भारत पन्ना
क़लम

भंग पीने वाले एक काल्पनिक आदमी ने वायसराय को चिट्ठियाँ लिखीं, और वह आज ग्यारहवीं में पढ़ाई जाती हैं

बालमुकुंद गुप्त ने 1903 से 1905 के बीच भारतमित्र में लॉर्ड कर्जन के नाम खुली चिट्ठियाँ छापीं। लिखने वाला वे नहीं थे, शिवशंभु नाम का एक किरदार था। यह चतुराई मज़ाक़ की भी थी और बचाव की भी।

लॉर्ड कर्जन, भारत के वायसराय 1899 से 1905 तक
तस्वीर: Bain News Service, publisher, विकिमीडिया कॉमन्स सार्वजनिक डोमेन

अगर आपने ग्यारहवीं में हिंदी पढ़ी है, तो आपने बालमुकुंद गुप्त को पढ़ा है।

एनसीईआरटी की किताब आरोह के पहले भाग का चौथा अध्याय उन्हीं का लिखा है। नाम है विदाई-संभाषण।

वह अध्याय एक बड़ी किताब से लिया गया एक टुकड़ा है, और किताब का नाम है शिवशंभु के चिट्ठे।

पर स्कूल में यह अक्सर नहीं बताया जाता कि शिवशंभु कौन था।

शिवशंभु कोई था नहीं

यह एक गढ़ा हुआ किरदार है।

बालमुकुंद गुप्त ने ये चिट्ठियाँ अपने नाम से नहीं लिखीं। उन्होंने एक ऐसा वक्ता बनाया जिसका नाम और रूप शिव जैसा है, जो ख़ुद को धरती पर भगवान का दूत बताता है, और जो भंग पीता है।

यह किरदार वायसराय को सीधे संबोधित करता है। ऊपर से पूरे अदब के साथ, "माई लॉर्ड" कहकर।

और अदब के भीतर से जो निकलता है, वह चीरता चला जाता है।

यह चतुराई सिर्फ़ मज़ाक़ की नहीं थी

यहाँ इस किताब का सबसे कम समझा गया पहलू है।

1903 से 1905 के बीच भारत में राजद्रोह के मुक़दमे कोई असामान्य बात नहीं थे। अख़बार बंद होते थे, ज़मानतें ज़ब्त होती थीं, और संपादक जेल जाते थे।

बालमुकुंद गुप्त उस समय कलकत्ता से निकलने वाले भारतमित्र के संपादक थे, यानी वे ठीक उसी कुर्सी पर बैठे थे जिस पर सबसे ज़्यादा ख़तरा था।

अब दो वाक्य सोचिए।

पहला: भारतमित्र के संपादक बालमुकुंद गुप्त लिखते हैं कि वायसराय ने आठ करोड़ लोगों की प्रार्थना ठुकरा दी।

दूसरा: शिवशंभु नाम का एक भंगेड़ी, जो ख़ुद को शिव का दूत कहता है, नशे में वायसराय से बतिया रहा है।

पहला बयान है। दूसरा साहित्य है।

क़ानूनी रूप से दूसरे को पकड़ना ज़्यादा मुश्किल है, क्योंकि उसमें बोलने वाला लेखक नहीं, एक किरदार है, और वह किरदार ख़ुद को नशे में बता रहा है।

यह वही तरकीब है जो दुनिया भर के व्यंग्यकारों ने सेंसरशिप के दौर में इस्तेमाल की है। मूर्ख या नशेड़ी का मुखौटा पहनकर वह बात कह देना जो समझदार आदमी नहीं कह सकता।

छापेख़ाने का धातु टाइप। बीसवीं सदी की शुरुआत में संपादक की कुर्सी सबसे ज़्यादा जोखिम वाली थी
तस्वीर: Willi Heidelbach, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY 2.5

चिट्ठियाँ कितनी थीं और किस बारे में

कर्जन के नाम लिखी चिट्ठियाँ दस हैं। ये भारतमित्र में छपीं, और आगे चलकर इन्हें किताब की शक्ल में इकट्ठा किया गया।

विषय वही थे जो उस समय के भारत को हिला रहे थे।

सबसे बड़ा विषय बंगाल का विभाजन था। कर्जन ने बंगाल को दो हिस्सों में बाँटने का फ़ैसला किया, और इसके ख़िलाफ़ जो आंदोलन उठा उसने स्वदेशी को जन्म दिया।

दूसरा विषय विश्वविद्यालयों पर कर्जन का क़ानून था, जिसके ज़रिए सरकार ने भारतीय विश्वविद्यालयों पर अपना नियंत्रण बढ़ाया।

तीसरा वह सामान्य रवैया था जिसे आज हम प्रशासनिक अहंकार कहेंगे: यह मान्यता कि शासित लोगों की राय पूछने की कोई ज़रूरत नहीं है।

