साठ शब्दों के प्रस्ताव से शुरू हुई जंग आज भी अमेरिकी क़ानून में है
18 सितंबर 2001 को अमेरिकी राष्ट्रपति ने जिस संयुक्त प्रस्ताव पर दस्तख़त किए, उसमें फ़ौज भेजने का अधिकार देने वाला वाक्य साठ शब्दों का है। उसमें न किसी देश का नाम है, न ख़त्म होने की कोई तारीख़। पच्चीस साल बाद वह प्रस्ताव वहीं है, और उसी तारीख़ का 1906 वाला रिकॉर्ड भी वह नहीं कहता जो उसके नाम पर दोहराया जाता है।

अमेरिकी कांग्रेस ने 14 सितंबर 2001 को एक संयुक्त प्रस्ताव पास किया और राष्ट्रपति ने 18 सितंबर को उस पर दस्तख़त कर दिए। उसमें फ़ौज भेजने का अधिकार देने वाला वाक्य साठ शब्दों का है। उसमें किसी देश का नाम नहीं है, किसी संगठन का नाम नहीं है, और ख़त्म होने की कोई तारीख़ नहीं है।
पच्चीस साल बाद वह प्रस्ताव, पब्लिक लॉ 107-40, अमेरिकी क़ानून की किताब में जस का तस दर्ज है। उसे रद्द करने वाला विधेयक दिसंबर 2025 में पेश होकर समिति के पास चला गया और सदन के पटल तक नहीं पहुँचा।
हमले पर हमलावरों का ख़र्च 9/11 आयोग ने ख़ुद 4 से 5 लाख डॉलर आँका, यह लिखते हुए कि आँकड़े अधूरे हैं और यह मोटा अनुमान है। जवाब पर हुए ख़र्च का एक अनुमान ब्राउन यूनिवर्सिटी की कॉस्ट्स ऑफ़ वॉर परियोजना के पास है, क़रीब 8 लाख करोड़ डॉलर।
इसी तारीख़ का एक दूसरा रिकॉर्ड भी है, 1906 का, जिसे 2001 के बाद से हर साल दोहराया जाता है। मूल दस्तावेज़ उसमें वह नहीं कहते जो दोहराया जाता है।
उस सुबह का सेकंड-दर-सेकंड ब्योरा
9/11 आयोग की रिपोर्ट का पहला अध्याय समय को सेकंड तक दर्ज करता है। अमेरिकन एयरलाइंस की उड़ान 11 सुबह 8:46:40 पर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के उत्तरी टावर से टकराई। यूनाइटेड एयरलाइंस 175 ने 9:03:11 पर दक्षिणी टावर को मारा। अमेरिकन 77 सुबह 9:37:46 पर पेंटागन से टकराई। यूनाइटेड 93 पेंसिल्वेनिया में 10:03:11 पर गिरी, वॉशिंगटन से 125 मील दूर।
इस आख़िरी समय के साथ आयोग ने एक टिप्पणी जोड़ी है। उड़ान 93 के गिरने का सटीक वक़्त विवाद में रहा है, और 10:03:11 का आँकड़ा राष्ट्रीय परिवहन सुरक्षा बोर्ड के पुराने विश्लेषण के अलावा रडार, फ़्लाइट डेटा रिकॉर्डर, कॉकपिट वॉइस रिकॉर्डर, इन्फ़्रारेड उपग्रह आँकड़ों और हवाई यातायात नियंत्रण की रिकॉर्डिंग से निकाला गया है। दक्षिणी टावर 9:59 पर गिरा और उत्तरी टावर 10:28:25 पर। पहली टक्कर से आख़िरी इमारत गिरने तक एक घंटा 41 मिनट 45 सेकंड बीते।
उन्नीस आदमी चार अंतरमहाद्वीपीय उड़ानों में सवार थे। आयोग ने उस दिन मारे गए लोगों की संख्या 2,973 लिखी है और नौवें अध्याय के फ़ुटनोट 188 में उसका ब्योरा दिया है। न्यूयॉर्क के मुख्य चिकित्सा परीक्षक के कार्यालय से जारी मृत्यु प्रमाणपत्रों के हिसाब से वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 2,749 लोग मारे गए, जिनमें अपहृत विमानों में सवार यात्री शामिल हैं। पेंटागन पर 184 और उड़ान 93 में 40।
