भारत पन्ना
काम की बात

पचास रुपये की अर्ज़ी पर सरकारी कर्मचारी का सेवा-विवाद कैट सुनता है, नियम में छह महीने की समय-सीमा दर्ज है

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी कैट में मूल आवेदन की फ़ीस 50 रुपये है, और यही रक़म 1987 के गजट, कैट के ई-फ़ाइलिंग मैनुअल और इस विज्ञप्ति, तीनों में दर्ज है। प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 की धारा 20 कहती है कि पहले विभाग में प्रतिवेदन दो, धारा 21 कहती है कि उसके बाद एक साल के भीतर अर्ज़ी लगे, और धारा 23 कहती है कि वकील रखना ज़रूरी नहीं। कैट (प्रक्रिया) नियम, 1987 का नियम 14(2) कहता है कि हर आवेदन रजिस्ट्रेशन से छह महीने के भीतर, जहाँ तक हो सके, सुना और तय किया जाए।

हैदराबाद में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण का एक बेंच-भवन, सड़क के किनारे नाम-पट्ट के साथ। यह जम्मू नहीं, हैदराबाद की तस्वीर है, पर वही अधिकरण है जिसकी बेंच जम्मू में भी बैठती है।
तस्वीर: adbh266, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

बहू प्लाज़ा का नया परिसर, और 1985 का क़ानून

20 सितंबर 2026 को जम्मू के बहू प्लाज़ा में एक इमारत का उद्घाटन हुआ। यह केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, यानी कैट, की जम्मू बेंच का नया कार्यालय-सह-न्यायालय परिसर है। कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इसे खोला। उन्होंने कहा कि जम्मू बेंच ने सेवा के मामले उम्मीद से कहीं तेज़ी से निपटाए हैं और यह देश में सबसे अधिक निपटाने वाली बेंचों में से एक है।

कैट उस कर्मचारी का मंच है जिसका झगड़ा अपने ही नियोक्ता से है, और नियोक्ता केंद्र सरकार है। तबादला, वरिष्ठता, पदोन्नति, अनुशासनिक कार्रवाई, पेंशन की गणना, छुट्टी का हिसाब: ये सब सेवा से जुड़े मामले हैं और इनके लिए अलग अदालत बनी हुई है। वह अदालत 1985 में बनी।

प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी 27 फ़रवरी 1985 को मिली। यह 1985 का अधिनियम संख्या 13 है। केंद्रीय अधिकरण के हिस्से में यह 1 जुलाई 1985 से लागू हुआ, अधिसूचना सा.का.नि. 527(अ) से।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने 20 सितंबर को अधिकरण के तीन मक़सद गिनाए: सेवा के मामलों में शीघ्र न्याय, सरकारी कर्मचारी के लिए किफ़ायती न्याय, और संवैधानिक अदालतों पर बोझ कम करना। किफ़ायती वाले हिस्से का आँकड़ा उसी विज्ञप्ति में है। मूल आवेदन की फ़ीस 50 रुपये है। विज्ञप्ति के मुताबिक़ विविध आवेदनों, पुनर्विचार आवेदनों और अवमानना याचिकाओं पर कोई फ़ीस नहीं लगती।

क़ानून ने इससे ऊपर जाने की छूट भी दे रखी थी। धारा 19(2) कहती है कि आवेदन के साथ जो फ़ीस लगेगी वह सौ रुपये से अधिक नहीं होगी, और उसे केंद्र सरकार नियम बनाकर तय करेगी। सरकार ने पचास पर रोक दी।

कैट का दायरा: अखिल भारतीय सेवाएँ, केंद्रीय पद और तीन अपवाद

धारा 14 अधिकरण का इलाक़ा तय करती है। उपधारा (1) का खंड (क) भर्ती और भर्ती से जुड़े मामले अधिकरण के पास भेजता है: किसी अखिल भारतीय सेवा में, संघ की किसी सिविल सेवा में, संघ के किसी सिविल पद पर, और रक्षा से जुड़े ऐसे पद पर जो किसी असैनिक व्यक्ति से भरा जाता है। खंड (ख) सेवा से जुड़े सारे मामले लेता है, उन्हीं तीन श्रेणियों के लोगों के।

सेवा से जुड़े मामले का मतलब क़ानून ने ख़ुद लिखा है। धारा 3 का खंड (क्यू) उसमें पाँच चीज़ें गिनाता है: भत्तों समेत पारिश्रमिक, पेंशन और सेवानिवृत्ति के दूसरे लाभ; कार्यकाल, जिसमें पुष्टिकरण, वरिष्ठता, पदोन्नति, प्रत्यावर्तन, समय-पूर्व सेवानिवृत्ति और अधिवर्षिता शामिल हैं; किसी भी क़िस्म की छुट्टी; अनुशासनिक मामले; और उसके बाद एक खुला खंड, कोई भी अन्य मामला।

