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चार शहरों के कचरे के पहाड़, सरकारी आँकड़ों में सिर्फ़ एक ही ख़त्म

आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय की 21 सितंबर की बैकग्राउंडर गोरखपुर, दिल्ली, नागपुर और रायचूर को स्वच्छ भारत मिशन-शहरी की चार कामयाबी बताती है। मंत्रालय की अपनी वार्षिक रिपोर्ट और भलस्वा पर बाद की विज्ञप्तियाँ जोड़ने पर पता चलता है कि इनमें से सिर्फ़ गोरखपुर की डंपसाइट पूरी तरह ख़त्म हुई है, और भलस्वा में बायोमाइंड कचरे का एक आँकड़ा मंत्रालय के दो दस्तावेज़ों में आपस में मेल भी नहीं खाता।

यह तस्वीर जुलाई 2021 की है, दिल्ली की भलस्वा डंपसाइट पर बुलडोज़र और एक्स्कैवेटर पुराने कचरे के बीच काम करते हुए; बायोमाइनिंग तेज़ रफ़्तार से चलने से पहले का यही पहाड़ है, जिसे अब चरणों में साफ़ किया जा रहा है
तस्वीर: Dayacharan1, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

तीस लाख से ज़्यादा आबादी वाले नागपुर में जिस जगह कभी कचरे के ट्रक रोज़ उतरते थे, वहाँ अब ट्रॉमेल जैसी मशीनें कचरे को छाँटती हैं। गोरखपुर में जिस चालीस एकड़ की डंपसाइट पर सात साल तक कचरा गिरता रहा, वहाँ अब रोज़ क़रीब पाँच सौ लोग आते हैं। यह आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय की 21 सितंबर 2026 की एक बैकग्राउंडर में दर्ज है।

बैकग्राउंडर गोरखपुर, दिल्ली, नागपुर और रायचूर, चार शहरों की कहानी एक साथ सुनाती है। चारों जगह मशीनें एक जैसी हैं, भाषा एक जैसी है, दावा भी एक जैसा है: पुराना कचरा हटा, ज़मीन वापस मिली। दस्तावेज़ के अपने आँकड़े पढ़ने पर एक फ़र्क़ साफ़ दिखता है। चार में से सिर्फ़ एक शहर की डंपसाइट सच में ख़त्म हुई है। बाक़ी तीन में या तो काम अभी जारी है, या मूल आँकड़े ही दर्ज नहीं जिनसे पूरा होना नापा जा सके।

गोरखपुर की चालीस एकड़: जहाँ पहाड़ अब पार्क है

गोरखपुर में शहर की सबसे पुरानी पहचान वाली जगहों में से एक अब एक पार्क है। सात साल तक यह शहर का मुख्य कचरा डंपिंग स्थल था। चालीस एकड़ में फैला यह ढेर लगातार ऊँचा होता गया, और आसपास रहने वालों के लिए हवा और पानी दोनों ख़राब करता रहा। यह आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय की 21 सितंबर 2026 की बैकग्राउंडर में दर्ज है।

समाधान बायोमाइनिंग से निकला। पुराने कचरे के पूरे ढेर को खोदा गया, फिर मशीनों से छानकर उसके चार हिस्से अलग किए गए: कचरे से बना ईंधन, काली मिट्टी, दोबारा इस्तेमाल हो सकने वाली चीज़ें, और वह मलबा जो किसी काम का नहीं। हर दिन क़रीब 400 टन कचरा इसी तरह छाना गया। काली मिट्टी नीची जगहों को भरने के काम आई। ईंधन सीमेंट कारख़ानों में जला, जहाँ वह कोयले की जगह लेता है। धीरे-धीरे पहाड़ ज़मीन में बदल गया।

ज़मीन मिलने के बाद काम रुका नहीं। पूरे चालीस एकड़ पर अब कचरे से कंचन रैप्टी इको पार्क बना है। इसमें हरी घास के मैदान हैं, टहलने और दौड़ने के ट्रैक हैं, बच्चों के खेलने की जगह है। एक ओपन जिम है, एक योगा ज़ोन है, सोलर लाइटें हैं और पानी बचाने के ढाँचे भी। खाने के स्टॉल हैं, पार्किंग है। कुछ हिस्सा उसी पुराने कचरे से बनी चीज़ों को दिखाता है, ताकि लोग देख सकें कि कचरे से क्या-क्या बन सकता है।