दमकल विभाग के 343 कर्मी मारे गए, पोर्ट अथॉरिटी पुलिस के 37 और न्यूयॉर्क पुलिस के 23। आयोग ने लिखा कि इन तीनों आँकड़ों को अपने-अपने वर्ग में सबसे बड़ा नुक़सान बताने का आधार सिर्फ़ यह है कि उसे इसके उलट कोई सबूत नहीं मिला। उत्तरी टावर के सीढ़ीघर बी में उस वक़्त बारह दमकलकर्मी, एक पोर्ट अथॉरिटी अफ़सर और तीन नागरिक थे। इमारत गिरने के बाद वे सोलह लोग ज़िंदा निकले।
साठ शब्दों का प्रस्ताव और उसका दायरा
प्रस्ताव की धारा 2(क) राष्ट्रपति को उन देशों, संगठनों या व्यक्तियों के ख़िलाफ़ "हर ज़रूरी और उपयुक्त बल" इस्तेमाल करने का अधिकार देती है जिन्हें वह ख़ुद तय करे कि उन्होंने 11 सितंबर 2001 के हमलों की योजना बनाई, उन्हें मंज़ूरी दी, अंजाम दिया या मदद दी, या ऐसे संगठनों को पनाह दी। यह पूरा वाक्य साठ शब्दों का है। इसमें अफ़ग़ानिस्तान का नाम नहीं है और अल-क़ायदा का भी नहीं।

संयुक्त प्रस्ताव अलग अध्याय के रूप में संहिताबद्ध नहीं हुआ; वह अमेरिकी संहिता के शीर्षक 50, धारा 1541 के साथ एक टिप्पणी के तौर पर दर्ज है।
धारा 2(ख) में कांग्रेस ने साफ़ किया कि यह वॉर पावर्स रिज़ॉल्यूशन के तहत विशिष्ट वैधानिक अधिकार है, और साथ यह भी कि इस प्रस्ताव से वॉर पावर्स रिज़ॉल्यूशन की कोई शर्त ख़त्म नहीं होती। प्रस्तावना की एक पंक्ति कहती है कि वे कृत्य अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के लिए "असाधारण और अप्रत्याशित ख़तरा" बने हुए हैं। वर्तमान काल में लिखी गई यह पंक्ति कभी संशोधित नहीं हुई।
कांग्रेशनल रिसर्च सर्विस की रिपोर्ट R43983 के मुताबिक़ इसी अधिकार के सहारे अफ़ग़ानिस्तान के बाहर पाकिस्तान, यमन, सोमालिया, लीबिया और सीरिया में कार्रवाइयाँ की गईं। कॉस्ट्स ऑफ़ वॉर की शोधकर्ता स्टेफ़नी सैवेल ने अमेरिकी आतंकरोधी गतिविधियों वाले देश गिने हैं: 2018 से 2020 के बीच 85, और 2021 से 2023 के बीच 78।
रद्द करने की कोशिशें होती रही हैं। 119वीं कांग्रेस में एच.आर. 6751 पेश हुआ, जो पब्लिक लॉ 107-40 को पूरी तरह निरस्त करता, और यह निरसन क़ानून बनने के 240 दिन बाद लागू होता। विधेयक दिसंबर 2025 में विदेश मामलों की समिति को भेजा गया और 2026 की शुरुआत तक वहीं था।
ख़र्च और मौतों का हिसाब, एक ही परियोजना के मुताबिक़
पच्चीस साल की क़ीमत का सबसे ज़्यादा हवाला दिया जाने वाला आँकड़ा ब्राउन यूनिवर्सिटी के वॉटसन इंस्टिट्यूट की कॉस्ट्स ऑफ़ वॉर परियोजना का है। उसके निष्कर्षों वाले पन्ने पर इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, सीरिया और अन्य जगहों की लड़ाइयों का कुल ख़र्च क़रीब 8 लाख करोड़ डॉलर बताया गया है, इस टीप के साथ कि इसमें आगे लिए जाने वाले क़र्ज़ का ब्याज शामिल नहीं है। पूर्व सैनिकों की देखभाल पर 2050 तक 2.2 से 2.5 लाख करोड़ डॉलर और लगने का अनुमान अलग से दिया गया है।