यह सूची लंबी है। अपवादों की सूची छोटी है।

धारा 2 तीन तरह के लोगों को इस पूरे अधिनियम से बाहर रखती है। पहले, नौसेना, थलसेना या वायुसेना का कोई सदस्य, या संघ के किसी अन्य सशस्त्र बल का। दूसरे, सुप्रीम कोर्ट का, किसी हाई कोर्ट का, या उनके अधीनस्थ न्यायालयों का कोई अधिकारी या सेवक। तीसरे, संसद के किसी सदन के सचिवीय स्टाफ़ में नियुक्त व्यक्ति, या किसी राज्य विधानमंडल के, या विधानमंडल वाले किसी संघ राज्यक्षेत्र के।

राज्य सरकार के कर्मचारी कैट में नहीं आते। उनके लिए धारा 15 है, जो राज्य प्रशासनिक अधिकरणों की बात करती है, और ऐसा अधिकरण केंद्र सरकार धारा 4(2) के तहत तभी बनाती है जब राज्य सरकार ख़ुद माँग करे। धारा 14(2) और 14(3) से स्थानीय निकाय, निगम और सोसाइटियाँ भी अधिसूचना जारी होने पर इस दायरे में आ जाते हैं। इंडिया कोड पर ऐसी अधिसूचनाएँ भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, भारतीय खेल प्राधिकरण और खादी तथा ग्रामोद्योग आयोग के नाम से दर्ज हैं।

पहले विभाग, फिर अधिकरण: धारा 20 और धारा 21

अधिकरण सीधे नहीं सुनता। धारा 20(1) कहती है कि आवेदन तब तक साधारणतया ग्रहण नहीं होगा जब तक अधिकरण को यह समाधान न हो जाए कि आवेदक ने संबंधित सेवा नियमों के सारे उपचार ले लिए हैं।

उपधारा (2) बताती है कि उपचार ले लेना माना कब जाएगा। पहली सूरत खंड (क) में है: सक्षम प्राधिकारी ने अपील या प्रतिवेदन को ख़ारिज करते हुए अंतिम आदेश कर दिया हो। दूसरी सूरत खंड (ख) में है: अपील या प्रतिवेदन दिए हुए छह महीने बीत गए, पर कोई अंतिम आदेश नहीं हुआ। उपधारा (3) एक चीज़ को गिनती से बाहर करती है। राष्ट्रपति या राज्यपाल को भेजा गया अभ्यावेदन तब तक नहीं गिना जाएगा जब तक आवेदक ने उसे भेजना ख़ुद चुना न हो।

फिर घड़ी शुरू होती है। वह धारा 21 में है। खंड (क): जहाँ अंतिम आदेश हो चुका है, आवेदन उस तारीख़ से एक साल के भीतर करना होगा। खंड (ख): जहाँ अपील या प्रतिवेदन के बाद छह महीने बिना आदेश के बीत गए, वहाँ उन छह महीनों की समाप्ति की तारीख़ से एक साल। उपधारा (3) देर की गुंजाइश रखती है। इस अवधि के बाद भी आवेदन ग्रहण हो सकता है, अगर आवेदक अधिकरण को संतुष्ट कर दे कि समय पर आवेदन न कर पाने का पर्याप्त कारण था।

सिर्फ़ तारीख़ों का हिसाब समझाने के लिए एक बनाया हुआ उदाहरण। प्रतिवेदन 1 मार्च को दिया गया और 1 सितंबर तक कोई अंतिम आदेश नहीं आया। धारा 20(2)(ख) के लिहाज़ से उपचार 1 सितंबर को पूरे हुए, और धारा 21(1)(ख) की अवधि अगले बरस 1 सितंबर तक चलेगी। यह किसी असल मुक़दमे का हिसाब नहीं है।

फ़ॉर्म-I में ये दोनों बातें आवेदक ख़ुद लिखकर देता है। पैरा 5 में घोषणा है कि आवेदन धारा 21 की समय-सीमा के भीतर है। पैरा 7 में घोषणा है कि सारे उपलब्ध उपचार ले लिए गए, और साथ में कालक्रम से यह ब्यौरा कि कौन-से प्रतिवेदन कब दिए और उनका नतीजा क्या रहा। पैरा 8 में यह घोषणा है कि इसी मामले में कोई आवेदन, रिट याचिका या वाद कहीं दायर नहीं हुआ और कहीं लंबित नहीं है।

एक बार आवेदन ग्रहण हो गया तो विभाग वाला रास्ता बंद हो जाता है। धारा 19(4) कहती है कि उसी विषय पर सेवा नियमों के अधीन लंबित कार्यवाही ख़त्म हो जाएगी, और उसके बाद कोई अपील या अभ्यावेदन नहीं सुना जाएगा।

