक्षता हरगोविंद पंत ने की और जिसमें असहयोग का प्रस्ताव पास हुआ।
27 अगस्त 1947: पृथक निर्वाचन के ख़िलाफ़
पंत का जो भाषण सदन के रिकॉर्ड में पूरा मिलता है, वह अल्पसंख्यक अधिकारों पर है। बी. पोकर के प्रस्ताव के जवाब में उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की सफलता इस बात से नापी जाती है कि वह समुदाय के अलग-अलग हिस्सों में कितना भरोसा पैदा करता है, और यह कि पृथक निर्वाचन ख़ुद अल्पसंख्यकों के लिए आत्मघाती होगा। उसी भाषण में उन्होंने कहा कि अच्छे से अच्छा वकील भी बेकार है अगर जज उसकी दलील न समझे और वकील के जज बनने की संभावना ही न हो।
5 जनवरी 1949: समवर्ती सूची की लड़ाई
संविधान सभा के विधायी सत्र में उन्होंने केंद्र के अधिकार सीमित करने वाला संशोधन उठाया। उनका तर्क था कि 1935 के अधिनियम की योजना में समवर्ती सूची पर केंद्र के पास क़ानून बनाने का ऊपरी अधिकार था, अपनी एजेंसी खड़ी करने का नहीं, और दो समानांतर तंत्र बनने से प्रशासन में गड़बड़ी होगी। उदाहरण उन्होंने अपने प्रांत से दिया: उत्तर प्रदेश ऐसा विधेयक लाने की सोच रहा था कि 25 हज़ार रुपये से ज़्यादा लागत वाली इमारत के लिए लोहा, इस्पात या कोयला न दिया जाए, और यह अधिकार सूची तीन के बिना नहीं मिलता।
ज़मींदारी का मुआवज़ा, गुणा में
12 सितंबर 1949 को मसौदा अनुच्छेद 24 पर उन्होंने संख्याएँ रखीं। उनके प्रांत में लगभग 20 लाख तथाकथित ज़मींदार थे; 19 लाख से ज़्यादा को शुद्ध वार्षिक आय का 28 गुना मुआवज़ा तय हुआ; 5 हज़ार रुपये या उससे कम लगान देने वाले किसी को भी 10 गुना से कम नहीं मिलना था; और लगान चाहे जितना ऊँचा हो, 8 गुना से कम कोई नहीं पाएगा। उन्होंने याद दिलाया कि अंग्रेज़ों ने शुरू में ज़मींदारों को वसूली का सिर्फ़ 10 फ़ीसदी रखने दिया था, और कहा कि वे 20 फ़ीसदी देने को तैयार हैं। मुआवज़ा नक़द चुकाने के लिए काश्तकारों से कुछ ही महीनों में लगभग 150 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य था। ताल्लुक़ेदारों पर उनका जुमला भी दर्ज है: पहले बैलों की लड़ाई और कबूतरबाज़ी होती थी, अब लड़ाई अदालत में होती है।
बेगम ऐज़ाज़ रसूल का आरोप
उसी दिन, पंत के तुरंत बाद, बेगम ऐज़ाज़ रसूल बोलीं। उन्होंने कहा कि उनका सौभाग्य है या दुर्भाग्य कि उन्हें अपने प्रांत के प्रीमियर के बाद बोलने को कहा गया, क्योंकि अब वे जवाब नहीं दे सकेंगे। फिर उन्होंने सीधा आरोप रखा: खंड (4), जो यूपी, बिहार और मद्रास के लंबित विधेयकों को अदालत में चुनौती से बचाता था, पंत के आग्रह पर जोड़ा गया है। उन्होंने पूछा कि अगर मुआवज़ा इतना ही न्यायसंगत है तो अदालत का रास्ता बंद करने की ज़रूरत क्यों पड़ी।
वह खंड आगे क्या हुआ
मसौदे का अनुच्छेद 24 संविधान में अनुच्छेद 31 बना। उसका खंड (4) कहता है कि संविधान लागू होते वक़्त किसी राज्य विधानमंडल में लंबित जो विधेयक पारित होकर राष्ट्रपति के पास आरक्षित रखा गया और उनकी सहमति पा गया, उस क़ानून को खंड (2) के उल्लंघन के आधार पर किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। पूरा अनुच्छेद 31 चौवालीसवें संविधान संशोधन की धारा 6 से हटाया गया, जो 20 जून 1979 से प्रभावी हुई; उसकी जगह अनुच्छेद 300क आया।