विदाई-संभाषण किस मौक़े पर लिखी गई

अब उस अध्याय पर आइए जो पाठ्यक्रम में है।

कर्जन 1899 से भारत के वायसराय थे, यानी उस समय तक छह साल हो चुके थे।

वायसराय का सामान्य कार्यकाल पाँच साल का होता था। कर्जन को दूसरा कार्यकाल मिला था, और वे उसे पूरा नहीं कर पाए। 1905 में उनका झगड़ा भारत में ब्रिटिश सेना के प्रधान सेनापति लॉर्ड किचनर से हुआ, और वह झगड़ा सेना पर नागरिक नियंत्रण को लेकर था।

लंदन में प्रधानमंत्री आर्थर बालफ़ोर की सरकार ने किचनर का साथ दिया।

कर्जन ने अगस्त 1905 में इस्तीफ़ा दे दिया और इंग्लैंड लौट गए।

झगड़े की जड़ यह थी कि भारत में सेना पर नियंत्रण किसका हो। परंपरा यह थी कि प्रधान सेनापति के ऊपर वायसराय की परिषद का एक सैन्य सदस्य होता था, जो नागरिक सरकार के प्रति जवाबदेह था। किचनर इसे ख़त्म कराना चाहते थे और उन्होंने यह करा लिया।

यहाँ इतिहास की एक विडंबना है जिस पर कम ध्यान जाता है। कर्जन की कुर्सी बंगाल के विभाजन की वजह से नहीं गई। वह एक सैन्य विवाद में गई।

और बंगाल का विभाजन 16 अक्तूबर 1905 को लागू हो गया, यानी उनके इस्तीफ़े के बाद।

जिस आदमी ने वह फ़ैसला किया, वह उसे लागू होते देखने के लिए भी वहाँ नहीं था। पर विभाजन रुका नहीं।

विदाई-संभाषण इसी मौक़े पर लिखी गई। एक जाते हुए शासक को विदाई देने के नाम पर।

नादिरशाह वाली तुलना

इस निबंध का सबसे तीखा हिस्सा एक तुलना है।

लेखक कर्जन को कैसर और ज़ार जैसे शासकों के साथ रखता है, और फिर नादिरशाह तक ले जाता है।

नादिरशाह ने 1739 में दिल्ली में क़त्लेआम का हुक्म दिया था। पर जब उससे प्रार्थना की गई, तो उसने हुक्म वापस ले लिया और तलवारें रुक गईं।

तुलना यह है कि कर्जन ने आठ करोड़ लोगों की प्रार्थना के बावजूद बंगाल पर आरी चलने दी।

यानी लेखक कह रहा है कि एक हमलावर लुटेरा भी अपनी बात से पीछे हट गया था, और यह शासक नहीं हटा।

इससे कड़ी बात उस दौर में सीधे शब्दों में कहना लगभग असंभव था। शिवशंभु के मुँह से यह कही जा सकी।

बंगाल का विभाजन 16 अक्तूबर 1905 को लागू हुआ, कर्जन के इस्तीफ़े के दो महीने बाद
तस्वीर: Adam Jones from Kelowna, BC, Canada, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 2.0

जिस माहौल में यह छपा

बचाव की ज़रूरत क्यों थी, यह समझने के लिए उस समय के क़ानून पर एक नज़र डालनी होगी।

भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए, यानी राजद्रोह की धारा, 1870 में जोड़ी गई थी। इसे जेम्स फ़िट्ज़जेम्स स्टीफ़न ने तैयार किया था, और यह सरकार के प्रति असंतोष फैलाने को अपराध बनाती थी।

पहली बड़ी सज़ा 1897 में हुई। बंबई उच्च न्यायालय ने बाल गंगाधर तिलक को इसी धारा के तहत दोषी ठहराया। यह औपनिवेशिक भारत में इस धारा के तहत पहली ऐसी सज़ा थी।

मुक़दमे की पृष्ठभूमि प्लेग की महामारी थी। सरकार को डर था कि तिलक के मराठी अख़बार केसरी में छपे लेख लोगों को महामारी रोकने की सरकारी कोशिशों के ख़िलाफ़ भड़काएँगे।

यानी बालमुकुंद गुप्त जब 1903 में लिखना शुरू कर रहे थे, तब यह मिसाल छह साल पुरानी थी और हर संपादक के सामने थी।

और आगे हालात और सख़्त हुए, बस उन्होंने वह नहीं देखा।

1908 में समाचारपत्र अधिनियम आया, जिसने मजिस्ट्रेटों को यह अधिकार दिया कि आपत्तिजनक सामग्री छापने वाले प्रेस की संपत्ति ज़ब्त कर लें।