अर्ज़ी की जगह, फ़ीस और साथ लगने वाले काग़ज़

कैट (प्रक्रिया) नियम, 1987 राजपत्र में 6 जनवरी 1987 को सा.का.नि. 17(अ) से छपे और 15 जनवरी 1987 से लागू हुए। इनका नियम 6 बताता है कि अर्ज़ी किस बेंच में जाएगी। तीन आधार हैं, और तीनों में से कोई भी चलेगा: वह बेंच जिसके अधिकार क्षेत्र में आवेदक उस समय तैनात है, या जिसके अधिकार क्षेत्र में वाद-हेतुक पैदा हुआ, या जहाँ प्रतिवादी साधारणतया रहता है। परंतुक अर्ज़ी प्रधान न्यायपीठ के रजिस्ट्रार के पास देने की भी इजाज़त देता है, जहाँ से वह सही बेंच को भेजी जा सकती है।

कौन-सी बेंच किस इलाक़े को देखती है, यह अधिनियम में नहीं, अधिसूचना में है। मूल अधिसूचना 26 जुलाई 1985 की सा.का.नि. 610(अ) है, और 2021 की एक अधिसूचना उसमें तेरह संशोधनों की सूची छापती है। कैट की केस सूचना प्रणाली पर उन्नीस बेंचें दर्ज हैं: प्रधान न्यायपीठ दिल्ली के अलावा अहमदाबाद, इलाहाबाद, बेंगलुरु, चंडीगढ़, चेन्नई, कटक, एर्नाकुलम, गुवाहाटी, हैदराबाद, जबलपुर, जयपुर, जम्मू, जोधपुर, कोलकाता, लखनऊ, मुंबई, पटना और श्रीनगर।

अर्ज़ी का प्रारूप फ़ॉर्म-I है। नियम 4(1) के मुताबिक़ इसे आवेदक ख़ुद, या उसका अभिकर्ता, या उसका प्राधिकृत विधि व्यवसायी रजिस्ट्रार के सामने पेश कर सकता है। रजिस्टर्ड डाक से, पावती सहित, भेजने का रास्ता भी खुला है। नियम 4(2) कहता है कि अर्ज़ी तीन प्रतियों में, पेपर-बुक की शक्ल में जाएगी, और साथ में प्रतिवादी का पूरा पता लिखा एक बिना इस्तेमाल किया फ़ाइल-साइज़ लिफ़ाफ़ा लगेगा। प्रतिवादी एक से ज़्यादा हों तो उतनी ही अतिरिक्त प्रतियाँ और उतने ही लिफ़ाफ़े।

फ़ीस नियम 7 में है। हर अर्ज़ी के साथ पचास रुपये जाएँगे, और वे दो में से एक शक्ल में जाएँगे: संबंधित बेंच के रजिस्ट्रार के नाम किसी राष्ट्रीयकृत बैंक का क्रॉस किया हुआ डिमांड ड्राफ़्ट, या उसी रजिस्ट्रार के नाम क्रॉस किया हुआ इंडियन पोस्टल ऑर्डर। दोनों उसी शहर में देय हों जहाँ बेंच बैठती है। पहला परंतुक कहता है कि कई लोगों या किसी संघ की साझा अर्ज़ी पर भी फ़ीस पचास रुपये ही रहेगी। दूसरा परंतुक निर्धनता की सूरत में फ़ीस माफ़ करने का अधिकार अधिकरण को देता है।

गुजरात के महेसाणा में प्रधान डाक घर, इंडिया पोस्ट और डाकघर बचत बैंक का बोर्ड और लाल डाक-पेटी सामने। यहीं जैसी किसी खिड़की से पचास रुपये का इंडियन पोस्टल ऑर्डर मिलता है।
तस्वीर: Nizil Shah, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

एक और छोटी रक़म है। नियम 11(6) कहता है कि पाँच से अधिक प्रतिवादी होने पर तामील के लिए हर अतिरिक्त प्रतिवादी के पाँच रुपये लगेंगे। ई-फ़ाइलिंग मैनुअल का चरण 13 भी यही दोहराता है।

काग़ज़ नियम 9 में गिनाए गए हैं: जिस आदेश के ख़िलाफ़ अर्ज़ी है उसकी अनुप्रमाणित सही प्रति, जिन दस्तावेज़ों पर भरोसा है उनकी प्रतियाँ, और एक अनुक्रमणिका। अनुप्रमाणन कोई विधि व्यवसायी कर सकता है या कोई राजपत्रित अधिकारी। नियम 10 एक अर्ज़ी को एक ही वाद-हेतुक तक सीमित रखता है।

