गुजरात के चार दलों पर आयकर विभाग की शिकायत, तीन पर अलग एफ़आईआर दर्ज
शनिवार, 26 सितंबर को गुजरात पुलिस की सीआईडी क्राइम ने तीन ग़ैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों, स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी, गरीब कल्याण पार्टी और सत्यवादी रक्षक पार्टी के ख़िलाफ़ अलग-अलग एफ़आईआर दर्ज कीं, हर एक आयकर विभाग की शिकायत पर। तीन दिन पहले, बुधवार को, अहमदाबाद के उप आयकर आयुक्त ने एक चौथी पार्टी, भारतीय नेशनल जनता दल पर सीधे अपनी शिकायत दाख़िल की थी, अकेले उस पर 1,143.85 करोड़ रुपये के बोगस दान का आरोप है। दोनों मामलों को मिलाकर कुछ रिपोर्टों में चला 'तीन दल, 1,870 करोड़ रुपये' का आँकड़ा जोड़ में सही बैठता है, पर पार्टियाँ ग़लत हैं: शनिवार की तीन एफ़आईआर में बीएनजेडी शामिल नहीं है।

शनिवार, 26 सितंबर की दोपहर गुजरात पुलिस की सीआईडी क्राइम ने तीन अलग-अलग प्राथमिकियाँ दर्ज कीं। तीनों का विषय एक ही था। राजनीतिक चंदे की आड़ में टैक्स की चोरी। आरोप है कि तीन पंजीकृत लेकिन ग़ैर-मान्यता प्राप्त दलों ने भारी चंदा दिखाया, पर यह चंदा असली नहीं था। पैसा बैंक खाते में आया। बोगस बिलों के सहारे निकाला गया। कमीशन काटकर बाक़ी नक़द वापस लौटाया गया।
तीन दिन पहले, बुधवार को, अहमदाबाद के उप आयकर आयुक्त ने ख़ुद एक शिकायत दाख़िल की। निशाने पर एक चौथी पार्टी थी। नाम भारतीय नेशनल जनता दल, संक्षेप में बीएनजेडी। अकेले इसी पार्टी पर 1,143.85 करोड़ रुपये के बोगस दान का आरोप है। यह रक़म बाक़ी तीनों दलों के दान से भी बड़ी है।
कुछ रिपोर्टों ने दोनों मामलों को मिलाकर एक आँकड़ा बनाया: "तीन दल, 1,870 करोड़ रुपये।" जोड़ में यह लगभग सही बैठता है। पर शनिवार को जिन तीन दलों पर एफ़आईआर दर्ज हुई, उनमें बीएनजेडी नहीं है।
असली तस्वीर तीन नहीं, चार दलों की है। और दो अलग-अलग शिकायतों की।
चार दल, दो शिकायतें, एक उलझा आँकड़ा
तीन एफ़आईआर शनिवार को दर्ज हुईं। गुजरात सीआईडी क्राइम की गांधीनगर ज़ोन टीम ने यह काम किया। हर एफ़आईआर की शिकायतकर्ता आयकर विभाग है, और हर एक अलग पार्टी के बारे में।
पहली, आणंद की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी पर। आरोप: 519 करोड़ रुपये का बोगस चंदा, 155 करोड़ रुपये की कथित कर चोरी। दूसरी, अहमदाबाद की गरीब कल्याण पार्टी पर। रक़म क़रीब 205 करोड़ रुपये बताई गई है, अलग-अलग रिपोर्टों में 204.76 और 206.76 करोड़ रुपये के बीच। नुक़सान का आँकड़ा 62 करोड़ रुपये है। तीसरी एफ़आईआर अहमदाबाद की ही सत्यवादी रक्षक पार्टी पर है। इसके तीन पदाधिकारियों और एक कॉस्ट अकाउंटेंट पर आपराधिक साज़िश का आरोप है। नुक़सान 124.5 करोड़ रुपये आँका गया।
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक़ तीनों मिलाकर सरकारी ख़ज़ाने को एक तय नुक़सान हुआ। यह नुक़सान 2022 से 2025 के बीच 314 करोड़ रुपये बताया गया है। पर तीनों अलग-अलग आँकड़े जोड़ने पर यह रक़म 341.5 करोड़ रुपये बैठती है। यह फ़र्क़ पीटीआई की अपनी ही रिपोर्ट में है। उपलब्ध रिपोर्टिंग में इसकी कोई वजह नहीं बताई गई।