मौतों के दो आँकड़े दो अलग तरीक़ों से बने हैं। सीधी युद्ध-हिंसा में मरने वालों की संख्या 2001 से 2023 के बीच 9 लाख 40 हज़ार से ऊपर रखी गई है, जिनमें 4 लाख 32 हज़ार से ज़्यादा आम नागरिक हैं। अप्रत्यक्ष मौतें, यानी वे जो युद्ध से टूटी स्वास्थ्य सेवा, पानी, भोजन और बुनियादी ढाँचे की वजह से हुईं, 36 से 38 लाख के बीच आँकी गई हैं। पहला आँकड़ा गिनती है और दूसरा प्रतिरूपण, इसीलिए दूसरा एक निश्चित संख्या के बजाय दायरे में लिखा गया है। दोनों को जोड़कर परियोजना कुल संख्या 45 से 47 लाख बताती है।
विस्थापन का आँकड़ा आठ देशों का है: अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, इराक़, सीरिया, लीबिया, यमन, सोमालिया और फ़िलीपींस, कुल 3 करोड़ 80 लाख लोग। परियोजना के निष्कर्षों में एक पंक्ति यह भी है कि 9/11 के बाद की लड़ाइयों के सेवारत सैनिकों और पूर्व सैनिकों में आत्महत्या से मरने वालों की संख्या लड़ाई में मारे गए लोगों से कम से कम चार गुना है।
ये सब एक ही संस्था की एक ही पद्धति के आँकड़े हैं और इनकी अवधियाँ आपस में मेल नहीं खातीं। जो संस्थाएँ सिर्फ़ प्रलेखित नागरिक मौतें गिनती हैं, उनकी संख्याएँ इनसे कम रहती हैं, क्योंकि वे वही गिनती हैं जिसका दस्तावेज़ मौजूद हो।
चार लाख डॉलर से पाँच लाख डॉलर के बीच, आयोग के अपने अनुमान के मुताबिक़, हमले की पूरी योजना पर लगे थे।
जानकारी की कमी नहीं थी
आयोग ने अपनी रिपोर्ट के ग्यारहवें अध्याय में दस मौक़ों की सूची छापी है, जिसे उसने "ऑपरेशनल अपॉर्चुनिटीज़" कहा। जनवरी 2000 में सीआईए को पता चला कि ख़ालिद अल-मिहधार के पास वैध अमेरिकी वीज़ा है; उसने न उसका नाम निगरानी सूची में डाला, न एफ़बीआई को बताया।
मार्च 2000 में नवाफ़ अल-हज़मी के अमेरिकी वीज़ा और 15 जनवरी 2000 को लॉस एंजेलिस पहुँचने की जानकारी के साथ भी वही हुआ। अगस्त 2001 में एफ़बीआई मुख्यालय ने ज़कारियास मूसाउई के प्रशिक्षण और मान्यताओं से जुड़ी जानकारी की अहमियत नहीं पहचानी। दसवाँ मौक़ा यह था कि सीआईए और एफ़बीआई ने मिहधार, हज़मी और मूसाउई की मौजूदगी को आसन्न हमलों की सामान्य चेतावनियों से नहीं जोड़ा।
तत्कालीन सीआईए निदेशक जॉर्ज टेनेट ने आयोग से कहा कि 2001 की गर्मियों में उनकी दुनिया में "सिस्टम ब्लिंकिंग रेड" था। आयोग ने चार तरह की नाकामियाँ गिनाईं और सूची में सबसे पहले कल्पना की नाकामी रखी, नीति, क्षमता और प्रबंधन उसके बाद आए।
जवाब में बनी व्यवस्था ने और जानकारी जमा करने का रास्ता चुना। उसी सरकार के बनाए एक बोर्ड ने बारह साल बाद उसका हिसाब लगाया। प्राइवेसी एंड सिविल लिबर्टीज़ ओवरसाइट बोर्ड ने 23 जनवरी 2014 को यूएसए पैट्रियट एक्ट की धारा 215 के तहत चल रहे फ़ोन-रिकॉर्ड कार्यक्रम पर अपनी रिपोर्ट दी। उसमें लिखा है कि गोपनीय ब्रीफ़िंग और दस्तावेज़ों समेत जो जानकारी बोर्ड को मिली, उसके आधार पर उसे "एक भी ऐसा मामला नहीं मिला जिसमें अमेरिका पर ख़तरे से जुड़ी किसी आतंकरोधी जाँच के नतीजे में इस कार्यक्रम से ठोस फ़र्क़ पड़ा हो"।
बोर्ड ने आगे लिखा कि उसे ऐसा कोई मामला भी नहीं मिला जिसमें कार्यक्रम ने किसी अनजान साज़िश का पता लगाने या किसी हमले को रोकने में सीधा योगदान दिया हो। सात साल में सिर्फ़ एक मामले में उसने माना कि कार्यक्रम ने एक अज्ञात संदिग्ध की पहचान में शायद योगदान दिया, और उसी वाक्य में जोड़ा कि वह आदमी किसी हमले की योजना में शामिल नहीं था और एफ़बीआई शायद उस तक अपने आप पहुँच जाती।
