नवाब राय की किताब जलाई गई, और धनपत राय को नया नाम लेना पड़ा
प्रेमचंद ने पहले उर्दू में लिखा, फिर हिंदी में। एक ही उपन्यास के दोनों रूपों को साथ रखकर पढ़िए तो पता चलता है कि बदलाव सिर्फ़ लिपि का नहीं था।

धनपत राय नाम के एक स्कूल इंस्पेक्टर ने 1907 में पाँच कहानियों का एक संग्रह छपवाया।
नाम था सोज़-ए-वतन, यानी वतन का दुख। भाषा उर्दू थी। लेखक का नाम नवाब राय।
कहानियाँ देशभक्ति की थीं, और उसी वजह से दो साल बाद सरकार की नज़र में आ गईं।
1909 के आसपास वे हमीरपुर में उप-उपनिरीक्षक थे। ज़िले के कलेक्टर जेम्स सैमुअल स्टीवेन्सन ने उनके घर पर छापे का आदेश दिया। किताब को राजद्रोही घोषित किया गया और क़रीब पाँच सौ प्रतियाँ जला दी गईं।
इसके बाद नवाब राय नाम चला गया।
नया नाम सुझाया ज़माना पत्रिका के संपादक मुंशी दयानारायण निगम ने। सुझाव था: प्रेमचंद।
निगम का नाम इस कहानी में दो बार आता है, और दोनों बार निर्णायक जगह पर।
कानपुर से निकलने वाली ज़माना उस दौर की अहम उर्दू पत्रिकाओं में थी। धनपत राय की पहली कहानी, "दुनिया का सबसे अनमोल रतन", निगम ने ही छापी थी।
यानी जिस संपादक ने उन्हें पहली बार छापा, उसी ने किताब जलने के बाद उन्हें नया नाम दिया।
एक बात इसमें ध्यान देने लायक़ है। नाम बदलने का फ़ैसला सुरक्षा का था, विचार बदलने का नहीं। सोज़-ए-वतन की कहानियाँ वापस नहीं ली गईं और उनका विषय नहीं छोड़ा गया। सिर्फ़ लेखक का नाम बदला, ताकि नौकरी बची रहे और लिखना चलता रहे।
वे उस समय सरकारी मुलाज़िम थे, और यही तनाव उनके साथ 1921 तक रहा, जब उन्होंने असहयोग आंदोलन के दौरान नौकरी छोड़ी।
नाम बदलना आसान था, भाषा बदलना नहीं
यह कहानी अक्सर यहीं रोक दी जाती है, मानो नाम बदलते ही प्रेमचंद हिंदी के लेखक हो गए।
ऐसा नहीं हुआ। इसमें और पंद्रह साल लगे।
हरीश त्रिवेदी ने इस पूरे बदलाव का हिसाब लगाया है, और उनके अनुसार 1903 से 1915 के बीच प्रेमचंद ने उर्दू में क़रीब पाँच उपन्यास और साठ कहानियाँ लिखीं।
हिंदी की तरफ़ खिसकाव 1918 और 1924 के बीच हुआ। 1924 में कायाकल्प के साथ उनके बड़े उपन्यास पूरी तरह हिंदी में आ गए, हालाँकि छोटी चीज़ें वे 1936 में अपनी मृत्यु तक उर्दू में भी लिखते रहे।
यानी बीस साल से ज़्यादा का करियर दो भाषाओं में बँटा रहा।
वजह पहले पैसे की थी, फिर राजनीति की
प्रेमचंद ने ख़ुद जो कारण बताया, वह व्यावहारिक था। उर्दू में प्रकाशक नहीं मिलते थे।
यह शिकायत आँकड़ों से मेल खाती है।
संयुक्त प्रांत में 1891 से 1900 के बीच उर्दू की 4,218 किताबें छपीं। अगले दशक, 1901 से 1910 में, यह घटकर 3,547 रह गईं।
उन्हीं दो दशकों में हिंदी की किताबें 3,186 से बढ़कर 5,063 हो गईं।
यानी एक भाषा का बाज़ार सिकुड़ रहा था और दूसरी का फैल रहा था, और लिखने वाला दोनों जानता था।
दूसरा कारण राजनीतिक था। 1921 के बाद प्रेमचंद गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित हुए, नौकरी छोड़ी, और उसी दौर में हिंदी राष्ट्रीय आंदोलन की भाषा के रूप में उभर रही थी।
तीसरा कारण सामग्री का था, और शायद सबसे गहरा। उर्दू की साहित्यिक परंपरा शहरी और परिष्कृत थी। प्रेमचंद जिस चीज़ की तरफ़ बढ़ रहे थे, वह गाँव थी।