बुधवार, 23 सितंबर को दाख़िल हुई चौथी शिकायत अलग रास्ते से आई। यह एफ़आईआर नहीं थी। यह आयकर अधिनियम की उन धाराओं के तहत की गई शिकायत थी, जो विभाग को पुलिस के बजाय सीधे अदालत जाने का अधिकार देती हैं। अहमदाबाद के उप आयकर आयुक्त डॉ. राजेंद्र राज जेहरा राम ने यह शिकायत दाख़िल की। निशाना गांधीनगर की भारतीय नेशनल जनता दल थी। रक़म बाक़ी तीनों से बड़ी है: वित्त वर्ष 2019-20 से 2024-25 के बीच 56,238 दानदाताओं से 1,143.85 करोड़ रुपये, और अनुमानित कर नुक़सान 343 करोड़ रुपये।
चार अलग दल। दो अलग तरह की शिकायतें। चार अलग तारीख़ें। जिस "1,870 करोड़ रुपये, तीन दल" के आँकड़े ने कुछ रिपोर्टों में जगह पाई, वह बीएनजेडी की 1,143.85 करोड़, एसएपी की 519 करोड़ और जीकेपी की क़रीब 205 करोड़ रुपये को जोड़कर बनता है। कुल रक़म 1,860 से 1,870 करोड़ रुपये के बीच बैठती है। हिसाब सही है।
पार्टियाँ ग़लत हैं। शनिवार को जिन तीन पर एफ़आईआर हुई, उनमें बीएनजेडी नहीं है। उनमें सत्यवादी रक्षक पार्टी है, जिसका नाम "1,870 करोड़" वाले आँकड़े में कहीं नहीं आता।
गजेरा की पार्टी: छप्पन हज़ार दानदाता, तीन लाख रसीदें
बीएनजेडी पर शिकायत का आधार 12 नवंबर 2025 की छापेमारी है। उस दिन आयकर विभाग ने छापे मारे। आयकर अधिनियम की धारा 132 के तहत यह कार्रवाई हुई, गांधीनगर के सेक्टर 11 स्थित मेघमल्हार कॉम्प्लेक्स में, पार्टी दफ़्तर पर और पदाधिकारियों के घरों पर। रिपोर्टों के मुताबिक़ यह छापेमारी अहमदाबाद, गांधीनगर, जूनागढ़, सूरत, वडोदरा और राजकोट में मिलाकर 24 से ज़्यादा जगह फैली थी। केंद्र में पार्टी अध्यक्ष सुरेंद्रकुमार विट्ठलभाई गजेरा थे।
शिकायत का तरीक़ा सीधा है। दानदाता के तौर पर पहचाने गए करदाता चेक या आरटीजीएस से बीएनजेडी के खाते में रक़म भेजते थे।

बदले में उन्हें दान की रसीद मिलती। इस रसीद के सहारे वे आयकर अधिनियम की धारा 80जीजीबी और 80जीजीसी के तहत कटौती का दावा कर सकते थे। पार्टी यही रक़म आगे भेज देती, कजल एंटरप्राइज़ और परमार एसोसिएट्स जैसी फ़र्मों को। वहाँ अनाज और दालों की ख़रीद के बनावटी बिल तैयार होते। इसके बाद 2 से 10 फ़ीसदी कमीशन कटता। बाक़ी रक़म नक़द निकाली जाती। आंगड़िया या हवाला चैनलों से यह असली दानदाताओं तक पहुँचती।
शिकायत में गजेरा को मुख्य साज़िशकर्ता बताया गया है। कमीशन की दर तय करना, उन्हीं के ज़िम्मे था। बिचौलिया फ़र्मों और हवाला चैनलों से नक़द वापसी की व्यवस्था भी उन्हीं की देखरेख में होती थी, ऐसा आरोप है। महासचिव विपुल सोलंकी पर भी आरोप है। वे व्हॉट्सऐप पर दानदाताओं का ब्योरा जुटाते थे। फिर गजेरा से तालमेल बिठाकर बोगस रसीदें भेजते थे। कोषाध्यक्ष रौनकसिंह चावड़ा के परिसर से जाँच में क़रीब 2.91 लाख रसीदें मिलीं। जाँचकर्ताओं को एक और सुराग़ मिला: अभिषेक शर्मा नाम के बिचौलिए के साथ व्हॉट्सऐप बातचीत, जिसमें 6 फ़ीसदी कमीशन काटकर आंगड़िया चैनल से पैसा भेजने का ज़िक्र है।