गृह मंत्री कब बने, इस पर भी दो तारीख़ें
अंग्रेज़ी विकिपीडिया का पंत वाला पन्ना और उसका इन्फ़ोबॉक्स गृह मंत्री का कार्यकाल 10 जनवरी 1955 से 7 मार्च 1961 बताते हैं। राज्य पुनर्गठन अधिनियम वाला पन्ना उसी विश्वकोश में लिखता है कि आयोग के काम की निगरानी पंत ने की, जो दिसंबर 1954 से गृह मंत्री थे। कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ़ इंडिया का सदस्य पन्ना तीसरी बात कहता है: वे लगभग एक दशक तक, 1955 तक, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। हिंदी विकिपीडिया मुख्यमंत्री का कार्यकाल 27 दिसंबर 1954 पर बंद करता है।
फ़ज़ल अली आयोग
राज्य पुनर्गठन आयोग दिसंबर 1953 में बना। तीन सदस्य थे: सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश फ़ज़ल अली, के.एम. पणिक्कर और एच.एन. कुंज़रू। इससे पहले जून 1948 में भाषाई प्रांत आयोग, यानी धर आयोग, बना था और उसने 10 दिसंबर 1948 की रिपोर्ट में कहा था कि केवल या मुख्यतः भाषा के आधार पर प्रांत बनाना राष्ट्र के बड़े हित में नहीं है। फ़ज़ल अली आयोग ने रिपोर्ट 30 सितंबर 1955 को सौंपी, और वह 14 दिसंबर 1955 को लोकसभा के पटल पर रखी गई।
आयोग ने भाषा को अकेली कसौटी नहीं माना
रिपोर्ट के दूसरे भाग का शीर्षक था "फ़ैक्टर्स बेयरिंग ऑन रीऑर्गनाइज़ेशन"। उसमें आयोग ने लिखा कि भाषा या संस्कृति, किसी एक कसौटी पर राज्यों का पुनर्गठन न तो संभव है न वांछनीय, और राष्ट्रीय एकता के हित में पूरे सवाल पर संतुलित रुख़ ज़रूरी है। यह वाक्य डेविड एफ़. मार्शल की 1991 की किताब लैंग्वेज प्लानिंग के 107वें पन्ने के हवाले से दर्ज है। जिस आयोग का नाम भाषाई पुनर्गठन से जुड़ा है, उसने भाषा को अकेला पैमाना मानने से इनकार किया।
1 नवंबर 1956 को नक्शा बदला

अधिनियम संख्या 37, सन 1956, 31 अगस्त 1956 को अधिनियमित हुआ और 1 नवंबर 1956 से लागू। उसी दिन संविधान का सातवाँ संशोधन भी लागू हुआ, जिसने भाग क, ख, ग और घ वाला वर्गीकरण ख़त्म किया और संघ राज्यक्षेत्र नाम की नई श्रेणी बनाई। आयोग ने सिर्फ़ तीन संघ राज्यक्षेत्र सुझाए थे: अंडमान-निकोबार, दिल्ली और मणिपुर। अधिनियम ने इनके अलावा लक्कादीव-मिनिकॉय-अमीनदीवी, हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा को भी उसी श्रेणी में रखा, और 14 राज्य बनाए। विदर्भ को अलग राज्य बनाने की सिफ़ारिश सरकार ने नहीं मानी।
जिन राज्यों की सीमा नहीं छुई गई
अधिनियम की सूची पढ़ने पर एक बात खटकती है। असम, जम्मू-कश्मीर, ओडिशा और उत्तर प्रदेश, इन चार राज्यों की सीमा 1956 में नहीं बदली। बिहार से पुरुलिया और इस्लामपुर पश्चिम बंगाल को गए, बंबई में सौराष्ट्र और कच्छ जुड़े, मध्य प्रदेश में मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल समाए, केरल त्रावणकोर-कोचीन और मालाबार से बना, और मैसूर तीन प्रेसीडेंसियों के कन्नड़ ज़िलों से। जिस गृह मंत्री के मंत्रालय ने यह क़वायद देखी, उनका अपना राज्य ज्यों का त्यों रहा।
अनुच्छेद 343 और पंद्रह साल की मियाद