1910 में भारतीय प्रेस अधिनियम आया, जिसमें छापने वाले से पंजीकरण के समय बड़ी ज़मानत माँगी जा सकती थी, और सरकार-विरोधी माने गए अख़बार का पंजीकरण रद्द किया जा सकता था।

गुप्त की मृत्यु 1907 में हुई थी। यानी उन्होंने वह खिड़की पकड़ी जो उनके बाद बंद होने लगी।

विश्वविद्यालय वाला क़ानून क्या था

चिट्ठियों में जो दूसरा बड़ा विषय है, वह आज कम जाना जाता है, इसलिए उसका ब्योरा देना ठीक है।

भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम 1904 कर्जन का बनाया हुआ था, और उसका असर विश्वविद्यालयों को सरकार के नियंत्रण में लाना था।

एक प्रावधान यह था कि विश्वविद्यालय के फ़ेलो, यानी सर्वोच्च निकाय के सदस्य, सौ से घटाकर पचास कर दिए गए।

दूसरा यह कि इनमें से बहुमत को नामित करने का अधिकार सरकार को मिल गया।

तीसरा यह कि किस कॉलेज को मान्यता मिलेगी, विश्वविद्यालय का क्षेत्र क्या होगा, पाठ्यक्रम क्या होगा और परीक्षाएँ कैसे होंगी, इन सब पर सरकारी निगरानी बढ़ गई।

सरकार का तर्क गुणवत्ता का था। भारतीय पक्ष का पढ़ना अलग था: यह भारतीय शिक्षकों पर अविश्वास है और विश्वविद्यालयों को साम्राज्य की नीति का औज़ार बनाने की कोशिश।

कलकत्ता, मद्रास और बंबई तीनों में छात्रों और शिक्षकों के विरोध हुए।

इसे बंगाल विभाजन के साथ रखकर देखिए तो एक ही तर्ज़ दिखती है, और वही तर्ज़ इन चिट्ठियों का असली विषय है।

कलकत्ता विश्वविद्यालय की इमारत। 1904 के क़ानून ने फ़ेलो की संख्या सौ से घटाकर पचास कर दी
तस्वीर: Biswarup Ganguly, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

और यह सब कलकत्ता से छपा

एक बात जो आज के पाठक को अटपटी लगती है।

बीसवीं सदी की शुरुआत में हिंदी पत्रकारिता का सबसे अहम केंद्र हिंदी प्रदेश नहीं था। वह कलकत्ता था।

भारतमित्र उसी शहर से निकलता था। हिंदी बंगवासी भी।

इसकी वजह सीधी है। कलकत्ता उस समय ब्रिटिश भारत की राजधानी था, वहाँ छापेख़ाने थे, पूँजी थी, और मारवाड़ी तथा दूसरे हिंदी-भाषी व्यापारिक समुदाय बड़ी संख्या में बसे हुए थे।

इसका एक नतीजा यह हुआ कि हिंदी गद्य को गढ़ने का बड़ा हिस्सा बंगाल में हुआ, बंगाली गद्य को सामने देखते हुए, जो उस समय हिंदी से आगे था।

यही वजह है कि हिंदी बंगवासी में शब्द गढ़ने का वह काम चला जिसका ज़िक्र ऊपर है। नए विषयों के लिए शब्द चाहिए थे, और वे रोज़ बनाने पड़ते थे।

लिखने वाला कौन था

बालमुकुंद गुप्त का जन्म 1865 में हुआ, रोहतक ज़िले में, यानी आज के हरियाणा में।

उन्हें आधुनिक हिंदी पत्रकारिता का जनक कहा जाता है, और यह उपाधि उनके निबंधों से ज़्यादा उनके काम की क़िस्म से आती है।

वे हिंदी बंगवासी में रहे और फिर भारतमित्र में, जो उनके और अंबिका प्रसाद वाजपेयी के संपादन में उस दौर का प्रमुख हिंदी अख़बार बना।

हिंदी बंगवासी के दिनों की एक बात ख़ास तौर पर दर्ज है। वहाँ बालमुकुंद गुप्त, प्रभु दयाल पांडे और अमृतलाल चक्रवर्ती तीनों मिलकर नए हिंदी शब्द गढ़ते थे, अलग-अलग बोलियों और अंग्रेज़ी की अपनी जानकारी के आधार पर।

यह याद रखने लायक़ है। उस समय हिंदी गद्य अभी बन रहा था। अख़बार निकालने वालों को रोज़ ऐसी चीज़ों के लिए शब्द चाहिए थे जिनके लिए हिंदी में शब्द थे ही नहीं।

गुप्त ने हिंदी पत्रकारिता का पहला विस्तृत इतिहास भी लिखा, जो भारतमित्र में क्रमशः छपा।

उनकी मृत्यु 1907 में हुई, 42 साल की उम्र में। शिवशंभु के चिट्ठे लिखे उन्हें दो साल भी नहीं हुए थे।