चार्टर्ड अकाउंटेंट आदिल सैयद पर भी आरोप है। उन्होंने पार्टी के खातों की जाँच नहीं की। फिर भी ऑडिट रिपोर्ट पर डिजिटल हस्ताक्षर कर दिए। शिकायत का दावा है कि हिसाब प्रमाणित करने से पहले वे न पार्टी दफ़्तर गए, न किसी पदाधिकारी से मिले। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इस काम में शामिल चार्टर्ड अकाउंटेंटों को महज़ 50 हज़ार रुपये नक़द मिलते थे।
वित्त वर्ष 2019-20 से 2024-25 तक, यानी छह बरस में, पार्टी को 56,238 दानदाताओं से 1,143.85 करोड़ रुपये मिलने का आरोप है। आयकर विभाग का अनुमान है कि इससे सरकार को सीधे 343 करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ। यह मिले चंदे का क़रीब 30 फ़ीसदी है। शिकायत का यह भी दावा है कि इन लेन-देन को असली दिखाने के लिए झूठे हिसाब-किताब बनाए गए। चुनाव आयोग को फ़ॉर्म 24ए में भेजी गई योगदान रिपोर्ट भी इसी झूठ का हिस्सा थी, ऐसा आरोप है।
तीन और दल, वही तरीक़ा
शनिवार की तीनों एफ़आईआर में तरीक़ा लगभग बीएनजेडी जैसा ही है। रक़में अलग हैं। आणंद की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी के दफ़्तर के पते पर गुजरात समाचार के रिपोर्टरों को अहमदाबाद के नरोडा इलाक़े में एक दुकान भर मिली। न बोर्ड, न स्टाफ़, न कोई राजनीतिक गतिविधि। इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष सुरेंद्रसिंह पुरुषोत्तमदास तिवारी हैं। मेहुल कुमार महेशकुमार खत्री और चार्टर्ड अकाउंटेंट मुकुंदभाई चंदनसिंह राठौड़ भी आरोपी हैं। शिकायत के मुताबिक़ इस पार्टी के ज़रिए 519 करोड़ रुपये का बोगस चंदा दिखाया गया। कर चोरी का आँकड़ा 155 करोड़ रुपये है। कमीशन की दर 8 से 9 फ़ीसदी के बीच बताई गई है।
अहमदाबाद की नाना चिलोड़ा स्थित गरीब कल्याण पार्टी पर शुक्रवार, 25 सितंबर को शिकायत दाख़िल हुई। शिकायतकर्ता अहमदाबाद के सहायक आयकर निदेशक यतीश शशिकांत काळे हैं। नौ लोग आरोपी हैं, इनमें अध्यक्ष नीरज कुमार क्षत्रिय, सचिव धनंजय सिंह राजपूत और कोषाध्यक्ष धीरज कुमार क्षत्रिय शामिल हैं। तीन चार्टर्ड अकाउंटेंट भी आरोपियों में हैं। इस पार्टी से जुड़ी फ़र्मों के बैंक खातों की जाँच में एक और आँकड़ा मिला: 1,295 करोड़ रुपये से ज़्यादा के क्रेडिट लेनदेन। यह रक़म चंदे के दावे से कहीं बड़ी है। इसका हिसाब अभी उपलब्ध रिपोर्टिंग में नहीं है।
अहमदाबाद की ही सत्यवादी रक्षक पार्टी पर तीसरी एफ़आईआर दर्ज हुई। इसकी रक़म सबसे कम बताई गई है। तीन पदाधिकारियों और एक कॉस्ट अकाउंटेंट पर आपराधिक साज़िश का आरोप है। नुक़सान 124.5 करोड़ रुपये आँका गया है। एडीआर के विश्लेषण में इसी पार्टी की ख़ुद घोषित आय दर्ज है, 2019-20 से 2023-24 के बीच 416.23 करोड़ रुपये। यह आँकड़ा एफ़आईआर के नुक़सान वाले आँकड़े से क़रीब उसी अनुपात पर बैठता है, जो बाक़ी मामलों में दिखा।
तीनों एफ़आईआर में एक दावा साझा है। पार्टियों ने चुनाव आयोग को ग़लत योगदान रिपोर्ट दी। इससे मिले चंदे का क़रीब 30 फ़ीसदी हिस्सा सरकारी ख़ज़ाने को चपत के तौर पर गिना गया। पीटीआई के मुताबिक़ अब तक किसी आरोपी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है।