ख़ामी निकले तो नियम 5 का रास्ता चलता है। औपचारिक ख़ामी रजिस्ट्रार आवेदक की मौजूदगी में ठीक करा सकता है; बाक़ी के लिए वह समय देता है, और 27 अक्टूबर 2014 की अधिसूचना सा.का.नि. 747(अ) ने यह परंतुक जोड़ा कि वह समय तीस दिन से अधिक नहीं होगा। इसके बाद रजिस्ट्रार कारण लिखकर पंजीकरण से इनकार कर सकता है, और उस पर पंद्रह दिन में अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के पास अपील होती है।

पचास की यह रक़म तीन जगह एक जैसी है: 1987 के गजट में, कैट के ई-फ़ाइलिंग मैनुअल में, और 20 सितंबर की विज्ञप्ति में। इंडिया कोड पर इन नियमों के सात संशोधन दर्ज हैं, सबसे नया 2014 का; फ़ीस बदलने वाला कोई संशोधन नहीं मिला।

वकील रखना अनिवार्य नहीं है

धारा 23(1) इस पर साफ़ है। अधिकरण में आवेदन करने वाला व्यक्ति या तो ख़ुद हाज़िर हो सकता है, या अपनी पसंद के किसी विधि व्यवसायी की सहायता लेकर अपना पक्ष रख सकता है।

यह बात कैट के ऑनलाइन फ़ॉर्म में भी उतरी हुई है। मूल आवेदन भरते समय एक ख़ाना आता है जिसमें तीन विकल्प हैं: अधिवक्ता, स्वयं आवेदक, या हस्तक्षेपकर्ता। यूज़र मैनुअल कहता है कि पोर्टल पर व्यक्ति के तौर पर पंजीकरण के लिए बार पंजीकरण संख्या नहीं चाहिए; वह सिर्फ़ अधिवक्ता वाले पंजीकरण में माँगी जाती है।

प्रक्रिया भी दीवानी अदालत जैसी नहीं है। धारा 22(1) कहती है कि अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता से बँधा नहीं है और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों से चलेगा। धारा 22(3) उसे गवाह बुलाने, दस्तावेज़ मँगाने, शपथपत्र पर सबूत लेने और अपने ही फ़ैसलों पर पुनर्विचार करने की वही शक्तियाँ देती है जो मुक़दमे की सुनवाई में सिविल अदालत के पास होती हैं।

दूसरी तरफ़ कौन खड़ा होगा, यह धारा 23(2) तय करती है। सरकार या संबंधित निकाय एक या एक से अधिक विधि व्यवसायियों को, या अपने ही किसी अधिकारी को, प्रस्तुतकर्ता अधिकारी के तौर पर प्राधिकृत कर सकता है।

ई-फ़ाइलिंग अनिवार्य है, काग़ज़ की नक़ल भी

20 सितंबर की विज्ञप्ति में डिजिटल सुविधाओं की एक सूची है: एडवांस केस इन्फ़ॉर्मेशन सिस्टम, ई-फ़ाइलिंग, वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग, ऑनलाइन डिस्प्ले बोर्ड, एसएमएस और ई-मेल अलर्ट, कोर्ट फ़ीस का ऑनलाइन भुगतान, मोबाइल से मुक़दमे की जानकारी, ऑनलाइन अभिप्रमाणित प्रति, उन्नत सर्च, ई-मेंशनिंग और ई-लिस्टिंग।

इस सूची के आमने-सामने कैट का अपना दस्तावेज़ रखा जा सकता है। ई-फ़ाइलिंग पोर्टल पर एक एफ़एक्यू पीडीएफ़ रखी है, जिसकी फ़ाइल 15 मई 2023 को बनी थी। वह कहती है कि ई-फ़ाइलिंग सभी बेंचों पर उपलब्ध है; मूल आवेदन से लेकर अवमानना याचिका, पुनर्विचार आवेदन और जवाब तक इसी खिड़की से जाते हैं; सिर्फ़ पीडीएफ़ चढ़ेंगी, मूल आवेदन के लिए साठ एमबी और बाक़ी के लिए तीस एमबी तक; और ओसीआर तथा बुकमार्क दोनों अनिवार्य हैं।

दो जवाब इस सूची से आगे जाते हैं। प्रश्न 11 पूछता है कि क्या कैट में मुक़दमा ऑनलाइन दाख़िल करना अनिवार्य है। जवाब है, हाँ। प्रश्न 7 और 10 कहते हैं कि याचिका की हार्ड कॉपी फ़ाइलिंग काउंटर पर जमा करनी ही होगी, ऑनलाइन फ़ाइलिंग की पुष्टि पर्ची के साथ।

