मोइरांग में तिरंगा फहराने के लिए जो जगह चुनी गई, वह इसलिए चुनी गई कि वहाँ राजाओं का राजतिलक होता था
14 अप्रैल 1944 की शाम, आज़ाद हिंद फ़ौज के बहादुर ग्रुप के कर्नल शौकत अली मलिक ने मोइरांग कांगला पर झंडा फहराया। सामने क़रीब चालीस स्थानीय लोग थे। उनमें से एक बाद में मणिपुर के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने।

लोकतक झील के किनारे एक क़स्बा है जिसका नाम मोइरांग है।
उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन इस हफ़्ते पूर्वोत्तर के अपने चार दिन के दौरे में वहाँ के आईएनए संग्रहालय और युद्ध स्मारक जाएँगे।
जिस घटना की याद में वह स्मारक है, उसकी तारीख़ 14 अप्रैल 1944 है, और उसका ब्योरा जितना जाना-पहचाना है, उसका एक हिस्सा उतना ही अनदेखा।
वह हिस्सा जगह के चुनाव का है।
पहले घटना
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापानी सेना और आज़ाद हिंद फ़ौज ने बर्मा की तरफ़ से भारत की सीमा पार की और मणिपुर की तरफ़ बढ़े।
आज़ाद हिंद फ़ौज की एक इकाई थी जिसे बहादुर ग्रुप कहा जाता था। यह ख़ुफ़िया काम की इकाई थी, यानी वह आगे बढ़कर जानकारी जुटाती थी और स्थानीय लोगों से संपर्क बनाती थी।
उस इकाई के कमांडर कर्नल शौकत अली मलिक थे।
14 अप्रैल 1944 की शाम उन्होंने मोइरांग कांगला पर तिरंगा फहराया।
झंडे पर छलाँग लगाते बाघ का निशान था, जो आज़ाद हिंद फ़ौज का चिह्न था।
वहाँ मौजूद लोगों की संख्या क़रीब चालीस बताई जाती है, और वे स्थानीय लोग थे।
यह जगह इसके बाद तीन महीने तक आज़ाद हिंद की अस्थायी सरकार का आधार रही, जिसने मणिपुर के कुछ हिस्सों का प्रशासन चलाया।
"बहादुर ग्रुप" क्या था
इस कहानी में जो इकाई सबसे आगे थी, उसका काम लड़ाई नहीं था।
आज़ाद हिंद फ़ौज की संरचना में कुछ इकाइयाँ ख़ुफ़िया काम के लिए बनीं, और बहादुर ग्रुप उन्हीं में था। ऐसी इकाइयों का काम मुख्य सेना से आगे बढ़कर इलाक़े की जानकारी जुटाना, रास्ते देखना, और स्थानीय आबादी से संपर्क बनाना होता है।
यह अंतर मोइरांग की घटना को समझने के लिए ज़रूरी है।
अगर वहाँ पहुँचने वाली इकाई एक लड़ाकू पलटन होती, तो वह क़स्बे पर क़ब्ज़ा करती और अपनी सुविधा की जगह पर झंडा लगाती। ख़ुफ़िया इकाई का पूरा काम ही स्थानीय लोगों से बात करना था, इसलिए उसने वही किया जो ऐसी इकाई करती है: उसने पूछा।
और जब पूछा गया, तो जवाब वहाँ के लोगों की परंपरा से आया।
यही वजह है कि झंडा किसी सरकारी इमारत पर नहीं, किसी पुल या चौराहे पर नहीं, बल्कि कांगला पर लगा।
अब वह जगह
मोइरांग कांगला कोई मैदान या चौराहा नहीं है।
मैतेई परंपरा में कांगला का अर्थ ही सत्ता का स्थान है। मोइरांग कांगला वह जगह है जहाँ मोइरांग रियासत के प्राचीन राजाओं का राजतिलक होता था।
इससे भी पीछे जाइए तो यह जगह थांगजिंग से जुड़ी है। मैतेई परंपरा में थांगजिंग मोइरांग वंश के प्रधान देवता माने जाते हैं, और उनका अधिकार लोकतक झील पर भी माना जाता है। उन्हें मोइरांग रियासत का संस्थापक और रक्षक माना जाता है, और यह भी माना जाता है कि वे कभी एक वास्तविक राजा थे जिन्हें बाद में देवता के रूप में पूजा गया।