संविधान के भाग सत्रह में अनुच्छेद 343 संघ की राजभाषा तय करता है: देवनागरी लिपि में हिंदी, और अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप। दूसरा खंड कहता है कि संविधान लागू होने से पंद्रह साल तक अंग्रेज़ी उन सब सरकारी कामों में चलती रहेगी जिनमें वह पहले से चल रही थी, और इस अवधि में राष्ट्रपति आदेश देकर हिंदी तथा देवनागरी अंकों का अतिरिक्त इस्तेमाल शुरू करा सकते हैं। अनुच्छेद 344(2ख) के तहत हर दस साल पर एक राजभाषा आयोग बनना था। मियाद 26 जनवरी 1965 को पूरी होनी थी।
खेर आयोग, फिर पंत समिति
पहला राजभाषा आयोग नेहरू ने 7 जून 1955 को बी.जी. खेर की अध्यक्षता में बनाया। उसने 31 जुलाई 1956 को रिपोर्ट दी, जिसमें मद्रास के पी. सुब्बारायन और पश्चिम बंगाल के सुनीति कुमार चटर्जी के असहमति-नोट दर्ज थे। खेर आयोग की रिपोर्ट की समीक्षा के लिए राजभाषा पर संसदीय समिति सितंबर 1957 में बनी और उसकी अध्यक्षता गोविंद बल्लभ पंत ने की। दो साल के विचार के बाद समिति ने 8 फ़रवरी 1959 को राष्ट्रपति को अपनी सिफ़ारिशें सौंपीं: हिंदी प्राथमिक राजभाषा हो और अंग्रेज़ी सहायक।
दो साल और दो मिनट
7 अगस्त 1959 को नेहरू ने संसद में फ़्रैंक एंथनी के विधेयक पर बोलते हुए आश्वासन दिया कि थोपना नहीं होगा और अनिश्चित काल तक अंग्रेज़ी सहयोगी तथा अतिरिक्त भाषा रहेगी; उन्होंने जोड़ा कि इसका फ़ैसला हिंदी जानने वालों पर नहीं, हिंदी न जानने वालों पर छोड़ेंगे। अंग्रेज़ी विकिपीडिया के पन्ने पर, आर. कन्नन की 2010 की किताब के हवाले से, इस पर पंत की प्रतिक्रिया दर्ज है: जो दो साल में हासिल किया, प्रधानमंत्री ने दो मिनट से भी कम में नष्ट कर दिया।
1963 का क़ानून, जो वे नहीं देख पाए
राजभाषा अधिनियम 23 अप्रैल 1963 को पेश हुआ, लोकसभा ने 27 अप्रैल और राज्यसभा ने 7 मई को पारित किया, और राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन की सहमति 10 मई 1963 को मिली। पेश करने वाले गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे, पंत के उत्तराधिकारी। धाराएँ अलग-अलग तारीख़ों पर लागू हुईं: धारा 5(1) 10 जनवरी 1965 से, धारा 3 उसी महीने 26 जनवरी से, और धारा 5(2) 1 अक्टूबर 1976 से। पंत की मृत्यु 7 मार्च 1961 को हो चुकी थी।
31 जुलाई 1959, केरल
इसी गृह-मंत्रित्व के दौर की एक और दर्ज तारीख़ है। केंद्र सरकार ने 31 जुलाई 1959 को केरल का मंत्रिमंडल बर्ख़ास्त किया और राष्ट्रपति शासन लगाया, जो 22 फ़रवरी 1960 तक चला। उससे पहले 13 जून 1959 को अंगमाली में पुलिस फ़ायरिंग हुई थी। सन 1960 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 63 और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को 29 सीटें मिलीं। अनुच्छेद 356 पर आगे चलकर जो कसौटियाँ बनीं, उनका ब्योरा हमने सरकारिया आयोग वाले लेख में अलग से देखा है।
जिस बोली का घर उन्हीं की पहाड़ी थी
कुमाऊँनी की गिनती अपने आप में एक दस्तावेज़ है। सन 1961 के सर्वेक्षण में भारत में 10,30,254 कुमाऊँनी बोलने वाले दर्ज थे; 2011 की जनगणना में यह संख्या 20 लाख है। जनगणना उसे हिंदी की बोली के रूप में सूचीबद्ध करती है। यूनेस्को के ख़तरे में पड़ी भाषाओं के एटलस में उसे असुरक्षित श्रेणी में रखा गया है। सन 2010 में लोकसभा में एक निजी विधेयक आया कि गढ़वाली और कुमाऊँनी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए।