बेलारूस के राष्ट्रीय अभिलेखागार का भंडार-कक्ष, पहियों पर चलने वाली अलमारियाँ और लेबल लगे डिब्बे। यह किसी भारतीय अदालत का रिकॉर्ड-कक्ष नहीं है, पर काग़ज़ ऐसे ही डिब्बों में टिका रहता है, चाहे नियम कुछ भी कहें।
तस्वीर: Homoatrox, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

तीसरा जवाब विज्ञप्ति से टकराता है। प्रश्न 8 पूछता है कि क्या फ़ीस ऑनलाइन दी जा सकती है, और उत्तर कहता है कि उपयोगकर्ता के पास ऑफ़लाइन तरीक़े का विकल्प है, और यह कार्यालय भविष्य में भारतकोष पोर्टल से ऑनलाइन भुगतान शुरू करेगा। विज्ञप्ति इसी सुविधा को शुरू हो चुकी सुविधाओं में गिनाती है। यह दो सरकारी दस्तावेज़ों के बीच का फ़र्क़ है, तीन साल के फ़ासले पर। यह रिपोर्ट इसे सुलझाती नहीं।

अभिप्रमाणित प्रति वाला दावा जाँचा जा सकता है। उसके लिए अलग यूज़र मैनुअल है, फ़ाइल 29 जनवरी 2025 की। आवेदन लॉगिन के बाद होता है, बेंच, केस नंबर और साल चुनकर; शुल्क तत्काल में दो रुपये प्रति पन्ना और साधारण में एक रुपया; और प्रति दफ़्तर से या डाक से मिलती है।

पोर्टल अपने बारे में क्या कहता है, वह भी देखिए। हर पन्ने के ऊपर यह चेतावनी छपी रहती है कि वेबसाइट परीक्षण के दौर में है और उपयोगकर्ता सिर्फ़ इस जानकारी पर भरोसा न करें। मदद वाले पन्ने पर इतना लिखा मिलता है कि सामग्री कैट से आनी बाक़ी है। नागरिक चार्टर और फ़ॉर्म डाउनलोड के पन्नों पर तालिका के शीर्षक हैं और उनके नीचे कोई पंक्ति नहीं। दिशानिर्देशों वाले पन्ने के ऊपर मुंबई के राज्य प्रशासनिक अधिकरण की ई-फ़ाइलिंग का नाम लिखा है। बेंचवार हेल्पलाइन सूची की फ़ाइल 20 फ़रवरी 2026 की है, और उन्नीस में से छह बेंचों के आधिकारिक पते जीमेल या याहू के हैं।

नियम 14(2) की छह महीने वाली समय-सीमा

पाठक का असली सवाल यही है कि कितना वक़्त लगेगा। नियमों में इसका जवाब है। नियम 14(2) कहता है कि हर आवेदन, जहाँ तक हो सके, उसके पंजीकरण की तारीख़ से छह महीने के भीतर सुना और तय किया जाएगा।

बाक़ी घड़ियाँ इसी के इर्द-गिर्द बँधी हैं। नियम 12(1) कहता है कि जो प्रतिवादी मुक़ाबला करना चाहता है वह नोटिस की तामील से एक महीने के भीतर तीन प्रतियों में जवाब और दस्तावेज़ दाख़िल करेगा; नियम 12(5) अधिकरण को इसके बाद भी जवाब लेने की छूट देता है। नियम 17 कहता है कि पुनर्विचार का आवेदन आदेश की तारीख़ से तीस दिन के भीतर आना चाहिए। अनुपस्थिति में ख़ारिज हुई अर्ज़ी को बहाल कराने का आवेदन भी नियम 15(2) के तहत तीस दिन में देना होता है।

दफ़्तर का समय भी नियमों में है। नियम 26 के मुताबिक़ शनिवार, इतवार और सार्वजनिक अवकाश छोड़कर कार्यालय सुबह 9.30 से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। नियम 22(1) कहता है कि हर अंतरिम और अंतिम आदेश दोनों पक्षों को भेजा जाएगा, हाथोंहाथ या रजिस्टर्ड डाक से, बिना किसी शुल्क के।

अब वह आँकड़ा जो कहीं नहीं मिला। इकतालीस बरस में दायर हुए मामलों पर निकली 93 फ़ीसदी की निपटारा दर यह नहीं बताती कि आज दाख़िल हुई अर्ज़ी में कितना समय लगेगा। 20 सितंबर की विज्ञप्ति में न किसी लंबित मामले की औसत उम्र है, न 30 जून 2026 तक की बेंचवार लंबित संख्या, और यह डेस्क इन दोनों को कहीं प्रकाशित नहीं पा सकी।

