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हाई कोर्ट ने पूछा, यह बस मानकों पर खरी उतरी थी या नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शुक्रवार, 25 सितंबर को ग्रेटर नोएडा बस अग्निकांड पर ख़ुद संज्ञान लिया और मुख्य सचिव, डीजीपी व परिवहन के अपर मुख्य सचिव को वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग पर तलब किया। आदेश में अदालत ख़ुद लिखती है कि उसे नहीं पता कि हादसे वाली बस आग-सुरक्षा के मानकों पर खरी उतरती थी या नहीं, और राज्य से 13 अक्तूबर तक जवाब माँगा है।

प्रयागराज में इलाहाबाद हाई कोर्ट परिसर की एक इमारत, दिसंबर 2023 की तस्वीर; इसी हाई कोर्ट की अदालत संख्या 36 में 25 सितंबर को जस्टिस शमशेरी ने इस मामले पर सुनवाई की
तस्वीर: Subhashish Panigrahi, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

शुक्रवार, 25 सितंबर की दोपहर इलाहाबाद हाई कोर्ट की अदालत संख्या 36 में जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने ग्रेटर नोएडा बस अग्निकांड पर ख़ुद संज्ञान लिया। आधार थीं अख़बारों की कतरनें। मामला रिट-सी संख्या 39454/2026 के नाम से दर्ज हुआ, और उसी दोपहर ढाई बजे उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और अपर मुख्य सचिव (परिवहन) वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग पर तलब कर लिए गए।

कोई दोष तय नहीं हुआ।

अदालत ने सिर्फ़ पूछा है।

सवाल एक है, सबसे तीखा। जिस बस में नौ यात्री जलकर मरे, वह ख़ुद आग-सुरक्षा के मानकों पर खरी उतरती थी या नहीं, इसका जवाब अदालत के पास भी नहीं है। यह इस डेस्क की 25 सितंबर की रिपोर्ट से जुड़ा अगला हिस्सा है। उस रिपोर्ट ने गजट के दस्तावेज़ों से दिखाया था कि आग-सूचक तंत्र की शर्त सिर्फ़ 1 अक्तूबर 2023 के बाद बनी बसों पर बंधती है, जबकि यह बस नवंबर 2022 में बनी थी (वह रिपोर्ट यहाँ पढ़ें)। अगली सुनवाई 13 अक्तूबर को है। तब तक राज्य सरकार को पाँच बिंदुओं पर हलफ़नामा दाख़िल करना है।

स्वतः संज्ञान, अख़बारों की कतरनें ही याचिका बनीं

आदेश के पहले पन्ने पर एक ख़ाली जगह है। "याचिकाकर्ता के वकील" वाले कॉलम में सिर्फ़ "इन पर्सन" दर्ज है। वजह सीधी है। यहाँ कोई याचिकाकर्ता है ही नहीं। मामले का नाम है "इन रे नाइन डेड ऐज़ बस इरप्ट्स इन फ़्लेम्स ऑन यमुना ई-वे।" अदालत ख़ुद इस मामले तक पहुंची। कोई पीड़ित या वकील अदालत तक नहीं गया।

आदेश में जस्टिस शमशेरी ने ख़ुद वे ख़बरें गिनाईं जिनके आधार पर संज्ञान लिया गया, हिंदुस्तान टाइम्स की शुक्रवार की रिपोर्ट "नाइन डेड ऐज़ बस इरप्ट्स इन फ़्लेम्स ऑन यमुना ई-वे", टाइम्स ऑफ़ इंडिया और द हिंदू की अंग्रेज़ी रिपोर्टें, हिंदुस्तान का शीर्षक "एक्सप्रेसवे पर बस आग का गोला बनी, नौ मरे", अमर उजाला के तीन अलग शीर्षक और दैनिक जागरण की रिपोर्ट। यह सूची आदेश में ही है, शब्दशः। आदेश ख़ुद कहता है कि इन अख़बारों की कतरनें आदेश का हिस्सा बनाई गई हैं। काग़ज़ पर छपी ख़बर सीधे अदालती रिकॉर्ड में चली गई।