उनका मंदिर आज भी लोकतक के किनारे मोइरांग में है, और वह इंफाल घाटी के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों और अनुष्ठान केंद्रों में गिना जाता है।
और मोइरांग एक और चीज़ के लिए जाना जाता है, जो शायद सबसे बड़ी है।
खंबा-थोइबी की कथा यहीं की है।
यह मैतेई साहित्य का महाकाव्य है, मोइरांग शयोन और मोइरांग कांगलैरोल परंपरा का हिस्सा, जिसमें खुमान खंबा नायक है और मोइरांग थोइबी नायिका। इस कथा में थांगजिंग खंबा के रक्षक के रूप में आते हैं।
यानी 1944 में जिस ज़मीन पर वह झंडा गड़ा, वह ज़मीन उस इलाक़े के लोगों के लिए पहले से राजा, देवता और महाकाव्य, तीनों की ज़मीन थी।

लोकतक, जो इस कहानी की पृष्ठभूमि है
मोइरांग जिस झील के किनारे है, वह पूर्वोत्तर भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है।
लोकतक की सबसे जानी-पहचानी चीज़ उसके तैरते हुए द्वीप हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में फुमदी कहते हैं। ये वनस्पति, मिट्टी और सड़े हुए कार्बनिक पदार्थ की परतें हैं जो पानी पर तैरती हैं और इतनी मज़बूत होती हैं कि उन पर चला जा सके और झोपड़ी बनाई जा सके।
इन्हीं में से एक बड़ी फुमदी पर केइबुल लामजाओ है, जिसे दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान कहा जाता है। वहाँ संगाई नाम का हिरण रहता है, जो मणिपुर का राज्य पशु है।
यह भूगोल 1944 की घटना से सीधे जुड़ा है, और दो तरह से।
पहला यह कि झील और उसके आसपास की दलदली ज़मीन ने उस पूरे अभियान की चाल तय की। बरसात में यह इलाक़ा भारी वाहनों के लिए बंद हो जाता है, और इंफाल अभियान की असफलता के कारणों में मौसम और रसद सबसे ऊपर गिने जाते हैं।
दूसरा यह कि थांगजिंग का अधिकार इसी झील पर माना जाता है। जिस देवता की ज़मीन पर वह झंडा फहराया गया, उनकी सत्ता की सीमा यही पानी है।
चुनाव किसने किया
यह जगह बाहर से आई फ़ौज ने नहीं चुनी।
रिकॉर्ड में दर्ज है कि यह जगह श्री एम. कोइरेंग सिंह और उनके साथियों ने चुनी, इस आधार पर कि कांगला एक पवित्र स्थान है और सत्ता का आसन है, जहाँ प्राचीन राजाओं का राजतिलक होता था।
यह ब्योरा इस पूरी घटना का अर्थ बदल देता है।
एक विदेशी अभियान के साथ आई फ़ौज अगर किसी क़स्बे में झंडा फहराए, तो वह एक सैनिक कार्रवाई है। पर अगर उस क़स्बे के अपने लोग यह तय करें कि झंडा कहाँ गड़ेगा, और वे उसके लिए अपनी सबसे पवित्र जगह चुनें, तो वह एक अलग तरह की घटना बन जाती है।
पहली स्थिति में स्थानीय लोग दर्शक हैं। दूसरी में वे भागीदार हैं।
मोइरांग में जो हुआ, वह दूसरी स्थिति थी।
वह आदमी जिसने जगह चुनी
मैरेम्बम कोइरेंग सिंह का जन्म 19 दिसंबर 1915 को मोइरांग में हुआ था।
1944 में वे अट्ठाईस साल के थे।
रिकॉर्ड के अनुसार उनके नेतृत्व में स्वतंत्रता सेनानियों के एक समूह ने ट्रोंग्लाओबी, मोइरांग में भारत-जापान अग्रिम टुकड़ी का स्वागत किया, और उन्हीं के साथ कर्नल शौकत अली मलिक ने मोइरांग कांगला पर झंडा फहराया।
उन्नीस साल बाद, 1963 में, वही व्यक्ति मणिपुर के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने। वे कांग्रेस से थे और 1963 से 1969 के बीच तीन कार्यकालों में मुख्यमंत्री रहे। 1994 में उनका निधन हुआ।