एक क़ानून इसी साल बना है जो ऐसे आँकड़े रखने की बात करता है। अधिकरण सुधार अधिनियम, 2026 को मंज़ूरी 13 अगस्त 2026 को मिली और वह 25 अगस्त 2026 की अधिसूचना का.आ. 4713(अ) से प्रवृत्त हुआ। उसकी धारा 2(f) राष्ट्रीय अधिकरण डेटा ग्रिड को ऐसे पोर्टल के तौर पर परिभाषित करती है जिसमें पहली अनुसूची वाले अधिकरणों के मुक़दमों की सारी जानकारी रखी जाएगी, और धारा 4(d) उसे चलाने की ज़िम्मेदारी राष्ट्रीय अधिकरण आयोग पर डालती है। कैट उस अनुसूची में क्रम संख्या 3 पर है। आयोग ख़ुद धारा 3 के तहत उस तारीख़ से बनेगा जो केंद्र सरकार अधिसूचित करे, और वह अधिसूचना इस डेस्क को नहीं मिली।

जम्मू बेंच का हिसाब: 78.15 फ़ीसदी और 9,045 लंबित

जम्मू और श्रीनगर की बेंचें 2020 में बनीं। उससे पहले यह क़ानून वहाँ लागू ही नहीं था। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की धारा 95 और पाँचवीं अनुसूची की सारणी 1 केंद्रीय क़ानूनों को संघ राज्यक्षेत्रों तक बढ़ाती है, और उसकी प्रविष्टि 2 प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 है, इस निर्देश के साथ कि धारा 1(2) का खंड (ख) हटा दिया जाए। इंडिया कोड की पाद-टिप्पणी यह हटाना 31 अक्टूबर 2019 से दर्ज करती है। फिर 28 मई 2020 को दो अधिसूचनाएँ निकलीं। सा.का.नि. 317(अ) ने धारा 5(7) के तहत जम्मू और श्रीनगर को न्यायपीठों के बैठने की जगह बताया, और सा.का.नि. 318(अ) ने 1985 की सारणी में क्रम 18 पर जम्मू न्यायपीठ जोड़कर उसे दोनों संघ राज्यक्षेत्रों का अधिकार क्षेत्र दिया। 17 नवंबर 2021 की सा.का.नि. 805(अ) ने यह क्षेत्र बाँटा: डोडा, जम्मू, कठुआ, किश्तवाड़, रियासी, पुंछ, राजौरी, रामबन, सांबा, उधमपुर और लेह जम्मू के पास, और श्रीनगर, अनंतनाग, बांदीपोरा, बारामूला, बडगाम, गांदरबल, कुलगाम, कुपवाड़ा, पुलवामा, शोपियाँ तथा करगिल नई श्रीनगर न्यायपीठ के पास।

अब विज्ञप्ति के आँकड़े। देश भर में अधिकरण की स्थापना से 30 जून 2026 तक 10,01,177 मामले दायर हुए और 9,32,723 निपटे; विज्ञप्ति ख़ुद दर निकालकर लिखती है, "लगभग 93.16 प्रतिशत"। भाग देने पर 93.163 फ़ीसदी आता है, यानी विज्ञप्ति का अपना आँकड़ा सही है। लंबित 68,454 बचते हैं।

जम्मू के आँकड़े अगले पैराग्राफ़ में हैं। जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट से स्थानांतरित होकर 20,984 मामले आए और बेंच के सामने 20,405 नए मामले दायर हुए। इन दोनों श्रेणियों में क्रमशः 18,392 और 13,952 निपटे। इसके बाद विज्ञप्ति का वाक्य है: "कुल मिलाकर 41,389 मामले आए और बहुत कम मामले ही लंबित बचे।"

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट का गुंबद और न्याय की प्रतिमा। जम्मू बेंच से नहीं, इसी अदालत तक अनुच्छेद 136 वाला रास्ता एल. चंद्र कुमार फ़ैसले के बाद जाता है।
तस्वीर: Subhashish Panigrahi, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

जोड़ यहीं करना होगा। 18,392 और 13,952 मिलकर 32,344 होते हैं। 41,389 में से 32,344 घटाने पर 9,045 बचते हैं। 32,344 को 41,389 से भाग देने पर निपटारा दर 78.15 फ़ीसदी आती है, और लंबित हिस्सा 21.85 फ़ीसदी। दोनों श्रेणियों की दरें अलग-अलग हैं: स्थानांतरित मामलों में 87.65 फ़ीसदी निपटे और 2,592 लंबित हैं, बेंच के अपने नए मामलों में 68.38 फ़ीसदी निपटे और 6,453 लंबित हैं।

यह 78.15 देश भर की 93.16 से पंद्रह प्रतिशत अंक नीचे है। इससे यह नहीं निकलता कि मंत्री ने कोई ग़लत बात कही। उनका दावा संख्या और रफ़्तार का है, और विज्ञप्ति कहीं यह नहीं कहती कि इस बेंच की दर राष्ट्रीय दर से ऊपर है। आमने-सामने एक ही दस्तावेज़ के दो हिस्से हैं: यह वाक्य कि बहुत कम मामले ही लंबित बचे, और उसी पैराग्राफ़ के आँकड़ों से निकलता 9,045 का घटाव।