यह फ़र्क़ मामूली नहीं है। जनहित याचिका में कोई व्यक्ति अपनी शिकायत लेकर अदालत आता है, और अक्सर अपने लिए राहत भी माँगता है, जैसे मुआवज़ा या कोई आदेश। स्वतः संज्ञान में अदालत ख़ुद शिकायतकर्ता बन जाती है। यहाँ किसी ने मुआवज़ा नहीं माँगा। कोई निजी राहत भी नहीं माँगी गई। अदालत का काम सिर्फ़ यह देखना है कि सरकार अपने ही नियम लागू कर रही है या नहीं। यह निगरानी अगली सुनवाई तक चलेगी, यानी 13 अक्तूबर तक।

इसी मक़सद से अदालत ने अपने दो शोधकर्ता, सुमित मिश्रा और दिव्या शुक्ला, को एक काम सौंपा। वे उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में हुए ऐसे हादसों का आँकड़ा जुटाएँगे। साथ ही शशवत गुप्ता को एमिकस क्यूरी बनाया गया, यानी अदालत की मदद के लिए नियुक्त स्वतंत्र वकील। एक सामान्य याचिका में यह भूमिका आमतौर पर याचिकाकर्ता या सरकार के वकील निभाते हैं। यहाँ अदालत ने अपनी ही एक टीम खड़ी कर दी। यह टीम अगली सुनवाई में और सामग्री लेकर आएगी।

मुख्य सचिव और डीजीपी वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग पर पेश हुए

तीनों अफ़सर उसी दिन वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग पर पेश हुए। उन्होंने अदालत को हादसे और उसके बाद दर्ज मुक़दमे की जानकारी दी, यानी वही एफ़आईआर और गिरफ़्तारियाँ जिनका ब्योरा इस डेस्क पहले दे चुका है। इसमें कुछ नया नहीं था। अदालत ने एक सीधा सवाल पूछा, उत्तर प्रदेश में ऐसी बसों की जांच कैसे होती है। परिवहन विभाग ने अपने उठाए गए क़दम गिनाए।

जवाब मुक़म्मल नहीं निकला। अदालत ने लिखा कि अभी भी सुधार की गुंजाइश है। नियमित जांच और तेज़ करने का निर्देश दिया गया, ख़ास तौर पर रात में, क्योंकि स्लीपर बसें ज़्यादातर रात में ही चलती हैं। मुख्य सचिव ने अदालत को व्यक्तिगत भरोसा दिलाया कि वे ख़ुद मामला देखेंगे और सभी विभाग मिलकर काम करेंगे। यह भी जांचा जाएगा कि बसें तय जगहों पर रुक रही हैं या नहीं। ध्यान रहे, यह अदालत के सामने दिया गया मौखिक भरोसा है। कोई लिखित शपथ-पत्र अभी नहीं है।

अगली सुनवाई पर भी यही तीन अफ़सर वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग पर पेश होंगे, आदेश में यह पहले से लिख दिया गया है। अपर महाधिवक्ता संजीव सिंह और वरिष्ठ अधिवक्ता तरुण अग्रवाल, स्थायी अधिवक्ता प्रभाकर त्रिपाठी की मदद से, राज्य की तरफ़ से मौजूद थे। दोनों पक्षों ने 13 अक्तूबर को और सुझाव लाने की बात कही है।

अदालत के सामने एआईएस के तीन दस्तावेज़, तारीख़ की परत गायब

एमिकस क्यूरी शशवत गुप्ता और अदालत के दोनों शोधकर्ताओं ने मिलकर तीन दस्तावेज़ अदालत के सामने रखे। पहला एआईएस-052, यानी बस की सामान्य बॉडी डिज़ाइन। दूसरा एआईएस-119, यानी स्लीपर कोच के लिए ख़ास शर्तें। तीसरा एआईएस-135, यानी आग की सूचना और बुझाने का तंत्र। अदालत ने अपने आदेश में इन तीनों के तकनीकी ब्योरे दर्ज किए।

चेन्नई में अशोक लेलैंड की बस-फ़ैक्ट्री, 2013 की तस्वीर; यह उस बस की नहीं, पर बस की बॉडी बनाने की उसी प्रक्रिया की झलक है जिसे एआईएस-052 नियमों में बाँधता है
तस्वीर: Nikhilb239, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