जूते उतारने का नियम उन्नीस साल चला
19 नवंबर 2001 को पब्लिक लॉ 107-71, यानी एविएशन एंड ट्रांसपोर्टेशन सिक्योरिटी एक्ट, क़ानून बना। उससे पहले अमेरिकी हवाई अड्डों पर यात्रियों की जाँच विमान कंपनियों के ठेकेदार करते थे; इस क़ानून ने वह काम एक नई संघीय एजेंसी, परिवहन सुरक्षा प्रशासन, को सौंप दिया। कॉकपिट के दरवाज़े मज़बूत करने का आदेश जनवरी 2002 में आया। तरल पदार्थ 100 मिलीलीटर की शीशियों में और एक पारदर्शी थैली में ले जाने का नियम अगस्त 2006 की एक साज़िश के बाद आया और अब भी चल रहा है।
जूते उतारने का नियम 8 जुलाई 2025 को ख़त्म हुआ। गृह सुरक्षा मंत्री क्रिस्टी नोएम की विज्ञप्ति में इसकी वजह सुरक्षा नहीं, यात्रा का अनुभव बताई गई है: "'शूज़-ऑफ़' नीति ख़त्म करना गृह सुरक्षा विभाग की उस कोशिश का ताज़ा क़दम है जिससे देश के हवाई अड्डों पर यात्री का अनुभव आधुनिक और बेहतर बने।" विज्ञप्ति में कहा गया कि इससे चेकपॉइंट पर इंतज़ार का समय बहुत घटेगा, और यह बदलाव "अत्याधुनिक तकनीकी प्रगति और बहुस्तरीय सुरक्षा" के भरोसे मुमकिन हुआ है।
अफ़ग़ानिस्तान: 7 अक्टूबर 2001 से 30 अगस्त 2021
अमेरिकी और ब्रिटिश बमबारी 7 अक्टूबर 2001 को शुरू हुई और उसे ऑपरेशन एंड्योरिंग फ़्रीडम नाम दिया गया। वह अभियान 28 दिसंबर 2014 को औपचारिक रूप से ख़त्म हुआ और उसकी जगह ऑपरेशन फ़्रीडम्स सेंटिनल ने ली। अमेरिकी सेना की वापसी 30 अगस्त 2021 को पूरी हुई। शुरुआत से अंत तक 19 साल, 10 महीने और 23 दिन।
मरने वाले अमेरिकी सैनिकों की संख्या पर दो आँकड़े चलते हैं और वे एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। एक गिनती 7 अक्टूबर 2001 से 30 अगस्त 2021 तक 2,459 की है। रक्षा विभाग की सूची दोनों अभियानों को जोड़कर 2,465 बताती है, जिनमें 1,926 शत्रु कार्रवाई में और 538 ग़ैर-शत्रु कारणों से मारे गए, और एक की स्थिति तय होनी बाक़ी है। फ़र्क़ इस बात से आता है कि गिनती किस अभियान और किस तारीख़ तक की जा रही है। दोनों में से कोई गिनती अफ़ग़ान नागरिकों, अफ़ग़ान सेना या तालिबान के मारे गए लोगों की नहीं है; वे कॉस्ट्स ऑफ़ वॉर की अलग सूची में आते हैं।
वापसी के आख़िरी हफ़्ते में काबुल हवाई अड्डे के एबी गेट पर 26 अगस्त 2021 को हुए आत्मघाती धमाके में 13 अमेरिकी सैनिक और क़रीब 170 अफ़ग़ान नागरिक मारे गए। तालिबान 15 अगस्त 2021 को ही काबुल में दाख़िल हो चुका था, वापसी की तय तारीख़ से पंद्रह दिन पहले।
तेरह दिसंबर 2001 के बाद भारत का ढाँचा
भारत में यह 13 दिसंबर 2001 को पहुँचा। सुप्रीम कोर्ट के 4 अगस्त 2005 के फ़ैसले में दर्ज है कि क़रीब साढ़े ग्यारह बजे पाँच हथियारबंद लोग सफ़ेद एंबेसडर कार से संसद भवन परिसर में घुसे; कार पर नक़ली वीआईपी लाल बत्ती थी और गृह मंत्रालय का जाली पहचान-चिह्न। उनके पास स्वचालित असॉल्ट राइफ़लें, पिस्तौलें, हथगोले और राइफ़ल ग्रेनेड, इलेक्ट्रॉनिक डेटोनेटर, टिफ़िन बम, और कार की डिक्की में भारी मात्रा में अमोनियम नाइट्रेट से बना बम था।