18 अप्रैल 1900
वे आँकड़े अपने आप नहीं बदले थे। उनके पीछे एक सरकारी आदेश है, और उसकी तारीख़ ठीक उन्हीं दो दशकों के बीच पड़ती है जिनकी तुलना त्रिवेदी करते हैं।
उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से संयुक्त प्रांत की अदालतों और दफ़्तरों की भाषा उर्दू थी, फ़ारसी लिपि में। सरकारी काम इसी में होता था, इसलिए नौकरी, वकालत और मुंशीगीरी सब इसी लिपि से जुड़ी थीं।
1895 से 1901 तक उत्तर-पश्चिमी प्रांत और अवध के लेफ़्टिनेंट गवर्नर सर एंटनी मैकडॉनल थे। उनके सामने कई साल से यह माँग रखी जा रही थी कि देवनागरी को भी मान्यता मिले।
18 अप्रैल 1900 को उन्होंने एक आदेश जारी किया। प्रांत की अदालतों और निचले दफ़्तरों में फ़ारसी लिपि के साथ-साथ देवनागरी के इस्तेमाल की अनुमति दी गई, ख़ास तौर पर वहाँ जहाँ अर्ज़ी देने वाला हिंदी चाहता हो।
यह अनुमति थी, अनिवार्यता नहीं। उर्दू हटाई नहीं गई। पर मान्यता मिल गई।
असर कुछ ही महीनों में दिखने लगा। इस आदेश के बाद हिंदी और उर्दू को दो अलग भाषाओं की तरह कहा जाने लगा, जबकि इससे पहले बोलचाल में वे एक ही ज़बान की दो लिपियाँ मानी जाती थीं।
उर्दू के पक्षधरों ने इसे झटके की तरह लिया। हिंदी के पक्षधरों के लिए यह वह मोड़ था जिसका इंतज़ार था, क्योंकि लिपि को मान्यता मिलना व्यवहार में भाषा को मान्यता मिलना समझा गया।
अब तारीख़ों को साथ रखिए।
प्रेमचंद का जन्म 1880 में हुआ था। यह आदेश आया तब वे बीस साल के थे और अभी लिखना शुरू ही कर रहे थे।
त्रिवेदी जिन दो दशकों की किताबों की गिनती करते हैं, उनमें से पहला 1900 में ख़त्म होता है और दूसरा उसी साल शुरू होता है।
यानी जिस बाज़ार के सिकुड़ने की वजह से प्रेमचंद को भाषा बदलनी पड़ी, वह बाज़ार एक प्रशासनिक आदेश से सिकुड़ना शुरू हुआ था, और वह आदेश उनके लिखने की शुरुआत के साथ ही आया।
लेखक ने भाषा चुनी, यह कहना पूरा सच नहीं है। भाषा का बाज़ार पहले ही बदल चुका था।
एक उपन्यास, दो रूप
अब उस किताब पर आइए जिससे यह पूरा सवाल सबसे साफ़ दिखता है।
उपन्यास उर्दू में 1916-17 के आसपास लिखा गया और उसका नाम था बाज़ार-ए-हुस्न।
छपा वह पहले हिंदी में, 1918 में कलकत्ता से, और नाम था सेवासदन।
उर्दू वाला मूल रूप चार साल तक अनछपा पड़ा रहा, क्योंकि प्रकाशक नहीं मिला। वह 1924 में लाहौर से छपा, और संशोधित रूप में छपा।
पहला फ़र्क़ नाम में ही है।
बाज़ार-ए-हुस्न का अर्थ है हुस्न का बाज़ार। सेवासदन का अर्थ है सेवा का घर।
एक नाम बाज़ार और सौंदर्य की तरफ़ इशारा करता है। दूसरा घर और समाजसेवा की तरफ़।
कहानी वही है: एक असंतुष्ट गृहिणी, जो बहकाकर तवायफ़ बना दी जाती है, फिर सुधरती है और तवायफ़ों की बेटियों के लिए चलने वाले अनाथालय की व्यवस्थापिका बनकर प्रायश्चित करती है।
पर नाम पाठक को दो अलग दरवाज़ों से भीतर ले जाते हैं।
शब्द जो बदल दिए गए
त्रिवेदी ने दोनों पाठों को मिलाकर जो बदलाव गिनाए हैं, वे सिर्फ़ लिपि के नहीं हैं।
उर्दू में एक जगह "पाक दामन" है। हिंदी में उसकी जगह "सच्चरित्रता" आ गई।