अंग्रेज़ों तक यह पहुँची

एक और बात इस किताब के असर के बारे में।

इन चिट्ठियों का अंग्रेज़ी अनुवाद ज्योत्स्येंद्रनाथ बनर्जी ने किया, और उसके बाद ये अंग्रेज़ों के बीच भी चर्चा में आईं।

यानी यह अंदरूनी खपत के लिए लिखा गया व्यंग्य नहीं रह गया। जिनके बारे में लिखा गया था, वे भी पढ़ रहे थे।

व्यंग्य के लिए यह सबसे कड़ी परीक्षा होती है। जब निशाना ख़ुद पढ़ ले, तब पता चलता है कि लिखने वाले ने सिर्फ़ अपने पाठकों को ख़ुश किया था या सचमुच कुछ कहा था।

एक तुलना जो कर्जन के हक़ में जाती है

ईमानदारी के लिए एक बात दूसरी तरफ़ से भी कह देनी चाहिए।

कर्जन सिर्फ़ विभाजन और विश्वविद्यालय अधिनियम नहीं थे। उन्हीं के कार्यकाल में 1904 का प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम आया, और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को नई जान मिली।

ताजमहल समेत कई इमारतों की मरम्मत उसी दौर में हुई, और स्मारकों को क़ानूनी संरक्षण देने की जो व्यवस्था उसी क़ानून से शुरू हुई, वह आज भी चल रही है।

यह बात शिवशंभु के चिट्ठों में नहीं है, और होनी भी नहीं थी। वह व्यंग्य था, मूल्यांकन नहीं।

पर आज पढ़ते समय यह याद रखना चाहिए कि व्यंग्य का काम संतुलन बनाना नहीं होता। उसका काम एक चीज़ को इतनी तेज़ रोशनी में रखना होता है कि वह दिखे।

बंगाल के विभाजन को उस रोशनी में रखने का काम इन चिट्ठियों ने किया।

इसे कैसे पढ़ा जाए

स्कूल में यह निबंध साहित्य की तरह पढ़ाया जाता है, और उसमें कुछ ग़लत नहीं है। भाषा वाक़ई असाधारण है।

पर यह पत्रकारिता भी है, और शायद उसी रूप में इसका महत्व ज़्यादा है।

यह किसी लेखक की एकांत में लिखी रचना नहीं थी। यह एक अख़बार में, तारीख़ के साथ, चल रही घटनाओं पर, हर कुछ हफ़्ते छपने वाली चीज़ थी। कलकत्ता से निकलने वाले भारतमित्र में ये चिट्ठियाँ 1903 और 1905 के बीच छपीं, और उन्हीं तीन बरसों में बंगाल का विभाजन तय होकर लागू हुआ। उसका पाठक अगले दिन उसी अख़बार में विभाजन की ख़बर पढ़ रहा था।

हिंदी में यह पहला मौक़ा था जब गद्य ने इस तरह काम किया: सामयिक, तीखा, और साहित्य के स्तर का।

इसीलिए इसे पहला पूरी तरह आधुनिक हिंदी गद्य-व्यंग्य कहा जाता है।

और अगर आपने इसे ग्यारहवीं में पढ़कर छोड़ दिया था, तो पूरी किताब उपलब्ध है। हिन्दवी पर विदाई-संभाषण का पूरा पाठ है, और शिवशंभु के चिट्ठे कई जगह मौजूद हैं।

एक भंगेड़ी की ज़बानी लिखी गई ये चिट्ठियाँ सवा सौ साल बाद भी पढ़ी जा सकती हैं, जबकि उस दौर के ज़्यादातर संपादकीय अब कोई नहीं पढ़ता।

आख़िरी बात उस तरकीब के बारे में, जो इस किताब की असली विरासत है।

बालमुकुंद गुप्त ने यह नहीं दिखाया कि सत्ता को क्या कहना चाहिए। वह उनसे पहले भी कई लोग जानते थे।

उन्होंने यह दिखाया कि जब सीधे कहने पर अख़बार बंद हो सकता है, तब कहने का रास्ता कैसे निकाला जाता है।

मुखौटा कमज़ोरी नहीं था। वह हथियार था, और उसे इतनी सफ़ाई से इस्तेमाल किया गया कि आज सवा सौ साल बाद वह पाठ स्कूल की किताब में है और उसका लिखने वाला कभी जेल नहीं गया।

यह अपने आप में उस दौर के एक हिंदी संपादक की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

स्रोतभारतीय संस्कृति पोर्टल, शिवशंभु के चिट्ठे, हिन्दवी, विदाई-संभाषण का पूरा पाठ, एनसीईआरटी आरोह भाग एक, अध्याय चार, मदन गोपाल, 'बालमुकुंद गुप्त', मेकर्स ऑफ़ इंडियन लिटरेचर, बंगाल विभाजन 1905 का विवरण

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