गोलीबारी क़रीब आधे घंटे चली। नौ लोग मारे गए, आठ सुरक्षाकर्मी और एक माली। सोलह घायल हुए, जिनमें तेरह सुरक्षाकर्मी थे। पाँचों हमलावर मारे गए। फ़ैसले में यह भी दर्ज है कि गोलाकार सड़क पर उपराष्ट्रपति का काफ़िला खड़ा होने से हमलावरों को इमारत तक जाने का रास्ता नहीं मिला।

इसके बाद बना क़ानून आतंकवाद निवारण अधिनियम था। राज्यसभा ने उसे 113 के मुक़ाबले 98 वोट से गिरा दिया, और सरकार उसे 26 मार्च 2002 को दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में ले गई, जहाँ वह 425 के मुक़ाबले 296 वोट से पास हुआ। भारतीय संसद के इतिहास में संयुक्त बैठक तब तक सिर्फ़ दो बार हुई थी। राष्ट्रपति की मंज़ूरी 28 मार्च 2002 को मिली और सितंबर 2004 में क़ानून रद्द हो गया। उसकी कई धाराएँ 1967 के ग़ैरक़ानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम के संशोधनों में चली गईं, जो आज भी लागू है।
26 नवंबर 2008 की रात मुंबई पर हुए हमले का ब्योरा सुप्रीम कोर्ट के 29 अगस्त 2012 के फ़ैसले में है। जस्टिस आफ़ताब आलम और जस्टिस चंद्रमौलि कुमार प्रसाद ने लिखा कि हमला 26 नवंबर 2008 को रात क़रीब सवा नौ बजे शुरू हुआ और 29 नवंबर की सुबह क़रीब नौ बजे तब ख़त्म हुआ जब होटल ताज महल पैलेस में छिपा आख़िरी हमलावर मारा गया। दस हमलावर समुद्र के रास्ते आए थे। 166 लोग मारे गए और 238 घायल हुए। फ़ैसले में नौ मृत अभियुक्तों और पैंतीस ऐसे अभियुक्तों का ज़िक्र है जिन्हें पकड़ा जाना बाक़ी था।
इन्हीं वर्षों में वॉशिंगटन से रिश्ता बदला। 18 दिसंबर 2006 को पब्लिक लॉ 109-401 पर दस्तख़त हुए, जिसका काम भारत के साथ प्रस्तावित परमाणु सहयोग समझौते को 1954 के अमेरिकी परमाणु ऊर्जा क़ानून की कुछ शर्तों से छूट दिलाना था। परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह ने 6 सितंबर 2008 को भारत के लिए छूट दी और 123 समझौते पर 10 अक्टूबर 2008 को वॉशिंगटन में दस्तख़त हुए। मुंबई हमले के आरोपी तहव्वुर हुसैन राणा को अमेरिका से लाकर 10 अप्रैल 2025 को दिल्ली उतारा गया, जहाँ राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने उसे गिरफ़्तार किया। वह सभी आरोपों से इनकार करता है।
कराची का आरोपी और ग्वांतानामो का मुक़दमा
ख़ालिद शेख़ मोहम्मद का ब्योरा आयोग की रिपोर्ट के पाँचवें अध्याय में है। कुवैत में स्कूल पूरा करने के बाद वह उत्तरी कैरोलाइना के मर्फ़्रीज़बरो में चोवान कॉलेज में दाख़िल हुआ, एक सेमेस्टर बाद ग्रीन्सबरो की नॉर्थ कैरोलाइना एग्रीकल्चरल एंड टेक्निकल स्टेट यूनिवर्सिटी चला गया, और दिसंबर 1986 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली। उसके बाद पेशावर, और अब्दुल रसूल सय्याफ़ के सदा शिविर में सैनिक प्रशिक्षण।