दोनों का अर्थ मोटे तौर पर पवित्रता या चरित्र की शुद्धता है। पर "पाक दामन" फ़ारसी-अरबी परंपरा का मुहावरा है और "सच्चरित्रता" संस्कृत से बना शब्द है। बदलाव सिर्फ़ शब्द का नहीं, उस पूरी दुनिया का है जिससे शब्द आता है।
दूसरा उदाहरण और साफ़ है। उर्दू में "बाँकेबिहारी" है। हिंदी में वह "श्रीबाँकेबिहारीजी" हो गया।
एक ही कृष्ण, पर दूसरे रूप में आदर के दो उपसर्ग जुड़ गए।
तीसरा उदाहरण सबसे दिलचस्प है। एक स्त्री पात्र को हिंदी में "सतीसाध्वी" कहा गया है, जबकि उर्दू मूल में उसके बारे में ऐसा कुछ नहीं था।
त्रिवेदी इस पूरे सिलसिले को एक नाम देते हैं। वे कहते हैं कि भाषा के हिंदीकरण के साथ-साथ एक हिंदूकरण भी चल रहा था।
यह आरोप नहीं है। यह एक तथ्य का विवरण है, और इसे इसी तरह पढ़ा जाना चाहिए।
लेखक जब भाषा बदलता है तो वह सिर्फ़ शब्द नहीं बदलता। वह पाठक बदलता है। और नया पाठक अपने साथ अपनी अपेक्षाएँ लेकर आता है।

दोनों तरफ़ के इतिहासकारों ने क्या किया
अब इस कहानी का वह हिस्सा जो साहित्य के बारे में कम और साहित्य के इतिहासकारों के बारे में ज़्यादा है।
त्रिवेदी दिखाते हैं कि दोनों परंपराओं ने प्रेमचंद पर अपना-अपना दावा किया, और दावा करने के लिए दूसरी तरफ़ का हिस्सा मिटा दिया।
हिंदी की तरफ़ रामचंद्र शुक्ल के 1929 के इतिहास से शुरू करके आगे तक, प्रेमचंद की कहानी 1916 से 1918 के बीच शुरू होती है, यानी उनकी हिंदी किताबों से। 1977 में छपे सोलह खंडों के बड़े इतिहास में भी यही ढाँचा है।
इससे पहले के तेरह साल और साठ कहानियाँ ग़ायब हैं।
उर्दू की तरफ़ उल्टा हुआ। कुछ आलोचकों ने उनकी हिंदी किताबों को उर्दू से अनुवाद बताया, और कुछ ने उन्हें गिना ही नहीं।
मुहम्मद सादिक़ ने 1984 में लिखी अपनी किताब में यह तक कहा कि प्रेमचंद के उपन्यास मूल रूप से हिंदी में छपी किताबों से अनूदित हैं।
यह बात तथ्य के उलटी है। जो पहले उर्दू में लिखा गया था, उसे हिंदी से अनुवाद बता दिया गया।
दोनों तरफ़ की चूक एक ही क़िस्म की है। लेखक को पूरा लेना असुविधाजनक था, इसलिए आधा ले लिया गया।
पर क्या भाषा बदलने से लिखना बेहतर हुआ
त्रिवेदी का जवाब हाँ में है, और वह इसे सीधे कहते हैं।
उनके अनुसार प्रेमचंद का शुरुआती उर्दू लेखन साधारण था, ऐसा जिसमें कुछ ख़ास नहीं दिखता।
जो चीज़ें उन्हें प्रेमचंद बनाती हैं, वे सब हिंदी में आने के बाद की हैं। प्रेमाश्रम 1921 में, रंगभूमि 1924 में, निर्मला 1925-26 में, और गोदान 1936 में।
इन सबका विषय गाँव है, किसान है, और वह राजनीति है जो ज़मीन से जुड़ी है।
त्रिवेदी का तर्क यह है कि यह सामग्री उर्दू की उस समय की शहरी साहित्यिक परंपरा में जगह नहीं पा रही थी।
यानी भाषा बदलना नुक़सान नहीं, आज़ादी थी।
प्रेस, जिसे उन्होंने अपनी सबसे बड़ी ग़लती कहा
भाषा का सवाल प्रकाशकों से शुरू हुआ था, और प्रेमचंद ने उसका एक सीधा हल निकालने की कोशिश की। उन्होंने ख़ुद प्रकाशक बन जाना तय किया।
1923 में उन्होंने बनारस में सरस्वती प्रेस स्थापित किया।
तर्क साफ़ था। जो लेखक अपनी किताब छपवाने के लिए दूसरों पर निर्भर है, वह अपनी भाषा भी पूरी तरह अपनी मर्ज़ी से नहीं चुन सकता। छापाख़ाना अपना हो तो यह अड़चन ख़त्म हो जाती है।