उनके बारे में एक और बात दर्ज है, जो 1944 से पहले की है और उनके स्वभाव के बारे में बताती है। वे मणिपुर की राजशाही की सामाजिक असमानताओं के मुखर आलोचक थे, और उन्होंने ख़ास तौर पर उस कर का विरोध किया था जो वंचित तबक़े पर माथे पर चंदन तिलक लगाने के लिए लगाया गया था।
यह ब्योरा इसलिए मायने रखता है कि यह उस व्यक्ति को एक ढाँचे में रख देता है। जो आदमी अपने ही राजा की सामाजिक व्यवस्था पर सवाल उठा रहा था, उसने एक ऐसी सेना का स्वागत किया जो एक बड़ी सत्ता को हटाने आई थी।
और जो उसी समय आसपास हो रहा था
14 अप्रैल 1944 की उस शाम के आसपास मणिपुर में जो चल रहा था, वह इस देश के इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाइयों में से एक थी।
जापानी सेना का अभियान इंफाल और कोहिमा पर था। महीनों तक घेराबंदी चली, बारिश शुरू हुई, रसद टूटी, और अंततः वह अभियान असफल रहा।
मोइरांग में जो हुआ, वह उस बड़े अभियान का एक छोटा और सबसे पश्चिमी सिरा था।
इसी वजह से इस घटना के बारे में दो तरह की बातें चलती हैं, और दोनों में से कोई भी पूरी नहीं है।
एक तरफ़ इसे भारत की मुक्ति की शुरुआत बताया जाता है, जो अतिशयोक्ति है, क्योंकि कुछ महीनों में वह पूरा अभियान पीछे हट गया।
दूसरी तरफ़ इसे एक प्रतीकात्मक घटना कहकर टाल दिया जाता है, जो भी पूरी बात नहीं है, क्योंकि तीन महीने तक वहाँ एक वैकल्पिक प्रशासन चला और उसमें स्थानीय लोग शामिल थे।

जो चीज़ इस घटना को दूसरों से अलग करती है
आज़ादी की लड़ाई में झंडे फहराने की कई घटनाएँ दर्ज हैं। उनमें से ज़्यादातर विरोध की घटनाएँ हैं: किसी ने पुलिस के सामने झंडा फहराया, गिरफ़्तार हुआ, झंडा उतार दिया गया।
मोइरांग की घटना उस श्रेणी में नहीं आती, और इसका कारण अवधि है।
वहाँ झंडा उतारा नहीं गया। उसके बाद तीन महीने तक उस इलाक़े में आज़ाद हिंद की अस्थायी सरकार का प्रशासन चला।
तीन महीने का प्रशासन क्या होता है, यह सोचने लायक़ है। इसका मतलब है कि किसी ने विवाद सुने होंगे, राशन का हिसाब रखा होगा, आने-जाने की अनुमति दी होगी।
इस दौर का विस्तृत रिकॉर्ड आसानी से उपलब्ध नहीं है, और यही इस कहानी का सबसे बड़ा ख़ालीपन है। जो तीन महीने सबसे ज़्यादा बताने लायक़ हैं, उनका ब्योरा सबसे कम मिलता है।
एक कारण यह है कि जब वह अभियान पीछे हटा, तो जो लोग उसमें शामिल थे उनके लिए इसका रिकॉर्ड रखना ख़तरा बन गया।
दूसरा कारण यह है कि आज़ादी के बाद के दशकों में आज़ाद हिंद फ़ौज का इतिहास लिखने का काम असमान रहा। जो हिस्से सिंगापुर, रंगून और दिल्ली के मुक़दमों से जुड़े थे, वे ज़्यादा लिखे गए। जो हिस्सा मणिपुर के एक क़स्बे में तीन महीने चला, वह कम।
तारीख़ों की गड़बड़
इस घटना के बारे में जो सामग्री उपलब्ध है, उसमें दो तरह की ग़लतियाँ बार-बार मिलती हैं, और उन्हें दर्ज करना ज़रूरी है।
पहली, साल की। कुछ जगहों पर यह घटना 1945 की बताई जाती है। यह ग़लत है। इंफाल-कोहिमा का अभियान 1944 का है और उस साल के अंत तक जापानी सेना पीछे हट चुकी थी।
दूसरी, तारीख़ की। कुछ जगहों पर 12 अप्रैल भी मिलता है।
जो स्रोत सबसे ज़्यादा और सबसे लगातार मिलते हैं, वे 14 अप्रैल 1944 की शाम बताते हैं, और मणिपुर में यह तारीख़ हर साल इसी रूप में मनाई जाती है।