11 सितंबर 2001 की सुबह वह कहाँ था, यह आयोग की रिपोर्ट में नहीं है। बीबीसी हिंदी की 11 सितंबर 2024 की रिपोर्ट कहती है कि उसने विमानों को टावरों से टकराते हुए कराची के एक इंटरनेट कैफ़े में देखा, और इसके लिए वह टेरी मैक्डरमट तथा जॉश मेयर की किताब 'द हंट फ़ॉर केएसएम' का हवाला देती है। यह दो पत्रकारों की किताब है, किसी सरकारी दस्तावेज़ का हिस्सा नहीं।
रिपोर्ट के पृष्ठ 146 पर एक बॉक्स छपा है। आयोग ने उसमें लिखा कि उसके पाँचवें और सातवें अध्याय पकड़े गए अल-क़ायदा सदस्यों से मिली जानकारी पर टिके हैं, और फिर अपनी सीमाएँ गिनाईं: "उन तक हमारी पहुँच सिर्फ़ उन ख़ुफ़िया रिपोर्टों को पढ़ने तक सीमित रही जो उन जगहों से आए संदेशों पर बनी थीं जहाँ असल पूछताछ होती है। हमने पूछताछ के लिए सवाल भेजे, पर इस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं था कि हमारे मतलब के सवाल पूछे भी जाएँगे या नहीं, कब पूछे जाएँगे और कैसे। न हमें पूछताछ करने वालों से बात करने दी गई, ताकि हम बंदियों की विश्वसनीयता परख सकें।" आयोग को बताया गया कि ऐसी माँगों से पूछताछ की संवेदनशील प्रक्रिया में ख़लल पड़ सकता है।
ख़ालिद शेख़ मोहम्मद को 1 मार्च 2003 को रावलपिंडी के एक मकान से पकड़ा गया। वह 9/11 के मुक़दमे में अभियुक्त है और किसी अदालत ने आज तक उसे दोषी नहीं ठहराया। अमेरिकी सीनेट की ख़ुफ़िया मामलों की समिति की 2014 की रिपोर्ट में दर्ज है कि उसे 183 बार वॉटरबोर्डिंग से गुज़ारा गया; यह गिनती सीआईए के अपने महानिरीक्षक की 2004 की समीक्षा से आई है और वह पानी डाले जाने की अलग-अलग बार गिनती है, 183 अलग सत्रों की नहीं। 2006 में उसे ग्वांतानामो बे भेज दिया गया।
मुक़दमा आज तक शुरू नहीं हुआ। 31 जुलाई 2024 को दोष स्वीकार करने का समझौता सामने आया, रक्षा मंत्री ने दो दिन बाद उसे रद्द किया, सैन्य न्यायाधीश और सैन्य अपील पैनल ने उसे वैध माना, और 11 जुलाई 2025 को डी.सी. सर्किट की अपील अदालत ने दो-एक के बहुमत से कहा कि रक्षा मंत्री ने अपने अधिकार के भीतर काम किया। सुनवाई की नई तारीख़ जून 2028 रखी गई है।
22 अगस्त 1906 के गज़ट में छपा अध्यादेश
22 अगस्त 1906 के ट्रांसवाल गवर्नमेंट गज़ट एक्स्ट्राऑर्डिनरी में एशियाई क़ानून संशोधन अध्यादेश का मसौदा छपा। गांधी वह गज़ट दफ़्तर से घर ले गए, एक दोस्त के साथ पास की पहाड़ी पर चढ़े, और वहीं उसका गुजराती अनुवाद शुरू किया। अपनी किताब में उन्होंने उसका सारांश दिया है। आठ साल या उससे ऊपर के हर भारतीय को, चाहे मर्द हो, औरत हो या बच्चा, एशियाई रजिस्ट्रार के पास नाम दर्ज कराना था, पुराना परमिट लौटाना था, नाम-पता-जाति-उम्र बतानी थी, शरीर के पहचान-चिह्न दर्ज कराने थे और अँगूठे तथा उँगलियों के निशान देने थे।
माँ-बाप को नाबालिग बच्चों के निशान दिलाने थे। प्रमाणपत्र किसी भी पुलिस अफ़सर के माँगने पर, कहीं भी, सड़क पर चलते हुए भी दिखाना था। पुलिस प्रमाणपत्र देखने के लिए निजी घरों में घुस सकती थी। अदालत में और राजस्व दफ़्तर में, यहाँ तक कि व्यापार या साइकिल का लाइसेंस लेने पर भी, वह माँगा जा सकता था। न दिखाने पर जुर्माना या क़ैद थी, और दर्ज न कराने पर रहने का अधिकार ही ख़त्म।