संख्या वाले दावे की जाँच नहीं हो सकी। देश की बाक़ी बेंचों के निपटारे के आँकड़े विज्ञप्ति में नहीं हैं और यह डेस्क उन्हें कहीं से हासिल नहीं कर पाई। दर का मुक़ाबला संख्या के मुक़ाबले की जगह नहीं ले सकता।

दो और बातें विज्ञप्ति में साफ़ नहीं हैं। जिस पैराग्राफ़ में 41,389 का आँकड़ा है वह शुरू जम्मू और श्रीनगर दोनों बेंचों के ज़िक्र से होता है और फिर एकवचन में बेंच लिखता है, इसलिए यह तय नहीं होता कि आँकड़ा अकेले जम्मू का है या दोनों का। दूसरी बात अपील की है। विज्ञप्ति कहती है कि जम्मू बेंच के मात्र 8 फ़ीसदी मामले अपील में हाई कोर्ट गए, पर यह नहीं बताती कि 8 फ़ीसदी किसका: 41,389 का आठ फ़ीसदी 3,311 होता है, और 32,344 का आठ फ़ीसदी 2,588। बेंच की शुरुआत एक डिवीजन बेंच से हुई थी, और अभी वहाँ दो न्यायिक और दो प्रशासनिक सदस्य हैं।

अपील का रास्ता, और मंत्री का वाक्य

अधिनियम ख़ुद अपील का दरवाज़ा बंद करता दिखता है। धारा 27 कहती है कि आवेदन या अपील को अंतिम रूप से निपटाने वाला आदेश अंतिम होगा और हाई कोर्ट समेत किसी न्यायालय में उस पर सवाल नहीं उठाया जाएगा। उसका पालन उसी तरह कराया जाएगा जैसे विभाग के अपने अंतिम आदेश का। धारा 28 सुप्रीम कोर्ट और औद्योगिक विवाद अधिनियम वाले अधिकरणों तथा श्रम न्यायालयों को छोड़कर बाक़ी सब अदालतों का अधिकार क्षेत्र हटा देती है।

1997 में सात जजों ने इस ढाँचे को दोबारा खींचा। एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ का फ़ैसला 18 मार्च 1997 को आया, और पीठ में मुख्य न्यायाधीश ए.एम. अहमदी के साथ एम.एम. पुंछी, के. रामास्वामी, एस.पी. भरूचा, एस. सग़ीर अहमद, के. वेंकटस्वामी और के.टी. थॉमस थे। फ़ैसले का पैरा 100 कहता है कि अनुच्छेद 323क के खंड 2(घ) और अनुच्छेद 323ख के खंड 3(घ) उस हद तक असंवैधानिक हैं जिस हद तक वे अनुच्छेद 226, 227 और 32 के तहत हाई कोर्टों और सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र हटाते हैं। इसी हद तक अधिनियम की धारा 28 भी असंवैधानिक है। उसी पैरा में यह भी है कि इन अधिकरणों के सारे फ़ैसले उस हाई कोर्ट की खंडपीठ की जाँच के अधीन होंगे जिसके अधिकार क्षेत्र में वह अधिकरण पड़ता है। पर अधिकरण पहली अदालत ही रहेंगे, इसलिए मुक़दमेबाज़ सीधे हाई कोर्ट नहीं जा सकता।

पैरा 93 ऊपर का रास्ता बदलता है। अब अधिकरण के फ़ैसले से सीधे सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 136 की अपील नहीं जाएगी; पीड़ित पक्ष अनुच्छेद 226 या 227 के तहत हाई कोर्ट जाएगा, और खंडपीठ के फ़ैसले के बाद ही अनुच्छेद 136 का दरवाज़ा खुलेगा।

मंत्री ने 20 सितंबर को इस ढाँचे के आर-पार जाती बात कही। उन्होंने कहा कि अपील की व्यवस्था अपनी जगह सही है, पर बार-बार या बेवजह आगे क़ानूनी लड़ाई लड़ने से प्रक्रिया लंबी हो सकती है। इसके बाद का वाक्य विज्ञप्ति में उद्धरण चिह्नों के भीतर है: "आदर्श स्थिति तो वह होगी जब अपील करने की कोई गुंजाइश न बचे, ऐसी कोई प्रवृत्ति न रहे, कोई तनाव न रहे, कोई उम्मीद न रहे और इसकी कोई जरूरत न रहे।" विज्ञप्ति के मुताबिक़ उन्होंने यह मसला क़ानून के जानकारों पर छोड़ा और उनसे सुझाव माँगे।