मानक कई हैं। यह तीनों दस्तावेज़ मूलतः दो श्रेणियों पर टिके हैं, टाइप-3 यानी सिर्फ़ बैठी सवारी वाली लंबी दूरी की बस, और टाइप-4 यानी स्कूल बस, टूरिस्ट बस और स्लीपर कोच जैसी ख़ास मक़सद की बसें। स्लीपर कोच में ड्राइवर केबिन को यात्री हिस्से से पूरी तरह बंद करने वाली दीवार नहीं होनी चाहिए। बस की ऊँचाई 3.8 मीटर से ज़्यादा नहीं हो सकती। 12 मीटर से छोटी बस में कम-से-कम चार इमरजेंसी एग्ज़िट चाहिए, 12 मीटर से बड़ी में पाँच। गैंगवे, यानी सीटों के बीच का गलियारा, भी तय चौड़ाई से कम नहीं हो सकता। इंजन-कक्ष में अपने-आप चलने वाला एरोसोल या फ़ोम तंत्र चाहिए। यात्री केबिन में पानी की महीन फुहार वाला सिस्टम चाहिए। ड्राइवर के लिए नींद-चेतावनी यंत्र भी अनिवार्य बताया गया है।

यह वही तीन दस्तावेज़ हैं जिन्हें इस डेस्क ने 25 सितंबर की अपनी रिपोर्ट में गजट अधिसूचनाओं तक जाकर पढ़ा था। उस रिपोर्ट ने दिखाया था कि आग-सूचक और बुझाने के तंत्र की शर्त दो अलग-अलग तारीख़ों से जुड़ी रही है। पहले जीएसआर 48(अ) से 27 जनवरी 2023, फिर जीएसआर 337(अ) से बदलकर 1 अक्तूबर 2023। यह शर्त सिर्फ़ उन बसों पर लागू होती है जो उस तारीख़ के बाद बनी हों। हादसे वाली बस नवंबर 2022 में बनी थी, दोनों तारीख़ों से पहले। एक और परत भी है। उसी रिपोर्ट ने यह भी दर्ज किया था कि एआईएस-119 ख़ुद स्लीपर कोच को टाइप-4 मानता है, जबकि दोनों अधिसूचनाएँ शब्द "टाइप-3" इस्तेमाल करती हैं। यह सवाल दस्तावेज़ों में अनसुलझा रह जाता है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के 25 सितंबर के आदेश में यह तारीख़ी शर्त कहीं दर्ज नहीं है। आदेश मानकों की पूरी सूची गिनाता है। पर यह नहीं पूछता कि कौन-सी तारीख़ से कौन-सी बस पर कौन-सा नियम बंधता है। इसका मतलब यह नहीं कि अदालत ग़लत है। इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि परमिट और फ़िटनेस की जड़ में जो सवाल है, वह अभी अदालत के सामने उस शक्ल में नहीं आया जिस शक्ल में इस डेस्क ने उसे गजट से निकाला था। 13 अक्तूबर का हलफ़नामा अगर परमिट जारी करने से पहले मानकों की जांच पर बात करेगा, तो यही वह जगह है जहाँ यह तारीख़ी सवाल भी उठ सकता है। इसके लिए बस इतना चाहिए कि कोई इसे वहाँ तक ले जाए। एमिकस क्यूरी ख़ुद कह चुके हैं कि वे अगली सुनवाई पर और सामग्री लाएँगे, तो यह मौक़ा अभी बंद नहीं हुआ है।

यह भी याद रखने की बात है कि टाइप-4 का दर्जा किसी बस को ढीले नियम नहीं देता। एआईएस-119 की अपनी धारा 4.0 ख़ुद कहती है कि स्लीपर कोच की बुनियादी शर्तें एआईएस-052 के उसी हिस्से से ली जाएँगी जो टाइप-3 पर लागू होता है। नाम भले अलग हो, दरवाज़े और एग्ज़िट का नियम एक ही है। इसलिए वर्गीकरण का सवाल तारीख़ के सवाल से जुड़ा तो है, पर उसकी जगह नहीं लेता।