पार्क में रोज़गार भी बना है। महिलाओं के एक स्वयं सहायता समूह, शक्ति की रसोई, ने पार्क के भीतर एक रेस्तरां शुरू किया है। बैकग्राउंडर के मुताबिक़ पार्क में अब रोज़ाना क़रीब 500 लोग आते हैं। जहाँ ट्रक कचरा गिराने आते थे, वहाँ अब बच्चे झूला झूलते हैं।

बायोमाइनिंग ख़ुद कोई नई तकनीक नहीं है, पर पैमाना अहम है। एक साथ रोज़ 400 टन कचरा छानने के लिए ट्रॉमेल जैसी बड़ी मशीनें चाहिए, जो घूमते हुए ड्रम में कचरे को आकार के हिसाब से अलग करती हैं। बैकग्राउंडर मशीनों के मॉडल या ठेकेदार का नाम नहीं देती। यह भी नहीं बताती कि सात साल में डंपिंग स्थल पर कुल कितना कचरा जमा हुआ था। इसलिए यह हिसाब नहीं लगाया जा सकता कि 400 टन रोज़ के हिसाब से यह काम कितने महीनों या सालों में पूरा हुआ। जो मिलता है, वह नतीजा है, प्रक्रिया की पूरी समयरेखा नहीं।

यह तस्वीर बार्सिलोना के एक कचरा प्रबंधन संघ की है, फ़रवरी 2016 में ली गई; ट्रॉमेल इसी तरह घूमते ड्रम में कचरे को आकार के हिसाब से छानता है, जैसा गोरखपुर में हर दिन 400 टन के हिसाब से हुआ
तस्वीर: Xavier Dengra, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

गोरखपुर का यह उदाहरण चारों शहरों में सबसे साफ़ है, इस मायने में कि इसमें अस्पष्टता की कोई गुंजाइश नहीं बचती। पूरी की पूरी चालीस एकड़ ज़मीन डंपिंग से निकलकर सार्वजनिक इस्तेमाल में आ चुकी है। न कोई बचा हुआ हिस्सा है, न कोई आगे की तारीख़ बताई गई है। बैकग्राउंडर में बाक़ी तीन शहरों के लिए ऐसा दावा नहीं मिलता।

दिल्ली का भलस्वा: पहाड़ अब भी वहीं खड़ा है

दिल्ली की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी पहचान में भलस्वा का नाम भी आता है, पर वजह अच्छी नहीं है। सत्तर एकड़ में फैली यह डंपसाइट सालों से राजधानी की सबसे ऊँची और सबसे चर्चित जगहों में गिनी जाती रही है। बैकग्राउंडर के मुताबिक़ जुलाई 2022 से यहाँ बायोमाइनिंग मिशन मोड में लगातार चल रही है।

रफ़्तार सितंबर 2025 में बढ़ी। इसी महीने देशभर में चलने वाला सालाना स्वच्छता ही सेवा अभियान भलस्वा से ही शुरू हुआ, और साइट को तेज़ रफ़्तार से साफ़ करने के लिए चुना गया। मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 के मुताबिक़ इसी मौक़े पर केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल ने ख़ुद भलस्वा को गोद लेकर उसकी सफ़ाई की ज़िम्मेदारी ली। दो महीने बाद, 8 नवंबर 2025 को, नेशनल अर्बन कॉन्क्लेव में मंत्री ने डंपसाइट रेमेडिएशन एक्सेलरेटर प्रोग्राम यानी डीआरएपी की शुरुआत की। यह पूरे देश में मिशन मोड से चलने वाला कार्यक्रम है।

नतीजे दिखने लगे। बैकग्राउंडर के मुताबिक़ मई 2026 तक भलस्वा का आधे से ज़्यादा हिस्सा साफ़ हो चुका था। एक अगस्त 2026 को मंत्री ने ख़ुद साइट का दौरा किया। उसी दिन जारी पीआईबी विज्ञप्ति में दिल्ली नगर निगम ने मंत्री को बताया कि 31 जुलाई 2026 तक 99.07 लाख मीट्रिक टन पुराना कचरा साफ़ हो चुका है। यही आँकड़ा बैकग्राउंडर में भी दोहराया गया है।