मृत्यु का कारण भी एक जैसा दर्ज नहीं
सन 1960 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा और इलाज करने वालों में उनके मित्र तथा पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बिधान चंद्र रॉय भी थे। अंग्रेज़ी विकिपीडिया के अनुसार 7 मार्च 1961 को 73 साल की उम्र में मस्तिष्काघात से उनकी मृत्यु हुई; हिंदी विकिपीडिया उसी तारीख़ के लिए हृदयाघात लिखता है। वे उस वक़्त पद पर थे। राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने शोक-संदेश में कहा कि वे पंत को 1922 से जानते थे और यह उनके काम का हिसाब लगाने का समय नहीं है।
नाम पर बनी इमारतें और एक झील

भारत रत्न उन्हें 26 जनवरी 1957 को मिला, गृह मंत्री रहते हुए। पंतनगर का कृषि विश्वविद्यालय स्वतंत्र भारत का पहला कृषि विश्वविद्यालय है; नेहरू ने उसका उद्घाटन 17 नवंबर 1960 को उत्तर प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय के नाम से किया, और नाम 1972 में बदला गया। जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान अगस्त 1988 में, उनके जन्म-शताब्दी वर्ष में बना, मुख्यालय कोसी-कटारमल, अल्मोड़ा। सोनभद्र का रिहंद बाँध 1954 से 1962 के बीच बना और उसका जलाशय गोविंद बल्लभ पंत सागर कहलाता है, भारत की सबसे बड़ी मानव-निर्मित झील, जिसके बनने में लगभग एक लाख लोग विस्थापित हुए।
स्रोतसंविधान सभा की बहस, 13 सितंबर 1949, राजभाषा पर, लक्ष्मी कांत मैत्र और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के भाषण, संविधान सभा की बहस, 27 अगस्त 1947, अल्पसंख्यक अधिकार और पृथक निर्वाचन पर पंत का भाषण, संविधान सभा की बहस, 12 सितंबर 1949, मसौदा अनुच्छेद 24 पर पंत और बेगम ऐज़ाज़ रसूल, संविधान सभा (विधायी) की बहस, 5 जनवरी 1949, समवर्ती सूची पर पंत के संशोधन, संविधान सभा की बहस, 14 सितंबर 1949, राजभाषा पर अंतिम दिन, कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ़ इंडिया, सदस्य पन्ना, गोविंद बल्लभ पंत, कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ़ इंडिया, अनुच्छेद 31 का पाठ और मसौदा अनुच्छेद 24, स्क्रॉल.इन, शेखर पाठक का लेख, कुमाऊँ में बेगार उन्मूलन आंदोलन, 12 जनवरी 2021, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, कुली-बेगार आंदोलन, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, गोविंद बल्लभ पंत, हिंदी विकिपीडिया, गोविन्द बल्लभ पन्त, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, राज्य पुनर्गठन आयोग, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, तमिलनाडु के हिंदी-विरोधी आंदोलन, खेर आयोग और पंत समिति का ब्योरा, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, राजभाषा अधिनियम 1963, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, केरल का विमोचन समरम, 1959, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, कुमाऊँनी भाषा, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, रिहंद बाँध और गोविंद बल्लभ पंत सागर, अंग्रेज़ी विकिपीडिया, जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, द प्रिंट, फ़ॉरगॉटन फ़ाउंडर्स शृंखला में गोविंद बल्लभ पंत