इस बस ने मानक पूरे किए या नहीं, अदालत को ख़ुद नहीं पता

आदेश की सबसे सीधी पंक्ति यह है, अदालत को नहीं बताया गया कि हादसे वाली बस ने उपरोक्त मानकों का पालन किया था या नहीं। दो दिन बीत चुके थे। फिर भी यह बुनियादी सवाल अनुत्तरित रहा।

अदालत ने आगे का रास्ता भी लिख दिया। अगर बस ने मानक पूरे नहीं किए थे, तो कार्रवाई सिर्फ़ ड्राइवर और कंडक्टर तक सीमित नहीं रहेगी। लाइसेंसधारी यानी बस कंपनी के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई होगी। अदालत ने यहाँ तक लिखा कि हालात के हिसाब से ऐसे लाइसेंसधारी की सभी बसों पर रोक भी लगाई जा सकती है। यह "अगर, तो" वाला निर्देश है। किसी को दोषी ठहराने वाला फ़ैसला नहीं।

बस राज कल्पना ट्रैवल एजेंसी की थी। कंपनी मध्य प्रदेश से चलती है और बिहार के मधुबनी में पंजीकृत है, यह इस डेस्क की पिछली रिपोर्ट में दर्ज हो चुका है। शनिवार रात इस कंपनी के प्रबंधक विकास को भी गिरफ़्तार कर लिया गया। यह चौथी गिरफ़्तारी थी, दो दिन पहले पकड़े गए दो ड्राइवर और एक परिचालक के बाद। जांच का दावा है कि हादसे से पहले ड्राइवर और परिचालक ने गियरबॉक्स की गड़बड़ी की शिकायत प्रबंधक तक पहुंचाई थी, और कंपनी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। यह पुलिस जांच का दावा है, तथ्य नहीं। किसी अदालत ने अभी इसकी पुष्टि नहीं की। विकास सहित चारों सिर्फ़ आरोपी हैं, दोषी नहीं।

फ़िटनेस और परमिट पर राज्य का हलफ़नामा 13 अक्तूबर तक बाक़ी

बस का पंजीकरण बिहार में हुआ। फ़िटनेस प्रमाणपत्र कथित तौर पर राजस्थान से और प्रदूषण प्रमाणपत्र हरियाणा से जुड़ा बताया गया, यह भी इस डेस्क की पिछली रिपोर्ट में दर्ज है। अख़बार ने ख़ुद इसे पुष्टि नहीं, वाहन-रिकॉर्ड में मिला विवरण बताया था। 25 सितंबर के आदेश में परिवहन विभाग ने अपनी कार्रवाई गिनाई। पर किसी ने अदालत को यह नहीं बताया कि इसी बस की फ़िटनेस कब, किसने और किन शर्तों पर जारी की थी। यह सवाल अभी भी खुला है।

तमिलनाडु के इरोड में क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय का बोर्ड, 2011 की तस्वीर; यह वह दफ़्तर नहीं जिसने इस बस को फ़िटनेस दी, पर फ़िटनेस और परमिट ऐसे ही किसी दफ़्तर से जारी होते हैं
तस्वीर: JayakanthanG, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 3.0

अदालत ने राज्य से पाँच बिंदुओं पर हलफ़नामा माँगा है। पहला, पिछले तीन साल में उत्तर प्रदेश से स्लीपर बसों को कितने परमिट मिले। दूसरा, परमिट देने से पहले मानक जांचे गए थे या नहीं, काग़ज़ात के साथ। यह भी कि किसी बस का ढाँचा बदलकर ज़्यादा जगह तो नहीं बनाई गई, या उसे व्यावसायिक पार्सल ढोने में तो इस्तेमाल नहीं किया गया। तीसरा, राज्य की सीमाओं पर जांच चौकियाँ कैसी हैं और अचानक जांच के लिए क्या क़दम उठाए गए। चौथा, हर जांच में यात्रियों के बयान दर्ज हुए या नहीं, आग-बुझाने का यंत्र मिला या नहीं, यात्रियों को इमरजेंसी गेट के बारे में बताया गया या नहीं, और ड्राइवर-परिचालक को हादसे में क्या करना है इसकी जानकारी थी या नहीं। पाँचवाँ, पिछले तीन साल में ऐसे हादसों पर कितनी आपराधिक कार्रवाई हुई और उसका नतीजा क्या निकला। यहाँ एक जुड़ाव है। यह पाँचवाँ बिंदु इस बस के अपने पुराने रिकॉर्ड को भी छू सकता है, चालानों की जो गिनती इस डेस्क की पिछली रिपोर्ट में दो अख़बारों के बीच उलझी मिली थी। जवाब अभी नहीं आया है। 13 अक्तूबर तक इनमें से कुछ भी दाख़िल नहीं हुआ।