दिल्ली के सिविक सेंटर में नगर निगम मुख्यालय की यह तस्वीर नवंबर 2014 की है; भलस्वा के 99.07 लाख टन वाले आँकड़े की जानकारी मंत्री को इसी निगम ने दी थी
तस्वीर: Nikhil B, विकिमीडिया कॉमन्स CC BY-SA 4.0

पर पहाड़ ख़त्म नहीं हुआ है। उसी विज्ञप्ति के मुताबिक़ बचा हुआ ढेर 15 अक्टूबर 2026 तक साफ़ होने की उम्मीद है। मार्च 2026 तक जो नया कचरा वहाँ जमा हुआ, उसे अलग से 31 दिसंबर 2026 तक हटाने का लक्ष्य रखा गया है। यानी आज, 23 सितंबर 2026 को, भलस्वा की डंपसाइट अब भी मौजूद है। बैकग्राउंडर ख़ुद इसे "एक और पहाड़ धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है" जैसे शब्दों में बताता है, कामयाबी की कहानी की तरह नहीं। यह फ़र्क़ छोटा नहीं है।

भलस्वा के लिए एकड़ में कोई सटीक आँकड़ा नहीं दिया गया, सिर्फ़ "आधे से ज़्यादा" कहा गया है। गोरखपुर, नागपुर और रायचूर तीनों के लिए एकड़ की गिनती दस्तावेज़ों में मौजूद है। दिल्ली की सबसे बड़ी और सबसे चर्चित साइट के लिए नहीं। सत्तर एकड़ के हिसाब से आधा हिस्सा पैंतीस एकड़ के आसपास बैठता है, पर यह हमारा हिसाब है, दस्तावेज़ का नहीं।

मंत्री ने दौरे पर एक और निर्देश दिया। उन्होंने निगम से कहा कि लैंडफ़िल में रोज़ आ रहे नए कचरे को प्रोसेस करने का हाल में मिला ठेका जल्दी शुरू किया जाए। मक़सद साफ़ है: पुराना कचरा साफ़ हो, इससे पहले उतना नया कचरा वहीं जमा न हो जाए। बैकग्राउंडर में भी यही चिंता दोहराई गई है, आग से बचाव और लीचेट यानी कचरे से रिसने वाले ज़हरीले पानी के प्रबंधन के हवाले से।

भलस्वा के एक आँकड़े पर मंत्रालय के दो दस्तावेज़ आपस में नहीं मिलते

एक आँकड़ा दो जगह अलग-अलग मिलता है। मंत्रालय की अपनी वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 कहती है कि 2019 से नवंबर 2025 तक भलस्वा में कुल 99.15 लाख मीट्रिक टन पुराना कचरा बायोमाइंड हो चुका था। यह रिपोर्ट के उस हिस्से में दर्ज है जिसके ज़्यादातर आँकड़े 31 दिसंबर 2025 तक के हैं।

दूसरी तरफ़ मंत्री के 1 अगस्त 2026 के दौरे पर जारी पीआईबी विज्ञप्ति में दिल्ली नगर निगम का दिया आँकड़ा है: 31 जुलाई 2026 तक सिर्फ़ 99.07 लाख मीट्रिक टन। बैकग्राउंडर ने यही दूसरा आँकड़ा उठाया है।

गणित सीधा है। नवंबर 2025 से जुलाई 2026 तक आठ महीने बीते, और इस दौरान काम मिशन मोड में चलता रहा। फिर भी बाद की तारीख़ का आँकड़ा पहले से क़रीब 8,000 मीट्रिक टन कम है। यह दुर्घटना नहीं, बल्कि दो दस्तावेज़ों में एक ही चीज़ के दो अलग जोड़ हैं।

फ़र्क़ कम है, एक फ़ीसदी से भी कम। पर दिशा उलटी है, और इसकी कोई वजह किसी दस्तावेज़ में नहीं दी गई। दोनों आँकड़े यहाँ दर्ज हैं। दोनों सरकारी हैं। दोनों एक साथ सच नहीं हो सकते।