धारा 13ए: चंदा टैक्स-फ्री क्यों है, शर्त क्या है
चारों मामलों की बुनियाद एक ही क़ानूनी छूट है। आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 13ए इसे तय करती है। इसके तहत किसी राजनीतिक दल को मिलने वाला कोई भी स्वैच्छिक चंदा उसकी कुल आय में नहीं गिना जाता, चाहे रक़म कितनी भी हो। यह छूट बिना शर्त नहीं है।

क़ानून चार शर्तें रखता है। पहली: दल ऐसे बहीखाते और काग़ज़ात रखे जिनसे आकलन अधिकारी उसकी आय ख़ुद निकाल सके। दूसरी: बीस हज़ार रुपये से ज़्यादा के हर चंदे का रिकॉर्ड रखे, दानदाता का नाम और पता समेत। तीसरी: दल के खातों का ऑडिट धारा 288 की परिभाषा वाला कोई मान्यता प्राप्त अकाउंटेंट करे। चौथी: दो हज़ार रुपये से ज़्यादा का कोई भी दान चेक, बैंक ड्राफ़्ट, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या इलेक्टोरल बॉन्ड के अलावा किसी और तरीक़े से न लिया जाए। एक पाँचवीं शर्त भी है। अगर दल जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29सी की रिपोर्ट तय समय पर दाख़िल नहीं करता, तो उस साल की छूट ख़ुद-ब-ख़ुद ख़त्म हो जाती है।
चारों मामलों में जो तरीक़ा बताया गया है, वह इन शर्तों को धता नहीं बताता। वह बस उनकी काग़ज़ी शक्ल भर पूरी करता है। चेक और आरटीजीएस से पैसा आया, इसलिए बैंकिंग चैनल की शर्त दिखने में पूरी होती है। रसीद जारी हुई। नाम-पता दर्ज हुआ। ऑडिट रिपोर्ट पर दस्तख़त भी हुए। धोखा वहाँ है जो काग़ज़ पर नहीं दिखता: दानदाता को बाद में उसी पैसे का बड़ा हिस्सा नक़द वापस मिल जाना।
दानदाता की तरफ़ से जो कटौती ली गई, वह धारा 80जीजीबी और 80जीजीसी से आती है। पहली कंपनियों के लिए है, दूसरी बाक़ी सबके लिए। दोनों धाराओं की शर्त एक ही है। चंदा किसी ऐसे दल को जाए जो जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29ए के तहत पंजीकृत हो, और भुगतान नक़द में न हो। कटौती की कोई ऊपरी सीमा नहीं है। यानी क़ानून जितनी छूट देता है, धोखा उतना ही बड़ा हो सकता है, बशर्ते बोगस रसीद और झूठा ऑडिट साथ चलें।
धारा 29सी एक ज़िम्मेदारी तय करती है। यह ज़िम्मेदारी हर दल के कोषाध्यक्ष पर है। हर वित्त वर्ष में बीस हज़ार रुपये से ज़्यादा के हर चंदे की रिपोर्ट तैयार करे। इसे उस साल की आयकर रिटर्न की तय तारीख़ से पहले चुनाव आयोग को सौंपे। अगर यह रिपोर्ट नहीं दी जाती, तो नतीजा साफ़ है। धारा 29सी की उपधारा 4 के तहत दल को उस साल आयकर अधिनियम की कोई राहत नहीं मिलेगी। चारों शिकायतों का आरोप है कि यही रिपोर्ट झूठी बनाई गई, ताकि यह ज़िम्मेदारी काग़ज़ पर निभती दिखे।
चुनाव आयोग का हथियार: सूची से नाम हटाना, पंजीकरण नहीं छीनना
कोई भी दल जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29ए के तहत आवेदन देकर चुनाव आयोग में पंजीकृत होता है। पंजीकरण मिलते ही धारा 13ए की टैक्स छूट और धारा 80जीजीबी-80जीजीसी की कटौती, दोनों अपने-आप लागू हो जाती हैं। पर जिस आसानी से यह पंजीकरण मिलता है, उतनी आसानी से यह छिनता नहीं।