जनवरी में मंत्रालय ने पुरानी बसों में आग-तंत्र लगाने को कहा था

यह बस नवंबर 2022 में बनी। यानी दोनों गजट अधिसूचनाओं की तारीख़ से पहले की बस। पर केंद्र सरकार पुरानी बसों को लेकर पूरी तरह चुप नहीं रही।

8 जनवरी 2026 को केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने एक वीडियो बयान में कहा कि पिछले छह महीनों में स्लीपर बसों के छह बड़े हादसों में 145 लोग मारे गए थे। अब सिर्फ़ मान्यता-प्राप्त कंपनियाँ ही स्लीपर बसें बना सकेंगी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि पहले से चल रही बसों में आग-सूचक तंत्र, हथौड़े वाले इमरजेंसी एग्ज़िट और इमरजेंसी लाइटिंग लगाई जाएगी। बात सिर्फ़ नई बसों तक सीमित नहीं रखी गई। यह बयान बिज़नेस स्टैंडर्ड ने एएनआई के हवाले से अगले दिन छापा, वीडियो के हवाले से। मंत्रालय के 1 सितंबर 2025 से लागू संशोधित बस बॉडी कोड का ज़िक्र इसी दौर की रिपोर्टों में मिलता है।

ताइवान में एक टूर बस के दरवाज़े पर सुरक्षा जांच करते अफ़सर, अगस्त 2017 की तस्वीर; यह भारत की तस्वीर नहीं, पर जांच जैसी होनी चाहिए उसकी झलक यहीं मिलती है
तस्वीर: Solomon203, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

फिर 29 अप्रैल 2026 को बसवर्ल्ड इंडिया कॉन्क्लेव में गडकरी ने आगे कहा कि आग-बुझाने के तंत्र और इमरजेंसी एग्ज़िट की जांच के बिना अब किसी नई स्लीपर बस का पंजीकरण नहीं होगा। हर बस का रिकॉर्ड वाहन पोर्टल पर चढ़ेगा। यह शर्त सिर्फ़ नए पंजीकरण पर है, पहले से पंजीकृत बसों पर नहीं। हादसे वाली बस अप्रैल 2023 में ही पंजीकृत हो चुकी थी। इसलिए अप्रैल वाली यह शर्त उस पर लागू ही नहीं होती।

बचता है जनवरी का रेट्रोफ़िट वाला वादा। बस उस वक़्त पहले से चल रही थी, इसलिए वह वादा उस पर लागू होता था। क्या यह बस रेट्रोफ़िट हुई? इसका जवाब न आदेश में है, न इस डेस्क को कहीं और मिला। यही वह ख़ाली जगह है जिस पर 13 अक्तूबर का हलफ़नामा रोशनी डाल सकता है। एक बात और ग़ौर करने की है। जनवरी वाला यह सिर्फ़ मंत्री का बयान है। इस डेस्क को कोई गजट अधिसूचना नहीं मिली जो इस एलान को क़ानूनी शक्ल देती हो।