नागपुर और रायचूर: प्रोसेसिंग प्लांट और जंगल

गोरखपुर पार्क बना, भलस्वा अब भी साफ़ हो रहा है। नागपुर और रायचूर ने तीसरा और चौथा रास्ता चुना।

नागपुर की भांडेवाड़ी डंपिंग यार्ड शहर की तीस लाख से ज़्यादा आबादी का दशकों का कचरा समेटे हुए थी। बैकग्राउंडर के मुताबिक़ यहाँ व्यवस्थित तरीक़े से खुदाई, छँटाई और प्रोसेसिंग हुई, और दस लाख मीट्रिक टन से ज़्यादा पुराना कचरा साफ़ किया गया। मंत्रालय की 22 जुलाई 2026 की अलग विज्ञप्ति में एक आँकड़ा और मिलता है, जो बैकग्राउंडर में नहीं है: क़रीब 55 एकड़ ज़मीन वापस मिली।

पर नागपुर की कहानी ज़मीन वापस मिलने पर ख़त्म नहीं होती। साइट अब एक पूरी इंटीग्रेटेड म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट प्रोसेसिंग फ़ैसिलिटी है। यहाँ कचरे से खाद बनती है, कचरे से ईंधन बनता है, और ट्रॉमेल तथा बैलिस्टिक सेपरेटर जैसी मशीनें रोज़ के कचरे को छाँटती हैं। सीसीटीवी और सेंसर आधारित निगरानी लगातार चलती है। भांडेवाड़ी अब भी एक सक्रिय कचरा केंद्र है। बस अब वह खुला ढेर नहीं, बंद और नियंत्रित प्रोसेसिंग प्लांट है।

यह तस्वीर अमेरिका के ग्रीनविल शहर की एक रीसाइक्लिंग छँटाई इकाई की है, अक्टूबर 2020 में ली गई; नागपुर की भांडेवाड़ी अब ऐसी ही मशीनों से रोज़ का कचरा छाँटने वाली इकाई बन चुकी है
तस्वीर: Greenville, NC, विकिमीडिया कॉमन्स Public domain

यहीं एक ख़ाली जगह भी है। न बैकग्राउंडर, न अलग विज्ञप्ति, कहीं भी यह नहीं बताया गया कि भांडेवाड़ी में मूल रूप से कुल कितना कचरा जमा था या साइट कितने एकड़ में फैली थी। इसके बिना 55 एकड़ या दस लाख टन का कोई फ़ीसदी नहीं निकाला जा सकता। गोरखपुर के लिए यह हिसाब मुमकिन है। नागपुर के लिए नहीं।

रायचूर की याकलस्पुरा डंपसाइट का हिसाब ज़्यादा साफ़ है। बैकग्राउंडर के मुताबिक़ यह साइट पैंतीस एकड़ में फैली थी। इसमें से 62,252 मीट्रिक टन कचरा प्रोसेस हुआ, और क़रीब बाईस एकड़ ज़मीन वापस मिली। यानी क़रीब 63 फ़ीसदी ज़मीन ही अब तक रीक्लेम हुई है। बाक़ी तेरह एकड़ का हिसाब बैकग्राउंडर में नहीं है।

रीक्लेम हुई ज़मीन के एक हिस्से पर, पाँच से सात एकड़ में, मियावाकी तरीक़े से घना जंगल लगाया गया है। क़रीब 60,000 पौधे रोपे जा रहे हैं, ज़्यादातर बांस और स्थानीय प्रजातियाँ। रोपाई 5 जून 2026 को विश्व पर्यावरण दिवस पर शुरू हुई। रिलीज़ इस पूरे काम को ख़ुद "टॉक्सिक वेस्ट टू इकोलॉजिकल वेल्थ" नाम देती है। बाक़ी तेरह एकड़ का क्या होगा, यह नहीं बताया गया।

चार में सिर्फ़ एक पहाड़ सच में ख़त्म हुआ है

बैकग्राउंडर का शीर्षक चार शहरों को एक जैसी कामयाबी की तरह पेश करता है। दस्तावेज़ के अपने आँकड़े पढ़ने पर तस्वीर एक जैसी नहीं रहती।