व्यवहार में उल्टा हुआ।
प्रेस चलाना अलग हुनर है, और उसमें पूँजी लगातार चाहिए। 1934-35 तक सरस्वती प्रेस भारी क़र्ज़ में था, और उन्हें अपनी पत्रिका जागरण बंद करनी पड़ी।
प्रेमचंद ने आगे चलकर इस फ़ैसले को अपने जीवन की सबसे बड़ी ग़लती कहा।
इसी दौर में उन्होंने एक और पत्रिका शुरू की थी, जो बची रही। हंस, 1930 में। उसके संपादक मंडल में महात्मा गांधी भी थे।
हंस आगे चलकर हिंदी की सबसे लंबी चलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं में गिनी गई, और 1986 में राजेंद्र यादव ने उसे फिर से शुरू किया।
यानी जिस आदमी को अपनी किताबें छपवाने के लिए भाषा बदलनी पड़ी, उसने आख़िर में एक ऐसी पत्रिका छोड़ी जो नब्बे साल बाद भी हिंदी में छपने की जगह बनी हुई है।

आख़िरी बड़ा भाषण, और वह किस भाषा में था
9 और 10 अप्रैल 1936 को लखनऊ में अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की पहली बैठक हुई।
उसकी अध्यक्षता प्रेमचंद ने की, और जो भाषण उन्होंने दिया उसका नाम था "साहित्य का उद्देश्य"।
उसका सार यह था कि लेखक ख़ुद को मनोरंजन करने वाला मानना छोड़े। साहित्य को कसौटी पर कसने का काम वह ख़ुद करे, और वह कसौटी समाज की हो।
यह हिंदी का एक बुनियादी दस्तावेज़ है और आज भी पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाता है।
पर इसके बारे में एक बात कम बताई जाती है, और वह इस पूरे लेख का सबसे सटीक अंत है।
यह भाषण हंस के जुलाई 1936 के अंक में छपा, और जो पाठ छपा वह हिंदी अनुवाद था। मूल या तो अंग्रेज़ी में था या उर्दू में।
यानी हिंदी साहित्य का सबसे प्रसिद्ध भाषण भी शायद हिंदी में नहीं लिखा गया था।
प्रेमचंद की मृत्यु उसी साल अक्तूबर में हो गई।
आख़िर में
इस पूरी कहानी की शुरुआत एक छापे से हुई थी।
एक अंग्रेज़ कलेक्टर ने एक उर्दू किताब की पाँच सौ प्रतियाँ जलवाईं, और लेखक को नाम बदलना पड़ा।
पंद्रह साल बाद उसी लेखक ने भाषा भी बदल ली, पर इस बार किसी के कहने पर नहीं। बाज़ार, राजनीति और उसकी अपनी सामग्री, तीनों उसे उसी तरफ़ ले जा रही थीं।
और जो साहित्य निकला, उस पर दो भाषाओं ने दावा किया, और दोनों ने उसका आधा हिस्सा भुला दिया।
प्रेमचंद को पूरा पढ़ने के लिए दोनों तरफ़ देखना पड़ता है। यह असुविधाजनक है, और शायद इसीलिए कम किया जाता है।
आज यह पहले से आसान है। उनका उर्दू लेखन रेख़्ता जैसे संग्रहों में देवनागरी लिप्यंतरण के साथ मौजूद है, यानी जो पाठक फ़ारसी लिपि नहीं पढ़ सकता वह भी उस आधे हिस्से तक पहुँच सकता है।
सोज़-ए-वतन भी उसी संग्रह में मिल जाती है, उसी किताब का पाठ जिसकी पाँच सौ प्रतियाँ 1909 में जला दी गई थीं। कलेक्टर का छापा उस किताब को मिटा नहीं सका, सिर्फ़ लेखक का नाम बदलवा सका।
स्रोतहरीश त्रिवेदी, 'द उर्दू प्रेमचंद ऐंड द हिंदी प्रेमचंद', बाज़ार-ए-हुस्न का प्रकाशन इतिहास, रेख़्ता पर सोज़-ए-वतन, प्रेमचंद का जीवन-वृत्त, प्रगतिशील लेखक संघ का 1936 का भाषण, कोलंबिया विश्वविद्यालय का संग्रह, सरस्वती प्रेस और प्रेमचंद पर मुद्रण इतिहास, हंस पत्रिका का इतिहास, सर एंटनी मैकडॉनल और 1900 का आदेश