तीन पुराने हादसे और एक राष्ट्रीय आँकड़ा, अदालत के अपने आदेश में

अदालत ने अपने आदेश में उत्तर प्रदेश के तीन पुराने हादसे ख़ुद गिनाए। जुलाई 2023 में रायबरेली-प्रयागराज-लखनऊ राजमार्ग पर तीन मौतें। नवंबर 2024 में कन्नौज-लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर चार मौतें। दिसंबर 2025 में यमुना एक्सप्रेसवे के मथुरा-ग्रेटर नोएडा हिस्से में तेरह मौतें। तीनों जोड़ें तो इस हादसे से पहले ही तीन साल में उत्तर प्रदेश में बीस मौतें दर्ज थीं। ग्रेटर नोएडा वाली नौ मौतें भी जोड़ दें, तो यह आँकड़ा उनतीस तक पहुंचता है, तीन साल दो महीने में, सिर्फ़ उत्तर प्रदेश के राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर। आदेश इन्हें सिर्फ़ "हादसे" कहता है। हर एक को आग से जोड़कर नहीं बताता।

दिसंबर 2025 वाला हादसा प्रसार भारती के न्यूज़ ऑन एयर पोर्टल के मुताबिक़ घने कोहरे में कई गाड़ियों की टक्कर और उसके बाद लगी आग थी। तेरह मौतें, सत्तर से ज़्यादा घायल। इसमें बस शामिल थी या नहीं, यह पोर्टल की रिपोर्ट में साफ़ दर्ज नहीं है।

आदेश ने एक राष्ट्रीय आँकड़ा भी दर्ज किया। सड़क परिवहन मंत्री ने राज्यसभा में बताया था कि जनवरी 2023 से 10 दिसंबर 2025 तक देश भर में बस में आग की 45 घटनाएँ हुईं, जिनमें 64 यात्री मारे गए और 145 घायल हुए। यह आँकड़ा अदालत के अपने आदेश से लिया गया है। इस डेस्क को राज्यसभा का असली जवाब या उससे जुड़ी पीआईबी विज्ञप्ति नहीं मिली। इसलिए राज्यवार ब्योरे में नहीं जाया जा रहा।

इसी डेस्क की 25 सितंबर की रिपोर्ट में केरल हाईकोर्ट के 2022 के एक आदेश का ज़िक्र है, जिसमें कॉन्ट्रैक्ट कैरिज बसों में बिजली की गड़बड़ी को आग का ख़तरा बताया गया था। वह आदेश बिजली के जोड़-तोड़ पर था, स्लीपर कोच की ढाँचागत आग-सुरक्षा पर नहीं। बस-अग्निकांडों में आग-सूचक या बुझाने के तंत्र पर कोई सुप्रीम कोर्ट निर्देश ढूँढने पर इस लेख को नहीं मिला।

स्रोतइलाहाबाद हाई कोर्ट, रिट-सी संख्या 39454/2026, 'इन रे नाइन डेड ऐज़ बस इरप्ट्स इन फ़्लेम्स ऑन यमुना ई-वे बनाम उत्तर प्रदेश राज्य', जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी का आदेश, 25 सितंबर 2026 (लाइवलॉ की होस्ट की गई प्रति, पाँच पन्ने), लाइवलॉ, 26 सितंबर 2026, सुबह 11:19 बजे, बाइलाइन स्पर्श उपाध्याय: आदेश पर रिपोर्ट, ईटीवी भारत अंग्रेज़ी, 25 सितंबर 2026: अदालत की सुनवाई पर रिपोर्ट, द प्रिंट हिंदी, 25 सितंबर 2026, रात 8:32 बजे, इंडिया डॉट कॉम, 26 सितंबर 2026, रात 11:08 बजे: प्रबंधक विकास की गिरफ़्तारी और गियरबॉक्स-शिकायत के दावे पर रिपोर्ट, न्यूज़ ऑन एयर, प्रसार भारती, 16 दिसंबर 2025, शाम 6:10 बजे: मथुरा में यमुना एक्सप्रेसवे हादसे पर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का शोक, इंडिया टीवी न्यूज़, 8 जनवरी 2026, रात 9:50 बजे: नितिन गडकरी का स्लीपर बसों पर बयान, बिज़नेस स्टैंडर्ड, एएनआई के हवाले से, 9 जनवरी 2026, सुबह 9:43 बजे: गडकरी के वीडियो बयान का उद्धरण, इंडिया टीवी हिंदी, 29 अप्रैल 2026, शाम 4:53 बजे: बसवर्ल्ड इंडिया कॉन्क्लेव में गडकरी का बयान

रोज़ सुबह 7 बजे, बीते दिन का अंक — एक मेल।