गांधी ने लिखा कि उँगलियों के निशान की बात से वे इसलिए चौंके कि पुलिस अफ़सर हेनरी की किताब पढ़कर उन्हें पता चला था कि क़ानून में यह माँग सिर्फ़ अपराधियों से की जाती है। औरतों और सोलह साल से कम उम्र के बच्चों का पंजीकरण भी पहली बार इसी अध्यादेश में प्रस्तावित हुआ था।
एम्पायर थिएटर की सभा का रिकॉर्ड
11 सितंबर 1906 की सभा पुराने एम्पायर थिएटर में हुई। अध्यक्षता ट्रांसवाल ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन के सभापति अब्दुल गनी ने की, गांधी ने नहीं। सबसे अहम चौथा प्रस्ताव था। 'इंडियन ओपिनियन' के 15 और 22 सितंबर 1906 के गुजराती अंकों में छपा उसका पाठ कहता है कि अगर विधान परिषद और दोनों सरकारें भारतीयों की प्रार्थना ठुकरा दें, तो सभा में मौजूद हर भारतीय यह तय करता है कि इस क़ानून के आगे झुकने के बजाय वह जेल जाएगा, और तब तक जाता रहेगा जब तक राहत न मिले।
शपथ का सुझाव गांधी का नहीं था। प्रस्ताव का समर्थन करने वालों में सेठ हाजी हबीब थे, जिन्होंने कहा कि इसे ईश्वर को साक्षी मानकर पास किया जाना चाहिए, और फिर ईश्वर के नाम पर ख़ुद घोषणा की कि वे इस क़ानून के आगे कभी नहीं झुकेंगे। गांधी ने लिखा: "जब अपने भाषण में सेठ हाजी हबीब उस गंभीर घोषणा तक पहुँचे, मैं तत्काल चौंका और सावधान हो गया।" उन्होंने आगे लिखा कि सभा में जाते वक़्त उनका न शपथ लेने का इरादा था, न किसी और से लिवाने का।
फिर उन्होंने अध्यक्ष से अनुमति लेकर लोगों को चेताया कि ऐसा प्रस्ताव बहुमत से पास नहीं होता, बँधेगा सिर्फ़ वही जो शपथ ले, और हर आदमी अपने भीतर झाँककर तय करे। जेल, भूख, कोड़े, संपत्ति की नीलामी, देश-निकाला और बीमारी से मौत गिनाकर उन्होंने कहा कि शपथ इसी समझ के साथ ली जाए।

सभा में मौजूद लोगों की संख्या गांधी ने अपने ही भाषण में तीन हज़ार बताई, और ट्रांसवाल की कुल भारतीय आबादी तेरह हज़ार। थिएटर अगले ही दिन आग में जल गया। तीसरे दिन लोग उन्हें यह ख़बर शुभ शकुन बताकर सुनाने आए; गांधी ने लिखा कि ऐसे शकुनों का उन पर कभी असर नहीं हुआ।
उस दिन सत्याग्रह शब्द मौजूद नहीं था। गांधी ने उसी किताब में लिखा: "हममें से किसी को नहीं पता था कि अपने आंदोलन को क्या नाम दें। तब मैंने उसे 'पैसिव रेज़िस्टेंस' कहा।" बाद में 'इंडियन ओपिनियन' में एक छोटा इनाम रखकर नाम माँगे गए, मगनलाल गांधी ने 'सदाग्रह' भेजा, और गांधी ने उसे सुधारकर 'सत्याग्रह' किया। इंडियन एक्सप्रेस में 11 सितंबर 2026 को छपे एक स्तंभ में लिखा है कि उस दिन को 120 साल हो रहे हैं जब सत्याग्रह की अवधारणा पहली बार किसी सार्वजनिक मंच से रखी गई। गांधी की अपनी किताब में उस दिन के लिए वह शब्द नहीं है।