एक तीसरी उलझन नाम की है। कर्नल का नाम कहीं शौकत अली मलिक लिखा मिलता है और कहीं शौकत हयात अली मलिक। यह लेख पहला रूप इस्तेमाल कर रहा है क्योंकि वही ज़्यादा जगह मिलता है, पर दोनों एक ही व्यक्ति के हैं।
ऐसी घटनाओं के साथ यह आम है। जो चीज़ हर साल दोहराई जाती है, उसका ब्योरा दोहराव में घिसता जाता है, और अस्सी साल बाद कई संस्करण चल पड़ते हैं।
संग्रहालय
आज मोइरांग में जो है, वह एक संग्रहालय और एक युद्ध स्मारक है, जिसे मणिपुर सरकार चलाती है।
ऐसे संग्रहालय एक ख़ास काम करते हैं। वे उस जगह को चिह्नित रखते हैं जहाँ कुछ हुआ था, और उसके बिना जगह सिर्फ़ ज़मीन रह जाती है।
पर उनकी एक सीमा भी है। संग्रहालय आम तौर पर एक कहानी सुनाता है, और मोइरांग की कहानी में कम से कम तीन परतें हैं।
सबसे ऊपर की परत 1944 की है, जो सबसे ज़्यादा दिखती है।
उसके नीचे मोइरांग रियासत और उसके राजतिलक की परत है।
और सबसे नीचे थांगजिंग और खंबा-थोइबी की परत है, जो सदियों पुरानी है और जिसका इस इलाक़े के लोगों के रोज़मर्रा से आज भी सीधा रिश्ता है।
जो आगंतुक सिर्फ़ ऊपर की परत देखकर लौटता है, उसे यह समझ नहीं आता कि वह झंडा वहीं क्यों फहराया गया।
दौरे का बाक़ी कार्यक्रम
उपराष्ट्रपति का यह दौरा 6 से 9 सितंबर तक असम, मेघालय, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश का है।
गुवाहाटी में गीता नगर कॉलेज के स्वर्ण जयंती समारोह और श्रीमंत शंकरदेव स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह से शुरुआत है। फिर गौहाटी विश्वविद्यालय में शिलान्यास और छात्रों तथा शिक्षकों से संवाद, और उसके बाद शिलांग में सोसो थाम सभागार में एक सार्वजनिक कार्यक्रम।
मणिपुर में इंफाल के साथ मोइरांग का यह कार्यक्रम है और इंफाल के सैनिक विद्यालय का दौरा भी।
अरुणाचल में विधानसभा के विशेष सत्र में शामिल होना है, विधानसभा की गैलरी-सह-संग्रहालय देखना है, और न्येदार नामलो, जवाहरलाल नेहरू राज्य संग्रहालय तथा श्रवण एवं दृष्टिबाधित बच्चों के लिए डोनी पोलो मिशन विद्यालय जाना है।
इस पूरी सूची में एक बात दिखती है। इसमें ज़्यादातर जगहें संस्थाएँ हैं: कॉलेज, विश्वविद्यालय, विधानसभा, संग्रहालय, विद्यालय।
चार दिन में चार राज्य और उनमें इतनी जगहें, इसका मतलब है कि हर जगह पर समय कम होगा। ऐसे दौरों की प्रकृति यही होती है।
पर मोइरांग इस सूची में अकेली जगह है जो किसी संस्था का नाम नहीं है। वह एक जगह का नाम है, और वह इसलिए सूची में है कि वहाँ अस्सी साल पहले एक शाम कुछ हुआ था।
आख़िर में
चालीस लोग एक शाम एक मैदान में खड़े थे।
उनमें से एक अट्ठाईस साल का था और उन्नीस साल बाद उसी राज्य का मुख्यमंत्री बना।
जिस मिट्टी पर वह झंडा गड़ा, उस पर सदियों से राजाओं का तिलक होता आया था और उसी मिट्टी की एक प्रेमकथा उस इलाक़े का महाकाव्य है।
यह जगह चुनने वाले यह सब जानते थे। इसीलिए उन्होंने यही जगह चुनी।

स्रोतउपराष्ट्रपति सचिवालय, पूर्वोत्तर दौरे का कार्यक्रम, मैरेम्बम कोइरेंग सिंह का जीवन विवरण, मोइरांग का थांगजिंग मंदिर और मैतेई परंपरा, आईएनए संग्रहालय, मोइरांग, मणिपुर सरकार