क़ानून इस वक़्त इससे अलग बात कहता है। धारा 17 अधिकरण को अवमानना में हाई कोर्ट जितनी शक्ति देती है, और एल. चंद्र कुमार के बाद उसके हर आदेश पर खंडपीठ तक जाने का रास्ता खुला रहता है। नियुक्तियों वाला हिस्सा इसी साल बदला है। अधिकरण सुधार अधिनियम, 2026 की दूसरी अनुसूची ने 1985 के अधिनियम की धारा 10B की जगह नई धारा रखी है, जिसके मुताबिक़ अब कैट के अध्यक्ष और सदस्यों की योग्यता, चयन, नियुक्ति, वेतन-भत्ते और हटाया जाना उसी 2026 के क़ानून से तय होंगे।

स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय, 20 सितंबर 2026 (विज्ञप्ति संख्या 2312764): जम्मू बेंच के नए परिसर का उद्घाटन, राष्ट्रीय और जम्मू के आँकड़े, 50 रुपये की फ़ीस, डिजिटल सुविधाओं की सूची और अपील पर मंत्री का बयान, इंडिया कोड: प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 (1985 का अधिनियम 13), धारा 1, 2, 3, 4, 5, 14, 15, 17, 19, 20, 21, 22, 23, 27 और 28 का पाठ तथा पाद-टिप्पणियाँ, इंडिया कोड पर भारत का राजपत्र, असाधारण, भाग II खंड 3(i): केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (प्रक्रिया) नियम, 1987, सा.का.नि. 17(अ), 6 जनवरी 1987, नियम 4 से 27 और अनुबंध क के फ़ॉर्म I, II, III तथा IV, इंडिया कोड: कैट (प्रक्रिया) संशोधन नियम, 2014, सा.का.नि. 747(अ), 27 अक्टूबर 2014, नियम 5(3) में तीस दिन का परंतुक, और पाद-टिप्पणी में 1987 के मूल नियमों के छह पुराने संशोधनों की सूची, इंडिया कोड: सा.का.नि. 317(अ) और सा.का.नि. 318(अ), दोनों 28 मई 2020, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग: जम्मू और श्रीनगर को कैट की न्यायपीठों के स्थान के रूप में विनिर्दिष्ट करना, और 26 जुलाई 1985 की सा.का.नि. 610(अ) की सारणी में जम्मू न्यायपीठ को क्रम 18 पर जोड़ना, इंडिया कोड: सा.का.नि. 805(अ), 17 नवंबर 2021: जम्मू और श्रीनगर न्यायपीठों के बीच ज़िलेवार अधिकार क्षेत्र का बँटवारा, और 1985 की मूल अधिसूचना के तेरह संशोधनों की सूची, इंडिया कोड: जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 (2019 का अधिनियम 34), धारा 95, धारा 100 और पाँचवीं अनुसूची की सारणी 1 की प्रविष्टि 2, इंडिया कोड: अधिकरण सुधार अधिनियम, 2026 (2026 का अधिनियम 17), 13 अगस्त 2026; धारा 2(f), 3, 4, 17, 18 और 24, पहली अनुसूची की प्रविष्टि 3 तथा दूसरी अनुसूची की प्रविष्टि 3; 25 अगस्त 2026 की अधिसूचना का.आ. 4713(अ) से प्रवृत्त, एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ, (1997) 3 एससीसी 261, सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की पीठ, 18 मार्च 1997: पैरा 92, 93 और 100, कैट की ई-फ़ाइलिंग एफ़एक्यू, efiling.cgat.gov.in पर रखी पीडीएफ़ (फ़ाइल 15 मई 2023 की बनी): प्रश्न 3, 4, 5, 6, 7, 8, 10, 11 और 14, कैट ई-फ़ाइलिंग यूज़र मैनुअल, 53 पन्ने (फ़ाइल 15 मई 2023 की बनी): पंजीकरण के चरण, व्यक्तिगत आवेदक के लिए बार पंजीकरण की छूट, और भुगतान का चरण 13, कैट: अभिप्रमाणित प्रति के लिए यूज़र मैनुअल (फ़ाइल 29 जनवरी 2025 की बनी): लॉगिन के बाद आवेदन, तत्काल दो रुपये और साधारण एक रुपया प्रति पन्ना, और डिलीवरी के दो तरीक़े, कैट: बेंचवार हेल्पलाइन सूची (फ़ाइल 20 फ़रवरी 2026 की बनी): उन्नीस बेंचों के ई-मेल पते और संपर्क अधिकारी, कैट की केस सूचना प्रणाली, cis.cgat.gov.in: बेंच सूची, कॉज़लिस्ट, केस स्टेटस और डेली ऑर्डर के पन्ने

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।