गोरखपुर में चालीस की चालीस एकड़ ज़मीन पार्क बन चुकी है। वहाँ अब कोई डंपिंग नहीं होती। कोई तारीख़ बाक़ी नहीं है। यही असली मायने में "ख़त्म" कहलाने लायक़ है।

भलस्वा में सत्तर एकड़ में से आधे से ज़्यादा साफ़ हुआ है, पर बाक़ी हिस्से के लिए 15 अक्टूबर और 31 दिसंबर 2026 की दो तारीख़ें अभी भी सामने हैं। रायचूर में पैंतीस में से बाईस एकड़, यानी दो-तिहाई से कुछ कम, वापस मिली है। नागपुर का हिसाब हो ही नहीं सकता, क्योंकि उसका मूल आकार दर्ज नहीं है।

नीचे की तालिका बैकग्राउंडर और उससे जुड़ी अलग विज्ञप्तियों के आँकड़े एक साथ रखती है:

शहरकुल क्षेत्रपुराना कचरा प्रोसेस्डज़मीन वापस मिलीस्थिति, 23 सितंबर 2026 तक
गोरखपुर40 एकड़दर्ज नहीं, दर क़रीब 400 टन/दिन40 एकड़ (100%)पार्क बनकर तैयार
दिल्ली-भलस्वा70 एकड़99.07 लाख टन (31 जुलाई 2026 तक)सिर्फ़ "आधे से ज़्यादा", एकड़ का आँकड़ा दर्ज नहींदो चरणों में जारी, अक्टूबर-दिसंबर 2026 लक्ष्य
नागपुर-भांडेवाड़ीदर्ज नहीं10 लाख टन से ज़्यादाक़रीब 55 एकड़प्रोसेसिंग प्लांट के रूप में सक्रिय
रायचूर-याकलस्पुरा35 एकड़62,252 टनक़रीब 22 एकड़ (63%)आंशिक, जंगल का काम जारी

चारों जगह मशीनें एक जैसी हैं, बायोमाइनिंग एक जैसी है, भाषा भी एक जैसी है। पर पूरा होना अलग-अलग चीज़ है। एक जगह पहाड़ सचमुच जा चुका है। बाक़ी तीन जगह वह घट रहा है, बदल रहा है, या मापा ही नहीं जा सकता। "रेमेडिएशन" शब्द तीनों हालात को एक साथ ढँक देता है।

राष्ट्रीय तस्वीर: 2,478 डंपसाइट और 25.06 करोड़ टन पुराना कचरा

बैकग्राउंडर सिर्फ़ चार शहरों की बात करता है। पूरे देश का हिसाब इसमें कहीं नहीं है। वह हिसाब मंत्रालय के एक अलग दस्तावेज़ में मिलता है: आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26, जिसके ज़्यादातर आँकड़े 31 दिसंबर 2025 तक के हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक़ स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के तहत देशभर में 2,478 डंपसाइट चिह्नित हैं। इनमें कुल 25.06 करोड़ मीट्रिक टन पुराना कचरा जमा है। इनमें से 15.37 करोड़ मीट्रिक टन, यानी 61 फ़ीसदी, अब तक साफ़ हो चुका है। बाक़ी क़रीब 9.69 करोड़ मीट्रिक टन अभी बचा है। ज़मीन के हिसाब से 8,027 एकड़, यानी अब तक का आधे से ज़्यादा हिस्सा, वापस मिल चुकी है।

एक फ़र्क़ ध्यान देने लायक़ है। कचरा साफ़ होने की दर 61 फ़ीसदी है, पर ज़मीन वापस मिलने की दर उससे कम, 53 फ़ीसदी है। वजह रिपोर्ट में नहीं बताई गई, पर चारों शहरों के उदाहरण इशारा करते हैं: कचरा हटाना पहला क़दम है, ज़मीन को समतल करना, ढाँकना और इस्तेमाल लायक़ बनाना अलग और बाद का काम है। गोरखपुर में यह दूसरा क़दम भी पूरा हुआ, इसलिए वहाँ पार्क बना। भलस्वा और रायचूर में कचरा जितनी तेज़ी से हटा, ज़मीन उतनी तेज़ी से तैयार नहीं हुई।

जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच अकेले 3.66 करोड़ मीट्रिक टन कचरा साफ़ हुआ। यही आँकड़ा बैकग्राउंडर में भी है, और यहाँ दोनों दस्तावेज़ मेल खाते हैं। इसी साल 459 शहरी स्थानीय निकायों ने, 29 राज्यों में फैले हुए, अपनी-अपनी डंपसाइट का पूरा रेमेडिएशन पूरा किया होने का दावा किया।

459 का यह आँकड़ा जितना बड़ा लगता है, उतना साफ़ नहीं है। न बैकग्राउंडर, न वार्षिक रिपोर्ट, कहीं यह नहीं बताया गया कि हर निकाय के पास कितनी डंपसाइट थीं। अगर किसी शहर में तीन डंपसाइट हैं, तो क्या "पूरा रेमेडिएशन" तीनों को शामिल करता है, या सिर्फ़ एक मुख्य साइट को? दोनों दस्तावेज़ इसका जवाब नहीं देते।

रफ़्तार बढ़ाने के लिए मंत्रालय ने डंपसाइट रेमेडिएशन एक्सेलरेटर प्रोग्राम यानी डीआरएपी 8 नवंबर 2025 को शुरू किया। यह कार्यक्रम पूरे 2,478 डंपसाइट को एक साथ नहीं छूता। इसका निशाना है टॉप 214 डंपसाइट, जो 203 शहरी स्थानीय निकायों में हैं और 30 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में फैली हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़ यही 214 डंपसाइट देश के लगभग 80 फ़ीसदी पुराने कचरे के बराबर हैं।

यह आँकड़ा अपने आप में कुछ कहता है। 2,478 में से सिर्फ़ 214 डंपसाइट, यानी इनका क़रीब 8.6 फ़ीसदी हिस्सा, देश के चार-पाँचवें पुराने कचरे का बोझ उठाए हुए हैं। बाक़ी 2,264 डंपसाइट में बचा हुआ बीस फ़ीसदी कचरा है, पर वे संख्या में कहीं ज़्यादा हैं। भलस्वा, जिस पर इतना ध्यान है, इन्हीं 214 में से एक है।

इसी दौर में मंत्रालय ने ठोस और तरल कचरा प्रबंधन के लिए राज्यों की क़रीब 5,000 करोड़ रुपये की परियोजनाएँ मंज़ूर कीं। यह वार्षिक रिपोर्ट का अपना आँकड़ा है। यह पैसा सीधे डंपसाइट रेमेडिएशन के लिए नहीं है। यह उसी बड़े ढाँचे का हिस्सा है जिस पर रेमेडिएशन के बाद का काम टिका होता है।

समय-सीमा: दिसंबर 2026 की एक तारीख़, अब दो हिस्सों में

भलस्वा के लिए मंत्रालय ने अलग-अलग समय पर अलग-अलग विस्तार से तारीख़ें दी हैं। जवाब दो दस्तावेज़ों में है।

वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 में एक ही लक्ष्य दर्ज है: भलस्वा का सौ फ़ीसदी रेमेडिएशन दिसंबर 2026 तक। इसके ज़्यादातर आँकड़े 31 दिसंबर 2025 तक के हालात पर आधारित हैं।

आठ महीने बाद तस्वीर बदल गई। मंत्री के 1 अगस्त 2026 के दौरे पर यही लक्ष्य दो हिस्सों में बँटा हुआ मिलता है। पुराना जमा हुआ बड़ा ढेर 15 अक्टूबर 2026 तक साफ़ होने की उम्मीद है। मार्च 2026 तक जो अतिरिक्त कचरा जमा हुआ, उसे अलग से 31 दिसंबर 2026 तक हटाना है। बड़ा ढेर पहले, बाक़ी बाद में।

दोनों तारीख़ों को साथ रखें तो दिसंबर का लक्ष्य टूटा नहीं लगता। यह ज़्यादा तफ़सील से बताया गया लगता है। पर एक फ़र्क़ है। अगस्त 2026 की विज्ञप्ति में एक नई शर्त जुड़ी है, जो वार्षिक रिपोर्ट में नहीं थी। मंत्री ने कहा कि नए आ रहे कचरे को प्रोसेस करने का ठेका जल्दी शुरू होना चाहिए, वरना पुराना ढेर साफ़ होने से पहले नया ढेर बनने लगेगा।