शपथ का असर भी सीधा नहीं रहा। लॉर्ड एल्गिन ने अध्यादेश नामंज़ूर किया, पर ट्रांसवाल के प्रतिनिधि सर रिचर्ड सॉलोमन को भरोसा दिला दिया कि 1 जनवरी 1907 को ज़िम्मेदार सरकार मिलने के बाद वही क़ानून दोबारा पास हुआ तो शाही मंज़ूरी नहीं रोकी जाएगी। गांधी ने लिखा कि इसके बाद कुछ लोगों ने तर्क दिया कि एम्पायर थिएटर की शपथ पूरी हो चुकी, क्योंकि पुराना अध्यादेश रद्द हो गया था। जगह-जगह सभाएँ करके शपथ दोबारा दिलानी पड़ी। उनकी किताब का पहला वाक्य यही है कि दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों का सत्याग्रह आठ साल चला।
स्रोत9/11 आयोग की अंतिम रिपोर्ट, अमेरिकी सरकारी मुद्रणालय संस्करण: अध्याय 1 का समय-ब्योरा, अध्याय 5 का 'डिटेनी इंटरॉगेशन रिपोर्ट्स' बॉक्स (पृष्ठ 146), अध्याय 9 का फ़ुटनोट 188, अध्याय 11 की 'ऑपरेशनल अपॉर्चुनिटीज़' सूची, पब्लिक लॉ 107-40, 18 सितंबर 2001: ऑथराइज़ेशन फ़ॉर यूज़ ऑफ़ मिलिट्री फ़ोर्स का पूरा पाठ, अमेरिकी सरकारी मुद्रणालय, अमेरिकी कांग्रेस: एच.आर. 6751, 119वीं कांग्रेस, 2001 के प्रस्ताव को रद्द करने का विधेयक और उसकी स्थिति, कांग्रेशनल रिसर्च सर्विस, रिपोर्ट R43983: 2001 के प्रस्ताव का लगातार इस्तेमाल और उसका दायरा, कॉस्ट्स ऑफ़ वॉर, वॉटसन इंस्टिट्यूट, ब्राउन यूनिवर्सिटी: ख़र्च, मौतों, विस्थापन और देशों की संख्या के मुख्य निष्कर्ष, कॉस्ट्स ऑफ़ वॉर: सीधी और अप्रत्यक्ष मौतों के आँकड़े और उनकी अवधि, स्टेफ़नी सैवेल, कॉस्ट्स ऑफ़ वॉर: 2021 से 2023 के बीच अमेरिकी आतंकरोधी कार्रवाइयों वाले देशों की गिनती, प्राइवेसी एंड सिविल लिबर्टीज़ ओवरसाइट बोर्ड, 23 जनवरी 2014: यूएसए पैट्रियट एक्ट की धारा 215 वाले फ़ोन-रिकॉर्ड कार्यक्रम पर रिपोर्ट, पब्लिक लॉ 107-71, 19 नवंबर 2001: एविएशन एंड ट्रांसपोर्टेशन सिक्योरिटी एक्ट, जिससे टीएसए बना, अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग और टीएसए की विज्ञप्ति, 8 जुलाई 2025: जूते उतारने का नियम ख़त्म, सुप्रीम कोर्ट: राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) बनाम नवजोत संधू उर्फ़ अफ़सान गुरु, आपराधिक अपील 373-375/2004, फ़ैसला 4 अगस्त 2005, सुप्रीम कोर्ट: मो. अजमल मो. आमिर क़साब उर्फ़ अबू मुजाहिद बनाम महाराष्ट्र राज्य, आपराधिक अपील 1899-1900/2011, फ़ैसला 29 अगस्त 2012, पब्लिक लॉ 109-401, 18 दिसंबर 2006: हेनरी जे. हाइड यूनाइटेड स्टेट्स-इंडिया पीसफ़ुल एटॉमिक एनर्जी कोऑपरेशन एक्ट, मोहनदास करमचंद गांधी, 'सत्याग्रह इन साउथ अफ़्रीका': अध्याय 12 'द एडवेंट ऑफ़ सत्याग्रह' और उसके बाद के अध्याय, साउथ अफ़्रीकन हिस्ट्री ऑनलाइन: 'इंडियन ओपिनियन' के 15 और 22 सितंबर 1906 के गुजराती अंकों की सामग्री, गांधी वाङ्मय खंड 5, पृष्ठ 424-426 और 439-443, बीबीसी हिंदी, 11 सितंबर 2024: ख़ालिद शेख़ मोहम्मद पर रिपोर्ट, जो कराची के इंटरनेट कैफ़े वाले ब्योरे के लिए टेरी मैक्डरमट और जॉश मेयर की किताब का हवाला देती है, इंडियन एक्सप्रेस, 11 सितंबर 2026: 'द टू 9/11s' स्तंभ, जिसमें 1906 को सत्याग्रह की अवधारणा का पहला सार्वजनिक कथन बताया गया है, एनपीआर: ग्वांतानामो के मुक़दमे में समझौते पर रोक और अपील अदालत की कार्यवाही का घटनाक्रम