2002 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फ़ैसला दिया। मामला था इंडियन नेशनल कांग्रेस बनाम इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल वेलफ़ेयर। अदालत ने कहा कि धारा 29ए के तहत पंजीकरण देना चुनाव आयोग का अर्ध-न्यायिक काम है, प्रशासनिक नहीं। जनरल क्लॉज़ेज़ एक्ट की जो धारा किसी संस्था को अपना ही आदेश वापस लेने का हक़ देती है, वह ऐसे अर्ध-न्यायिक फ़ैसलों पर लागू नहीं होती। इसलिए आयोग किसी दल का पंजीकरण सिर्फ़ तीन हालात में रद्द कर सकता है। पहला: पंजीकरण धोखे या जालसाज़ी से मिला हो। दूसरा: दल ने अपने संविधान में संशोधन कर भारत के संविधान के प्रति निष्ठा ही छोड़ दी हो। तीसरा: केंद्र सरकार ने उसे क़ानूनन प्रतिबंधित कर दिया हो।
इनमें से कोई शर्त फ़िलहाल गुजरात के इन चार दलों पर लागू नहीं होती। इसलिए आयोग के पास बचा एक ही औज़ार है। इसे वह ख़ुद "डी-लिस्टिंग" यानी सूची से हटाना कहता है। इससे दल का प्रतीक और स्टार प्रचारक जैसे अधिकार छिन जाते हैं। पर धारा 29ए का पंजीकरण काग़ज़ पर बना रहता है। यह औज़ार भी एक ही शर्त पर चलता है: दल ने 2019 से लगातार छह बरस तक कोई चुनाव न लड़ा हो।
आयोग की 9 अगस्त 2025 की प्रेस विज्ञप्ति इसका ब्योरा देती है। उस वक़्त देश में 2,854 पंजीकृत लेकिन ग़ैर-मान्यता प्राप्त दल थे, यानी ऐसे दल जो चुनाव आयोग में दर्ज तो हैं पर किसी राज्य या राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने लायक़ वोट कभी नहीं जुटा पाए। जून 2025 में शुरू हुई पहली जाँच में 345 दलों को नोटिस मिला। इनमें से 334 सूची से हटा दिए गए। कुल गिनती 2,854 से घटकर 2,520 रह गई। विज्ञप्ति में एक और बात दर्ज है: सूची से हटते ही कोई भी दल जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29बी और 29सी के तहत मिलने वाला फ़ायदा, और आयकर अधिनियम की जुड़ी छूट, दोनों खो देता है। नेशनल हेराल्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ यह गिनती 5 सितंबर 2026 तक बढ़कर 800 से ऊपर पहुँच चुकी थी।
गुजरात के ये चार दल इस पूरी सफ़ाई से बाहर रहे, एक वजह से। चारों ने 2017 और 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव लड़े। 2024 का लोकसभा चुनाव भी लड़ा, भले उम्मीदवारों की गिनती हर बार मुट्ठी भर रही। छह बरस तक चुनाव न लड़ने की शर्त पर वे कभी खरे नहीं उतरे। डी-लिस्टिंग की कैंची इन तक कभी नहीं पहुँची।
मैदान पर रिकॉर्ड: ज़मानत हर बार ज़ब्त, दफ़्तर पर ताला
बीबीसी हिंदी की पत्रकार शुभांगी मिश्रा की एक पड़ताल ने इन दलों की तरफ़ पहला ध्यान खींचा था। तारीख़ थी 5 सितंबर 2026, आयकर विभाग की किसी भी शिकायत से क़रीब तीन हफ़्ते पहले। नेशनल हेराल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक़ उस पड़ताल ने एक पैटर्न पकड़ा। गुजरात मुख्यालय वाले छह ऐसे दल हैं, इन चारों के अलावा आम जनमत पार्टी और न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी। इन्हें मिलाकर 2022-23 में 1,500 करोड़ रुपये से ज़्यादा का चंदा मिला था। यह रक़म बीजेपी को छोड़कर बाक़ी हर मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल को उस साल मिले कुल चंदे से भी ज़्यादा थी। इसी अकेले साल में गरीब कल्याण पार्टी को सबसे कम मिला, 138 करोड़ रुपये। आम जनमत पार्टी को सबसे ज़्यादा मिला, 620 करोड़ रुपये। सत्यवादी रक्षक पार्टी को 330 करोड़ रुपये मिले। पड़ताल ख़ुद यह नहीं कहती कि इसमें कोई ग़ैर-क़ानूनी काम हुआ।