इसका मतलब है कि दिसंबर 2026 की तारीख़ एक चलती हुई शर्त पर टिकी है। अगर नए कचरे की प्रोसेसिंग समय पर शुरू नहीं हुई, तो पुराने कचरे की सफ़ाई की रफ़्तार पर भी असर पड़ सकता है। यह शर्त किसी दस्तावेज़ में तारीख़ के साथ दर्ज नहीं है।

पूरे देश के लिए ऐसी कोई एक तारीख़ किसी भी पढ़े गए दस्तावेज़ में नहीं मिली। डीआरएपी की अपनी कोई समाप्ति तारीख़ दर्ज नहीं है, न वार्षिक रिपोर्ट में, न बैकग्राउंडर में। जो तय है, वह सिर्फ़ इतना: टॉप 214 डंपसाइट को बाक़ी से पहले निपटाना है।

दोबारा न भरे, इसके लिए मशीन से ज़्यादा निगरानी चाहिए

बैकग्राउंडर का आख़िरी हिस्सा एक सवाल उठाता है जो चारों कहानियों से बड़ा है। पहाड़ हटा भी दिया जाए, तो वह दोबारा नहीं बनेगा, इसकी गारंटी क्या है।

रिलीज़ के मुताबिक़ जवाब मशीन में नहीं, तीन संस्थागत औज़ारों में है। पहला, हर शहर की अपनी सॉलिड वेस्ट एक्शन प्लान, जो बताती है कि रोज़ के कचरे का क्या होगा। दूसरा, एसबीएम-यू के पोर्टल पर हर शहर की प्रगति का लगातार दर्ज होना। तीसरा, सालाना स्वच्छ सर्वेक्षण रैंकिंग, जो शहरों को एक-दूसरे से तुलना में रखती है।

यह तर्क समझ में आता है। गोरखपुर का पार्क तभी पार्क बना रहेगा जब वहाँ रोज़ का नया कचरा दोबारा जमा न हो। नागपुर की भांडेवाड़ी तभी प्रोसेसिंग प्लांट बनी रहेगी जब रोज़ आने वाला कचरा उतनी ही रफ़्तार से प्रोसेस होता रहे जितनी रफ़्तार से आता है। भलस्वा में मंत्री ख़ुद यही चिंता दोहरा चुके हैं।

पर तीनों औज़ार निगरानी के हैं, गारंटी के नहीं। पोर्टल पर आँकड़ा दर्ज होना और ज़मीन पर हालात एक जैसे होना दो अलग बातें हैं, ठीक वैसे ही जैसे "रेमेडिएशन पूरा" और "डंपसाइट ख़त्म" दो अलग बातें निकलीं। बैकग्राउंडर ख़ुद इतना मानता है कि यह एक बार की सफ़ाई को टिकाऊ व्यवस्था में बदलने की कोशिश है। कोशिश पूरी हो चुकी उपलब्धि नहीं।

चार शहरों में से एक का पहाड़ सच में जा चुका है।

बाक़ी तीन का हिसाब अगली रिपोर्ट में देखना होगा।

स्रोतपत्र सूचना कार्यालय, आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय, पीआईबी बैकग्राउंडर, 21 सितंबर 2026, शाम 5:03: Reclaiming the Land Beneath the Waste — Transforming India's Legacy Dumpsites, आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय, वार्षिक रिपोर्ट 2025-26, अध्याय 4 (स्वच्छ भारत मिशन), पैरा 4.08-4.09; अधिकतर आँकड़े 31 दिसंबर 2025 तक के, पत्र सूचना कार्यालय, आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय, 1 अगस्त 2026, दोपहर 2:58: मंत्री मनोहर लाल का भलस्वा डंपसाइट दौरा, पत्र सूचना कार्यालय, आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय, 22 जुलाई 2026, शाम 5:59: Bhandewadi's Urban Facelift — Turning Legacy Waste Into Opportunity

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