छहों दलों ने मिलकर 2024 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ़ 15 उम्मीदवार उतारे। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत ज़मानत बचाने के लिए किसी उम्मीदवार को कुल वैध वोट का छठा हिस्सा चाहिए। इनके उम्मीदवारों को हर बार 300 से 1,700 वोट के बीच मिले। राज्यभर वोट शेयर 0.01 फ़ीसदी से भी कम रहा। ज़मानत हर बार ज़ब्त हुई।
सत्यवादी रक्षक पार्टी की अध्यक्ष स्वाती बेन आणंद में रहती हैं। पार्टी का पंजीकृत दफ़्तर उसी रिहायशी परिसर के दूसरे फ़्लैट में दर्ज है। उन्होंने बीबीसी को बताया कि पार्टी ने चंदा दान-पुण्य में ख़र्च किया। पर इसका कोई हिसाब नहीं रखा गया। पार्टी का दावा है कि 330 करोड़ रुपये में से 316 करोड़ रुपये दान में ख़र्च हो गए। 2024 के लोकसभा चुनाव में उसने सिर्फ़ एक उम्मीदवार उतारा। उस पर 8 करोड़ रुपये ख़र्च होने का दावा किया गया।
एडीआर के आँकड़े: घोषित आय और शिकायत के आँकड़े का फ़ासला
एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स ने 2,764 पंजीकृत ग़ैर-मान्यता प्राप्त दलों के दस्तावेज़ खँगाले। इनमें सबसे ज़्यादा आय वाले दस दलों की कुल घोषित आय निकाली, 2019-20 से 2023-24 तक की। यह रक़म 3,014.27 करोड़ रुपये बैठती है। इस सूची में बीएनजेडी सबसे ऊपर है, 957.44 करोड़ रुपये के साथ।
यह आँकड़ा शिकायत के आँकड़े से मेल नहीं खाता। आयकर विभाग की शिकायत उसी जैसी अवधि के लिए, 2019-20 से 2024-25, 1,143.85 करोड़ रुपये का दावा करती है। यह क़रीब 186 करोड़ रुपये ज़्यादा है। एक साल का फ़र्क़ इसकी पूरी वजह नहीं हो सकता। दोनों आँकड़े अलग स्रोतों से आते हैं। एडीआर पार्टी की अपनी दाख़िल रिपोर्टों से, शिकायत जाँच में मिले बैंक रिकॉर्ड से। इसलिए दोनों को सीधे बराबर नहीं रखा जा सकता। पर फ़र्क़ ख़ुद एक तथ्य है। पार्टी ने चुनाव आयोग को जो बताया, जाँच ने उससे कहीं ज़्यादा पाया।
एडीआर की उसी पड़ताल का एक और आँकड़ा है। जाँचे गए दलों में से 73.26 फ़ीसदी ने समय पर अपनी ऑडिट या योगदान रिपोर्ट चुनाव आयोग को नहीं सौंपी। यानी धारा 29सी की जो शर्त धारा 13ए की छूट को टिकाए रखती है, बहुसंख्यक दल उसे पहले ही पूरा नहीं कर रहे। सत्यवादी रक्षक पार्टी की घोषित आय, वही चार साल, 416.23 करोड़ रुपये दर्ज है। यह आँकड़ा एफ़आईआर के 124.5 करोड़ रुपये के नुक़सान वाले दावे से क़रीब उसी अनुपात पर बैठता है जो बाक़ी मामलों में दिखा।
जाँच अभी कहाँ खड़ी है
चारों मामलों में अब तक कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई है। पीटीआई के मुताबिक़ आरोपी पदाधिकारियों ने कथित तौर पर एक बात क़बूल की। पार्टियाँ सिर्फ़ कमीशन कमाने के लिए बनाई गई थीं। जाँच जारी है।
जेबीटी न्यूज़ से बात करने वाले एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का नाम रिपोर्ट में नहीं है। उन्होंने कहा कि आयकर विभाग ख़ुद शिकायतकर्ता होने से काग़ज़ी सबूत पहले से मज़बूत हैं। फ़ोरेंसिक सबूत जुटाए जा रहे हैं। आरोपियों की संपत्ति पर रोक लगाने की क़ानूनी प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। यह ब्योरा एक अनाम अधिकारी के हवाले से है, दस्तावेज़ से नहीं। किसी उपलब्ध रिपोर्ट में एफ़आईआर या शिकायत के केस नंबर दर्ज नहीं मिले। चुनाव आयोग ने भी इन चार दलों पर अलग से कोई बयान नहीं दिया है। तीनों एफ़आईआर के नुक़सान का जो कुल आँकड़ा पीटीआई ने दिया, 314 करोड़ रुपये, वह तीनों अलग रक़में जोड़ने पर बनने वाले 341.5 करोड़ रुपये से मेल नहीं खाता। यह फ़र्क़ कहीं समझाया नहीं गया है।
चारों दल फ़िलहाल आरोपी हैं, दोषी नहीं।
स्रोतद प्रिंट, पीटीआई की ख़बर, 26 सितंबर 2026: गुजरात सीआईडी क्राइम ने स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी, सत्यवादी रक्षक पार्टी और गरीब कल्याण पार्टी पर तीन अलग एफ़आईआर दर्ज कीं, गुजरात समाचार (अंग्रेज़ी), 26 सितंबर 2026: बीएनजेडी और चार पदाधिकारियों पर 1,143 करोड़ रुपये के बोगस दान का आरोप, जीएसटीवी गुजराती न्यूज़, 26 सितंबर 2026: बीएनजेडी शिकायत का पूरा ब्योरा, डॉ. राजेंद्र राज जेहरा राम के हवाले से, अधिवक्ता परेश एम. मोदी, क़ानूनी विश्लेषण, 26 सितंबर 2026: बीएनजेडी मामले में लागू आयकर अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की धाराएँ, देशगुजरात, 12 नवंबर 2025: गजेरा से जुड़े ठिकानों पर आयकर विभाग की तलाशी की रिपोर्ट, गुजरात समाचार (अंग्रेज़ी), 26 सितंबर 2026: स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी पर 519 करोड़ रुपये के बोगस दान का आरोप, गुजरात समाचार (अंग्रेज़ी), 26 सितंबर 2026: गरीब कल्याण पार्टी पर 204.76 करोड़ रुपये के बोगस दान का आरोप, शिकायतकर्ता यतीश शशिकांत काळे, जेबीटी न्यूज़ (हिंदी), 26 सितंबर 2026: '1,870 करोड़ रुपये, तीन दल' की रिपोर्ट, जिसमें बीएनजेडी को तीन एफ़आईआर वाले दलों में गिना गया, पत्र सूचना कार्यालय, चुनाव आयोग, 26 जून 2025: 345 पंजीकृत ग़ैर-मान्यता प्राप्त दलों को डी-लिस्ट करने की प्रक्रिया शुरू, पत्र सूचना कार्यालय, चुनाव आयोग, 9 अगस्त 2025: 334 दल सूची से हटाए गए, कुल गिनती 2,854 से 2,520, एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (एडीआर): 2,764 पंजीकृत ग़ैर-मान्यता प्राप्त दलों के आय आँकड़ों का विश्लेषण, 2019-20 से 2023-24, नेशनल हेराल्ड, 5 सितंबर 2026: बीबीसी हिंदी की पड़ताल पर आधारित रिपोर्ट, छह गुजराती दलों और उनके 2022-23 के चंदे पर, इंडियन कानून: आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 13ए, पूरा पाठ, इंडियन कानून: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29सी, पूरा पाठ, इंडियन कानून: आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80जीजीसी, पूरा पाठ